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Friday, February 28, 2025

ऋषभाष्टकम् स्तोत्र अर्थ सहित

यह सर्वविदित तथ्य है की जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर श्री ऋषभदेव इस युग के आदिपुरुष थे जिन्होंने अपनी प्रज्ञा के वल पर जगत को असि, मसि, कृषि का ज्ञान दिया. उन्होंने संसार के जीवों को सर्वोत्तम पुरुषों की ७२ कलायें एवं   स्त्रियों की ६४ कलाओं का ज्ञान दिया. वे इस आर्यावर्त के प्रथम राजा, प्रथम श्रमण, प्रथम श्रमण, प्रथम सर्वज्ञ  एवं प्रथम तीर्थंकर थे. जैन आगम कल्पसूत्र एवं जिनसेन, वर्धमान सूरी, हेमचंद्राचार्य, मानतुंग सूरी आदि महान आचार्यों ने उनकी महिमा का गान किया है. जैनेतर साहित्य एवं धर्मग्रंथों जैसे वेद, पुराण, श्रीमद्भागवत, त्रिपिटक आदि में भी उनका उल्लेख मिलता है. 

प्रथम तीर्थंकर श्री ऋषभदेव,  शत्रुंजय तीर्थ  

ऋग्वेद एवं यजुर्वेद में स्थान स्थान पर उनका एवं उनकी उत्कृष्ट साधना का वर्णन मिलता है. इसी प्रकार की एक संस्कृत रचना है ऋषभाष्टकम्। जिस में ऋग्वेद के आधार पर श्री ऋषभदेव स्वामी की स्तुति की गई है. 

रचनाशैली 

इस ऋषभाष्टक की रचना में मुख्य रूप से भारवि कवि की गम्भीर एवं गौरवमयी शैली का अनुसरण किया गया है। भारवि अपनी रचनाओं में गूढ़ अर्थ, शक्तिशाली पदविन्यास तथा कठोरता और सरलता का संतुलित समावेश करके यथार्थ को स्पष्ट रूप से प्रस्तुत करते हैं। विशेष रूप से ऋग्वेद, यजुर्वेद आदि के उद्धरणों में तथा पुरुषोत्तम, वातरशन, आर्हत जैसे विशेषणों में भारवि की भांति गंभीरता प्रदान की गई है।

किन्तु, कुछ स्थलों परमाघ कवि की शब्द-चमत्कृति, कालिदास की मधुरता तथा दण्डिन की अलंकार प्रधान सौंदर्यपूर्ण शैली को भी समाहित किया गया है। 

यहाँ पर प्रस्तुत है ऋषभदेव की स्तुति रूप ऋषभाष्टकम् एवं उसका अर्थ. 

II अथ ऋषभाष्टकम् II  


ऋग्वेदवाचः सुकृतिप्रणामाः
यस्योत्तमं वेदविदः स्तुवन्ति।
अजोपनिष्ठं परमार्थगम्यं
तं ऋषभं पूण्डरीकं भजेऽहम्॥

(जिनकी महिमा ऋग्वेद एवं अन्य वेदों में गाई गई है, ऐसे प्रथम तीर्थंकर पुरुषोत्तम श्री ऋषभदेव की मैं स्तुति करता हूँ।)


आचर्षिणो यं जगतः समस्तं
कुशस्थलीमास्थितवांश्च योऽभूत्।
यजुर्विचारैः श्रुतिसंहिताभिः
तं वातरसं प्रणमामि नित्यं॥

(जिन्होंने संपूर्ण जगत् को ज्ञान दिया और जिनकी महिमा यजुर्वेद में वर्णित है, ऐसे वातरसन श्री ऋषभदेव की मैं स्तुति करता हूँ।)


सप्तार्चिषं यो रविवत् प्रकाशं
वेदेषु गीते रुचिरं विभाति।
ज्ञानप्रदीपं भवभीतिकर्त्रं
तं जिननाथं प्रणमाम्यहं सदा॥

(जो सूर्य के समान सात किरणों से प्रकाशित हैं, जो वेदों में गाए गए हैं, और जो ज्ञान के दीप हैं, ऐसे जिननाथ श्री ऋषभदेव की मैं स्तुति करता हूँ।)


यः सप्त सिन्धून् प्रवहन्न् दिशन्तं
ज्ञानामृतं लोकहिताय दत्तम्।
ऋग्यजुराद्यैः श्रुतिसंहिताभिः
संस्तूयते तं पुरुषोत्तमं भजे॥

