नचिकेता की कथा : आत्मविद्या की खोज में एक दार्शनिक यात्रा
१. भूमिका : कथा और दर्शन का संगम
भारतीय दार्शनिक परम्परा में कुछ कथाएँ ऐसी हैं जो केवल आख्यान नहीं, बल्कि सम्पूर्ण दार्शनिक संक्रमण की साक्षी हैं। नचिकेता की कथा ऐसी ही एक कथा है। यह केवल पिता–पुत्र का संवाद नहीं, न ही मात्र मृत्यु–देव यम से हुआ कोई उपदेशात्मक प्रसंग; बल्कि यह वैदिक यज्ञ–कर्म से उपनिषद् की आत्मविद्या की ओर बढ़ते भारतीय चिंतन की जीवित कथा है।
२. नचिकेता की कथा : यज्ञ से प्रश्न तक
कथा का आरम्भ ऋषि वाजश्रवा (उद्दालक आरुणि) से होता है, जो स्वर्ग–प्राप्ति की कामना से विश्वजित् यज्ञ का अनुष्ठान कर रहे थे। यज्ञ के विधान के अनुसार उन्हें अपनी सम्पूर्ण सम्पत्ति का दान करना था, किंतु उन्होंने ऐसी वृद्ध, रोगग्रस्त और अनुपयोगी गायों का दान किया जिनका कोई वास्तविक मूल्य नहीं था।
यह दृश्य उनके अल्पवयस्क पुत्र नचिकेता के मन में तीव्र नैतिक और दार्शनिक प्रश्न उत्पन्न करता है। बालक बार–बार पिता से पूछता है — “पितः! आप मुझे किसे दान करेंगे?” यह प्रश्न केवल बालहठ नहीं, बल्कि यज्ञ–कर्म की आन्तरिक शुद्धता पर प्रश्नचिह्न था। क्रोधित होकर वाजश्रवा कह देते हैं — “मैं तुम्हें मृत्यु को दान करता हूँ।”
३. यमलोक की यात्रा : प्रतीक्षा और तपस्या
पिता के वचन को सत्य मानकर नचिकेता यमलोक की ओर प्रस्थान करता है। वहाँ पहुँचकर उसे ज्ञात होता है कि यम अनुपस्थित हैं। तीन रात्रियों तक वह अन्न–जल के बिना प्रतीक्षा करता है। यह प्रतीक्षा स्वयं में तपस्या है — धैर्य, संयम और वैराग्य की परीक्षा।
यम लौटकर जब इस बाल अतिथि को देखते हैं, तो आतिथ्य–भंग के प्रायश्चितस्वरूप उसे तीन वरदान प्रदान करते हैं।
४. तीन वरदान : कर्म से आत्मा तक
प्रथम वरदान में नचिकेता पिता के क्रोध की शान्ति और उनके साथ पुनः सौहार्द की कामना करता है। यह पारिवारिक और सामाजिक संतुलन का प्रतीक है।
द्वितीय वरदान में वह उस अग्निविद्या को जानना चाहता है जिससे स्वर्ग की प्राप्ति होती है — यही नचिकेता अग्नि है। यहाँ तक कथा वैदिक कर्मकाण्ड की सीमा में रहती है। यम विस्तार से यज्ञ–अग्नि का विधान बताते हैं और नचिकेता उसे पूर्णतः ग्रहण करता है।
तृतीय वरदान वह बिन्दु है जहाँ कथा दर्शन बन जाती है। नचिकेता पूछता है — “मृत्यु के बाद आत्मा रहती है या नहीं?” यही प्रश्न उपनिषद् की आत्मा है।
५. यम–नचिकेता संवाद : आत्मविद्या का उद्घाटन
यम इस प्रश्न को अत्यन्त गूढ़ बताते हैं और नचिकेता को विविध भोग, आयु, ऐश्वर्य और राज्य का लोभ देते हैं। किंतु नचिकेता उन्हें अस्वीकार करते हुए कहता है कि ये सब नश्वर हैं। वह केवल आत्मतत्त्व का ज्ञान चाहता है।
यहाँ यम उसे आत्मा का स्वरूप बताते हैं — जो न जन्म लेती है, न मरती है; जो न कर्ता है, न भोगता। शरीर रथ है, इन्द्रियाँ घोड़े हैं, मन लगाम है और आत्मा रथी। यह प्रतीकात्मक भाषा वैदिक चिन्तन को दर्शन में रूपान्तरित कर देती है।
६. कठोपनिषद् का काल और श्रमण प्रभाव
