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रविवार, 18 जनवरी 2026

दादागुरु श्री जिनदत्त सूरी चादर महोत्सव जैसलमेर


दादागुरु श्री जिनदत्त सूरी चादर महोत्सव जैसलमेर

श्रद्धा, स्मृति और सामूहिक चेतना का जीवंत पर्व

चादर महोत्सव जैन श्वेताम्बर खारतरगच्छ परंपरा का एक विशिष्ट, ऐतिहासिक एवं भावनात्मक आयोजन है, जो दादागुरुओं—विशेषतः प्रथम दादागुरु दादा जिनदत्त सूरी—की स्मृति, साधना और करुणामयी चेतना से गहराई से जुड़ा हुआ है। यह महोत्सव मात्र एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि श्रद्धा, इतिहास और सामूहिक आस्था का एक जीवंत एवं प्रेरणास्पद उत्सव है।

दादा जिनदत्त सूरी के स्वर्गवास के पश्चात जब उनके पार्थिव शरीर को अग्नि को समर्पित किया गया, तब उनकी चादर एवं अन्य साधना-संबंधी उपकरण अग्नि से अप्रभावित रहे। यह अद्भुत घटना उनकी उच्च कोटि की साधना, कठोर तपश्चर्या और दिव्य आत्मिक तेज का प्रतीक मानी जाती है। यह चादर अत्यंत चमत्कारी, विघ्नहर्ता एवं कल्याणकारी मानी जाती है, इसके अभिषेक-जल के छिड़काव से महामारी और संकट दूर होते हैं।

यह चादर स्वर्गवास स्थल अजयमेरु (अजमेर) से ऐतिहासिक परिस्थितियों वश अन्हिलपुर पाटन (गुजरात) ले जाया गया.  लगभग 150 वर्ष पूर्व जब जैसलमेर में महामारी का भीषण प्रकोप फैला, तब जैसलमेर के महारावल के निवेदन पर अन्हिलपुर पाटन के राजा ने यह चमत्कारी चादर जैसलमेर भेजी उसके पश्चात से आज तक यह पावन चादर जैसलमेर के ज्ञान भंडार में सुरक्षित रूप से संरक्षित है. इसी ऐतिहासिक स्मृति में, दादा जिनदत्त सूरी के स्वर्गवास के 871 वर्ष पश्चात प्रथम बार चादर महोत्सव का भव्य आयोजन किया जा रहा है, जिसमें दादा की चादर का विधिवत अभिषेक महोत्सव सम्पन्न होगा।

यह आयोजन 6 से 8 मार्च, 2026 परम पूज्य  गच्छाधिपति आचार्य श्री मणिप्रभ सूरीश्वर जी महाराज, अन्य पूज्य आचार्यों, शताधिक जैन साधु -साध्वियों के पावन सान्निध्य तथा वैदिक परंपरा के लगभग 200 पूज्य संतों की उपस्थिति में सम्पन्न होगा। इस महोत्सव में विश्वभर से 15 से 20 हजार श्रद्धालुओं की सहभागिता संभावित है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के परम पूज्य सरसंघ चालक श्री मोहनराव भागवत जी 6 मार्च को इस ऐतिहासिक आयोजन का उद्घाटन करेंगे 7 मार्च को भव्य बरघोड़े (जुलूस) के साथ चादर को महोत्सव स्थल पर लाया जाएगा, जहाँ श्रद्धालुओं द्वारा उसका  विधिपूर्वक अभिषेक किया जाएगा। अभिषेक के समय सम्पूर्ण विश्व में समस्त हिंदू समाज के 108,00,000 (एक करोड़ आठ लाख) भक्तों द्वारा सामूहिक गुरु इकतीसा का पाठ किया जाएगा। 8 मार्च को पूज्य उपाध्याय श्री महेन्द्रसागर जी महाराज को आचार्य पद प्रदान किया जायेगा।

महोत्सव के अंतर्गत भारत की सांस्कृतिक एकात्मता एवं सामाजिक समरसता में दादागुरुदेव परंपरा का  योगदान विषय पर एक विद्वत संगोष्ठी का भी आयोजन किया जाएगा, जो इस परंपरा के व्यापक सामाजिक एवं सांस्कृतिक प्रभाव को रेखांकित करेगी।

श्री जिन दत्त सूरी: प्रथम दादागुरुदेव 


दादागुरु श्री जिनदत्त सूरी: साधना, भारतीय सांस्कृतिक एकात्मता और सामाजिक समरसता 

दादागुरु श्री जिनदत्त सूरी (12वीं शताब्दी) श्वेतांबर जैन खरतरगच्छ परंपरा के प्रथम दादागुरु और आचार्य वल्लभ सूरी के प्रमुख शिष्य थे। वे केवल जैन संप्रदाय के महान आचार्य ही नहीं, बल्कि मध्यकालीन भारत में सामाजिक संतुलन, सांस्कृतिक एकात्मता और नैतिक पुनर्निर्माण के प्रमुख स्तंभ थे। राजस्थान और गुजरात के सामाजिक जीवन में उनका स्थान वही माना जाता है, जो अद्वैत परंपरा में आदि शंकराचार्य का और गुजरात में आचार्य हेमचंद्र का रहा है।