(जो ज्ञान की गंगा बहाकर लोक का कल्याण करते हैं और जो ऋग्वेद एवं यजुर्वेद में स्तुत हैं, ऐसे पुरुषोत्तम श्री ऋषभदेव की मैं स्तुति करता हूँ।)


अनादिपूर्वः परमः पवित्रः
शुद्धो जितारिः सततं विनीतः।
ऋग्वेदवाक्यैः परिणीयमानं
तं पुरुषपुण्डरीकं नमामि॥

(जो अनादि, पवित्र, शुद्ध और जितेन्द्रिय हैं तथा जिनका गुणगान ऋग्वेद में किया गया है, ऐसे पुरुष पुण्डरीक श्री ऋषभदेव की मैं स्तुति करता हूँ।)


वेदेषु यो वर्णित आर्हतेशः
तपस्विनां पूज्यतमः सुपूज्यः।
सर्वज्ञता यस्य हि शाश्वती च
तं भगवन्तं प्रणमाम्यहं सदा॥

(जो वेदों में वर्णित हैं, जो तपस्वियों के पूज्य हैं और जिनकी सर्वज्ञता शाश्वत है, ऐसे भगवंत श्री ऋषभदेव की मैं स्तुति करता हूँ।)


यः सप्तशीर्षः चतुरश्रुगीतः
वेदेषु संकीर्तितपूर्वकाले।
वातरसनं जिननाथमाद्यं
तं ऋषभं प्राञ्जलिको भजामि॥

(जो सप्तशीर्ष एवं चतुरश्रु रूप में वेदों में वर्णित हैं, ऐसे वातरसन, जिननाथ, आदि तीर्थंकर श्री ऋषभदेव की मैं स्तुति करता हूँ।)


ऋग्यजुराद्यैरनघैः स्तुतश्च
यो विश्वनाथः सुरमौक्तिकाभिः।
सत्यं यथार्थं च समं सदा यो
तं वृषभं प्रणमामि नित्यं॥

(जो ऋग्वेद, यजुर्वेद आदि पवित्र वेदों में स्तुत हैं, जो सत्य, यथार्थ एवं समता के प्रतीक हैं, ऐसे वृषभ श्री ऋषभदेव की मैं स्तुति करता हूँ।)

॥इति श्री ऋषभाष्टकं संपूर्णम्॥

ऋषभाष्टक का विस्तृत हिंदी अर्थ


ऋग्वेदवाचः सुकृतिप्रणामाः
यस्योत्तमं वेदविदः स्तुवन्ति।
अजोपनिष्ठं परमार्थगम्यं
तं ऋषभं पूण्डरीकं भजेऽहम्॥

अर्थ:
जिनकी स्तुति ऋग्वेद और अन्य वेदों में की गई है, जिनके प्रति श्रेष्ठ पुरुष प्रणाम करते हैं, जो ज्ञानमार्ग के द्वारा परम सत्य को प्राप्त करने योग्य हैं, तथा जिन्होंने सांसारिक विषयों का त्याग कर दिया है, ऐसे पुरुषोत्तम, परम पवित्र, पुण्डरीक समान निर्मल श्री ऋषभदेव को मैं भजता हूँ (स्तुति करता हूँ)।


आचर्षिणो यं जगतः समस्तं
कुशस्थलीमास्थितवांश्च योऽभूत्।
यजुर्विचारैः श्रुतिसंहिताभिः
तं वातरसं प्रणमामि नित्यं॥

अर्थ:
जिन्होंने संपूर्ण जगत को आचार-धर्म का मार्ग दिखाया, जो कुशस्थली (अयोध्या या पवित्र स्थान) में प्रतिष्ठित हुए, जिनकी महिमा यजुर्वेद और अन्य श्रुतियों में वर्णित है, तथा जो वातरशन (अर्थात् संयमशील व विरक्त) हैं, ऐसे श्री ऋषभदेव को मैं नित्य प्रणाम करता हूँ।


सप्तार्चिषं यो रविवत् प्रकाशं
वेदेषु गीते रुचिरं विभाति।
ज्ञानप्रदीपं भवभीतिकर्त्रं
तं जिननाथं प्रणमाम्यहं सदा॥

अर्थ:
जो सप्त किरणों (सात प्रकार के ज्ञान) से प्रकाशित हैं, जो सूर्य के समान तेजस्वी हैं, जिनकी स्तुति वेदों में की गई है, जो ज्ञान का दीपक हैं और संसार-भय को नष्ट करने वाले हैं, ऐसे जिननाथ ऋषभदेव को मैं सदा प्रणाम करता हूँ।


