जैन दर्शन में काल-समय की अवधारणा
जैन दर्शन में सम्पूर्ण विश्व ब्रह्माण्ड (लोक-अलोक) की संरचना 6 मुलभुत पदार्थों (षट्द्रव्य) से मानी गई है 1. धर्मास्तिकाय 2. अधर्मास्तिकाय 3. आकाशास्तिकाय 4. पुद्गलास्तिकाय 5. जीवास्तिकाय, एवं 6. काल. इससे यह समझा जा सकता है की जैन सूत्रों में काल को ब्रह्माण्ड के मूल कारक तत्वों में माना गया है.
जगत में होनेवाले सभी परिवर्तनों का कारक तत्व काल है. इसे परिवर्तन का निमित्त कारण कहा गया है. व्यवहार में दिन-रात आदि होना, ऋतू परिवर्तन, जन्म-मृत्यु- नवीन-पुरातन आदि होना काल के ही अधीन है.
काल को दो प्रकार से समझाया गया है 1. निश्चय काल 2. व्यवहार काल. निश्चय काल काल का वास्तविक-तात्विक स्वरुप है जबकि व्यवहार काल सूर्य चन्द्रमा आदि की गति के आधार पर लोक व्यवहार में प्रचलित काल है. निश्चय काल को निरपेक्ष एवं व्यवहार काल को सापेक्ष काल भी कहा जा सकता है. जैन दर्शन में काल की सूक्ष्तम इकाई "समय" है. कालक्रम में यह समय ही काल का पर्यायवाची शब्द बन गया और समय शब्द से ही लोग काल को समझने लगे हैं.
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समय: जैन दर्शन में काल की सूक्ष्मतम इकाई |
समय की अवधारणा
परिभाषा: धीर गति से चलते हुए एक पुद्गल परमाणु को एक आकाश प्रदेश से निकटतम दूसरे आकाश प्रदेश में पहुँचने में जितना काल लगता है उसे समय कहते हैं.
यह परिभाषा आधुनिक काल में परमाणविक घड़ियों से समय मापन की प्रणाली से मेल खाता है, जहाँ उप-परमाण्विक कण के आंदोलन के आधार पर सटीक समय नापा जाता है. जैन दर्शन के अनुसार समय इतना सूक्ष्म है की सामान्य व्यक्ति इसे नहीं जान सकता. मात्र केवलज्ञानी सर्वज्ञ ही इसे जान सकते हैं. समय को अविभाज्य (indivisible) माना जाता है, और यह काल की अत्यंत सूक्ष्मतम इकाई है। इससे अधिक सूक्ष्म किसी भी अन्य माप की संभावना नहीं है।
असंख्य समय की एक आवलीका होती है और जैन दर्शन में इसी आवलिका को व्यवहार में काल के निर्धारण की लघुतम इकाई माना गया है. आगे हम काल की सूक्ष्म इकाइयों से लेकर वृहत इकाइयों तक की चर्चा करेंगे.
विशेष: 6 मुलभुत द्रव्यों में से एक आकाश (Space) की सूक्ष्मतम इकाई प्रदेश है. इसी प्रकार पुद्गल (Matter) की सूक्ष्मतम इकाई परमाणु (Smallest particle) है. जैन दर्शन का परमाणु एक अति सूक्ष्म कण है जो की आधुनिक विज्ञानं के परमाणु से बहुत छोटा है. जैन दर्शन का परमाणु उप-परमाण्विक कण (Sub-atomic particle) जैसे क्वार्क, न्यूट्रिनो आदि से भी सूक्ष्म है.
जैन दर्शन के अनुसार, आकाश एक अखंड द्रव्य (indivisible substance) है, जो निष्क्रिय है। पुद्गल (भौतिक तत्व) गतिशील हैं और संपूर्ण लोक (ब्रह्मांड) में व्याप्त रहता हैं।
1. काल की अनादि-अनंतता
लोकाकाश (ब्रह्माण्ड), एवं पुद्गल अनादि (जिसका कोई आरंभ न हो) अनंत (जिसका कोई अंत न हो) है. आकाश में पुद्गल की गति भी अनादि और अनंत है। इसी कारण, काल भी मूल रूप से अनादि और अनंत है।
आधुनिक विज्ञान की कालगणना
वर्तमान समय में, वैज्ञानिक समय की इकाई को सेकंड मानते हैं। हालाँकि यह समय नापने की सूक्ष्मतम इकाई नहीं है.
