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शुक्रवार, 16 मई 2025

IMCTF: मूल्य निर्माण से राष्ट्र निर्माण की ओर


IMCTF

INITIATIVE  FOR  MORAL  AND  CULTURAL  TRAINING  FOUNDATION  
नैतिक-सांस्कृतिक प्रशिक्षण प्रवर्तन संस्थान

Meta Description 

IMCTF युवाओं में संस्कार, कर्तव्यबोध व राष्ट्रभक्ति को जागृत कर राष्ट्र निर्माण हेतु प्रेरित एक नैतिक-सांस्कृतिक प्रशिक्षण अभियान है।

 परिकल्पना – “सर्वे भवन्तु सुखिनः...”

"सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत्।"

(सभी सुखी हों, सभी निरोग रहें, सभी मंगलमय दृष्टिकोण से युक्त हों, कोई भी दुःख का भागी बने)

यही प्रार्थना IMCTF (Initiative for Moral and Cultural Training Foundation) की नींव है। यह प्रयास भारत की सांस्कृतिक चेतना को आधार बनाकर भावी पीढ़ी को संस्कारकर्तव्यबोध, और राष्ट्रीय गौरव से जोड़ता है।

IMCTF Themes
समकालीन संकट

आज हम आधुनिकता, स्वतंत्रता और व्यक्तिगत अधिकारों की बात करते हैं
किन्तु इस एकपक्षीय चिंतन से उत्पन्न हो रहे हैं:

  • हमारी संस्कृति और मूल्यों में गिरावट
  • युवाओं में पश्चिमी संस्कृति का अंधानुकरण
  • भारतीय विरासत के प्रति गर्व का अभाव

जिसके परिणामस्वरूप हो रहा है:

🔻 विचारों का प्रदूषण
🔻 वाणी का अशुद्धिकरण
🔻 आचरण में पतन

यदि इस संकट को शीघ्र समझा गया, तो भारत को भी पश्चिम जैसी सांस्कृतिक विघटन की स्थिति का सामना करना पड़ेगा।

भारत की भूमिका – Spiritual Soft Power

अमेरिका की National Intelligence Council की रिपोर्ट के अनुसार“India will be looked upon to lead the world with its soft power – Spiritualism.”

भारत को वैश्विक दिशा देने के लिए अपनी नैतिकआध्यात्मिक शक्ति को पुनर्जीवित करना होगा। यही IMCTF का लक्ष्य है।

उद्देश्य

  • युवाओं का चरित्र निर्माण
  • भारत के सांस्कृतिक आत्मविश्वास का पुनर्जीवन
  • राष्ट्र को एक आध्यात्मिक विकल्प के रूप में खड़ा करना
  • समाज, संस्कृति, राष्ट्र और प्रकृति के प्रति उत्तरदायित्व की भावना विकसित करना

दर्शनवसुधैव कुटुम्बकम्

IMCTF एक ऐसे विश्व की कल्पना करता है जिसमें

  • मनुष्य और मनुष्य के बीच करुणा
  • मनुष्य और जीव के बीच सह-अस्तित्व
  • मनुष्य और प्रकृति के बीच संतुलन
  • मनुष्य और राष्ट्र के बीच समर्पण हो

1.  वन एवं वन्यजीव संरक्षण

Conserve Forest & Protect Wildlife

🔸 उद्देश्य:

  • प्रकृति की रक्षा का संस्कार बाल एवं युवा मन में रोपण करना 
  • जैव विविधता के प्रति श्रद्धा और सह-अस्तित्व की भावना जगाना

भाव: “वनम् देवालयः इव” — वन को देवालय के समान पवित्र मानना।

🔸  संस्कार:

  • वृक्ष वंदना: वृक्षों को जीवनदायिनी देवता मानकर पूजा करना
  • नाग वंदना: नागों को धरती के रक्षक, पारिस्थितिकीय संतुलन के प्रतीक के रूप में सम्मान देना

🔸 प्रतीक:

  • वृक्ष, वन, नाग, वन्य पशु-पक्षी

2. पारिस्थितिकी संरक्षण

Preserve Ecology

🔸 उद्देश्य:

  • पारिस्थितिकी में संतुलन के लिए सभी प्राणियों और वनस्पतियों की महत्ता समझाना

भाव: “प्रकृति रक्षति रक्षितम्” — जो प्रकृति की रक्षा करता हैप्रकृति उसकी रक्षा करती है।

🔸 संस्कार:

  • गौ वंदना – गौमाता को पालनकर्ता के रूप में देखना
  • गज वंदना – गज (हाथी) को वन-समृद्धि का प्रतीक मानना
  • तुलसी वंदना – औषधीय पौधों के प्रति श्रद्धा का भाव

🔸 प्रतीक:

  • गौ, गज, तुलसी, समस्त वनस्पति और प्राणी-जगत

3. पर्यावरण संरक्षण

Sustain Environment

🔸 उद्देश्य:

  • पर्यावरण के तत्वों के प्रति कृतज्ञतासंरक्षणऔर स्वच्छता का भाव उत्पन्न करना

भाव: “माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः” — यह पृथ्वी मेरी जननी हैमैं उसका पुत्र हूँ।

🔸संस्कार:

  • भूमि वंदना – धरती को जननी के रूप में पूजना
  • गंगा वंदना – नदियों को पवित्र जीवनधारा मानकर उनका संरक्षण

🔸 प्रतीक:

  • पृथ्वी, नदियाँ, जल स्रोत, पर्वत, आकाश

4. पारिवारिक एवं मानवीय मूल्य स्थापना

Inculcate Family & Human Values

🔸 उद्देश्य:

  • कृतज्ञतासेवानम्रताऔर अनुशासन का भाव बालकों में उत्पन्न करना

भाव: “पितृदेवो भवमातृदेवो भवआचार्यदेवो भवअतिथि देवो भव

🔸 संस्कार:

  • मातृ-पितृ वंदना – माता-पिता को ईश्वर के तुल्य मानकर श्रद्धा
  • आचार्य वंदना – गुरुजनों के प्रति सम्मान
  • अतिथि वंदना – अतिथि को देव मानना

🔸 प्रतीक:

  • माता-पिता, गुरु, अतिथि, वृद्धजन

5. नारी सम्मान की पुनर्स्थापना

Foster Women’s Honour

🔸 उद्देश्य:

  • स्त्री को उपभोग की वस्तु नहींसम्माननीय शक्ति के रूप में देखना
  • समाज में स्त्री-पुरुष समत्वगरिमा और सुरक्षा को पुनर्स्थापित करना

भाव: “या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता...”

🔸 संस्कार:

  • कन्या वंदना – कन्या को देवी रूप मानकर सम्मान
  • सुवासिनी वंदना – मातृत्व और स्त्री गरिमा का आदर

🔸  प्रतीक:

  • कन्याएँ, मातृत्व, गृहलक्ष्मी, वधू

6. राष्ट्रभक्ति की भावना का जागरण

Instill Patriotism

🔸 उद्देश्य:

  • देशभक्तिराष्ट्र सेवाऔर आत्म-बलिदान के प्रति प्रेरणा देना
  • भारत को "विष्वगुरु" के रूप में पुनर्स्थापित करने का भाव

भाव: “जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी

🔸 संस्कार

  • भारत माता वंदना – देश को माता रूप में देखना
  • परमवीर वंदना – शहीदों के प्रति श्रद्धांजलि

🔸 प्रतीक:

  • भारतमाता, राष्ट्रध्वज, शहीद सैनिक, स्वतंत्रता सेनानी

त्रिकोणीय कार्यनीतिउद्देश्यसंस्कार और प्रतीक

IMCTF प्रत्येक सांस्कृतिक विषय को एक त्रिकोणीय संरचना में समझाता है:

  • थीम (Theme): उद्देश्य
  • संस्कार (Sanskara): भावनात्मक प्रेरणा
  • प्रतीक (Symbol): दृश्य प्रभाव

विषय (Theme)

संस्कार (Sanskara)

प्रतीक (Symbol)

वन एवं वन्यजीव संरक्षण

वृक्ष वंदना, नाग वंदना

वृक्ष, पशु, नाग

पारिस्थितिकी संरक्षण

गौ, गज, तुलसी वंदना

गाय, हाथी, तुलसी, वनस्पति जगत

पर्यावरण संरक्षण

भूमि वंदना, गंगा वंदना

पृथ्वी, नदियाँ, जलस्रोत

पारिवारिक मानवीय मूल्य

मातृ-पितृ, आचार्य, अतिथि वंदना

माता-पिता, गुरु, अतिथि, वृद्धजन

नारी सम्मान

कन्या वंदना, सुवासिनी वंदना

कन्या, मातृत्व

राष्ट्रभक्ति

भारतमाता वंदना, परमवीर वंदना

भारतमाता, शहीद सैनिक

 किसके लिए?