कठोपनिषद् को विद्वान प्रायः ईसा–पूर्व ५वीं–४थी शताब्दी के मध्य रखते हैं — वही काल जब श्रमण परम्पराएँ (जैन, बौद्ध, आजीवक) अपने उत्कर्ष पर थीं। आत्मा की अकर्तृत्वता, वैराग्य, मृत्यु–चिन्तन और कर्म–त्याग के संकेत स्पष्ट रूप से श्रमण वातावरण की छाया दर्शाते हैं।
७. जैन आगमों से तुलनात्मक दृष्टि
आचारांग सूत्र में महावीर आत्मा को शुद्ध, स्वतंत्र और कर्म–बंधन से मुक्त होने योग्य बताते हैं। उत्तराध्ययन सूत्र में मृत्यु–स्मृति और वैराग्य का वही स्वर है जो नचिकेता में दिखाई देता है। जहाँ कठोपनिषद् आत्मा को द्रष्टा कहता है, वहीं जैन आगम आत्मा को ज्ञान–स्वरूप मानते हैं — दोनों ही उसे कर्तृत्व–रहित बताते हैं।
८. भाष्य परम्परा : शंकर और मध्व
शंकराचार्य कठोपनिषद् को अद्वैत वेदान्त की आधारशिला मानते हैं। उनके अनुसार आत्मा और ब्रह्म अभिन्न हैं, और नचिकेता की जिज्ञासा ही मोक्ष–मार्ग है।
माध्वाचार्य इस संवाद को जीव–ईश्वर भेद के सन्दर्भ में देखते हैं। उनके लिए आत्मा नित्य है, पर ब्रह्म से भिन्न। इस प्रकार एक ही कथा से भिन्न–भिन्न दार्शनिक निष्कर्ष निकलते हैं।
९. उपसंहार
नचिकेता की कथा एक बालक की मृत्यु–जिज्ञासा से आरम्भ होकर भारतीय दर्शन की आत्मा तक पहुँचती है। यह कथा वैदिक कर्मकाण्ड, उपनिषदिक आत्मविद्या और श्रमण वैराग्य — तीनों के संगम का सजीव दस्तावेज़ है। यही कारण है कि नचिकेता केवल एक पात्र नहीं, बल्कि भारतीय दर्शन का प्रतीक बन जाता है।
2.
1. वाजश्रवस का यज्ञ और नचिकेता
प्राचीन काल में वाजश्रवस (उद्दालक आरुणि) नामक ब्राह्मण ऋषि ने
विश्वजित् यज्ञ का आयोजन किया। इस यज्ञ का विधान यह था कि
यज्ञकर्ता अपना सर्वस्व दान कर देता है।
यज्ञ सम्पन्न हो रहा था—
गायें दान की जा रही थीं,
किन्तु नचिकेता, जो कि ऋषि का बालक पुत्र था,
ने देखा कि जिन गायों का दान किया जा रहा है—
वे बूढ़ी थीं
दूध नहीं देती थीं
चलने में असमर्थ थीं
बालक का हृदय विचलित हो उठा।
उसने सोचा—
“यदि दान निष्कपट न हो, तो यज्ञ का फल कैसे प्राप्त होगा?”
2. बालक का प्रश्न — धर्मबोध का प्रथम उदय
नचिकेता अपने पिता के समीप गया और बोला—
“तात! आप सब कुछ दान कर रहे हैं,
तो मुझे किसे दान देंगे?”
पिता मौन रहे।
नचिकेता ने पुनः पूछा—
फिर तीसरी बार पूछा।
बार-बार पूछे जाने पर,
क्षणिक क्रोध में आकर पिता के मुख से शब्द निकल गये—
“मैं तुम्हें मृत्यु को दान देता हूँ।”
(मृत्यवे त्वा ददामि)
यह वाक्य साधारण नहीं था।
वैदिक परम्परा में उच्चारित शब्द ऋत होते हैं—
वे निष्फल नहीं जाते।
नचिकेता समझ गया—
अब उसका पथ यमलोक की ओर है।
3. यमलोक की यात्रा और अतिथि–धर्म
नचिकेता निडर भाव से
यमराज के लोक पहुँचा।
परन्तु यम उस समय वहाँ उपस्थित नहीं थे।
बालक ने यमलोक में
तीन दिन और तीन रात्रियाँ
बिना अन्न–जल के
अतिथि के रूप में प्रतीक्षा की।
उपनिषद् कहता है—
अतिथि यदि भूखा लौटे,
तो गृहस्थ का पुण्य नष्ट हो जाता है।
जब यम लौटे और उन्होंने यह देखा,
तो उन्हें गहरा पश्चात्ताप हुआ।
4. यमराज और तीन वरदान
यमराज बोले—
“हे ब्राह्मण!