यः सप्त सिन्धून् प्रवहन्न् दिशन्तं
ज्ञानामृतं लोकहिताय दत्तम्।
ऋग्यजुराद्यैः श्रुतिसंहिताभिः
संस्तूयते तं पुरुषोत्तमं भजे॥

अर्थ:
जिन्होंने सप्त सिन्धुओं (ज्ञान की सात धाराओं) को प्रवाहित करके अमृत समान उपदेश दिए, जो लोक के हित के लिए अपने उपदेश प्रदान करते हैं, जिनकी स्तुति ऋग्वेद और यजुर्वेद में हुई है, ऐसे पुरुषोत्तम श्री ऋषभदेव को मैं भजता हूँ।


अनादिपूर्वः परमः पवित्रः
शुद्धो जितारिः सततं विनीतः।
ऋग्वेदवाक्यैः परिणीयमानं
तं पुरुषपुण्डरीकं नमामि॥

अर्थ:
जो अनादि (सनातन) हैं, परम पवित्र हैं, पूर्णतः शुद्ध हैं, जिन्होंने समस्त विकारों पर विजय प्राप्त कर ली है, जो सदा विनम्र एवं शांत स्वभाव के हैं, तथा जिनकी वंदना ऋग्वेद के वचनों में की गई है, ऐसे पुरुष पुण्डरीक श्री ऋषभदेव को मैं प्रणाम करता हूँ।


वेदेषु यो वर्णित आर्हतेशः
तपस्विनां पूज्यतमः सुपूज्यः।
सर्वज्ञता यस्य हि शाश्वती च
तं भगवन्तं प्रणमाम्यहं सदा॥

अर्थ:
जो वेदों में आर्हत रूप में वर्णित हैं, जो तपस्वियों में सर्वाधिक पूजनीय हैं, जिनकी सर्वज्ञता (सर्वज्ञान की क्षमता) शाश्वत है, तथा जो समस्त गुणों के स्वामी हैं, ऐसे भगवन्त श्री ऋषभदेव को मैं सदा प्रणाम करता हूँ।


यः सप्तशीर्षः चतुरश्रुगीतः
वेदेषु संकीर्तितपूर्वकाले।
वातरसनं जिननाथमाद्यं
तं ऋषभं प्राञ्जलिको भजामि॥

अर्थ:
जो सप्तशीर्ष (ज्ञान के सात प्रकारों से युक्त) तथा चतुरश्रु (चार प्रमुख दिशाओं में प्रसिद्ध) हैं, जिनकी महिमा प्राचीन वेदों में गाई गई है, जो वातरसन (संयमी एवं तपस्वी) हैं, जो जिननाथ तथा प्रथम तीर्थंकर हैं, ऐसे ऋषभदेव को मैं हाथ जोड़कर भजता हूँ।


ऋग्यजुराद्यैरनघैः स्तुतश्च
यो विश्वनाथः सुरमौक्तिकाभिः।
सत्यं यथार्थं च समं सदा यो
तं वृषभं प्रणमामि नित्यं॥

अर्थ:
जो ऋग्वेद, यजुर्वेद आदि वेदों में पवित्र वचनों द्वारा स्तुत हैं, जो समस्त लोकों के स्वामी (विश्वनाथ) हैं, जिन्हें देवगण मोती (रत्न) की भाँति पूजते हैं, जो सत्य, यथार्थ, और समता के प्रतीक हैं, ऐसे वृषभ श्री ऋषभदेव को मैं नित्य प्रणाम करता हूँ।


संक्षिप्त सारांश:

इस ऋषभाष्टक में ऋग्वेद और यजुर्वेद के आधार पर ऋषभदेव की महिमा का गुणगान किया गया है। वे ज्ञान, त्याग, तपस्या, संयम, मोक्ष-मार्ग के प्रवर्तक तथा लोककल्याण हेतु प्रवचन करने वाले हैं। उन्हें  "पुरुषोत्तम, जिन, आर्हत, वृषभ, भगवंत" आदि नामों से स्तुत किया गया है। प्रत्येक श्लोक के अंत में "मैं ऐसे श्री ऋषभदेव की स्तुति करता हूँ"—ऐसा वचन दिया गया है, जिससे भक्ति भाव का पूर्णतया निरूपण होता है।

॥इति श्री ऋषभाष्टकस्य विस्तृत हिंदी अर्थः संपूर्णः॥


Thanks, 
Jyoti Kothari 
 (Jyoti Kothari, Proprietor, Vardhaman Gems, Jaipur represents Centuries Old Tradition of Excellence in Gems and Jewelry. He is adviser, Vardhaman Infotech, a leading IT company in Jaipur. He is also ISO 9000 professional)

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