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मंगलवार, 31 मार्च 2026

आचारांग सूत्र में स्व का बोध: आत्मविस्मृति से आत्मज्ञान की यात्रा

  • प्रस्तावना 

  • 1. स्व का बोध: आत्मविकास का मूलाधार

    स्व का बोध एक ऐसी केन्द्रीय अवधारणा है, जिसके बिना किसी भी व्यक्ति, समाज अथवा राष्ट्र की वास्तविक उन्नति संभव नहीं है। यह केवल वैयक्तिक आत्मचेतना नहीं, बल्कि आत्मगौरव, आत्मशक्ति और आत्मदायित्व की सम्यक् अनुभूति है। जब तक यह बोध नहीं होता, तब तक न तो स्वाभिमान विकसित होता है और न ही व्यक्ति अपनी शक्तियों एवं सीमाओं का यथार्थ आकलन कर पाता है।

    जैन आगम आचारांग सूत्र (भगवान् महावीर का प्रथम उपदेश) स्व की अज्ञानता से स्व के ज्ञान की ओर ले जाने का मार्गदर्शन करता है। यह गहन दर्शनशास्त्रीय विषय है और भारतीय ज्ञान परंपरा के मूल चिंतन को रेखांकित करता है। भौतिकता के स्थान पर आत्मविद्या को केंद्र में रखकर विकसित यह चिंतनक्रम भारतीय आध्यात्मिक दृष्टि की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता को अभिव्यक्त करता है। इसी के आधार पर अहिंसा को व्यापक आध्यात्मिक सिद्धांत के रूप में प्रतिष्ठा प्राप्त होती है।

    इसके विपरीत, जब स्व की विस्मृति होती है, तो व्यक्ति न तो अपनी शक्ति को पहचान पाता है और न ही अपनी दुर्बलताओं का बोध कर पाता है। परिणामस्वरूप वह पराश्रित, भ्रमित और अंततः पराधीनता की स्थिति में पहुँच जाता है।


    समवशरण में भगवान महावीर द्वारा आचारांग सूत्र का उपदेश  

    2. भारत में स्वबोध का ह्रास: ऐतिहासिक संदर्भ

    भारतवर्ष, जो कभी आत्मबोध, धर्म और सांस्कृतिक शक्ति का प्रमुख केंद्र था, मध्यकाल में अपनी शत्रुबोध-क्षमता को काफी हद तक खो बैठा। हमने न तो अपनी आंतरिक दुर्बलताओं को पर्याप्त रूप से पहचाना और न ही बाह्य आक्रमणों का यथार्थ मूल्यांकन किया। परिणामस्वरूप भारत को दीर्घकाल तक इस्लामी शासन के अंतर्गत पराधीनता का अनुभव करना पड़ा।

    स्वबोध के इस क्षरण की प्रक्रिया औपनिवेशिक काल में और अधिक गहरी हुई। विशेषतः ब्रिटिश शासन के दौरान शिक्षा, प्रशासन, भाषा और इतिहास-लेखन की नीतियों ने भारतीय परंपरागत आत्मदृष्टि को प्रभावित किया। अनेक विचारकों का मत है कि इस काल में भारतीय समाज में आत्मविश्वास की कमी और सांस्कृतिक विस्मृति की प्रवृत्ति बढ़ी।

    स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात भी औपनिवेशिक प्रभावों से पूर्णतः मुक्त होने की प्रक्रिया धीमी रही। आत्मबोध की पुनर्प्राप्ति के लिए आवश्यक सांस्कृतिक पुनर्समीक्षा व्यापक स्तर पर अपेक्षित थी, जिस पर विभिन्न चिंतकों ने अपने विचार प्रस्तुत किए।

    इस विषय पर स्वामी विवेकानन्दप्रभुदास बेचारदासश्री अरविन्द जैसे विचारकों ने अपने-अपने समय में गंभीर चिंतन किया। इतिहासकार धर्मपाल ने ब्रिटिश अभिलेखों के आधार पर भारतीय समाज की पारंपरिक संरचनाओं का विश्लेषण प्रस्तुत किया है।

    3. आत्मविस्मृति से स्वबोध की ओर: वर्तमान और भविष्य

    सौभाग्यवश, इक्कीसवीं सदी के भारत में आत्मविस्मृति की जड़ें धीरे-धीरे कमजोर पड़ती दिखाई दे रही हैं। आज भारत स्व के बोध की दिशा में अधिक सजग और आत्मविश्वासी रूप से अग्रसर है। वैश्विक मंच पर आर्थिक, सामरिक और सांस्कृतिक क्षेत्रों में बढ़ती सक्रियता के साथ-साथ भारत अपने मूल आत्मतत्त्व को पुनः पहचानने की प्रक्रिया में भी संलग्न है।

    भारत की मनीषा प्राचीन काल से ही "स्व" की अप्रतिम क्षमता को स्वीकार करती रही है, आत्मविद्या की खोज करती रही है, और आत्मविस्मृति की संभावित हानियों से भी सावधान करती रही है। यही कारण है कि तीर्थंकरों, ऋषि-मुनियों और भारत के महापुरुषों ने स्वबोध को आध्यात्मिक उन्नति का आधार माना है।

    इस लेख में हम विशेष रूप से भगवान महावीर द्वारा उपदिष्ट आचारांग सूत्र के माध्यम से उस मनीषा का अध्ययन करेंगे, जिसमें "स्व के बोध" को केंद्रीय महत्व दिया गया है। भगवद्गीताधम्मपद आदि ग्रंथों तथा अनेक आधुनिक विचारकों के स्वर भी आचारांग सूत्र की इस विचारधारा का समर्थन करते हैं, तथापि इस लेख का विषय आचारांग सूत्र तक ही सीमित रखा गया है।

    इस वैचारिक पुनर्जागरण की प्रक्रिया में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की भूमिका भी उल्लेखनीय रही है। "स्व का बोध" संघ की विचारधारा के प्रमुख तत्वों में से एक है। इसे केवल बौद्धिक अवधारणा के रूप में नहीं, बल्कि भारतीय जीवनदृष्टि के मूलाधार के रूप में देखा जाता है। इस दृष्टिकोण के अनुसार भारत के पुनरुत्थान के लिए अपने ‘स्व’ की पहचान और आत्मविस्मृति से मुक्ति अनिवार्य मानी गई है।

    आचारांग सूत्र: आत्मविस्मृति से स्वबोध और परिज्ञान की यात्रा

    भारतीय दर्शनों में ‘स्व का बोध’ ही वह मूल है, जिससे जीवन की दिशा, मूल्य और मुक्ति का निर्धारण होता है।
    जैन आगम, विशेषतः आचारांग सूत्र, इस बोध को अत्यंत सूक्ष्म और व्यावहारिक ढंग से प्रस्तुत करता है, जहाँ आत्मा की दिशाहीनता से लेकर परिज्ञान तक की यात्रा सूत्रबद्ध रूप में निरूपित की गई है।

    आचारांग सूत्र (1.1.1 – 1.1.6): आत्मविस्मृति से स्वबोध तक

    🔹 सूत्र 1 (1.1.1)

    प्राकृत मूल पाठ:


    "सुयं मे आउस्सं। तेणं भगवया एवमक्खायं — इह मेगेंसि नो सण्णा भवइ।
    तं जहा —
    पुरत्थिमाओ वा दिसाओ आगओ अहमंसि, दाहिणाओ वा… अण्णयरियो दिसाओ वा अणुदिसाओ वा आगओ अहमंसि।
    एवमेगेंसि नो णायं भवइ —
    अत्थि मे आया उववाइए? णत्थि मे आया उववाइए?
    के अहं आसी? के वा इओ चुओ इह पेच्चा भविस्सामि।"

    हिंदी भावार्थ:
    ऐसे जीव को यह भी ज्ञात नहीं होता कि वह किस दिशा से आया है —
    पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, ऊपर, नीचे या अन्य किसी दिशा अथवा अनुदिशा से।
    क्या मैं पुनर्जन्म लेकर आया हूँ या नहीं?
    मैं पूर्वजन्म में कौन था? और इस जन्म के बाद क्या बनूँगा?

    ➡ यह स्व-विस्मृति की पूर्ण अवस्था है — जिसमें आत्मा अपने मूल, मार्ग और गंतव्य से पूर्णतः अनभिज्ञ हो जाती है।

    🔹 सूत्र 2 (1.1.2)

    प्राकृत मूल पाठ:


    "से जं पुण जाणेज्जा सहसम्मइयाए परवागरणेणं अण्णेसिं वा अंतिए सोच्चा...
    एवमेगेंसि जं णायं भवइ —
    अत्थि मे आया उववाइए, जो इमाओ दिसाओ वा अणुदिसाओ वा अणुसंचरइ, सव्वाओ दिसाओ सव्वाओ अणुदिसाओ जो आगओ अणुसंचरइ — सोऽहं।
    से आयावाई, लोयावाई, कम्मावाई, किरियावाई।"

    हिंदी भावार्थ:
    जब किसी को स्वयं (पूर्वजन्म की स्मृति आदि से) अपने आप का ज्ञान होता है, अथवा किसी ज्ञानी पुरुष के उपदेश से वह आत्मबोध को प्राप्त करता है —
    तब उसे यह बोध होता है कि मैं ही वह जीव हूँ, जो समस्त दिशाओं और अनुदिशाओं में संचरण करता आया है।