IMCTF का आह्वान समाज के हर जागरूक नागरिक से है:

  • स्कूल प्रबंधन, प्राचार्य, शिक्षक
  • अभिभावक
  • सामाजिक नेता
  • राष्ट्र निर्माण में रुचि रखने वाले युवा

कार्यक्रमों की विशेषताएँ

  • सांस्कृतिक पुनर्जागरण के माध्यम से युवा मन का निर्माण
  • भारतीय प्रतीकों के माध्यम से संस्कारों की गहराई
  • जीवनशैली और आचरण में मूल्यों की प्रतिष्ठा
  • संवेदनशील नागरिकता, पर्यावरणीय उत्तरदायित्व और देशभक्ति का बोध

आदर्श वाक्य

"Value Building is Nation Building"
मूल्य-निर्माण ही राष्ट्र-निर्माण है।

समर्पण और आह्वान

भारत को विश्वगुरु बनाने के लिए हम सबका यह साझा संकल्प है।
हम आमंत्रित करते हैंआइए, इस यज्ञ में सहभागी बनें।

प्रगति की राह पर अग्रसर आप और हमजय हिन्द।
वन्दे मातरम्।

आह्वानएक पवित्र यज्ञ में सहभागी बनने का

1. हम आपसे आग्रह करते हैं कि आप IMCTF के साथ एक प्राचार्य, प्रबंधन सदस्य, शिक्षक या अभिभावक के रूप में जुड़ें।

2. समाज आपसे अपेक्षा करता है
आप मात्र शिक्षक या पालक नहीं...
आप हैं:

  • धरोहर के दीपधारक — Torchbearer of our Cultural Heritage
  • माटी को आकार देने वाले मृत्तिका-शिल्पी — Ceramist or Potter of Young Minds
  • आदर्श प्रेरक व्यक्तित्व — Role Model
  • मार्गदर्शक और पथप्रदर्शक नेता — Path-Founder & Inspiring Leader
  • कर्तव्यनिष्ठ नागरिक — Responsible Citizen of Bharat

3. IMCTF क्यों?


आज के युवाओं को संस्कार, संस्कृति और आत्मचेतना की आवश्यकता है।
जो बालक-बालिकाएं भारतीय आध्यात्मिक परंपरा से दूर होते जा रहे हैं और जिन पर पाश्चात्य जीवनशैली का नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है, उनके लिए IMCTF एक संरक्षक बनकर उभरता है।

  • हम प्रतीकों और संस्कारों के माध्यम से मूल्यनिष्ठ और सांस्कृतिक प्रशिक्षण प्रदान करते हैं।
  • हम उनके मन, आचरण, चरित्र और जीवनशैली को भारतीय जीवन मूल्यों के अनुरूप आकार देते हैं।
  • हम उन्हें सिखाते हैं — मातृ-पितृ-गुरु वंदनस्त्री-सम्मानप्रकृति और राष्ट्र आराधना।

4. हमारा दृढ़ विश्वास है
"
मूल्य निर्माण ही राष्ट्र निर्माण है"

IMCTF का मूल मंत्र:
“Value Building is Nation Building”

5. आइए, हम सब मिलकर इस पुण्य कार्य में सहभागी बनें।
भारत को फिर सेविश्वगुरुबनाने के इस महान प्रयास में आपकी सहभागिता स्वागतयोग्य है।

IMCTF एक नैतिक-सांस्कृतिक प्रशिक्षणअभियान है जो भारतीय युवाओं में संस्कार, कर्तव्यबोध और राष्ट्रभक्ति को पुनर्स्थापित करता है। “मूल्य निर्माण ही राष्ट्र निर्माण है” — इसी सिद्धांत पर आधारित यह पहल भावी पीढ़ी को भारतीय संस्कृति, पर्यावरण, परिवार और राष्ट्र के प्रति जागरूक एवं कर्मशील बनाती है।

वन्दे मातरम्

प्रगति की राह पर अग्रसर आप और हम – जय हिन्द

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Thanks, 
Jyoti Kothari 
(Jyoti Kothari, Proprietor, Vardhaman Gems, Jaipur, represents the Centuries Old Tradition of Excellence in Gems and Jewelry. He is an adviser at Vardhaman Infotech, a leading IT company in Jaipur. He is also an ISO 9000 professional.

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बुधवार, 14 मई 2025

हिंदू जीवनशैली का मूलाधार: मार्गानुसारी जीवन के 35 आदर्श गुण

हिंदू जीवनशैली का मूलाधार: मार्गानुसारी जीवन के 35 आदर्श गुण

प्रस्तावना 

"धर्मो रक्षति रक्षितः" — मनुस्मृति
जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है।

भारत के मनीषियों ने प्राचीन काल से ही मनुष्य के जीवन को ऊर्ध्वगामी बनाने और उसके सतत विकास के लिए प्रेरणा एवं दिशा-निर्देश प्रदान किए हैं। उनके चिंतन में महामुनियों से लेकर सामान्य जन तक की आत्मिक और सामाजिक उन्नति की चिंता समाहित रही है। इसी चिंतन से भारतीय जीवन पद्धति — जिसे हम आर्य या हिन्दू जीवन पद्धति भी कह सकते हैं — विकसित हुई।

यह जीवन-पद्धति केवल मनुष्य के लिए नहीं, बल्कि संपूर्ण प्राणी-जगत के कल्याण पर आधारित है और "वसुधैव कुटुम्बकम्" की भावना से ओतप्रोत है। यह भोग नहीं, योग पर; परपीड़ा नहीं, परोपकार पर; विवाद नहीं, संवाद पर; संग्रह नहीं, दान पर आधारित जीवनशैली है। इसमें व्यक्ति का महत्व स्वीकारते हुए भी समष्टि को उससे ऊपर रखा गया है। इस कारण भारतीय दृष्टिकोण में पश्चिम की भांति व्यक्ति सबसे ऊपर नहीं होता — बल्कि उसके ऊपर परिवार, समाज, राष्ट्र, और यहाँ तक कि समस्त सृष्टि का स्थान होता है।

यह दृष्टिकोण केवल भौतिक सुखों तक सीमित नहीं है, बल्कि आधिदैविक और आध्यात्मिक साधना को भी समान महत्व देता है। ब्रह्मचर्य आश्रम से लेकर गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास — यह सम्पूर्ण यात्रा आत्मानुशासन और अंतर्मुखी साधना की ओर प्रेरित करती है। यह केवल भोग की अंधी दौड़ नहीं, बल्कि पूर्ण आनंद और चैतन्य की प्राप्ति की दिशा में एक गहन यात्रा है।

