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गुरुवार, 26 मार्च 2026

ऋषभदेव कथानक में अग्नि का प्रथम अनुभव तथा ऋग्वेद का प्रथम मंत्र ‘अग्निमीळे पुरोहितं’: एक तुलनात्मक अध्ययन


प्रस्तावना

आवश्यक निर्युक्ति, कल्पसूत्र टीका, त्रिषष्टि शलाका पुरुष चरित्र आदि जैन ग्रंथों में प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव की कथा से ऋग्वेद १.१.१ मंत्र, अर्थात वेद के प्रथम मंत्र का बड़ा गहरा सम्बन्ध दृष्टिगोचर होता है। भारतीय परम्पराओं में सभ्यता के प्रारम्भ, अग्नि के प्रथम अनुभव तथा यज्ञ परम्परा के उद्भव के सम्बन्ध में विविध संकेत मिलते हैं। प्रस्तुत लेख में जैन परम्परा में वर्णित ऋषभदेव सम्बन्धी कथानकों के आधार पर अग्नि के प्रथम अनुभव और उसके प्रति विकसित श्रद्धा-भाव को ऋग्वेद के प्रथम मंत्र के सन्दर्भ में समझने का प्रयास किया गया है।

प्रथम तीर्थंकर श्री ऋषभदेव, शत्रुंजय तीर्थ, पालीताना 

अकर्मभूमि और मानव सभ्यता का संक्रमण

ऋषभदेव के पिता नाभि अंतिम कुलकर थे। उस समय जम्बूद्वीप का भरत क्षेत्र अकर्मभूमि था, अर्थात जहाँ किसी प्रकार असि, मसि, कृषि का व्यवहाररूप कर्म नहीं था। उस समय के मनुष्य अत्यंत सरल एवं संतोषी थे; उनकी सभी आवश्यकताओं की पूर्ति कल्पवृक्ष के माध्यम से हो जाती थी। अपनी जीविका के लिए उन्हें कोई कर्म नहीं करना पड़ता था, इसलिए उस समय की भूमि को अकर्मभूमि कहा जाता था।

कालक्रम से कल्पवृक्षों की फल प्रदान करने की क्षमता कम होने लगी और उस समय के मनुष्यों ने जीवन में पहली बार 'अभाव' का अनुभव किया। अभाव का अनुभव धीरे-धीरे आपसी झगड़ों में बदलने लगा और वे न्याय के लिए नाभि कुलकर के पास आने लगे। उस समय के मनुष्य अत्यंत सरल प्रकृति के थे; नाभि कुलकर उन्हें समझा-बुझाकर अथवा बहुत ही सामान्य मौखिक दंड देकर उन झगड़ों को शांत कर देते थे। धीरे-धीरे नाभि वृद्ध होने लगे और इस कार्य के लिए उन्होंने अपने पुत्र ऋषभ को मनोनीत कर दिया, और तब से ऋषभ ही इस प्रकार का न्याय और दंड-विधान करने लगे।

अग्नि का प्रथम आविर्भाव और मानव प्रतिक्रिया


राजा ऋषभ के समक्ष अग्नि की उत्पत्ति पर युगलिकों की आश्चर्यभिव्यक्ति 

जैन कथानकों के अनुसार उसी समय इस अवसर्पिणी काल के तीसरे आरे के अंतिम भाग में जम्बूद्वीप के इस भरत क्षेत्र में प्रथम बार अग्नि उत्पन्न हुई। इससे पहले इस क्षेत्र में अग्नि नहीं थी और कल्पवृक्ष के फल खाकर ही उस समय के मनुष्य अपनी भूख शांत करते थे।

जीवन में प्रथम बार अग्नि को देखकर उस समय के युगलिक मनुष्य अत्यंत आश्चर्यचकित हुए और विस्मित होकर अग्नि को सुंदर चमकीला फूल मानकर उसे तोड़ने जाने लगे, जिससे उनके हाथ जल गए और उन्हें भारी पीड़ा होने लगी। तब वे ऋषभ के पास आकर अग्नि के उत्पन्न होने से लेकर अपनी पीड़ा तक बताने लगे। अलौकिक ज्ञान से संपन्न ऋषभदेव ने भरतक्षेत्र में अग्नि की उत्पत्ति हुई है, ऐसा जानकर उन भोले, अबोध युगलिकों को अग्नि का ज्ञान कराया, परंतु यह बात उन्हें सही तरीके से समझ में नहीं आई। कथानक के अनुसार कालांतर में ऋषभदेव उनके राजा बने और धीरे-धीरे उन्हें असि, मसि, कृषि का व्यवहार तथा अग्नि का उपयोग समझाने में सफल रहे, परंतु यह अग्नि उनके लिए एक आश्चर्यजनक वस्तु बनी रही।