    ➡ यही आध्यात्मिक अर्थों में आत्मविस्मृति से निकलकर स्वबोध की अवस्था है।

    ऐसे जानने वाला व्यक्ति कहलाता है —

    • आयावाई (आत्मवादी) — आत्मा की सत्ता को जानने और मानने वाला,

    • लोयावाई (लोकवादी) — लोक में भ्रमणशील आत्मा को मानने वाला,

    • कम्मावाई (कर्मवादी) — कर्मबन्ध को जानने वाला,

    • किरियावाई (क्रियावादी) — क्रिया को कर्मबन्ध का कारण मानने वाला।

    🔹 सूत्र 3 (1.1.3)

    प्राकृत मूल पाठ:


    "अकरिस्सं च हं, कारवेसुं च हं, करओ यावि समणुण्णे भविस्सामि।
    एयावंति सव्वावंति लोगंसि कम्मसमारंभा परिजाणियव्वा भवंति।"

    हिंदी भावार्थ:
    मैंने स्वयं भी कर्म किए हैं, दूसरों से करवाए हैं, और उन्हें करने योग्य समझा है।
    इस प्रकार लोक में होने वाले समस्त कर्म-समारम्भों को भली-भाँति जानना चाहिए।

    ➡ यह आत्मा की कर्म-संवेदनशीलता का चरण है — जहाँ वह अपने दोषों की स्वीकृति करती है।

    🔹 सूत्र 4 (1.1.4)

    प्राकृत मूल पाठ:


    "अपरिण्णाय कम्मे खलु अयं पुरिसे, जो इमाओ दिसाओ वा अणुदिसाओ वा अणुसंचरइ,
    सव्वाओ दिसाओ सव्वाओ अणुदिसाओ साहेइ,
    अणेगरूवा जोणीओ संधेइ, विरुवरुवे फासे पड़िसंवेदेइ।"

    हिंदी भावार्थ:
    जो आत्मा कर्म का यथार्थ ज्ञान नहीं रखती,
    वह समस्त दिशाओं और अनुदिशाओं में भटकती रहती है,
    अनेक प्रकार की योनियों में जन्म लेती है, और विविध प्रकार के दुःखों का अनुभव करती है।

    ➡ यह दुःखमूलक संसार-चक्र आत्मविस्मृति की ही परिणति है।

    🔹 सूत्र 5 (1.1.5)

    प्राकृत मूल पाठ:


    "तत्थ खलु भगवया परिण्णा पवेइया —
    इमस्स चेव जीवियस्स परिवंदण, माणण, पूयणाए;
    जाई मरण मोयणाए; दुक्ख पड़िघाय हेउं।"

    हिंदी भावार्थ:
    अब भगवान महावीर ज्ञान का मार्ग बताते हैं —
    यह जीव वंदना, मान और पूजा प्राप्त करने के लिए,
    जन्म–मरण और मोक्ष की आकांक्षा से प्रेरित होकर,
    दुःखों को दूर करने हेतु विभिन्न प्रकार की क्रियाओं में उलझा रहता है।

    ➡ यह संसार में आसक्ति और भ्रम की चेतावनी है।

    🔹 सूत्र 6 (1.1.6)

    प्राकृत मूल पाठ:


    "एयावंति सव्वावंति लोगंसि कम्मसमारंभा परिजाणियव्वा भवंति।
    जस्सेते लोगंसि कम्मसमारंभा परिण्णाया भवंति, से हु मुणी परिण्णायकम्मे — त्ति बेमि।"

    हिंदी भावार्थ:
    इस प्रकार लोक में अज्ञानवश किए जाने वाले समस्त कर्म-समारम्भों को जानना चाहिए।
    जो व्यक्ति लोक के इन समस्त कर्म-समारम्भों का यथार्थ ज्ञान प्राप्त कर चुका है,
    वही सच्चा मुनि है, वही परिज्ञातकर्मी है।

    ➡ यही आत्मज्ञान का चरम लक्ष्य है — मुनित्व अथवा परिज्ञान में स्थित अवस्था

    निष्कर्ष

    इन सूत्रों में भगवान महावीर ने जीव की आत्मविस्मृति की दशा से लेकर स्वबोध और परिज्ञान तक की यात्रा को अत्यंत सूक्ष्मता और स्पष्टता से प्रतिपादित किया है। साथ ही वे जीवों को चार प्रमुख दृष्टियों — आत्मवाद, लोकवाद, कर्मवाद और क्रियावाद — से अवगत कराते हुए स्वदर्शन की आधारशिला स्थापित करते हैं।

    यहाँ यह भी संकेत किया गया है कि जीव अकेला नहीं है, अपितु लोक में परिभ्रमण करते हुए अपने जैसे अनगिनत जीवों की भाँति आत्मविस्मृति और अज्ञानवश भ्रमणशील है। वह अपने अज्ञान और स्वार्थवश विविध प्रकार की क्रियाएँ करता है, जिससे कर्म का बन्ध होता है और परिणामस्वरूप वह संसार में परिभ्रमण करते हुए विविध प्रकार के दुःखों का अनुभव करता है।

    विशेष द्रष्टव्य:

    स्व के बोध को यदि आधुनिक प्रबंधन-भाषा में समझें, तो इसे आंशिक रूप से SWOT (Strengths, Weaknesses, Opportunities, Threats) विश्लेषण से जोड़ा जा सकता है। जैसे SWOT में व्यक्ति या संस्था अपनी शक्तियों, सीमाओं और परिस्थितियों का आकलन करती है, उसी प्रकार “स्व का बोध” व्यक्ति और समाज को अपने वास्तविक स्वरूप, सामर्थ्य और दिशा का आत्ममूल्यांकन करने हेतु प्रेरित करता है।


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    Jyoti Kothari, Proprietor at Vardhaman Gems, Jaipur, represents the centuries-old tradition of Excellence in Gems and Jewelry. He is an adviser at Vardhaman Infotech, a leading IT company in Jaipur. He is also an ISO 9000 professional.

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    रविवार, 29 मार्च 2026

    साहित्य से संस्था तक: आचार्य जिनदत्त सूरी का मध्यकालीन सामाजिक प्रतिमान

     

    प्रस्तावना: धर्माचार्य और सामाजिक संरचना

    भारतीय इतिहास में धर्माचार्यों की भूमिका को प्रायः आध्यात्मिक सीमाओं में बाँधकर देखा गया है। किंतु मध्यकालीन पश्चिमी भारत का इतिहास बताता है कि कुछ आचार्य ऐसे भी थे, जिन्होंने धर्म को केवल साधना का विषय न मानकर समाज-निर्माण की एक कार्यशील प्रणाली के रूप में विकसित किया। भगवान महावीर की परम्परा के श्वेताम्बर खरतरगच्छ में प्रथम दादागुरु आचार्य जिनदत्त सूरी (11वीं–12वीं शताब्दी) इसी श्रृंखला के प्रभावशाली प्रतिनिधि थे।

    उनका योगदान किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं था—वह साहित्य, अनुष्ठान, नैतिकता, सामाजिक संगठन और राजनीतिक संवाद—इन सभी स्तरों पर एक संयोजित सामाजिक प्रतिमान के रूप में सामने आता है। उनके कार्य में विचार, आचरण और संस्था—तीनों का संगठित समन्वय दिखाई देता है।

    प्रथम दादागुरु श्री जिनदत्त सूरी 

    साहित्य: विचार से व्यवहार की सेतु-रचना

    आचार्य जिनदत्त सूरी से संबद्ध साहित्य—विशेषतः अपभ्रंश और प्राकृत में रचित कृतियाँ—केवल स्तुति या भक्ति-पाठ नहीं थीं, बल्कि अपने समय के समाज के लिए व्यवहारिक मार्गदर्शिकाएँ थीं।

    ‘उपदेश-रसायन’, ‘धर्म-समुच्चय-गाथा’ और ‘चरित्र-प्रदीप’ जैसे ग्रंथों में गृहस्थ जीवन के लिए स्पष्ट नैतिक निर्देश मिलते हैं—सत्यनिष्ठ व्यापार, ऋण-शुद्धता, संयमित वाणी, अहिंसा, सार्वजनिक दान और सामाजिक उत्तरदायित्व।

    इसी प्रकार ‘चैत्यवंदन-कुलक’ और ‘वंदना-स्तव’ जैसी रचनाओं ने अनुष्ठानिक जीवन को मानकीकृत किया, जिससे भौगोलिक रूप से बिखरे अनुयायी एक साझी धार्मिक दिनचर्या से जुड़ सके। यह साहित्य केवल वैचारिक संकलन नहीं, बल्कि समाज को संगठित करने का एक कार्यात्मक उपकरण था।

    संस्था-निर्माण: नैतिकता का संस्थागत रूपांतरण

    दादागुरुदेव का महत्वपूर्ण योगदान यह था कि उन्होंने साहित्य में निहित नैतिक सिद्धांतों को संस्थागत रूप दिया। गोत्र-स्थापना की प्रक्रिया—जिसे अक्सर केवल वंशावली से जोड़ा जाता है—वास्तव में एक सुनियोजित सामाजिक पुनर्गठन थी।

    गोत्रों के माध्यम से

    • विवाह और उत्तराधिकार के नियम स्थिर हुए
    • सामुदायिक पहचान स्पष्ट हुई
    • संगठित दान और मंदिर-प्रशासन संभव हुआ

    यह प्रक्रिया विशेष रूप से उन राजपूत राजकुमारों और अभिजात वर्ग के लिए निर्णायक सिद्ध हुई, जो ज्येष्ठाधिकार की परंपरा के कारण सत्ता से बाहर हो गए थे। दादागुरुदेव ने उन्हें जैन गृहस्थ जीवन का ऐसा विकल्प दिया, जिसमें प्रतिष्ठा, नैतिक अधिकार और आर्थिक अवसर—तीनों उपलब्ध थे।