भारतीय मनीषियों ने विशेषकर गृहस्थ जीवन की मर्यादा और महिमा पर गंभीर चिंतन किया है। इन्हीं मनीषियों में से एक सूरी पुरंदर नाम से विख्यात महान आचार्य —   हरिभद्रसूरि (5वीं शताब्दी), जो लगभग 1444 ग्रंथों के रचयिता हैं — ने धर्मबिन्दु’ नामक एक विशिष्ट ग्रंथ में गृहस्थ जीवन की विशेषताओं पर प्रकाश डाला है। इस ग्रंथ के प्रथम अध्याय "सामान्य गृहस्थ धर्म" में उन्होंने ऐसे 35 गुणों की चर्चा की है, जो एक गृहस्थ के जीवन को सुख, शांति और समृद्धि से भर सकते हैं। यही 35 गुण ‘मार्गानुसारी जीवन’ का स्वरूप बनाते हैं, जिन्हें आचार्य हरिभद्रसूरि ने हिंदू जीवनशैली के मूलाधार के रूप में प्रस्तुत किया है।

मार्गानुसारी जीवन

लगभग सभी भारतीय दर्शन जीवन में मुख्य रूप से चार पुरुषार्थ की बात करता है- धर्म, अर्थ, काम, एवं मोक्ष. इसमें मोक्ष परम पुरुषार्थ है और धर्म पुरुषार्थ के आचरण से ही यह प्राप्त हो सकता है. धर्मविन्दु ग्रन्थ में आचार्य हरिभद्र सूरी कहते हैं की सम्यग्दर्शन  एवं श्रावक-धर्म की प्राप्ति के लिए पहले मार्गानुसारी जीवन का अभ्यास आवश्यक है। यह जीवन एक प्रकार से मोक्षमार्ग के महल की नींव के समान है — बिना इसकी दृढ़ता के धार्मिक विकास संभव नहीं।

चरमावर्त काल के प्रारंभ में यद्यपि सभी जीवों को सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र रूप सद्धर्म सहज उपलब्ध नहीं होता, सदाचारी मनुष्यों को ऐसे गुण प्राप्त होते हैं जोउसको मोक्षमार्ग की दिशा में आगे बढ़ाते हैं। इस प्रकार के जीवन को ही मार्गानुसारी जीवन कहते हैं।

भले ही व्यक्ति को धर्म का पूर्ण शास्त्रीय ज्ञान न हो, यदि उसमें मोक्ष के प्रति श्रद्धा और आत्मा के अस्तित्व की स्वीकृति है — तो वह मार्गानुसारी जीवन की दिशा में अग्रसर है। यह जीवन मोक्ष की अवधारणा को आत्मसात करता है, भले ही सर्वज्ञ द्वारा प्रतिपादित मोक्षस्वरूप का पूर्ण ज्ञान उसमें न हो।

आचार्य हरिभद्रसूरि ने ‘धर्मबिन्दु’ ग्रंथ में इस मार्गानुसारी जीवन के 35 गुण बताए हैं, जिन्हें चार भागों में विभाजित किया गया है —

  1. ११ कर्तव्य

  2. ८ गुण

  3. ८ दोषों से बचाव

  4. ८ साधनाएँ

मार्गानुसारी जीवन के 11 कर्तव्य (जीवन में करने योग्य बातें)

"कर्तव्येण हि जीवनं शोभते।"
(कर्तव्यों का पालन ही जीवन को शोभायमान बनाता है।)

1. न्यायसंपन्न वैभव

गृहस्थ जीवन के लिए धन आवश्यक है, परंतु उसका अर्जन धर्म और नीति के अनुसार होना चाहिए।
अन्याय या छल से प्राप्त संपत्ति धर्म, सुख और शांति को नष्ट कर देती है।
न्याय-संपन्न जीविकोपार्जन मार्गानुसारी जीवन का पहला आधार है।

2. आयोचित व्यय (उचित खर्च)

आय के अनुरूप ही व्यय करना चाहिए।
दिखावे, प्रतिस्पर्धा या भोगवृत्ति के कारण यदि आय से अधिक खर्च किया जाए, तो जीवन में तनाव, ऋण और पतन आता है।
उदार बनें, पर फिजूलखर्च न हों।

3. उचित वेशभूषा

वस्त्र और आभूषण ऐसे हों जो सादगी, शालीनता और मर्यादा को प्रकट करें।
आडंबर, तड़क-भड़क या शरीर प्रदर्शन से बचें।
वेश आपकी आर्थिक स्थिति और संस्कृति के अनुरूप हो।

4. उचित गृह

घर ऐसा हो जो:

  • सुरक्षित हो,

  • अत्यधिक द्वार या एकदम बंद न हो,

  • ऋतु और स्थान के अनुकूल हो,

  • और अच्छे पड़ोसियों से घिरा हो।
    ऐसा गृह पारिवारिक और आध्यात्मिक उन्नति के लिए अनुकूल होता है।

5. उचित विवाह

विवाह समान कुलशील, समान धर्म–दृष्टि और शीलयुक्त परिवारों में हो।
भिन्न गोत्र होना शास्त्रसम्मत है।
इससे पारिवारिक शांति, समरसता और धर्मानुकूलता बनी रहती है।

मार्गानुसारी जीवन के कर्तव्य - उचित भोजन 

6. उचित भोजन  

भोजन:

  • समयबद्ध आहार (निश्चित समय पर),

  • शरीर और ऋतु के अनुकूल,

  • मित, सात्त्विक और संयमित होना चाहिए।
    भक्ष्य-अभक्ष्य का विवेक रखें, गरिष्ठ या विकारजन्य पदार्थों से बचें।
    अजीर्ण की स्थिति में भोजन न करें, अन्यथा स्वास्थ्य और साधना दोनों में बाधा आती है।

7. माता–पिता की सेवा (पूजा)

माता-पिता का आदर, सेवा और आज्ञा–पालन धर्म का भाग है।
उनके प्रति श्रद्धा, कृतज्ञता और प्रेम बनाए रखें।
उनकी प्रसन्नता में ही ईश्वर का साक्षात दर्शन होता है।

8. पाल्य–पोषण का धर्म

जो लोग आपके अधीन हैं – जैसे परिवार के सदस्य, सेवक, या अन्य आश्रित – उनका सहानुभूतिपूर्वक पालन–पोषण करें।
सिर्फ स्वार्थ नहीं, समर्पण से परिवार चलाना गृहस्थ का कर्तव्य है।

9. अतिथि सेवा और दान

जो योग्य अथवा ज़रूरतमंद अतिथि, गुरुजन, या पीड़ितजन आएं – उनकी यथाशक्ति सेवा और सत्कार करें
दान सुपात्र को दें, और सहायता भावनापूर्वक हो।

10. ज्ञानी–चारित्रशीलों की सेवा

जो व्यक्ति ज्ञान, संयम, तप, और सदाचार से युक्त हों – उनकी संगति करें, सेवा करें और मार्गदर्शन प्राप्त करें।
ऐसी संगति जीवन में धर्म और विवेक की वृद्धि करती है।

11. यथाशक्ति कार्य और परिस्थिति–अनुकूल आचरण

कोई भी कार्य शुरू करने से पहले सोचें कि –

  • क्या मेरी उसमें शक्ति और सामर्थ्य है?