तुमने मेरे यहाँ तीन रात्रियाँ भूखे रहकर बिताईं।
अतिथि–धर्म भंग हुआ है।
प्रायश्चित्त–स्वरूप
मैं तुम्हें तीन वरदान देता हूँ—
जो चाहो, माँग लो।”
5. प्रथम वर — पिता की शान्ति
नचिकेता ने पहला वर माँगा—
“मेरे पिता का क्रोध शांत हो जाए,
वे मुझे जीवित देखकर प्रसन्न हों
और मुझे स्वीकार करें।”
यम ने तुरंत कहा—
“तथास्तु।”
6. द्वितीय वर — नचिकेता अग्नि
दूसरे वर में नचिकेता ने पूछा—
“हे यम!
वह अग्नि–विद्या बताइए
जिससे स्वर्ग की प्राप्ति होती है।”
यम ने उसे
विशेष अग्नि–विधान,
ईंटों की संख्या,
विधि और फल
सब विस्तार से समझाया।
यह अग्नि आगे चलकर
“नचिकेता अग्नि” कहलायी।
यहाँ तक नचिकेता
कर्मकाण्ड के क्षेत्र में था।
7. तृतीय वर — वह प्रश्न जिससे यम भी हिचके
अब नचिकेता ने जो माँगा,
वह साधारण नहीं था।
उसने कहा—
“मनुष्य की मृत्यु के बाद—
कुछ कहते हैं आत्मा रहती है,
कुछ कहते हैं नहीं रहती।
हे यम!
आप मृत्यु के अधिपति हैं—
आप ही इसका सत्य बताइए।”
यह सुनकर
यमराज स्वयं भी कुछ क्षण मौन हो गये।
उन्होंने नचिकेता को
धन, दीर्घायु,
राज्य, पुत्र,
स्वर्गीय सुख—
सब कुछ देने का प्रलोभन दिया।
पर नचिकेता अडिग रहा।
उसने कहा—
“ये सब क्षणभंगुर हैं।
आप इन्हें अपने पास ही रखें।
मुझे केवल आत्मा का सत्य चाहिए।”
8. श्रेय और प्रेय का विवेक
यम प्रसन्न हुए।
उन्होंने कहा—
“मनुष्य के सामने दो मार्ग होते हैं—
प्रेय (इन्द्रिय–सुख)
और
श्रेय (आत्मकल्याण)।
अधिकांश लोग प्रेय चुनते हैं,
पर तुमने श्रेय चुना है।”
यहीं से
आत्मविद्या का उपदेश आरम्भ होता है।
9. आत्मा का रहस्य
यम ने नचिकेता को बताया—
आत्मा न जन्म लेती है,
न मरती है।
शरीर नष्ट होता है,
आत्मा नहीं।
“न जायते म्रियते वा कदाचित्…”
आत्मा—
इन्द्रियों से परे है
मन से भी सूक्ष्म है
केवल विवेक और संयम से जानी जा सकती है
10. नचिकेता की सिद्धि
यम ने कहा—
“जो इस आत्मतत्त्व को जान लेता है,
वह शोक और भय से मुक्त हो जाता है।”
नचिकेता ने
इस ज्ञान को आत्मसात किया।
वह बालक होकर भी
पूर्ण ब्रह्मजिज्ञासु बन गया।
उपनिषद् कहता है—
जो इस संवाद को जानता है,
वह भी नचिकेता के समान
मृत्यु से परे हो जाता है।
11. उपसंहार
नचिकेता—
केवल एक पात्र नहीं
धर्मबोध से आत्मबोध तक की यात्रा है
यह कथा बताती है कि—
सच्चा प्रश्न
आयु नहीं,
साहस माँगता है।
3. नचिकेता–प्रसंग
(कठोपनिषद् पर आधारित विस्तृत कथा)
नचिकेता का प्रसंग उपनिषदिक साहित्य में अत्यन्त प्रसिद्ध है और वह कठोपनिषद् (Kaṭha Upaniṣad) में ही विशेष रूप से और विस्तार से आता है। अन्य उपनिषदों में नचिकेता का स्वतंत्र कथानक नहीं मिलता।
कठोपनिषद् के सटीक सन्दर्भ, अध्याय–वल्ली और मूल श्लोकों सहित क्रमबद्ध विवरण
1. नचिकेता किस उपनिषद् में है?