    सामाजिक प्रतिमान: व्यापार, नैतिकता और स्थिरता

    इस संस्थागत व्यवस्था का सबसे स्पष्ट परिणाम व्यापारी समाज में दिखाई देता है। ओसवाल जैन समुदाय का उदय केवल आर्थिक घटना नहीं, बल्कि नैतिक-सामाजिक परिवर्तन का उदाहरण है।

    जिनदत्त सूरी के उपदेशों से प्रेरित होकर व्यापार में

    • विश्वास और पारदर्शिता को प्राथमिकता मिली
    • दीर्घकालिक ऋण और साझेदारी संभव हुई
    • व्यापारी वर्ग राजदरबारों में विश्वसनीय माना जाने लगा

    यही कारण है कि बाद के कालों में जैन व्यापारी विभिन्न राजनीतिक व्यवस्थाओं—राजपूत, सल्तनत और मुगल—में दीवान, कोषाध्यक्ष और मंत्री जैसे पदों पर प्रतिष्ठित हुए। यहाँ धर्म सत्ता से टकराता नहीं, बल्कि नैतिक संतुलन प्रदान करता है।

    राज्य से संवाद: नैतिक प्राधिकार का प्रभाव

    आचार्य जिनदत्त सूरी किसी राजदरबार तक सीमित औपचारिक गुरु नहीं थे, फिर भी उनके नैतिक प्रभाव के स्पष्ट संकेत मिलते हैं। उनके हस्तक्षेपों से हिंसक अनुष्ठानों में कमी, व्यापार मार्गों की सुरक्षा, यात्रियों और धार्मिक संस्थानों को संरक्षण जैसी प्रवृत्तियों को प्रोत्साहन मिला।

    यह एक ऐसा प्रतिमान था जिसमें धर्म शासन का विकल्प न बनकर उसका नैतिक परामर्शदाता सिद्ध होता है। इस प्रकार आध्यात्मिक प्राधिकार ने सामाजिक स्थिरता और आर्थिक विश्वसनीयता को बल प्रदान किया।

    शास्त्रीय वैधता: गैर-जैन परंपराओं में स्वीकृति

    आचार्य जिनदत्त सूरी की ऐतिहासिक और दार्शनिक प्रामाणिकता केवल जैन परंपरागत स्रोतों तक सीमित नहीं है। उनकी विद्वत्ता और सिद्धांतगत अधिकार को गैर-जैन, वैदिक दार्शनिक परंपरा में भी मान्यता प्राप्त है।

    चौदहवीं शताब्दी के प्रख्यात अद्वैत वेदांताचार्य माधवाचार्य—जो शृंगेरी पीठ के जगद्गुरु थे—ने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ Sarva-Darśana-Saṅgraha में जैन दर्शन के निरूपण हेतु जिनदत्त सूरी को प्राधिकृत आचार्य के रूप में उद्धृत किया है। जैन दर्शन पर अध्याय में वे स्पष्ट रूप से लिखते हैं:

    “The Jaina doctrine has thus been summed up by Jinadatta-sūri.”

    यह उद्धरण केवल एक संदर्भ नहीं, बल्कि इस तथ्य का प्रमाण है कि जिनदत्त सूरी को मध्यकालीन भारत में जैन सिद्धांत के प्रतिनिधि प्रवक्ता के रूप में स्वीकार किया गया था।

    7. बाह्य ऐतिहासिक पुष्टिकरण

    7.1 हरविलास शारदा का दृष्टिकोण

    इस पूरे जैन आख्यान को केवल संप्रदायगत दृष्टि से देखना पर्याप्त नहीं। राजस्थान के प्रतिष्ठित इतिहासकार हरविलास शारदा (1867–1959) का योगदान यहाँ विशेष महत्त्व रखता है।

    शारदा—जो स्वयं जैन नहीं थे—ने ओसवाल समुदाय, गोत्र-निर्माण और राजपूत–व्यापारी संबंधों पर अपने अध्ययनों में आचार्य जिनदत्त सूरी की भूमिका को एक सामाजिक वास्तुकार के रूप में स्वीकार किया। वे गोत्र-स्थापना को मिथक नहीं, बल्कि मध्यकालीन समाज की एक व्यावहारिक आवश्यकता और सुनियोजित प्रक्रिया के रूप में देखते हैं।

    उनका यह दृष्टिकोण जैन स्रोतों द्वारा किए गए दावों को पन्थनिरपेक्ष ऐतिहासिक पुष्टिकरण प्रदान करता है।

    7.2 डॉ. दशरथ शर्मा का ऐतिहासिक प्रमाण

    जिनदत्त सूरी के ऐतिहासिक प्रभाव का एक और अत्यंत सशक्त बाह्य प्रमाणीकरण डॉ. दशरथ शर्मा (1903–1976) के कार्य में मिलता है।
    डॉ. शर्मा राजस्थान के सबसे प्रतिष्ठित मध्यकालीन इतिहासकारों में गिने जाते हैं—विशेषतः चौहान वंश के राजनीतिक इतिहास पर उनके ग्रंथ Early Chauhan Dynasties को आज भी मानक संदर्भ माना जाता है।

    डॉ. शर्मा न तो जैन साधु थे, न ही किसी संप्रदायगत लेखन से जुड़े थे। वे एक धर्मनिरपेक्ष अकादमिक इतिहासकार थे, जिन्होंने चौहान शासकों—अर्नोराज, अजयपाल, अजयराज द्वितीय—के काल का गहन अध्ययन किया, वही काल जिसमें आचार्य जिनदत्त सूरी सक्रिय थे।

    यह तथ्य विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है कि:डॉ. दशरथ शर्मा ने नाहटा बंधुओं की प्रसिद्ध कृति “युगप्रधान जिनदत्त सूरी” (1946) की प्रस्तावना (Prastāvanā) स्वयं लिखी। यह वही नाहटा बंधु हैं जिनका शोध जिनदत्त सूरी के सामाजिक, राजनीतिक और संस्थागत योगदान पर आधारित था। चौहान इतिहास के सर्वमान्य विद्वान द्वारा इस ग्रंथ का समर्थन यह स्पष्ट करता है कि जिनदत्त सूरी को केवल धार्मिक उपदेशक नहीं, बल्कि मध्यकालीन राजस्थान की सामाजिक-राजनीतिक संरचना को प्रभावित करने वाले ऐतिहासिक व्यक्तित्व के रूप में स्वीकार किया गया था।

    डॉ. शर्मा का यह समर्थन जैन स्रोतों से प्राप्त निष्कर्षों को मुख्यधारा के इतिहासलेखन में स्थान देता है और यह दर्शाता है कि जिनदत्त सूरी का प्रभाव राजपूत सत्ता-संरचना और व्यापारी समाज—दोनों पर समान रूप से पड़ा।

    निष्कर्ष: धर्म एक सामाजिक-सांस्कृतिक तंत्र के रूप में

    आचार्य जिनदत्त सूरी का जीवन यह दर्शाता है कि धर्म केवल आस्था का विषय नहीं होता—वह समाज को संगठित करने का एक सामाजिक-सांस्कृतिक तंत्र भी हो सकता है। साहित्य से संस्था तक, और संस्था से स्थायी सामाजिक संरचना तक—यह क्रमिक विकास उनके प्रतिमान को विशिष्ट बनाता है।

    आज जब सामाजिक विखंडन, नैतिक संकट और संस्थागत अविश्वास की चर्चा होती है, तब जिनदत्त सूरी का प्रतिमान यह स्मरण कराता है कि आध्यात्मिक प्राधिकार जब सामाजिक विवेक से जुड़ता है, तो वह दीर्घकालिक सभ्यतागत स्थिरता प्रदान कर सकता है।

    दादागुरु जिनदत्त सूरी: सामाजिक पुनर्निर्माण के शिल्पकार

    भारतीय व्यापारी वर्ग के नैतिक स्वरूप के निर्माण में जिनदत्त सूरी की भूमिका

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    महावीर जन्म कल्याणक: अहिंसा, करुणा और समानता का सन्देश


    भगवान महावीर जन्म कल्याणक 

    भगवान् महावीर का जन्म कल्याणक चैत्र शुक्ल त्रयोदशी के दिन मनाया जाता है। सामान्य व्यक्तियों का जन्म दिवस ‘जन्म जयंती’ कहलाता है, परन्तु तीर्थंकरों का जन्म दिवस ‘कल्याणक’ कहा जाता है, क्योंकि उनका जन्म समस्त जीवों के कल्याण के लिए होता है। इसलिए महावीर जन्म कल्याणक केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि मानवता के लिए प्रेरणा का पावन पर्व है। इस वर्ष यह पर्व 31 मार्च 2026 को मनाया जा रहा है और उस दिन भारत के केंद्र सरकार ने छुट्टी भी घोषित की है. 