  • क्या वह कार्य राज्य, समय और धर्म के अनुकूल है?
    जो कार्य शक्ति से बाहर हो, या समय–देश–धर्म से प्रतिकूल हो, उससे बचें।

मार्गानुसारी जीवन के 8 दोष (जिनसे बचाव आवश्यक है)

"दोषाणां परित्यागः धर्मस्य आरंभः।"
(दोषों का त्याग ही धर्म की शुरुआत है।)

1. निंदा का त्याग

किसी भी व्यक्ति की निंदा — चाहे वह मन से हो, वाणी से हो, या व्यवहार से — पापकर्म है।
विशेषतः धर्मगुरु, राजनेता, या वरिष्ठ व्यक्तियों की निंदा करने से ईर्ष्या, द्वेष, अपकीर्ति और नीच कर्मबंधन होता है।
शास्त्रों में इसे "पीठ का मांस खाने" जैसा घोर पाप कहा गया है।

2. निंदनीय प्रवृत्तियों से बचाव

धर्म और नैतिकता के विरुद्ध कोई भी कार्य —
भले ही उसमें मृत्यु का भय हो — नहीं करना चाहिए।
ऐसी प्रवृत्तियाँ व्यक्ति को राजदंड, अपमान, और आत्मिक पतन की ओर ले जाती हैं।

3. इंद्रिय-निग्रह (संयम)

पाँचों इंद्रियाँ स्वभावतः विषयों की ओर आकर्षित होती हैं।
जो व्यक्ति इंद्रियों का गुलाम बनता है, वह पतन की ओर बढ़ता है।
इंद्रियनिग्रह से मन की स्थिरता, विवेक और आत्मिक बल प्राप्त होता है।

4. आंतर शत्रुओं पर विजय

काम, क्रोध, मद, मान, माया, लोभ, और मत्सर — ये सभी अंतःशत्रु हैं।
बाह्य शत्रुओं की अपेक्षा ये अधिक विनाशकारी होते हैं।
इन पर विजय प्राप्त करना धर्म का मूल है, वरना:

  • पुण्य का नाश होता है,

  • धर्म, धन और स्वास्थ्य की हानि होती है,

  • पारिवारिक कलह और सामाजिक विघटन होता है।

5. अभिनिवेश और कदाग्रह का त्याग

"केवल मेरा मत ही सत्य है" — ऐसा हठ या कदाग्रह (dogmatism) ज्ञान, विवेक और संवाद को रोकता है।
सत्य का ग्रहण तटस्थ और खुले मन से होना चाहिए।
हठ धर्मिता से सामाजिक और आत्मिक अपकीर्ति होती है।

6. त्रिवर्ग (धर्म–अर्थ–काम) अबाधा (संतुलन)

धर्म, अर्थ और काम — इन तीनों पुरुषार्थों में संतुलन आवश्यक है।
कोई भी पुरुषार्थ ऐसा न हो जो दूसरे को बाधित करे।
धन की लालसा धर्म को नष्ट करती है, और काम की अति शरीर, धर्म व धन — तीनों को हानि पहुँचाती है।
भीष्म की प्रतिज्ञा धर्म की अति का ऐतिहासिक उदाहरण है।

7. उपद्रवयुक्त स्थान से बचाव

मारी (महामारी), युद्ध, विद्रोह, प्लेग आदि जहाँ हों —
ऐसे स्थानों को छोड़ देना चाहिए।
ऐसे स्थानों में रहना शारीरिक, मानसिक और आर्थिक दृष्टि से विनाशकारी हो सकता है और धर्म की रक्षा कठिन हो जाती है।

8. अयोग्य देश–काल–चर्या से बचाव

व्यक्ति का धर्म और चरित्र केवल कर्म से नहीं, बल्कि स्थान, समय और संगति से भी प्रभावित होता है।
रात्रिकाल में अनुचित स्थानों पर जाना, वेश्याओं या अपराधियों की संगति करना, या अवांछनीय वातावरण में बार-बार आना-जाना —
भले ही व्यक्ति निर्दोष हो, पर समाज में कलंक और आत्मिक पतन का कारण बनता है।

मार्गानुसारी जीवन के 8 गुण (जिनका विकास हर धर्मनिष्ठ व्यक्ति में होना चाहिए)

"गुणाः पूज्याः सर्वत्र।"
(गुण सर्वत्र पूजनीय होते हैं।)

1. पाप-भय (पापकर्म से सावधानी)

हमेशा यह जागरूकता बनी रहनी चाहिए कि “मुझसे कोई पाप न हो जाए।”
पाप का विचार आते ही आत्मा में संकोच और अपराधबोध का भाव जागे — यही पापभय है।
यह धर्म के प्रति सतर्कता और आत्मोत्थान का पहला चरण है।

2. लज्जा (अकार्य में संकोच और आत्मसंयम)

अनुचित कार्य करते हुए भीतर से जो संकोच उत्पन्न होता है — वह लज्जा है।
यह व्यक्ति को गलत मार्ग पर जाने से रोकती है और भविष्य में सही आचरण की प्रेरणा देती है।
लज्जा आत्मनियंत्रण की नींव है।

3. सौम्यता (शांत, मृदु और संयमी स्वभाव)

जिस व्यक्ति का चेहरा शांत, वाणी मधुर और हृदय पवित्र हो,
वह सबका स्नेह, सम्मान और सहयोग पाता है।
क्रोध, कटुता और असंयम से विपरीत प्रभाव पड़ता है।

4. लोकप्रियता (शील, सेवा और विनय से प्राप्त सामाजिक सम्मान)

नैतिकता, सेवा-भाव, विवेक और विनम्रता से जब व्यक्ति समाज में प्रिय बनता है,
तो उसका प्रभाव सकारात्मक होता है और वह धर्म के प्रचार का माध्यम बनता है।

5. दीर्घदर्शिता (कार्य से पहले दूरदृष्टिपूर्ण चिंतन)

कोई भी कार्य करने से पहले यह विचार करना चाहिए कि इसके भविष्य में क्या परिणाम हो सकते हैं।
तात्कालिक लाभ के लिए बिना सोच समझे किया गया कार्य अक्सर पश्चाताप का कारण बनता है।

6. बलाबल विचारणा (अपनी शक्ति और सामर्थ्य का मूल्यांकन)

जो कार्य करना है, पहले यह देखें कि उसमें मेरी बौद्धिक, मानसिक और भौतिक शक्ति पर्याप्त है या नहीं।
अन्यथा अधूरा काम छोड़ना पड़ सकता है और अपकीर्ति हो सकती है।

7. विशेषज्ञता (विवेक और कौशल की समझ)

सार–असार, भक्ष्य–अभक्ष्य, कर्तव्य–अकर्तव्य, हित–अहित में विवेक करने की योग्यता को विशेषज्ञता कहते हैं।
यह ज्ञान, अभ्यास और अनुभव का संयोजन है।
विशेषज्ञता बिना अहंकार के हो — यह आवश्यक है।

8. गुणपक्षपात (गुणों के प्रति श्रद्धा और समर्थन)

गुण जहाँ भी हों, उनका स्वागत करें।
दोषों से दूरी बनाएँ।
गुणवानों की निंदा नहीं, प्रशंसा करें — चाहे वे अपने हों या पराए।
इससे अपने भीतर भी गुणों का विकास होता है और ईर्ष्या, द्वेष से बचाव होता है।

मार्गानुसारी जीवन की 8 साधनाएँ (जो जीवन को धर्म, विवेक और आत्मोन्नति की ओर ले जाती हैं)

1. कृतज्ञता (उपकार की स्मृति और प्रत्युपकार की भावना)

जो भी व्यक्ति हमारे जीवन में किसी भी रूप में उपकारी रहा हो —
चाहे वह माता–पिता, गुरु, देव, वृद्ध या कोई सामान्य सहयोगी ही क्यों न हो —
उसके उपकार को कभी न भूलें।
उपकार की स्मृति और अवसर आने पर प्रत्युपकार की तत्परता ही कृतज्ञता है।
यह गुण अनेक अन्य सद्गुणों की जननी है।

मार्गानुसारी जीवन की साधना: अतिथि सेवा और परोपकार 

2. परोपकार (निस्वार्थ सेवा का भाव)

जितना संभव हो, दूसरों की निस्वार्थ सहायता करें।
परोपकार को शास्त्रों ने श्रेष्ठ पुण्य कहा है:
"परोपकारः पुण्याय, पापाय परपीडनम्।"
(परोपकार पुण्य है, और परपीड़ा पाप।)

3. दया (कोमलता और करुणा)