ऋषभदेव की दीक्षा और साधु परम्परा का आरम्भ

एक समय संसार से वैराग्य होने पर ऋषभदेव ने दीक्षा अंगीकार की और मुनिजीवन स्वीकार किया। उनके साथ उनके अनुयायी बनकर १००० अन्य पुरुषों ने भी दीक्षा अंगीकार कर मुनि बन गए। इस भरतक्षेत्र में वे पहले मुनि तपस्वी थे और मुनिजीवन के सम्बन्ध में किसी को कुछ भी पता नहीं था। दीक्षा लेने के बाद ऋषभदेव आहार के लिए भिक्षाटन करने लगे, परंतु भिक्षाविधि से अनजान तत्कालीन प्रजाजन उन्हें अपना राजा समझकर उनके सत्कार के लिए हाथी, घोड़े, रथ, वस्त्राभूषण, कन्या आदि देने लगे। परंतु सर्वत्यागी होने के कारण ऋषभदेव को इन बहुमूल्य वस्तुओं की नहीं, मात्र भोजन की अपेक्षा थी, और नासमझी के कारण कोई भी उन्हें भोजन नहीं देता था। शुद्ध भिक्षा नहीं मिलने के कारण ऋषभदेव एक वर्ष से अधिक निराहार रहे; मौन होने के कारण उन्होंने किसी को आहार देने के लिए नहीं कहा।

ऋषभदेव ने इतनी कठिन तपस्या कर आहार-परिषह को सहन किया, परंतु उनके १००० अनुयायी भूख सहन नहीं कर पाए। मौन होने के कारण ऋषभदेव ने भी उन्हें कुछ नहीं कहा। तब वे ऋषभदेव के परमभक्त, सरल परंतु अज्ञानी मनुष्यों ने निर्णय किया कि घर का त्याग किया है, अतः जंगल में ही रहेंगे; भूख सहन नहीं कर सकते, इसलिए जंगल के कंदमूल का भक्षण करेंगे और तापस बनकर साधना करेंगे।

ऋषभदेव अलौकिक ज्ञान से संपन्न थे, परंतु अभी केवलज्ञान प्राप्त नहीं हुआ था; वे सर्वज्ञ नहीं बने थे। तीर्थंकर सर्वज्ञ बनने से पहले उपदेश नहीं देते, अतः उन तापसों का कोई मार्गदर्शक नहीं था। आध्यात्मिक साधना के सम्बन्ध में कोई ज्ञान नहीं था, इसलिए अपनी बुद्धि के अनुसार जो उन्हें योग्य लगा, वैसा आचरण करने लगे।

अग्नि : आश्चर्य से आराधना तक

जैसा कि पहले ही कहा गया है, गृहस्थ जीवन में उन मनुष्यों का साक्षात्कार अग्नि से प्रथम बार हुआ था, जिसने उनके जीवन में आश्चर्य और भय का मिश्रित अनुभव प्रदान किया था। अग्नि उनके लिए आज भी एक विस्मयकारी शक्ति थी। जंगल में निवास करते हुए और प्राकृतिक शक्तियों से प्रत्यक्ष सम्पर्क में रहते हुए संभवतः उनके मन में अग्नि के प्रति श्रद्धा का भाव विकसित हुआ। इसी कारण उन्होंने अग्नि की पूजा तथा यज्ञकर्म प्रारम्भ किए। ऋग्वेद का प्रथम मंत्र "अग्निमीळे पुरोहितं" इसी सत्य की ओर संकेत करता है।

(विशेष: ऋग्वेद में सौ से अधिक बार, एवं यजुर्वेद में भी ऋषभ का नाम बारम्बार आया है. साथ ही ऋषभ के पुत्र भरत के नाम भी अनेकों बार उल्लेख हुआ है. यह उल्लेख वेदों के सन्दर्भ में ऋषभदेव के महत्व को रेखांकित करता है.)


वैदिक यज्ञ और अग्नि 


मंत्र

अग्निमीळे पुरोहितं यज्ञस्य देवम् ऋत्विजम् ।
होतारं रत्नधातमम् ॥

अब ऋग्वेद १.१.१ मंत्र का अर्थ सायणाचार्य के वैदिक भाष्य के अनुसार प्रस्तुत किया जा रहा है। सायणाचार्य का भाष्य वैदिक परंपरा का सर्वाधिक प्रचलित और पारंपरिक प्रामाणिक कर्मकाण्डीय अर्थ देता है।

सायणभाष्यम् (मूल पाठ)