    प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव की इक्ष्वाकु वंश परंपरा में २४वें तीर्थंकर भगवान् महावीर (जन्म नाम वर्धमान) का जन्म आज से लगभग २६०० वर्ष पूर्व मगध के क्षत्रियकुंड (मतान्तर से वैशाली) में एक राजपरिवार में हुआ। उनकी माता त्रिशला वैशाली की राजकुमारी थीं, इसलिए उन्हें वैशालीय भी कहा जाता है। उनका पालन-पोषण राजपरिवार की मर्यादाओं और वैभव के बीच हुआ, परन्तु उनका सात्विक मन भोग-विलास और राजसी महत्वाकांक्षाओं से बहुत दूर था। वे बचपन से ही आत्मसाधना और जगत के कल्याण की भावना में रत रहते थे। 

    तीर्थंकर महावीर स्वामी, कोलकाता 

    संसार त्याग एवं साधना 

    मात्र ३० वर्ष की आयु में उन्होंने समस्त राजसी वैभव का त्याग कर मुनि दीक्षा अर्थात संन्यास ग्रहण किया। इसके बाद साढ़े बारह वर्षों तक उन्होंने कठिन तपस्या और आत्मसाधना की। अंततः उन्होंने वीतराग अवस्था और केवलज्ञान प्राप्त किया। उनकी कठोर तपस्या का वर्णन अनेक जैन आगमों में विस्तार से मिलता है। बौद्ध त्रिपिटकों में भी उन्हें ‘निर्ग्रन्थ ज्ञातपुत्र’ के नाम से संबोधित किया गया है। दीक्षा काल में वे सदैव निस्पृह, उच्चतम त्याग के आदर्शों का पालन करने वाले, अत्यंत क्षमाशील और समभाव में विचरण करते थे।  

    एक कवि ने उनकी तपस्या के संबंध में कहा है—

    देव ने दानव ने वलि मानव, पशु पंखी सहू डंखी रह्या;
    हँसते मुखड़े तो ए महावी,र सहु णो मङ्गल जंखी रह्या।

    अर्थात महावीर की साधना के समय देव, दानव, पशु और पक्षियों ने उन्हें अनेक प्रकार के कष्ट दिए, परन्तु महावीर ने हँसते हुए न केवल उन कष्टों को सहा बल्कि उन्हें कष्ट देने वालों की भी मंगल कामना करते रहे।


    चंडकौशिक का उपसर्ग एवं क्षमाशील महावीर 


    भगवान् महावीर और चंडकौशिक सर्प का उपसर्ग

    साधनाकाल में एक बार महावीर जंगल के रास्ते से गुजर रहे थे। ग्रामीणों ने उन्हें चेतावनी दी कि उस जंगल में एक अत्यंत भयंकर दृष्टिविष सर्प चंडकौशिक रहता है, जिसकी आँखों की दृष्टि मात्र से जीव की मृत्यु हो जाती है। परन्तु महावीर अपने निश्चय में अडिग थे। उन्हें अपने प्राणों का मोह नहीं था।

    जब सर्प ने उन्हें आते देखा तो अत्यंत क्रोधित होकर उनकी ओर देखा। महावीर की करुणा दृष्टि चंडकौशिक की विषदृष्टि से टकराई और अमृत दृष्टि ने विषदृष्टि को निष्फल कर दिया। महावीर आगे बढ़े और सर्प के निकट पहुँच गए। सर्प ने क्रोध में आकर उनके पैर में डस लिया।

    कथानक है कि सर्प के डसने पर उनके चरणों से रक्त के स्थान पर दूध की धारा बह निकली। यह देखकर सर्प आश्चर्यचकित रह गया। जैसे संतान के प्रति वात्सल्य से माता के स्तनों से दूध प्रवाहित होता है, वैसे ही समस्त जगत के प्रति वात्सल्य के कारण उनके शरीर का रक्त भी दूध के समान करुणामय बन गया था।

    आश्चर्यचकित चंडकौशिक को महावीर ने क्रोध त्याग कर क्षमा का उपदेश दिया। सर्प का हृदय परिवर्तन हुआ और उसने आत्मसाधना का मार्ग अपनाया। कहा जाता है कि उसने आगे चलकर देवत्व प्राप्त किया।

    चंदनबाला द्वारा आहारदान

    एक बार भगवान् महावीर ने साधना के दौरान एक कठोर प्रतिज्ञा ली। इसमें एक साथ तेरह शर्तें थीं— जैसे कोई राजकुमारी हो, परन्तु बेड़ियों में जकड़ी हुई हो, मुंडित मस्तक हो, तीन दिन से भूखी हो, हाथ में उबले हुए उड़द लेकर भिक्षा दे रही हो, और वह एक साथ हँस भी रही हो तथा रो भी रही हो। ऐसा संयोग मिलने पर ही वे आहार ग्रहण करेंगे।

    पाँच महीने और पच्चीस दिन तक ऐसा कोई संयोग नहीं मिला और वे इतने दिनों तक निराहार रहे।

    चंदनबाला एक राजकुमारी थी। युद्ध में पिता की पराजय के बाद उसे दासी के रूप में बेच दिया गया और उसकी वही अवस्था हो गई। जब महावीर वहाँ पहुँचे तो वह अत्यंत प्रसन्न हुई और अपने लिए रखे उबले हुए उड़द उन्हें देने को तैयार हुई। सभी शर्तें पूर्ण हो रही थीं, परन्तु उसकी आँखों में आँसू नहीं थे।

    महावीर लौटने लगे। तब चंदनबाला ने सोचा— “मैं अभागिनी हूँ, इतना दुःख सहा, अब यह तपस्वी भी मेरे द्वार से लौट रहे हैं।” यह सोचकर उसकी आँखों से आँसू बह निकले। महावीर ने उसी क्षण उसके हाथों से आहार ग्रहण किया।

    कहा जाता है कि उस समय देवताओं ने पाँच दिव्य प्रकट किए और चंदनबाला दासत्व से मुक्त हुई। आगे चलकर वही चंदनबाला महावीर के संघ में ३६००० साध्वियों की प्रमुखा बनीं।

    इस प्रकार उनका साधनाकाल अनेक घटनाओं से भरा हुआ है। साढ़े बारह वर्षों की उत्कट साधना के बाद उनका सम्पूर्ण मोह, राग-द्वेष आदि नष्ट हो गया और वे वीतरागी एवं सर्वज्ञ बने। उन्हें केवलज्ञान-केवलदर्शन प्राप्त हुआ। सर्वज्ञ अवस्था प्राप्त करने के बाद जब उन्हें तीनों लोकों के समस्त पदार्थों और ८४ लाख योनियों के जीवों का ज्ञान हुआ, तब उन्होंने जगत के कल्याण के लिए उपदेश देना प्रारम्भ किया। अहिंसा और सत्य उनके उपदेश का मूल आधार था।

    लोकभाषा का उपयोग

    भगवान् महावीर स्वयं राजपुत्र थे, परन्तु सर्वज्ञ बनने के बाद उन्होंने अपने उपदेश राजभाषा या तत्कालीन विद्वानों की भाषा संस्कृत में नहीं दिए। उन्होंने सामान्य जनता की लोकभाषा प्राकृत को चुना। उनके उपदेश अर्धमागधी प्राकृत में ही गुम्फित हैं। इस प्रकार उन्होंने धर्म क्षेत्र में व्याप्त आभिजात्य वर्ग के एकाधिकार को समाप्त कर धर्म के सार्वभौमिक और सार्वजनिक स्वरूप को प्रकाशित किया।

    भगवान महावीर का समवशरण

    चतुर्विध संघ, तीर्थ एवं तीर्थंकर

    केवलज्ञान प्राप्ति के बाद सभी तीर्थंकर समवशरण में विराजमान होकर धर्म का उपदेश देकर तीर्थ की स्थापना करते हैं। तीर्थ का अर्थ है— तारने वाला। भगवान् स्वयं संसार-सागर से पार पहुँचे और उनके अनुयायी बनकर अन्य जीव भी संसार की मोह-माया से मुक्त होकर मोक्ष प्राप्त करते हैं।

    अनुयायियों का यह समूह तीर्थ कहलाता है, जिसे चतुर्विध संघ कहा जाता है— साधु, साध्वी (गृहत्यागी) तथा श्रावक और श्राविका (गृहस्थ)। ये चार अंग मिलकर चतुर्विध संघ बनाते हैं।

    भगवान महावीर का चित्र- कल्पसूत्र  प्राचीन प्रति 


    सामाजिक सद्भाव एवं समरसता

    भगवान् महावीर तत्कालीन समाज में व्याप्त अस्पृश्यता और जातिवाद की विकृतियों को स्वीकार नहीं करते थे। उनकी दृष्टि में प्राणिमात्र के प्रति समान भाव था। उन्होंने कहा कि व्यक्ति जन्म से नहीं, बल्कि कर्म से ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र होता है।

    उनके संघ में इंद्रभूति गौतम जैसे ब्राह्मण, श्रेणिक जैसे क्षत्रिय, आनंद जैसे वैश्य तथा हरिकेशवल जैसे चाण्डाल भी सम्मिलित थे। उत्तराध्ययन सूत्र में हरिकेशवल मुनि की प्रशंसा करते हुए उन्हें श्रेष्ठ गुणों से सम्पन्न बताया गया है।

    नारी जाति का सम्मान

    भगवान् महावीर प्राणी मात्र को समान मानते थे, इसलिए उनका उपदेश जाति के साथ-साथ लिंगभेद से भी परे था। उनके चतुर्विध संघ में पुरुष साधुओं के साथ स्त्री साध्वियाँ और पुरुष श्रावकों के साथ स्त्री श्राविकाएँ भी सम्मिलित थीं।

    चंदनबाला, मृगावती जैसी साध्वियाँ तथा सुलसा, रेवती जैसी श्राविकाएँ उनके संघ में शोभायमान थीं। विशेष उल्लेखनीय तथ्य यह है कि सुलसा, रेवती और चेल्लना ने अपने जीवन में सर्वोच्च सत्कर्म अर्जित किए, जिसके कारण भविष्य में वे तीर्थंकर पद प्राप्त करेंगी। चंदनबाला का प्रसंग नारी गरिमा के पुनरुद्धार का उत्कृष्ट उदाहरण है।