तन, मन और धन से दूसरों के प्रति सहानुभूति और करुणा रखना ही सच्ची दया है।
"दया नदीतीरे सर्वे धर्मद्रुमायिता"
(दया रूपी नदी के तट पर ही धर्म रूपी वृक्ष फलते–फूलते हैं।)
दया धर्म की जड़ है — और निर्दयता पाप की।

4. सत्संग (सज्जनों की संगति)

ज्ञानी, तपस्वी, संयमी, और सदाचारी लोगों की संगति को सत्संग कहते हैं।
सत्संग से:

  • चित्त शुद्ध होता है,

  • विवेक जागृत होता है,

  • और आत्मिक विकास की राह खुलती है।
    "एक घड़ी, आधी घड़ी, आधी की भी आध,
    तुलसी संगत साधु की, कटे कोटि अपराध।"

5. धर्मश्रवण (धार्मिक और सद्विचारों का श्रवण)

प्रतिदिन कुछ समय धर्म, सदाचार, और ज्ञान से युक्त वाणी सुनना चाहिए।
यह अभ्यास व्यक्ति को सच्चे–झूठे, हित–अहित का विवेक देता है।
धर्मश्रवण सत्संग का ही फल है — और बोलने से अधिक श्रवण में गहराई होती है।

धर्मश्रवण प्रवचन 

6. बुद्धि के आठ गुण (शास्त्रीय श्रवण–चिंतन की क्षमता)

"शुश्रूषा श्रवणं चैव, ग्रहणं धारणं तथा।
ऊहाऽपोहोऽर्थविज्ञानं, तत्त्वज्ञानं च धीगुणाः।।"

इन आठ गुणों को अपनाने से श्रवण सार्थक होता है:

  1. शुश्रूषा – सुनने की इच्छा

  2. श्रवण – ध्यानपूर्वक सुनना

  3. ग्रहण – समझकर स्वीकार करना

  4. धारण – स्मृति में रखना

  5. ऊह – सकारात्मक तर्क करना

  6. अपोह – प्रतिकूल तर्कों से जांच करना

  7. अर्थविज्ञान – तात्पर्य का निर्धारण

  8. तत्त्वज्ञान – तत्व का ज्ञान और सिद्धांत निर्धारण

7. प्रसिद्ध देशाचार का पालन

जहाँ आप निवास करते हैं, वहाँ के धर्मसम्मत रीति–नीति, सामाजिक मर्यादा और आचरणों का पालन करें।
इससे समाज में सामंजस्य, सम्मान, और स्थानीय संस्कृति के अनुरूप जीवन संभव होता है।
जैसे कहा जाता है:
"When in Rome, do as the Romans do."

(8) शिष्टाचार–प्रशंसा (शिष्ट आचरण की सराहना और अनुकरण)

हमें सदैव शिष्ट और मर्यादित आचरण वाले व्यक्तियों की प्रशंसा करनी चाहिए। यह प्रशंसा मात्र वाणी से नहीं, बल्कि उन गुणों को आत्मसात करने की भावना से होनी चाहिए।

शिष्ट आचरण में निम्नलिखित गुण सम्मिलित होते हैं:

  1. लोक-निंदा से बचाव – ऐसा कोई कार्य न करना जिससे समाज में अपकीर्ति हो।

  2. दीन–दुखियों की सहायता – करुणा और संवेदना के साथ सहयोग देना।

  3. उचित प्रार्थना का सम्मान – जहाँ तक संभव हो, किसी की सही और उचित विनती को अस्वीकार न करना।

  4. निंदा का त्याग – दूसरों की बुराई करने से बचना, और दोष देखने की आदत को छोड़ना।

  5. गुणों की प्रशंसा – अपने और दूसरों के अच्छे गुणों की खुले मन से सराहना करना।

  6. आपत्ति में धैर्य – संकट के समय घबराने या झल्लाने की बजाय शांत रहना।

  7. संपत्ति में नम्रता – धन या पद मिलने पर अहंकार न करना, विनम्र बने रहना।

  8. अवसरोचित कार्य करना – समय, स्थान और परिस्थिति के अनुसार उचित व्यवहार करना।

  9. हित-मित वचन बोलना – ऐसा बोलना जो सत्य, प्रिय और आवश्यक हो – न अधिक, न कम।

  10. सत्यप्रतिज्ञा – जो प्रतिज्ञा ली हो, उसे पूर्ण निष्ठा से निभाना।

  11. आयोचित व्यय – जहाँ जरूरी हो, वहीं खर्च करना; न तो अपव्यय, न कंजूसी।

  12. सत्कार्य में आग्रह – अच्छे कार्यों में पूरे मन से जुटना और उन्हें टालना नहीं।

  13. अकार्य का त्याग – अनुचित या अनावश्यक कार्यों से स्वयं को दूर रखना।

  14. बहुनिद्रा का त्याग – आलस्य, अधिक नींद और प्रमाद से बचना।

  15. विषय-कषाय और विकथा का परित्याग – विषयभोग, क्रोध-द्वेष और निरर्थक बातों से दूरी बनाए रखना।

  16. औचित्य का पालन – हर कार्य को समय, स्थान, स्थिति और पात्रता के अनुरूप करना।

इन सभी गुणों को हम “शिष्टाचार” कहते हैं।
इन गुणों की प्रशंसा करके हम उनमें श्रद्धा उत्पन्न करते हैं — और धीरे-धीरे वे हमारे जीवन में भी उतरने लगते हैं।

"साधनाः सिद्धेः सेतुर्भवन्ति।"
(साधनाएँ ही सिद्धि की सेतु हैं।)

मार्गानुसारी जीवन के 35 गुण — सारणी

भागगुणों का शीर्षकसंख्यासंक्षिप्त संकेत
1कर्तव्य (KARTAVYA)11न्यायसंपन्न वैभव, आयोचित व्यय, उचित वेश, उचित गृह, उचित विवाह, उचित भोजन, माता-पिता की सेवा, पाल्य–पोषण, अतिथि सेवा, ज्ञानी-चारित्रियों की संगति, यथाशक्ति कर्म
2गुण (GUNA)8पापभय, लज्जा, सौम्यता, लोकप्रियता, दीर्घदर्शिता, बलाबल विचारणा, विशेषज्ञता, गुणपक्षपात
3दोषों से बचाव (DOSHA TYAGA)8निंदा त्याग, निंद्य प्रवृत्ति त्याग, इन्द्रियनिग्रह, आंतर शत्रु विजय, अभिनिवेश त्याग, त्रिवर्ग अबाधा, उपद्रवयुक्त स्थान त्याग, अयोग्य देश–काल–चर्या त्याग 
4साधना (SADHANA)8कृतज्ञता, परोपकार, दया, सत्संग, धर्मश्रवण, बुद्धि के 8 गुण, देशाचार पालन, शिष्टाचार प्रशंसा

उपसंहार

मार्गानुसारिता के ये 35 गुण धार्मिक जीवन की आधारशिला हैं।
यह केवल साधना का अनुशासन नहीं, बल्कि जीवन की सांस्कृतिक, नैतिक और आध्यात्मिक तैयारी है।

यदि कोई व्यक्ति इन गुणों से रहित होकर श्रावक या साधु बनने का प्रयास करता है,
तो वह जीवन एक अधूरी नींव पर खड़े भवन के समान अस्थिर और पतनशील हो सकता है।

इन गुणों का होना सम्यग्दर्शन की गारंटी नहीं है,
किन्तु यह सम्यग्दर्शन के योग्य भूमि पर पदार्पण अवश्य कराता है।

यही कारण है कि आचार्य हरिभद्रसूरि जैसे प्राचीन मनीषियों ने इन गुणों को धर्म के प्रथम सोपान के रूप में प्रतिष्ठित किया है।