दादागुरु जिनदत्त सूरी का प्रभाव तत्कालीन राजनैतिक सत्ता तक विस्तृत था। अजमेर के चौहान शासक अर्णोराज (पृथ्वीराज चौहान के पितामह) सहित अनेक राजपूत शासक उनके प्रति श्रद्धावान थे। उन्होंने राजपूत कुलों में चल रहे वंशगत संघर्षों, पारिवारिक विवादों और रक्तपात को शांत करने में निर्णायक भूमिका निभाई। उनके उपदेशों ने क्षत्रिय समाज में मर्यादा, संयम और सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना को पुनर्स्थापित किया।

उनकी साधना का केंद्र अहिंसा, करुणा और आत्मसंयम था, किंतु इसका प्रभाव सीमित वर्गों तक नहीं रहा। उन्होंने समाज के हाशिये पर खड़े SC–ST एवं वंचित समुदायों को भी नैतिक संरक्षण, सांस्कृतिक सम्मान और धार्मिक आत्मविश्वास प्रदान किया। लोकजीवन में उनकी छवि एक ऐसे गुरु की बनी, जो सभी वर्गों का रक्षक और संकटमोचक है।

दादागुरु की योग-साधना से जुड़े अनेक चमत्कार—अग्नि-संस्कार में चादर का न जलना, योगिणियों पर विजय, संकटग्रस्त भक्तों की रक्षा—जनस्मृति में आज भी जीवित हैं। उनकी विरासत आज हजारों दादाबाड़ियों, दादागुरु इकतीसा और लोकभक्ति परंपराओं के माध्यम से संपूर्ण भारतीय समाज को जोड़ने वाली शक्ति बनी हुई है। 

दादागुरु श्री जिनदत्त सूरी (12वीं शताब्दी) श्वेतांबर जैन खरतरगच्छ परंपरा के प्रथम दादागुरु और आचार्य वल्लभ सूरी के प्रमुख शिष्य थे। वे केवल जैन संप्रदाय के महान आचार्य ही नहीं, बल्कि मध्यकालीन भारत में सामाजिक संतुलन, सांस्कृतिक एकात्मता और नैतिक पुनर्निर्माण के प्रमुख स्तंभ थे। राजस्थान और गुजरात के सामाजिक जीवन में उनका स्थान वही माना जाता है, जो अद्वैत परंपरा में आदि शंकराचार्य का और गुजरात में आचार्य हेमचंद्र का रहा है।

दादागुरु जिनदत्त सूरी का प्रभाव तत्कालीन राजनैतिक सत्ता तक विस्तृत था। अजमेर के चौहान शासक अर्णोराज (पृथ्वीराज चौहान के पितामह) सहित अनेक राजपूत शासक उनके प्रति श्रद्धावान थे। उन्होंने राजपूत कुलों में चल रहे वंशगत संघर्षों, पारिवारिक विवादों और रक्तपात को शांत करने में निर्णायक भूमिका निभाई। उनके उपदेशों ने क्षत्रिय समाज में मर्यादा, संयम और सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना को पुनर्स्थापित किया।

उनकी साधना का केंद्र अहिंसा, करुणा और आत्मसंयम था, किंतु इसका प्रभाव सीमित वर्गों तक नहीं रहा। उन्होंने समाज के हाशिये पर खड़े SC–ST एवं वंचित समुदायों को भी नैतिक संरक्षण, सांस्कृतिक सम्मान और धार्मिक आत्मविश्वास प्रदान किया। लोकजीवन में उनकी छवि एक ऐसे गुरु की बनी, जो सभी वर्गों का रक्षक और संकटमोचक है।

दादागुरु की योग-साधना से जुड़े अनेक चमत्कार—अग्नि-संस्कार में चादर का न जलना, योगिणियों पर विजय, संकटग्रस्त भक्तों की रक्षा—जनस्मृति में आज भी जीवित हैं। उनकी विरासत आज हजारों दादाबाड़ियों, दादागुरु इकतीसा और लोकभक्ति परंपराओं के माध्यम से संपूर्ण भारतीय समाज को जोड़ने वाली शक्ति बनी हुई है।

 Thanks, 

 Jyoti Kothari, Proprietor at Vardhaman Gems, Jaipur, represents the centuries-old tradition of Excellence in Gems and Jewelry. He is an adviser at Vardhaman Infotech, a leading IT company in Jaipur. He is also an ISO 9000 professional.

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