    भगवान् महावीर के प्रथम शिष्य गणधर गौतम 


    महावीर का जीवन संदेश

    भगवान् महावीर ने धर्म को उत्कृष्ट मंगल बताते हुए उसे अहिंसा, संयम और तप के रूप में परिभाषित किया। उन्होंने कहा कि जिनका मन सदैव धर्म में लगा रहता है, उन्हें देवता भी नमस्कार करते हैं। इस प्रकार धार्मिक मनुष्य का स्थान देवताओं से भी ऊपर प्रतिष्ठित किया गया।

    उन्होंने सत्य को प्रतिष्ठित करते हुए कहा कि सत्य ही भगवान् है। अहिंसा सभी जीवों के लिए कल्याणकारी है। समभाव सभी धर्मों में श्रेष्ठ है। विनय सभी धर्मों का मूल है।

    क्रोध, मान (अहंकार), माया (कपट) और लोभ इन चार दुर्गुणों से बचने के लिए उन्होंने क्रमशः क्षमा, मृदुता, सरलता और संतोष अपनाने का उपदेश दिया।

    जीवन में आचरण के लिए उन्होंने पाँच व्रत बताए— अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह। ये व्रत गृहस्थों के लिए अणुव्रत और त्यागी ascetics के लिए महाव्रत माने गए हैं।

    भगवान् महावीर का जीवन केवल धार्मिक कथा नहीं, बल्कि मानव समाज के लिए आचरण का मार्ग है। आज भी जब समाज हिंसा, भेदभाव और स्वार्थ से जूझ रहा है, तब महावीर का संदेश— अहिंसा, समानता और संयम — पहले से अधिक प्रासंगिक हो गया है। उनके जन्म कल्याणक पर हमें संकल्प लेना चाहिए कि हम अपने जीवन में उनके आदर्शों को अपनाएँ और समाज में शांति, सद्भाव और करुणा का वातावरण बनाएँ। 

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    Jyoti Kothari, Proprietor at Vardhaman Gems, Jaipur, represents the centuries-old tradition of Excellence in Gems and Jewelry. He is an adviser at Vardhaman Infotech, a leading IT company in Jaipur. He is also an ISO 9000 professional.



     

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    शनिवार, 28 मार्च 2026

    भारतीय व्यापारी वर्ग के नैतिक स्वरूप के निर्माण में जिनदत्त सूरी की भूमिका


    भारत के मध्यकालीन इतिहास में जब राजनीतिक अस्थिरता, युद्ध और सत्ता-संघर्ष व्यापक थे, उसी कालखंड में कुछ ऐसे संत–आचार्य भी हुए जिन्होंने नैतिकता और संयम के आधार पर समाज की दिशा को प्रभावित किया। श्वेताम्बर खरतरगच्छ परंपरा के दादागुरुदेव आचार्य जिनदत्त सूरी ऐसे ही एक विशिष्ट व्यक्तित्व थे, जिनका प्रभाव राजस्थान और गुजरात के सामाजिक–आर्थिक ढाँचे में दीर्घकाल तक देखा जा सकता है।

    आचार्य जिनदत्त सूरी 11वीं–12वीं शताब्दी में सक्रिय रहे—एक ऐसा समय जब राजपूत राज्यों में ज्येष्ठाधिकार की प्रथा के कारण अनेक राजकुमार सत्ता से बाहर रह जाते थे, जिससे सामाजिक अस्थिरता की संभावना उत्पन्न होती थी। इस परिस्थिति में दादागुरुदेव ने न तो राजनीतिक विद्रोह का मार्ग अपनाया और न ही सत्ता-संघर्ष का। उन्होंने एक वैकल्पिक सामाजिक मॉडल प्रस्तुत किया—जैन गृहस्थ जीवन, जिसमें संयम, सत्य, अहिंसा और अनुशासन को जीवन का आधार बनाया गया।

    नैतिकता से व्यापार तक

    आचार्य जिनदत्त सूरी का महत्वपूर्ण योगदान यह था कि उन्होंने व्यापार को केवल आर्थिक लाभ का माध्यम न मानकर नैतिक दायित्व से जोड़ा। उनके उपदेशों में स्पष्ट रूप से सत्यनिष्ठा, विश्वास और अहिंसा पर आधारित व्यापारिक आचरण पर बल दिया गया। झूठे माप-तौल, धोखाधड़ी, शोषण और हिंसा को उन्होंने सामाजिक पतन के कारणों के रूप में चिन्हित किया।

    उनकी शिक्षाओं का प्रभाव विशेष रूप से उन समुदायों पर पड़ा, जो आगे चलकर ओसवाल जैन समाज सहित संगठित व्यापारी समुदायों के रूप में विकसित हुए। इन समुदायों ने व्यापार में पारदर्शिता, ऋण-शुद्धता, वचन-पालन और सामाजिक उत्तरदायित्व को अपनाया। परिणामस्वरूप वे न केवल सफल व्यापारी ही बने, बल्कि शासकीय संरचनाओं में विश्वसनीय प्रशासक के रूप में भी प्रतिष्ठित हुए।

    इतिहास में ऐसे अनेक उदाहरण मिलते हैं जब जैन व्यापारी दीवान, कोषाध्यक्ष और मंत्री के पदों पर प्रतिष्ठित हुए—यह केवल आर्थिक शक्ति के कारण नहीं, बल्कि उनके विश्वसनीय और नैतिक आचरण के कारण भी था।

    समाज को संगठित करने की प्रक्रिया

    दादागुरुदेव की दृष्टि व्यक्तिगत नैतिकता तक सीमित नहीं थी। उन्होंने समाज को संगठित करने के लिए गोत्र-प्रणाली को सुव्यवस्थित किया, जिससे विवाह, उत्तराधिकार और सामुदायिक जीवन में स्थिरता आई। इस प्रक्रिया ने बिखरे हुए समूहों को एक संगठित सामाजिक ढाँचे में रूपांतरित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

    यह परिवर्तन तत्काल नहीं हुआ, बल्कि दीर्घकाल तक चले उपदेश, संवाद और सामाजिक मार्गदर्शन का परिणाम था। परंपरागत स्रोतों में उनके समय में बड़ी संख्या में लोगों के संगठित जैन जीवन में प्रवेश का उल्लेख मिलता है। संख्या चाहे प्रतीकात्मक मानी जाए, फिर भी यह स्पष्ट है कि यह एक व्यापक सामाजिक पुनर्संरचना की प्रक्रिया थी।

    राज्य से संवाद की परंपरा

    आचार्य जिनदत्त सूरी की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह थी कि उन्होंने सत्ता से टकराव के बजाय नैतिक संवाद का मार्ग अपनाया। वे किसी राजदरबार तक सीमित आधिकारिक राजगुरु नहीं थे, फिर भी उनके परामर्श को व्यापक सम्मान प्राप्त था।

    उनके प्रभाव से विभिन्न क्षेत्रों में हिंसक अनुष्ठानों में कमी, व्यापारिक मार्गों की सुरक्षा, यात्रियों और धार्मिक संस्थानों को संरक्षण तथा कर-नीतियों में संयम जैसी प्रवृत्तियों को प्रोत्साहन मिला। इस प्रकार धर्म सामाजिक समन्वय का माध्यम बना, न कि विभाजन का।

    समकालीन प्रासंगिकता

    वर्तमान समय में जब व्यापार, राजनीति और समाज में नैतिकता के प्रश्न पुनः चर्चा में हैं, दादागुरुदेव जिनदत्त सूरी का जीवन एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक संदर्भ प्रदान करता है। उनके विचार संकेत करते हैं कि संयम, सत्यनिष्ठा और सामाजिक उत्तरदायित्व केवल आध्यात्मिक मूल्य नहीं, बल्कि सामाजिक स्थिरता और आर्थिक विश्वसनीयता के भी आधार हैं।

    सम्पूर्ण भारत में “मरुस्थली कल्पतरु” के रूप में पूजित दादागुरुदेव की स्मृति यह स्मरण कराती है कि भारत की सामाजिक शक्ति केवल राजनीतिक संरचनाओं से निर्मित नहीं हुई, बल्कि उन नैतिक परंपराओं से भी विकसित हुई, जिन्होंने समाज को दीर्घकालिक स्थिरता प्रदान की।

    इसी जीवंत परंपरा की स्मृति में जैसलमेर में आयोजित चादर महोत्सव केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि उस सांस्कृतिक चेतना का प्रतीक है, जिसने भारतीय व्यापारी और सामाजिक जीवन को नैतिक आधार प्रदान किया।


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    शुक्रवार, 27 मार्च 2026

    भारतीय दर्शन एवं चिंतन: विमर्श विषयों की लिंक सूची


    लम्बे समय तक भारतवासी यूरोपीय एवं अमेरिकी चिंतनशैली से प्रभावित रहे। पाश्चात्य सभ्यताओं की सामरिक शक्ति एवं साम्राज्यवादी प्रभाव ने इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। पाश्चात्य वामपंथी विचारधारा तथा Wokism जैसी अवधारणाओं ने भी भारतीय आधुनिक चिंतन को प्रभावित किया। इन परिस्थितियों ने मूल भारतीय चिंतन की वैज्ञानिक अवधारणाओं, भारतीय समाज-विज्ञान तथा धर्म–दर्शन–आध्यात्म से सम्बद्ध लेखन को अनेक स्तरों पर प्रभावित किया। परिणामस्वरूप, भारत ने अपने अतीत के गौरव को उपेक्षित कर कभी-कभी अपने ही चिंतन को अवैज्ञानिक, दकियानूसी या पोंगापंथी मानकर नकारने का प्रयास किया।

    किन्तु विगत कुछ वर्षों में भारत पुनः जागृत हो रहा है और प्राचीन भारतीय ज्ञान-विज्ञान के आलोक को नए संदर्भों में पुनः प्रकाशित कर रहा है। भारतीय ज्ञान परंपरा की समृद्ध विरासत के सागर में पुनः अवगाहन किया जा रहा है. 