यह गुण किसी विशेष सम्प्रदाय या समुदाय तक सीमित नहीं —
बल्कि हर उस व्यक्ति के लिए उपयोगी हैं जो सत्य, संयम, सेवा और आत्मकल्याण की ओर अग्रसर होना चाहता है।

इन गुणों से युक्त जीवन ही धर्ममय, समरस, और मोक्षमार्ग की ओर गतिशील हो सकता है।

संदर्भ सूची (References)

  1. हरिभद्रसूरि (5वीं शती ई.):
    🔹 धर्मबिन्दु — प्रथम अध्याय: “सामान्य गृहस्थ धर्म”
    प्रकाशक: जैन श्वेताम्बर तीर्थ निकाय, अहमदाबाद (संस्कृत प्राकृत ग्रंथों का संग्रह)
    भाषा: संस्कृत/प्राकृत

  2. मनुस्मृति
    🔹 सूत्र: "धर्मो रक्षति रक्षितः" — मनुस्मृति 8.15
    संस्करण: श्री गंगानाथ झा संस्करण
    टिप्पणी: धर्म और समाज की पारस्परिक रक्षा की शाश्वत अवधारणा

  3. व्यास स्मृति — महापुराण समाहार
    🔹 श्लोक: “अष्टादश पुराणेषु व्यासस्य वचनद्वयम् – परोपकारः पुण्याय, पापाय परपीडनम्।”
    स्रोत: गरुड़ पुराण, नीतिसार

  4. तुलसीदास:
    🔹 “एक घड़ी, आधी घड़ी, आधी की भी आध,
    तुलसी संगत साधु की, कटे कोटि अपराध।”
    स्रोत: विनय पत्रिका / मानस के बाद की रचनाएँ

  5. जैन आगम और ग्रंथ संग्रह
    🔹 तत्वार्थ सूत्र — उमास्वाति (सूत्र 1.1, 1.2)
    🔹 धर्मसंग्रहणी — हरिभद्रसूरि

  6. बुद्धि के आठ गुण
    🔹 “शुश्रूषा श्रवणं चैव...”
    स्रोत: नंदीसूत्र (जैन आगम), उपदेशमाला — आचार्य धर्मदास

  7. भारतीय संस्कृति पर आधुनिक शोध ग्रंथ

    • Indian Tradition and Hindu Ethics – Dr. S. Radhakrishnan

    • The Cultural Heritage of India – Ramakrishna Mission Institute, Kolkata

    • Hinduism: Doctrine and Way of Life – A.L. Basham

    • Jainism: An Indian Religion of Salvation – Helmuth von Glasenapp

  8. संस्कृत नीतिशतक संग्रह

    • चाणक्य नीतिशतक

    • हितोपदेश, पंचतंत्र

  9. विशेष उल्लेखनीय

    • When in Rome, do as the Romans do — प्रसिद्ध लोकोक्ति, व्यवहार संदर्भ हेतु उद्धृत

    • SWOT Analysis — आधुनिक प्रबंधन शास्त्र, "Strength, Weakness, Opportunity, Threat" का मूल्यांकन



Thanks, 
Jyoti Kothari (Jyoti Kothari, Proprietor, Vardhaman Gems, Jaipur represents the Centuries Old Tradition of Excellence in Gems and Jewelry. He is an adviser, Vardhaman Infotech, a leading IT company in Jaipur. He is also an ISO 9000 professional.

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मंगलवार, 13 मई 2025

Wokism का उपयुक्त अनुवाद: भाषाशास्त्र और दार्शनिक दृष्टि से 11 वैकल्पिक हिंदी शब्द


Wokism का सही हिंदी अनुवाद क्या हो सकता है? इस लेख में जानिए भाषाशास्त्रीय और दार्शनिक दृष्टिकोण से 11 वैकल्पिक शब्द जैसे – स्वच्छंदतावाद, उत्पीड़नवाद, वंचनावाद, और नव-वामवाद....। यह विश्लेषण भारतीय परंपरा और आधुनिक विमर्श दोनों..............

भूमिका

पिछले कुछ वर्षों में "Woke" और "Wokism" जैसे शब्द पश्चिमी देशों की सार्वजनिक बहस, शिक्षा, मीडिया और राजनीति में प्रमुखता से उभरे हैं। यह एक वैचारिक आंदोलन है, जो मूलतः नस्लीय, लैंगिक, वर्गीय, और सामाजिक अन्याय के प्रति जागरूकता के नाम पर शुरू हुआ, किंतु समय के साथ इसने एक कट्टर, नैतिक-अहंकारी, परंपराविरोधी और असहिष्णु दृष्टिकोण ग्रहण कर लिया।

भारत में भी इसके प्रभाव दिखाई देने लगे हैं — विश्वविद्यालयों से लेकर सोशल मीडिया तक। इसलिए अब यह आवश्यक हो गया है कि हम इस विचारधारा को भारतीय दार्शनिक और भाषिक दृष्टिकोण से समझें, और उसके लिए उचित हिंदी पद की रचना करें, जो न केवल शाब्दिक, बल्कि वैचारिक रूप से भी सार्थक हो।

शब्द शास्त्रीय एवं दार्शनिक विश्लेषण 

वर्तमान में बहुप्रचलित Wokism के लिए अभी तक कोई उपयुक्त हिंदी शब्द उपलब्ध नहीं है। संबंधित विमर्श के लिए एक उपयुक्त हिंदी शब्द की विशेष आवश्यकता है। इसी बात को ध्यान में रखते हुए, Wokism की दार्शनिक एवं व्यावहारिक अवधारणाओं को आधार बनाकर इस लेख में भाषाशास्त्रीय दृष्टिकोण से उपयुक्त हिंदी विकल्प खोजने का प्रयास किया गया है।

इन प्रस्तावित शब्दों का चयन भारतीय दार्शनिक शब्दावली, पश्चिमी वैचारिक प्रवृत्तियों, और सामाजिक विमर्श की आधुनिक चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए किया गया है।

यहाँ पर भाषाविदों और दार्शनिकों के लिए Wokism के 11 संभावित हिंदी विकल्पों का संक्षिप्त विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है एवं उनसे अपेक्षा है की इन विश्लेषणों को आधार बनाकर अपना मत प्रस्तुत कर Wokism के लिए एक समतुल्य हिंदी शब्द प्रस्तुत करें.  

1. स्वच्छंदता / स्वच्छंदतावाद

  • व्युत्पत्ति: स्व + छंद (मन की इच्छा)

  • परिभाषा: गुरु, परंपरा, शास्त्र अथवा सामाजिक अनुशासन से विमुख होकर अपने ही मत पर चलने की प्रवृत्ति।

  • अंग्रेज़ी समकक्ष: Self-assertive Individualism, Anti-traditionalism

  • उदाहरण:

    आधुनिक विश्वविद्यालयों में स्वच्छंदतावाद का प्रभाव इतना बढ़ गया है कि परंपरा और धर्म पर बात करना ही पिछड़ापन माना जाता है।

2. उत्पीड़नवाद

  • व्युत्पत्ति: उत्पीड़न + वाद

  • परिभाषा: हर सामाजिक संबंध को उत्पीड़क बनाम पीड़ित के ढांचे में देखने की वैचारिक प्रवृत्ति।

  • अंग्रेज़ी समकक्ष: Oppression-Centric Ideology, Critical Theory

  • उदाहरण:

    जब हर चीज़ को जाति, लिंग या रंगभेद के चश्मे से देखा जाए, तो वह उत्पीड़नवाद कहलाता है, जो समाज को बाँटता है।

3. वंचनावाद

  • व्युत्पत्ति: वंचना (deprivation) + वाद

  • परिभाषा: समाज के वंचित माने गए वर्गों के नाम पर की जाने वाली राजनीतिक और वैचारिक गतिविधियाँ, जो अक्सर अतिवादी हो जाती हैं।