"अग्निम् ईळे स्तौमि। कं? पुरोहितम्। पुरः हितः पुरस्तात् स्थाप्यते इति पुरोहितः। यज्ञस्य देवम् दीप्तिमन्तम्। ऋत्विजम् ऋतुषु यजनशीलम्। होतारं हव्यवाहनम्। रत्नधातमम् रत्नानां धनानां धातमं दातारम्।"

सायणाचार्य के अनुसार पदानुसार अर्थ

  1. अग्निम्
    सायणाचार्य के अनुसार यहाँ अग्नि का अर्थ यज्ञीय अग्नि है — वह अग्नि जिसमें आहुति दी जाती है और जो देवताओं तक हवि पहुँचाती है। यह लौकिक अग्नि ही है, परंतु यज्ञ में देवता का स्वरूप धारण करती है।
  2. ईळे
    “ईळे” का अर्थ है — स्तौमि अर्थात् “मैं स्तुति करता हूँ”।
    ऋषि यज्ञारम्भ में अग्नि का आह्वान करते हैं।
  3. पुरोहितम्
    सायणाचार्य कहते हैं —
    पुरः हितः = यज्ञस्य अग्रे स्थापितः
    अर्थात जो यज्ञ के आगे स्थापित किया जाता है।
    अग्नि यज्ञ का प्रथम अंग है, इसलिए वह पुरोहित है।
  4. यज्ञस्य देवम्
    अग्नि यज्ञ का देवता है क्योंकि वही यज्ञ का अधिष्ठाता है।
    सायणाचार्य के अनुसार —
    देवः = दीप्तिमान्
    जो प्रकाशमान है।
  5. ऋत्विजम्
    ऋतु + इज् = ऋतु के अनुसार यज्ञ करने वाला
    अर्थात अग्नि यज्ञ के प्रत्येक काल में आहुति ग्रहण करता है।
  6. होतारम्
    सायणाचार्य कहते हैं —
    हु शब्दे दाने
    जो हवि को देवताओं तक पहुँचाता है, वह होता है।
    अग्नि देवताओं का मुख है — वह आहुति स्वीकार कर उन्हें पहुँचाती है।
  7. रत्नधातमम्
    सायणाचार्य इस शब्द का अर्थ करते हैं —
    रत्नानि धनानि धत्ते इति
    जो धन, समृद्धि, पशु, पुत्र आदि प्रदान करता है।
    यहाँ रत्न का अर्थ लौकिक समृद्धि से है — कृषि, पशुधन, आयु, प्रतिष्ठा आदि।

सायणाचार्य के अनुसार अन्वय

अहम् यज्ञस्य पुरोहितं देवम् ऋत्विजम् होतारं रत्नधातमम् अग्निम् ईळे।

वैदिक ऋषियों द्वारा अग्नि में आहुति 


सायणाचार्य के अनुसार भावार्थ

मैं उस अग्नि की स्तुति करता हूँ जो यज्ञ का पुरोहित है, देवता है, ऋत्विज् है, होता है और यज्ञ के द्वारा साधकों को धन, समृद्धि तथा कल्याण प्रदान करती है।

सायणाचार्य के अनुसार यह मंत्र यज्ञारम्भ का मंगलाचरण है। ऋषि पहले अग्नि को आह्वान करते हैं क्योंकि—

अग्नि देवताओं का मुख है
अग्नि बिना यज्ञ संभव नहीं
अग्नि आहुति को देवताओं तक ले जाती है
अग्नि यज्ञकर्ता को फल दिलाती है 

उपसंहार

  • उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट होता है कि जैन परम्परा में वर्णित ऋषभदेव सम्बन्धी कथानकों में अग्नि के प्रथम अनुभव, उसके प्रति उत्पन्न आश्चर्य एवं भय, तथा क्रमशः विकसित श्रद्धा-भाव का उल्लेख मिलता है। यह मानसिक एवं सांस्कृतिक संक्रमण अग्नि के प्रति आराधनात्मक दृष्टि के विकास की ओर संकेत करता है। ऋग्वेद का प्रथम मंत्र अग्नि को पुरोहित, ऋत्विज् तथा यज्ञ का अधिष्ठाता मानते हुए इसी आराधनात्मक दृष्टिकोण को अभिव्यक्त करता है। इस प्रकार जैन कथानकों में वर्णित सभ्यता के संक्रमण और वैदिक साहित्य में व्यक्त अग्नि-स्तुति के बीच एक उल्लेखनीय वैचारिक साम्य दृष्टिगोचर होता है. 

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  • Thanks, 
    Jyoti Kothari, Proprietor at Vardhaman Gems, Jaipur, represents the centuries-old tradition of Excellence in Gems and Jewelry. He is an adviser at Vardhaman Infotech, a leading IT company in Jaipur. He is also an ISO 9000 professional.

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