    यह एक प्रकार से भारत का बौद्धिक पुनर्जागरण है—‘स्व’ को जानने, अपनी ऐतिहासिक विरासत को सँभालने तथा उसे आधुनिक विमर्श में स्थापित करने की नवीन आकांक्षा का संकेत। इसी संदर्भ में भारतीय ऐतिहासिक एवं वैचारिक विमर्श को आधुनिक शैली में प्रस्तुत करने की प्रवृत्ति भी विकसित हो रही है। मैंने भी अपने विभिन्न लेखों के माध्यम से इस चेतना को अभिव्यक्त करने का प्रयास किया है।

    इस क्रम में “वेद विज्ञान” लेखमाला के अंतर्गत अब तक 19 लेख तथा “भारतीय नववर्ष” (जिसमें प्राचीन भारतीय ज्योतिर्विद्या पर विशेष बल है) विषय पर 10 लेख लिखे जा चुके हैं, जिनकी सूची पूर्व में प्रकाशित की जा चुकी है। यहाँ इन दोनों सूचियों के साथ-साथ विमर्श संबंधी अन्य लेखों की सूची भी दी जा रही है।

    सुधी पाठकगण अपनी रुचि के अनुसार सुविधाजनक रूप से इच्छित विषय तक सरलता से पहुँच सकते हैं।

    विमर्श विषयों की लिंक सूची

    वेद विज्ञान लेखमाला: समन्वित दृष्टिकोण- ऋग्वेद एवं अन्य वेदों से सम्बंधित लेखों की सूचि

    https://jyoti-kothari.blogspot.com/2025/03/blog-post_47.html


    वैदिक, बौद्ध एवं जैन परम्पराओं में सनातन की अवधारणा: एक शास्त्रीय एवं तुलनात्मक अध्ययन

    https://jyoti-kothari.blogspot.com/2026/03/blog-post_40.html


    https://jyoti-kothari.blogspot.com/2026/01/blog-post.html


    https://jyoti-kothari.blogspot.com/2025/11/jainism-in-ancient-kashmir.html

    https://jyoti-kothari.blogspot.com/2026/03/31-2026.html

    https://jyoti-kothari.blogspot.com/2026/01/blog-post_13.html

    https://jyoti-kothari.blogspot.com/2026/03/blog-post_28.html


    महोपाध्याय श्री साधुकीर्ति गणि कृत सतरह भेदी पूजा (मूल) एवं अर्थ

    https://jyoti-kothari.blogspot.com/2023/02/blog-post.html

    https://jyoti-kothari.blogspot.com/2021/08/blog-post.html

    https://jyoti-kothari.blogspot.com/2020/07/blog-post_31.html

    https://jyoti-kothari.blogspot.com/2024/05/blog-post.html

    Wokism का उपयुक्त अनुवाद: भाषाशास्त्र और दार्शनिक दृष्टि से 11 वैकल्पिक हिंदी शब्द

    https://jyoti-kothari.blogspot.com/2025/05/wokism-11.html

    https://www.linkedin.com/pulse/cultural-marxism-wokeism-civilizational-challenge-response-kothari-jldoc/

    https://www.linkedin.com/pulse/paper-1-cultural-marxism-wokeism-threat-bharatiya-ways-jyoti-kothari-u6jtf/

    https://jyoti-kothari.blogspot.com/2025/05/the-case-for-india.html

    https://jyoti-kothari.blogspot.com/2025/04/guardians-without-limits-when-supreme.html

    https://jyoti-kothari.blogspot.com/2025/04/blog-post_24.html

    https://jyoti-kothari.blogspot.com/2025/04/blog-post_23.html
     

    Rani Abbakka Chowta-The brave Queen of Tulu Nadu

    https://jyoti-kothari.blogspot.com/2025/10/rani-abbakka-chowta-brave-queen-of-tulu.html

    https://jyoti-kothari.blogspot.com/2025/08/blog-post.html

    https://jyoti-kothari.blogspot.com/2025/06/blog-post_16.html

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    गुरुवार, 26 मार्च 2026

    वैदिक, बौद्ध एवं जैन परम्पराओं में सनातन की अवधारणा: एक शास्त्रीय एवं तुलनात्मक अध्ययन

     

    1. भूमिका

    आधुनिक लोकमान्यता में “सनातन धर्म” शब्द का प्रयोग प्रायः केवल वैदिक परम्परा के लिए किया जाता है। यह धारणा इतनी प्रचलित हो चुकी है कि बौद्ध एवं जैन परम्पराओं को इससे बाहर मान लिया जाता है। किन्तु यदि हम मूल ग्रन्थों (canonical texts) के आधार पर विचार करें, तो यह धारणा यह धारणा शास्त्रीय दृष्टि से अपूर्ण प्रतीत होती है।

    वास्तव में सनातन (संस्कृत), सनन्तनो (पाली) अथवा सासओ  (प्राकृत) शब्द तीनों परम्पराओं—वैदिक, बौद्ध और जैन—में धर्म की शाश्वतता को व्यक्त करने के लिए प्रयुक्त हुआ है।

    वस्तुतः समग्र भारतीय चिंतन में धर्म को एक शाश्वत तत्व के रूप में स्वीकार किया गया है, जिसे धारण कर जीव मानसिक विशुद्धि के माध्यम से क्रमशः ऊर्ध्वगमन करते हुए मोक्ष की प्राप्ति करता है। विभिन्न उपासना पद्धतियाँ (पंथ–संप्रदाय) तथा दार्शनिक मत इसी शाश्वत सत्य का विविध रूपों में प्रतिपादन करते हैं।


    सनातन धर्म 


    2. सनातन” शब्द की व्युत्पत्ति एवं दार्शनिक अर्थ

    “सनातन” शब्द का अर्थ अनादि तथा नित्य माना जाता है। संस्कृत में ‘सनातन’, पाली में ‘सनन्तनो’ तथा प्राकृत में ‘सासओ’ जैसे रूप मिलते हैं। इन सभी का दार्शनिक आशय यह है कि धर्म अथवा सत्य का स्वरूप कालातीत, अनादि और अपरिवर्तनीय है।

    3. वैदिक परम्परा में सनातन

    यद्यपि वैदिक संहिताओं में “सनातन धर्म” पद स्पष्ट रूप में व्यवस्थित नहीं मिलता, तथापि शाश्वतता की अवधारणा प्रारम्भ से ही विद्यमान है। उपनिषद् काल से इसके दार्शनिक संकेत स्पष्ट होने लगते हैं। वैदिक एवं परवर्ती वैदिक साहित्य में धर्म की कालातीतता को नित्य, शाश्वत तथा पुराण जैसे शब्दों द्वारा व्यक्त किया गया है।

    श्रुति साहित्य में भी शाश्वतता की अवधारणा स्पष्ट मिलती है। उदाहरणतः श्वेताश्वतर उपनिषद् में कहा गया है—

    श्वेताश्वतर उपनिषद् 6.13

    नित्यो नित्यानां चेतनश्चेतनानाम्।
    एको बहूनां यो विदधाति कामान्॥

    अर्थ :
    जो अनेक नश्वर चेतन प्राणियों में स्थित है, वह स्वयं नित्य है—सभी के अस्तित्व का आधार वही शाश्वत सत्ता है। यहाँ “नित्य” शब्द शाश्वत, सनातन सत्ता का बोध कराता है। इस प्रकार श्रुति परम्परा परम सत्य को नित्य और कालातीत मानती है, जो सनातनता की दार्शनिक पृष्ठभूमि प्रस्तुत करता है।

    मनुस्मृति

    वेदोऽखिलो धर्ममूलं स्मृतिशीले च तद्विदाम्।
    आचारश्चैव साधूनामात्मनस्तुष्टिरेव च॥
    (मनुस्मृति 2.6)

    मनु धर्म की सार्वकालिकता का प्रतिपादन करते हैं—जो सनातनता की अवधारणा से संबद्ध है।

    भगवद्गीता

    भगवद्गीता (जो महाभारत का अंग है) में कृष्ण कहते हैं—

    एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः।
    स कालेनेह महता योगो नष्टः परन्तप॥ (गीता 4.2)

    यद्यपि यहाँ “सनातन” शब्द नहीं है, पर परम्परा और कालातीतता की अवधारणा स्पष्ट है।

    महाभारत

    स्पष्ट शब्द में—

    शाश्वतोऽयं पुराणो धर्मः
    (महाभारत, शान्ति पर्व, 109.10)

    यहाँ शाश्वत / पुराण धर्म का प्रयोग हुआ है, जिसे परवर्ती परम्परा में “सनातन धर्म” कहा गया।

    4. बौद्ध परम्परा में सनन्तन धम्म

    बुद्ध धम्म की खोज करते हैं, निर्माण नहीं। बौद्ध धर्म में धम्म को बुद्ध द्वारा निर्मित नहीं, बल्कि अनाविष्कृत शाश्वत नियम के रूप में देखा गया है। इसका सर्वाधिक प्रसिद्ध प्रमाण धम्मपद में मिलता है।