  • अंग्रेज़ी समकक्ष: Victimhood Politics, Identity Politics

  • उदाहरण:

    वंचनावाद की राजनीति ने व्यक्ति की पहचान को योग्यता से नहीं, उसकी पीड़ितता से जोड़ दिया है।

4. नव-वामवाद

  • व्युत्पत्ति: नव (नई) + वामवाद (Leftism)

  • परिभाषा: एक नई किस्म का वामपंथ, जो सांस्कृतिक मुद्दों पर अधिक केंद्रित है बजाय आर्थिक वर्ग-संघर्ष के।

  • अंग्रेज़ी समकक्ष: Neo-Leftism, Cultural Left

  • उदाहरण:

    आज का नव-वामवाद सामाजिक न्याय के नाम पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को नियंत्रित करने का प्रयास करता है।

5. परंपरा-निषेधवाद

  • व्युत्पत्ति: परंपरा + निषेध + वाद

  • परिभाषा: प्राचीन सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक मान्यताओं का खुला विरोध या बहिष्कार।

  • अंग्रेज़ी समकक्ष: Cancel Culture, Tradition Negationism

  • उदाहरण:

    रामायण या महाभारत पर बात करना परंपरा-निषेधवादियों के लिए "सांप्रदायिकता" बन गया है।

6. अहं-न्यायवाद (नव प्रयोग)

  • व्युत्पत्ति: अहं (स्वार्थ या आत्ममत्ता) + न्याय + वाद

  • परिभाषा: अपने मत को ही अंतिम नैतिक सत्य मानकर दूसरों पर नैतिक दंड थोपने की प्रवृत्ति।

  • अंग्रेज़ी समकक्ष: Moral Absolutism through Self-Righteousness, Virtue Tyranny

  • उदाहरण:

    अहं-न्यायवादी लोग दूसरों को सुनने की बजाय उन्हें 'कैंसल' करना पसंद करते हैं।

7. स्वप्रमाणवाद (दार्शनिक विश्लेषण से)

  • व्युत्पत्ति: स्व (स्वयं) + प्रमाण (authority) + वाद

  • परिभाषा: केवल अपने मत या अनुभव को प्रमाण मानने की प्रवृत्ति, शास्त्र, परंपरा या अन्य प्रमाणों का निषेध।

  • अंग्रेज़ी समकक्ष: Epistemic Solipsism, Self-referential Truthism

  • उदाहरण:

    आधुनिक "woke" विचारधारा अक्सर स्वप्रमाणवाद की ओर झुकती है, जहाँ हर सत्य व्यक्तिगत अनुभव बन जाता है।

     8. संवेदनशीलतावाद

    • व्युत्पत्ति: संवेदना + वाद

    • परिभाषा: सामाजिक मामलों में अत्यधिक और अतार्किक भावुकता या तात्कालिक प्रतिक्रिया देने की प्रवृत्ति।

    • अंग्रेज़ी समकक्ष: Hypersensitivity Culture

    • उदाहरण:

      विश्वविद्यालयों में विचार विमर्श से अधिक संवेदनशीलतावाद हावी होता जा रहा है।

    9. नैतिक दिखावावाद

    • व्युत्पत्ति: नैतिक + दिखावा + वाद

    • परिभाषा: नैतिकता का सार्वजनिक प्रदर्शन केवल अपनी श्रेष्ठता जताने के लिए, बिना किसी वास्तविक मूल्यों के।

    • अंग्रेज़ी समकक्ष: Virtue Signaling

    • उदाहरण:

      सोशल मीडिया पर अधिकांश पोस्ट नैतिक दिखावावाद के उदाहरण बनते जा रहे हैं।

    10. जागरूकतावाद / अतिजागरूकतावाद

    • व्युत्पत्ति: जागरूकता + वाद

    • परिभाषा: सामाजिक अन्याय के प्रति अतिसजगता जो कई बार संतुलन खोकर उग्रता और दमन में बदल जाती है।

    • अंग्रेज़ी समकक्ष: Wokeism (literal translation)

    • उदाहरण:

      अतिजागरूकतावाद की प्रवृत्ति आज सामाजिक संवाद को असहिष्णु बना रही है।

    11. अभिज्ञतावाद / जागृतिवाद

    • व्युत्पत्ति: अभिज्ञ (woke) + ता + वाद

    • परिभाषा: सजगता या जागरूकता के नाम पर उत्पन्न वैचारिक आंदोलन जो अक्सर उग्रता और संकीर्ण नैतिकता में परिवर्तित हो जाता है।

    • अंग्रेज़ी समकक्ष: Woke Consciousness, Hyper-awareness Ideology

    • उदाहरण:

      अभिज्ञतावाद में सजगता की जगह कट्टरता ले चुकी है।

वोकिज़्म का सार

Wokism उस वैचारिक प्रवृत्ति का नाम है जिसमें:

  • परंपरा, धर्म, संस्कृति आदि को दमनकारी संरचनाएँ मानकर खारिज किया जाता है,

  • नैतिक श्रेष्ठता के भाव से दूसरों पर विचार थोपे जाते हैं,

  • हर सामाजिक संबंध को उत्पीड़क बनाम पीड़ित की दृष्टि से देखा जाता है,

  • और असहमति रखने वालों को ‘कैंसल’ करने की प्रवृत्ति प्रबल होती है।

इस विचारधारा की जड़ें Critical Theory, Identity Politics, और Neo-Marxism जैसी पश्चिमी अवधारणाओं में हैं।

संभावित हिंदी विकल्प

नीचे दी गई सारणी में Wokism के लिए ग्यारह वैकल्पिक हिंदी पदों को प्रस्तुत किया गया है, जिनमें उनके व्युत्पत्तिपरक अर्थ, संक्षिप्त परिभाषा, और संबंधित अंग्रेज़ी संदर्भ दिए गए हैं:

क्रमप्रस्तावित हिंदी शब्दसंक्षिप्त परिभाषाअंग्रेज़ी समकक्ष
1स्वच्छंदतावादपरंपरा, गुरु व शास्त्र से विमुख स्वमत की प्रवृत्तिAnti-traditionalism
2उत्पीड़नवादहर सामाजिक संरचना को उत्पीड़न के रूप में देखनाCritical Theory
3वंचनावादपीड़ितता आधारित पहचान की राजनीतिIdentity Politics
4नव-वामवादसांस्कृतिक वामपंथ की आधुनिक शाखाNeo-leftism
5परंपरा-निषेधवादपरंपराओं का बहिष्कार और निषेधCancel Culture
6अहं-न्यायवादआत्मन्याय के अहंकार में दूसरों पर नैतिक अत्याचारVirtue Tyranny
7स्वप्रमाणवादकेवल अपने अनुभव को सत्य माननाEpistemic Solipsism
8संवेदनशीलतावादअतार्किक अति-भावुकता की सामाजिक प्रवृत्तिHypersensitivity Culture
9नैतिक दिखावावाददिखावटी नैतिकता, मात्र प्रदर्शनVirtue Signaling
10जागरूकतावाद / अतिजागरूकतावादअति सजगता जो असहिष्णुता में बदलती हैLiteral Wokeism
11अभिज्ञतावाद / जागृतिवादसजगता के नाम पर उग्र वैचारिक आंदोलनWoke Consciousness
वैचारिक विश्लेषण

इन सभी शब्दों को यदि समग्र दृष्टि से देखा जाए तो Wokism का केन्द्रबिंदु है – एक नैतिक-दृष्टि से सजगता का अत्याचार, जिसमें व्यक्ति या समूह स्वयं को “नैतिक रूप से जाग्रत” मानता है और शेष समाज को “दमनकारी”, “पिछड़ा” या “असभ्य” कहकर खारिज करता है।

स्वच्छंदता, जो भारतीय दर्शन में “गुरु, कुल या परंपरा से विमुख होकर अपने मत को प्रमाण मानने की प्रवृत्ति” के रूप में आती है, इस पूरे विमर्श का भारतीय सन्निकट समकक्ष प्रतीत होती है।