👉 कठोपनिषद् (काठक उपनिषद्)
कृष्ण यजुर्वेद से सम्बद्ध
कुल 2 अध्याय (अध्याय = अध्याय, अध्याय के भीतर वल्ली)
2. नचिकेता–कथा का स्थान
📍 कठोपनिषद् – प्रथम अध्याय, प्रथम वल्ली (1.1)
पूरी प्रथम वल्ली नचिकेता–यम संवाद की भूमिका है।
3. नचिकेता का परिचय – प्रारम्भिक श्लोक
🔹 कठोपनिषद् 1.1.1
संस्कृत श्लोक:
उशन् ह वै वाजश्रवसः सर्ववेदसं
ददौ। तस्य ह नचिकेता नाम पुत्र आसीत्॥
अर्थ (संक्षेप):
वाजश्रवस (उद्दालक आरुणि) नामक ऋषि ने विश्वजित् यज्ञ में अपना सर्वस्व दान कर दिया। उनका एक पुत्र था—नचिकेता।
4. पिता से प्रश्न — धर्मबोध का उदय
🔹 कठोपनिषद् 1.1.4
स होवाच पितरं तात कस्मै मां दास्यसीति।
द्वितीयं तृतीयं तं होवाच।
नचिकेता ने बार-बार पूछा—
“पिताजी! आप मुझे किसे दान देंगे?”
5. यमराज को दान — निर्णायक श्लोक
🔹 कठोपनिषद् 1.1.6
तमुवाच मृत्यवे त्वा ददामीति।
“मैं तुम्हें मृत्यु (यम) को दान देता हूँ।”
👉 यही श्लोक नचिकेता की यमलोक-यात्रा का आधार है।
6. यमलोक में तीन दिन प्रतीक्षा
🔹 कठोपनिषद् 1.1.9
अतिथिं मृत्युः प्राप्य
ब्राह्मणो गृहमेधिनः।
अनश्नन् ब्रह्महत्या स्यात्
एतद् विदित्वा मृत्युः॥
यम के अनुपस्थित रहने पर नचिकेता तीन रात्रि बिना अन्न के अतिथि रहता है।
7. तीन वरदान (तीन वर)
🔹 कठोपनिषद् 1.1.10–11
**तिस्रो रात्रीर्यदवात्सीर्गृहें मेऽनश्नन् ब्रह्मणः।
अतिथे नमस्तेऽस्तु ब्रह्मन् स्वस्ति मेऽस्तु सर्वदा॥तस्मात् प्रति वरं ते दास्यामि त्रीन् वरान् वृणीष्व॥**
यम नचिकेता को तीन वरदान देते हैं।
8. द्वितीय वर — नचिकेता अग्नि (यज्ञ)
🔹 कठोपनिषद् 1.1.13–19
यहाँ नचिकेता अग्नि का विस्तृत वर्णन है —
स्वर्गप्राप्ति का साधन, जिसे आगे चलकर नचिकेता अग्नि कहा गया।
9. तृतीय वर — आत्मा का प्रश्न (केन्द्रीय दार्शनिक संवाद)
🔹 कठोपनिषद् 1.1.20
येयं प्रेते विचिकित्सा मनुष्ये
अस्तीत्येके नायमस्तीति चैके।
एतद्विद्यामनुशिष्टस्त्वयाहं
वराणामेष वरस्तृतीयः॥
भावार्थ:
मृत्यु के बाद आत्मा है या नहीं—इस पर संदेह है।
हे यम! आप ही इसे स्पष्ट करें—यही मेरा तीसरा वर है।
10. यम–नचिकेता संवाद (आत्मविद्या)
यह संवाद चलता है—
📍 कठोपनिषद् 1.2 तथा 2.1–2.3
यहाँ प्रमुख सिद्धान्त आते हैं:
आत्मा अजर–अमर है
शरीर नश्वर है
श्रेय और प्रेय का भेद
आत्मा इन्द्रियों से परे है
🔹 प्रसिद्ध श्लोक — आत्मा का स्वरूप
कठोपनिषद् 1.2.18
न जायते म्रियते वा कदाचित्
नायं भूत्वा भविता वा न भूयः।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो
न हन्यते हन्यमाने शरीरे॥
11. सार-सूत्र (संक्षेप निष्कर्ष)
नचिकेता का एकमात्र उपनिषदिक स्रोत:
✔ कठोपनिषद्विषय:
बालक का धर्मबोध
मृत्यु से निर्भय प्रश्न
आत्मा, मोक्ष और विद्या
यह उपनिषद् संन्यास–आत्मविद्या–परम्परा का मूल ग्रन्थ है

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