    (क) धम्मपद — खुद्दक निकाय, गाथा 5

    (पाली मूल, देवनागरी लिप्यंतरण)

    न हि वेरेन वेरानि सम्मन्तीध कदाचनं।
    अवेरेन च सम्मन्ति, एस धम्मो सनन्तनो॥

    (धम्मपद 5)

    अर्थ
    “वैरो से वैर कभी भी शांत नहीं होते;
    अवैर से ही वे शांत होते हैं—
    यह सनन्तन धम्म है।”

    यहाँ सनन्तनो शब्द स्पष्ट रूप से आया है, जो पाली में सनातन / शाश्वत का ही रूप है।
    अतः बौद्ध धर्म स्वयं अपने धम्म को सनन्तन कहता है—यह किसी उत्तरकालीन व्याख्या का परिणाम नहीं, बल्कि मूल निकाय-साहित्य का कथन है।

    जैन ग्रन्थ की प्राचीन पांडुलिपि - प्रतीकात्मक चित्र 


    5. जैन परम्परा में शाश्वत / सनातन धर्म

    जैन दर्शन में धर्म को अनादि–अनन्त माना गया है। तीर्थंकर केवल उसका प्रवर्तन करते हैं, निर्माण नहीं। सभी तीर्थंकर अपना उपदेश प्रारम्भ करते हुए कहते हैं कि अतीत में अनंत तीर्थंकर हो गए हैं, वर्तमान में हैं और भविष्य में अनंत तीर्थंकर होंगे वे सभी ऐसा कहते थे, कहते हैं और कहेंगे..........  

    वत्थु सहावो धम्मो 

    अर्थात धर्म वस्तुओं का स्वाभाविक, शाश्वत नियम है—कालजन्य नहीं।

    एगो मे सासओ अप्पा, णाण दंसण संजुओ; 

    सेसा मे वहिरा भावा, सव्वे संजोग लक्खणा

    अर्थात मै ज्ञान-दर्शन से युक्त एक शाश्वत आत्मा हुं। शेष सभी संयोगों से उत्पन्न वहिर्भाव हैं।

    पुक्खरवरदीवढ्ढे सूत्र

    यह एक आगमिक वचन है जिसे श्रुत-स्तव के नाम से जाना जाता है, जो—

    • नित्य देववंदन

    • प्रतिक्रमण

    • एवं चतुर्विंशति स्तव परम्परा

    में प्रयुक्त होता है। यह श्वेताम्बर आगमिक परम्परा में अत्यन्त प्राचीन एवं मान्य स्तव है।

    प्राकृत पंक्ति—

    धम्मो वढ्ढउ सासओ, विजयओ धम्मुत्तरं वढ्ढउ।

    अर्थ
    “श्रुत-धर्म (ज्ञान-धर्म) शाश्वत रूप से बढ़ता रहे,
    विजयी हो; और चारित्र-धर्म (धर्मोत्तर) भी बढ़ता रहे।”

    यहाँ सासओ (शाश्वत) शब्द प्रयुक्त है, जो प्राकृत में सनातन का ही पर्याय है।

    6.  तुलनात्मक विश्लेषण 

    परम्परा शब्द   अर्थस्रोत
    वैदिकशाश्वतकालातीत धर्ममहाभारत
    बौद्धसनन्तनोनित्य धम्मधम्मपद 5
    जैनसासओशाश्वत धर्मश्रुत स्तव

    7. “शाश्वत” और “सनातन” : शब्दार्थ की स्पष्टता

    भाषाशब्दअर्थ
    संस्कृतसनातन / शाश्वतअनादि–अनन्त
    पालीसनन्तनोशाश्वत
    प्राकृतसासओनित्य, अपरिवर्तनीय

    अतः शाश्वत और सनातन में कोई वैचारिक भेद नहीं है—केवल भाषिक रूपांतर है।

    8. निष्कर्ष

    शास्त्रीय साक्ष्यों के आधार पर यह स्पष्ट है कि—

    1. वैदिक परम्परा अपने धर्म को शाश्वत / पुराण / सनातन कहती है।

    2. बौद्ध परम्परा अपने धम्म को सनन्तन घोषित करती है (धम्मपद 5)।

    3. जैन परम्परा धर्म को अनादि–अनन्त मानती है और उसे सासओ (शाश्वत) कहती है।

    अतः यह कहना कि केवल वैदिक धर्म ही सनातन है, शास्त्रीय तथ्यों के विपरीत है। भारत की तीनों प्रमुख श्रमण–वैदिक परम्पराएँ—वैदिक, बौद्ध और जैन—अपने-अपने धर्म को सनातन / शाश्वत मानती हैं।

    यह निष्कर्ष किसी आधुनिक विचारधारा पर नहीं, बल्कि मूल ग्रन्थों के प्रत्यक्ष प्रमाण पर आधारित है। अतः ‘सनातन’ किसी एक धार्मिक पहचान का नाम नहीं, बल्कि शाश्वत धर्म के सिद्धांत का दार्शनिक संकेत है।

    हिन्दू जीवनशैली का मूलाधार 

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    ऋषभदेव कथानक में अग्नि का प्रथम अनुभव तथा ऋग्वेद का प्रथम मंत्र ‘अग्निमीळे पुरोहितं’: एक तुलनात्मक अध्ययन


    प्रस्तावना

    आवश्यक निर्युक्ति, कल्पसूत्र टीका, त्रिषष्टि शलाका पुरुष चरित्र आदि जैन ग्रंथों में प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव की कथा से ऋग्वेद १.१.१ मंत्र, अर्थात वेद के प्रथम मंत्र का बड़ा गहरा सम्बन्ध दृष्टिगोचर होता है। भारतीय परम्पराओं में सभ्यता के प्रारम्भ, अग्नि के प्रथम अनुभव तथा यज्ञ परम्परा के उद्भव के सम्बन्ध में विविध संकेत मिलते हैं। प्रस्तुत लेख में जैन परम्परा में वर्णित ऋषभदेव सम्बन्धी कथानकों के आधार पर अग्नि के प्रथम अनुभव और उसके प्रति विकसित श्रद्धा-भाव को ऋग्वेद के प्रथम मंत्र के सन्दर्भ में समझने का प्रयास किया गया है।

    प्रथम तीर्थंकर श्री ऋषभदेव, शत्रुंजय तीर्थ, पालीताना 

    अकर्मभूमि और मानव सभ्यता का संक्रमण

    ऋषभदेव के पिता नाभि अंतिम कुलकर थे। उस समय जम्बूद्वीप का भरत क्षेत्र अकर्मभूमि था, अर्थात जहाँ किसी प्रकार असि, मसि, कृषि का व्यवहाररूप कर्म नहीं था। उस समय के मनुष्य अत्यंत सरल एवं संतोषी थे; उनकी सभी आवश्यकताओं की पूर्ति कल्पवृक्ष के माध्यम से हो जाती थी। अपनी जीविका के लिए उन्हें कोई कर्म नहीं करना पड़ता था, इसलिए उस समय की भूमि को अकर्मभूमि कहा जाता था।

    कालक्रम से कल्पवृक्षों की फल प्रदान करने की क्षमता कम होने लगी और उस समय के मनुष्यों ने जीवन में पहली बार 'अभाव' का अनुभव किया। अभाव का अनुभव धीरे-धीरे आपसी झगड़ों में बदलने लगा और वे न्याय के लिए नाभि कुलकर के पास आने लगे। उस समय के मनुष्य अत्यंत सरल प्रकृति के थे; नाभि कुलकर उन्हें समझा-बुझाकर अथवा बहुत ही सामान्य मौखिक दंड देकर उन झगड़ों को शांत कर देते थे। धीरे-धीरे नाभि वृद्ध होने लगे और इस कार्य के लिए उन्होंने अपने पुत्र ऋषभ को मनोनीत कर दिया, और तब से ऋषभ ही इस प्रकार का न्याय और दंड-विधान करने लगे।

    अग्नि का प्रथम आविर्भाव और मानव प्रतिक्रिया


    राजा ऋषभ के समक्ष अग्नि की उत्पत्ति पर युगलिकों की आश्चर्यभिव्यक्ति 

    जैन कथानकों के अनुसार उसी समय इस अवसर्पिणी काल के तीसरे आरे के अंतिम भाग में जम्बूद्वीप के इस भरत क्षेत्र में प्रथम बार अग्नि उत्पन्न हुई। इससे पहले इस क्षेत्र में अग्नि नहीं थी और कल्पवृक्ष के फल खाकर ही उस समय के मनुष्य अपनी भूख शांत करते थे।

    जीवन में प्रथम बार अग्नि को देखकर उस समय के युगलिक मनुष्य अत्यंत आश्चर्यचकित हुए और विस्मित होकर अग्नि को सुंदर चमकीला फूल मानकर उसे तोड़ने जाने लगे, जिससे उनके हाथ जल गए और उन्हें भारी पीड़ा होने लगी। तब वे ऋषभ के पास आकर अग्नि के उत्पन्न होने से लेकर अपनी पीड़ा तक बताने लगे। अलौकिक ज्ञान से संपन्न ऋषभदेव ने भरतक्षेत्र में अग्नि की उत्पत्ति हुई है, ऐसा जानकर उन भोले, अबोध युगलिकों को अग्नि का ज्ञान कराया, परंतु यह बात उन्हें सही तरीके से समझ में नहीं आई। कथानक के अनुसार कालांतर में ऋषभदेव उनके राजा बने और धीरे-धीरे उन्हें असि, मसि, कृषि का व्यवहार तथा अग्नि का उपयोग समझाने में सफल रहे, परंतु यह अग्नि उनके लिए एक आश्चर्यजनक वस्तु बनी रही।