वहीं उत्पीड़नवाद और वंचनावाद जैसे नव-निर्मित शब्द, Wokism की पश्चिमी वैचारिक जड़ों को स्पष्टता से दर्शाते हैं।

उपसंहार

भारत में “Woke” संस्कृति का अनुवाद केवल भाषिक अनुवाद नहीं है, बल्कि यह एक दार्शनिक उत्तरदायित्व है। यदि हम ऐसे शब्द गढ़ते हैं जो विचार, चेतना, प्रवृत्ति और सामाजिक प्रभाव – इन चारों को समाहित करें, तभी हम “Wokism” को भारतीय विमर्श में सही रूप से समझ व प्रस्तुत कर सकते हैं।

स्वच्छंदतावाद और उत्पीड़नवाद जैसे शब्द केवल शब्द नहीं, बल्कि विचारों की शुद्धि का प्रयास हैं।

प्रस्तावित् हिंदी शब्द

यदि एक समेकित पद निर्मित किया जाए जो स्वच्छंदता, वंचनावाद और उत्पीड़न विमर्श – तीनों का दार्शनिक समन्वय करे, तो निम्नलिखित विकल्प सुझाए जा सकते हैं:

🔹 स्वच्छंद-उत्पीड़नवाद
🔹 वंचनासम्मत स्वच्छंदतावाद

यह शब्द नैतिक उच्छृंखलता और उत्पीड़न विमर्श – दोनों को समेटता है। यह न केवल वैचारिक स्पष्टता प्रदान करता है, अपितु भारतीय भाषिक परंपरा की आत्मा से भी गहराई से जुड़ा है।

यह लेख एक आमंत्रण है — विद्वानों, भाषा-विशेषज्ञों और दार्शनिकों के लिए — कि वे इस वैचारिक विकृति के लिए भारतीय परंपरा में निहित उचित भाषिक औषधि प्रस्तुत करें।

सन्दर्भ सूचि 

पश्चिमी स्रोत – Wokism, Critical Theory, और Identity Politics पर

1. Lindsay, James & Pluckrose, Helen.

Cynical Theories: How Activist Scholarship Made Everything About Race, Gender, and Identity
Pitchstone Publishing, 2020
यह पुस्तक "Woke" आंदोलन की विचारधारा का गहन विश्लेषण करती है, जिसमें इसे आधुनिक ज्ञान-विनाशक और संवादविरोधी घोषित किया गया है।

2. Murray, Douglas.

The Madness of Crowds: Gender, Race and Identity
Bloomsbury Publishing, 2019
लेखक ने Woke प्रवृत्ति को एक नई कट्टरता करार देते हुए इसकी समाज-विभाजक और अराजक प्रवृत्तियों को उजागर किया है।

3. Horowitz, David.

Final Battle: The Next Election Could Be the Last
Humanix Books, 2023
अमेरिका में वामपंथी वैचारिक हमले को लोकतांत्रिक संकट बताते हुए लेखक ने Wokism की जड़ों को एक्सपोज किया है।

4. Scruton, Roger.

Fools, Frauds and Firebrands: Thinkers of the New Left
Bloomsbury, 2015
यह पुस्तक "नव-वामपंथियों" की तार्किक दुर्बलताओं को उजागर करती है, जो Wokism की वैचारिक पृष्ठभूमि बनते हैं।

5. Stanford Internet Observatory (SIO)

Reports on Disinformation and Censorship Narratives
Stanford University, 2019–वर्तमान
डिजिटल युग में सूचना-नियंत्रण, नैरेटिव हेरफेर, और "Woke censorship" की रणनीतियों पर गहन शोध।

भारतीय दार्शनिक स्रोत – स्वच्छंदता, अनुशासन और विवेकपरकता पर

6. धम्मपद (Dhammapada)
गाथा: "अनुसासितो सदा सन्तो, ना स्वच्छन्देन वर्तते..."
अनुवाद: भदन्त आनन्द कोशल्यायन
सार: बुद्ध के उपदेशों में "स्वच्छंदता" को विपरीतधर्मी आचरण के रूप में निंदा की गई है। विनय की तुलना में स्वच्छंद वृत्ति त्याज्य मानी गई है।

अनुवाद

7. स्वामी हरशानंद – हिन्दू धर्म कोश (संस्कृति संस्करण)

Vol. 1–3
प्रकाशक: रामकृष्ण मठ, बैंगलोर
सार: भारतीय दर्शन और परंपरा में "स्व" की सीमाओं और गुरु–शिष्य अनुशासन का विवेचन, जिसमें स्वच्छंदता को पतन की ओर ले जाने वाली प्रवृत्ति बताया गया है।

8. श्रीमद् राजचंद्र – आत्मसिद्धि शास्त्र

"स्वच्छंदता – बंधन का मूल" (गाथा ५३ से ५८, विशेषतः ५५)
प्रकाशक: श्री आत्मसिद्धि शास्त्र रक्षक ट्रस्ट, विभिन्न संस्करण
श्रीमद् राजचंद्र इस ग्रंथ में स्वच्छंदता को आत्मोन्नति का सबसे बड़ा विघ्न बताते हैं। वे लिखते हैं कि जो आत्मा स्वमति से चलते हुए शास्त्र, गुरु और अनुभवी ज्ञानी की बात को त्याग देता है, वह गहरे मोह में डूबता है। "स्वच्छंदता ही बंधन का मूल है" — यह उनकी दार्शनिक चेतावनी है।

3. सामाजिक–राजनीतिक विमर्श

9. राजीव मल्होत्रा – Breaking India

Amaryllis, 2011
भारत के विभाजनकारी विमर्शों (जैसे वंचनावाद, जातिवाद उग्रता) के पीछे पश्चिम प्रेरित योजनाओं को उजागर करता है — जिनकी जड़ें Wokism से जुड़ी हैं।

10. रामबहादुर राय – भारतवर्ष: परंपरा और प्रगतिशीलता का द्वंद्व

वाणी प्रकाशन, 2018
यह ग्रंथ भारतीय संस्कृति और आधुनिक स्वच्छंदतावादी विचारों के बीच वैचारिक द्वंद्व का संतुलित चित्रण करता है।

4. भाषावैज्ञानिक स्रोत – नवपद निर्माण और वाद-प्रत्ययों की व्युत्पत्ति

11. डॉ. सूर्यनाथ शास्त्री – हिंदी व्याकरण और भाषा विज्ञान

लोकभारती प्रकाशन
"वाद" प्रत्यय से बने वैचारिक संप्रदायों की रचना का भाषा वैज्ञानिक विश्लेषण। आधुनिक वैचारिक शब्दों के हिंदीकरण की पद्धति प्रस्तुत करता है।

12. Central Institute of Indian Languages (CIIL), Mysuru

Indian Lexicography and Terminology Projects
भारत की प्रमुख भाषाओं में नवपद निर्माण की औपचारिक नीति और संकल्पना पर आधारित परियोजनाएँ।

5. संभावित शोध–विषय (Developing Contribution)

13. जैन, वैदिक एवं बौद्ध परंपराओं में स्वच्छंदता पर प्रवचनों की तुलनात्मक दृष्टि

अप्रकाशित शोध प्रस्ताव


यह शीर्षक भारतीय धार्मिक–दार्शनिक परंपराओं में स्वच्छंदता बनाम अनुशासन, विवेक बनाम अज्ञान के द्वंद्व को उद्घाटित करता है। जैन आगम, उपनिषद और विनयपिटक में स्वच्छंद विचार को आध्यात्मिक पतन का मार्ग कहा गया है। यह शोध एक व्यापक तुलनात्मक विवेचन प्रस्तुत कर सकता है।

टैग्स: 

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Jyoti Kothari 
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