    ऋषभदेव की दीक्षा और साधु परम्परा का आरम्भ

    एक समय संसार से वैराग्य होने पर ऋषभदेव ने दीक्षा अंगीकार की और मुनिजीवन स्वीकार किया। उनके साथ उनके अनुयायी बनकर १००० अन्य पुरुषों ने भी दीक्षा अंगीकार कर मुनि बन गए। इस भरतक्षेत्र में वे पहले मुनि तपस्वी थे और मुनिजीवन के सम्बन्ध में किसी को कुछ भी पता नहीं था। दीक्षा लेने के बाद ऋषभदेव आहार के लिए भिक्षाटन करने लगे, परंतु भिक्षाविधि से अनजान तत्कालीन प्रजाजन उन्हें अपना राजा समझकर उनके सत्कार के लिए हाथी, घोड़े, रथ, वस्त्राभूषण, कन्या आदि देने लगे। परंतु सर्वत्यागी होने के कारण ऋषभदेव को इन बहुमूल्य वस्तुओं की नहीं, मात्र भोजन की अपेक्षा थी, और नासमझी के कारण कोई भी उन्हें भोजन नहीं देता था। शुद्ध भिक्षा नहीं मिलने के कारण ऋषभदेव एक वर्ष से अधिक निराहार रहे; मौन होने के कारण उन्होंने किसी को आहार देने के लिए नहीं कहा।

    ऋषभदेव ने इतनी कठिन तपस्या कर आहार-परिषह को सहन किया, परंतु उनके १००० अनुयायी भूख सहन नहीं कर पाए। मौन होने के कारण ऋषभदेव ने भी उन्हें कुछ नहीं कहा। तब वे ऋषभदेव के परमभक्त, सरल परंतु अज्ञानी मनुष्यों ने निर्णय किया कि घर का त्याग किया है, अतः जंगल में ही रहेंगे; भूख सहन नहीं कर सकते, इसलिए जंगल के कंदमूल का भक्षण करेंगे और तापस बनकर साधना करेंगे।

    ऋषभदेव अलौकिक ज्ञान से संपन्न थे, परंतु अभी केवलज्ञान प्राप्त नहीं हुआ था; वे सर्वज्ञ नहीं बने थे। तीर्थंकर सर्वज्ञ बनने से पहले उपदेश नहीं देते, अतः उन तापसों का कोई मार्गदर्शक नहीं था। आध्यात्मिक साधना के सम्बन्ध में कोई ज्ञान नहीं था, इसलिए अपनी बुद्धि के अनुसार जो उन्हें योग्य लगा, वैसा आचरण करने लगे।

    अग्नि : आश्चर्य से आराधना तक

    जैसा कि पहले ही कहा गया है, गृहस्थ जीवन में उन मनुष्यों का साक्षात्कार अग्नि से प्रथम बार हुआ था, जिसने उनके जीवन में आश्चर्य और भय का मिश्रित अनुभव प्रदान किया था। अग्नि उनके लिए आज भी एक विस्मयकारी शक्ति थी। जंगल में निवास करते हुए और प्राकृतिक शक्तियों से प्रत्यक्ष सम्पर्क में रहते हुए संभवतः उनके मन में अग्नि के प्रति श्रद्धा का भाव विकसित हुआ। इसी कारण उन्होंने अग्नि की पूजा तथा यज्ञकर्म प्रारम्भ किए। ऋग्वेद का प्रथम मंत्र "अग्निमीळे पुरोहितं" इसी सत्य की ओर संकेत करता है।

    (विशेष: ऋग्वेद में सौ से अधिक बार, एवं यजुर्वेद में भी ऋषभ का नाम बारम्बार आया है. साथ ही ऋषभ के पुत्र भरत के नाम भी अनेकों बार उल्लेख हुआ है. यह उल्लेख वेदों के सन्दर्भ में ऋषभदेव के महत्व को रेखांकित करता है.)


    वैदिक यज्ञ और अग्नि 


    मंत्र

    अग्निमीळे पुरोहितं यज्ञस्य देवम् ऋत्विजम् ।
    होतारं रत्नधातमम् ॥

    अब ऋग्वेद १.१.१ मंत्र का अर्थ सायणाचार्य के वैदिक भाष्य के अनुसार प्रस्तुत किया जा रहा है। सायणाचार्य का भाष्य वैदिक परंपरा का सर्वाधिक प्रचलित और पारंपरिक प्रामाणिक कर्मकाण्डीय अर्थ देता है।

    सायणभाष्यम् (मूल पाठ)

    "अग्निम् ईळे स्तौमि। कं? पुरोहितम्। पुरः हितः पुरस्तात् स्थाप्यते इति पुरोहितः। यज्ञस्य देवम् दीप्तिमन्तम्। ऋत्विजम् ऋतुषु यजनशीलम्। होतारं हव्यवाहनम्। रत्नधातमम् रत्नानां धनानां धातमं दातारम्।"

    सायणाचार्य के अनुसार पदानुसार अर्थ

    1. अग्निम्
      सायणाचार्य के अनुसार यहाँ अग्नि का अर्थ यज्ञीय अग्नि है — वह अग्नि जिसमें आहुति दी जाती है और जो देवताओं तक हवि पहुँचाती है। यह लौकिक अग्नि ही है, परंतु यज्ञ में देवता का स्वरूप धारण करती है।
    2. ईळे
      “ईळे” का अर्थ है — स्तौमि अर्थात् “मैं स्तुति करता हूँ”।
      ऋषि यज्ञारम्भ में अग्नि का आह्वान करते हैं।
    3. पुरोहितम्
      सायणाचार्य कहते हैं —
      पुरः हितः = यज्ञस्य अग्रे स्थापितः
      अर्थात जो यज्ञ के आगे स्थापित किया जाता है।
      अग्नि यज्ञ का प्रथम अंग है, इसलिए वह पुरोहित है।
    4. यज्ञस्य देवम्
      अग्नि यज्ञ का देवता है क्योंकि वही यज्ञ का अधिष्ठाता है।
      सायणाचार्य के अनुसार —
      देवः = दीप्तिमान्
      जो प्रकाशमान है।
    5. ऋत्विजम्
      ऋतु + इज् = ऋतु के अनुसार यज्ञ करने वाला
      अर्थात अग्नि यज्ञ के प्रत्येक काल में आहुति ग्रहण करता है।
    6. होतारम्
      सायणाचार्य कहते हैं —
      हु शब्दे दाने
      जो हवि को देवताओं तक पहुँचाता है, वह होता है।
      अग्नि देवताओं का मुख है — वह आहुति स्वीकार कर उन्हें पहुँचाती है।
    7. रत्नधातमम्
      सायणाचार्य इस शब्द का अर्थ करते हैं —
      रत्नानि धनानि धत्ते इति
      जो धन, समृद्धि, पशु, पुत्र आदि प्रदान करता है।
      यहाँ रत्न का अर्थ लौकिक समृद्धि से है — कृषि, पशुधन, आयु, प्रतिष्ठा आदि।

    सायणाचार्य के अनुसार अन्वय

    अहम् यज्ञस्य पुरोहितं देवम् ऋत्विजम् होतारं रत्नधातमम् अग्निम् ईळे।

    वैदिक ऋषियों द्वारा अग्नि में आहुति 


    सायणाचार्य के अनुसार भावार्थ

    मैं उस अग्नि की स्तुति करता हूँ जो यज्ञ का पुरोहित है, देवता है, ऋत्विज् है, होता है और यज्ञ के द्वारा साधकों को धन, समृद्धि तथा कल्याण प्रदान करती है।

    सायणाचार्य के अनुसार यह मंत्र यज्ञारम्भ का मंगलाचरण है। ऋषि पहले अग्नि को आह्वान करते हैं क्योंकि—

    अग्नि देवताओं का मुख है
    अग्नि बिना यज्ञ संभव नहीं
    अग्नि आहुति को देवताओं तक ले जाती है
    अग्नि यज्ञकर्ता को फल दिलाती है 

    उपसंहार

  • उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट होता है कि जैन परम्परा में वर्णित ऋषभदेव सम्बन्धी कथानकों में अग्नि के प्रथम अनुभव, उसके प्रति उत्पन्न आश्चर्य एवं भय, तथा क्रमशः विकसित श्रद्धा-भाव का उल्लेख मिलता है। यह मानसिक एवं सांस्कृतिक संक्रमण अग्नि के प्रति आराधनात्मक दृष्टि के विकास की ओर संकेत करता है। ऋग्वेद का प्रथम मंत्र अग्नि को पुरोहित, ऋत्विज् तथा यज्ञ का अधिष्ठाता मानते हुए इसी आराधनात्मक दृष्टिकोण को अभिव्यक्त करता है। इस प्रकार जैन कथानकों में वर्णित सभ्यता के संक्रमण और वैदिक साहित्य में व्यक्त अग्नि-स्तुति के बीच एक उल्लेखनीय वैचारिक साम्य दृष्टिगोचर होता है. 

    वैदिक, बौद्ध एवं जैन परम्पराओं में सनातन की अवधारणा: एक शास्त्रीय एवं तुलनात्मक अध्ययन

  • Thanks, 
    Jyoti Kothari, Proprietor at Vardhaman Gems, Jaipur, represents the centuries-old tradition of Excellence in Gems and Jewelry. He is an adviser at Vardhaman Infotech, a leading IT company in Jaipur. He is also an ISO 9000 professional.

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