- वे 1 सेकंड के 1000 अरबवें भाग (10⁻¹² सेकंड) तक का मापन कर सकते हैं, जिसे पिको-सेकंड (Picosecond) कहा जाता है।
- वर्तमान में सेकंड की सबसे सूक्ष्म गणना झेप्टो-सेकंड (Zeptosecond - 10⁻²¹ सेकंड) तक हो चुकी है।
- परंतु जैन दर्शन में "समय" की गणना इससे भी अधिक सूक्ष्म मानी जाती है।
काल के प्रकार
(1) पारंपरिक रूप से काल के तीन प्रकार:
- भूतकाल (अतीत)
- वर्तमानकाल
- भविष्यकाल
(2) जैन गणना के अनुसार काल के तीन प्रकार:
- संख्यात (गिनने योग्य)
- असंख्यात (जिसे गिना न जा सके)
- अनंत (जिसका कोई अंत न हो)
(3) जैन शास्त्रों में काल के चार वर्गीकरण:
- प्रमाण काल – जैसे वर्ष, पल्योपम आदि। इसे दो प्रकार में विभाजित किया गया है:
- (क) दिन का प्रमाण
- (ख) रात्रि का प्रमाण
- आयुष्य काल – जीवों की आयु निर्धारित करने वाला काल।
- मृत्यु काल – जब जीव अपने जीवन का अंत प्राप्त करता है।
- अद्वा काल (व्यवहारिक काल) – जिसे हम अपने दैनिक जीवन में समय के रूप में अनुभव करते हैं।
जैन दर्शन में काल की गणना और उसकी जटिल संरचना
- जैन शास्त्रों में काल की गणना जितनी सूक्ष्म बताई गई है, उतनी किसी अन्य प्रणाली में उपलब्ध नहीं है।
- इसी तरह, काल की विशालता की गणना भी जैन शास्त्रों में जितनी विस्तृत है, उतनी अन्यत्र कहीं नहीं मिलती।
असंख्यात समय की आवलिका – जैन गणना की अद्भुत इकाई
- "आवलिका" भी एक जैन पारिभाषिक शब्द है और इसे असंख्यात समय की एक इकाई माना जाता है।
- जैन शास्त्रों के अनुसार 1 मुहूर्त (48 मिनट) में 1,67,77,216 आवलिकाएँ होती हैं।
- इसका अर्थ है कि 1 सेकंड में 5825.42222... आवलिकाएँ बीत जाती हैं।
- हालाँकि, एक आवलिका में कितने सूक्ष्मतम समय होते हैं, इसका कोई निश्चित मापन नहीं है। एक आवलिका में अनगिनत (असंख्यात) समय इकाइयाँ समाहित होती हैं। जैन शास्त्रों में कहा गया है कि असंख्यात का अर्थ है "न गिना जा सकने वाला" या "संख्याओं में व्यक्त न किया जा सकने वाला"।
- कालगणना में श्वासोश्वास:
- सामान्यतः श्वासोश्वास का सम्बन्ध सांस लेने और छोड़ने से है परन्तु जैन कालगणना में इसका सन्दर्भ अलग है. नीचे दी गई तालिका से गणना करने पर 1 मुहूर्त में 3773 श्वासोश्वास होते हैं अर्थात एक मिनट में लगभग 78. ध्यान देने योग्य बात ये है की यह समय ह्रदय की स्वाभाविक गति से निकट है. जैन सूत्रकारों ने इसकी व्याख्या अलग प्रकार से की है. "पाय समा उच्छासा" अर्थात 8 मात्रा के एक पद को बोलने में जितना समय लगता है उसे श्वासोश्वास कहा है. जैन परंपरा में स्वाध्याय एवं कायोत्सर्ग में पदों की संख्या के आधार पर समय निर्धारण की विधि प्रचलित है.
- व्यवहारिक काल की गणना निम्नलिखित क्रम में दर्शाई गई है:
समय मापन | सापेक्ष मापन |
---|---|
असंख्यात समय | 1 आवलिका |
संख्यात आवलिका | 1 श्वास या 1 उच्छ्वास |
1 श्वास और 1 उच्छ्वास | 1 श्वासोच्छ्वास (प्राण) |
7 प्राण | 1 स्तोक |
7 स्तोक | 1 लव |
38.5 लव | 1 नालिका (घड़ी) |
2 नालिका (घड़ी) | 1 मुहूर्त (48 मिनट) |
2.5 नालिका | 1 घंटा |
60 नालिका (घड़ी) | 1 अहोरात्र (24 घंटे) |
15 अहोरात्र | 1 पक्ष (पखवाड़ा) |
2 पक्ष | 1 महीना |
2 महीने | 1 ऋतु |
3 ऋतु (6 महीने) | 1 अयन |
2 अयन (12 महीने) | 1 वर्ष |
1. जैन गणना में विशाल समय चक्र84,00,000 वर्ष | 1 पूर्वांग |
84,00,000 पूर्वांग | 1 पूर्व (70 लाख, 56 हजार करोड़ वर्ष) |
84,00,000 पूर्व | 1 त्रुटितांग |
84,00,000 त्रुटितांग | 1 त्रुटित |
84,00,000 त्रुटित | 1 अडडांग |
84,00,000 अडडांग | 1 अडड |
84,00,000 अडड | 1 अववांग |
84,00,000 अववांग | 1 अवव |
84,00,000 अवव | 1 हुहुकांग |
84,00,000 हुहुकांग | 1 हुहुक |
84,00,000 हुहुक | 1 उत्पलांग |
84,00,000 उत्पलांग | 1 उत्पल |
84,00,000 उत्पल | 1 पद्मांग |
84,00,000 पद्मांग | 1 पद्म |
84,00,000 पद्म | 1 नलिनांग |
84,00,000 नलिनांग | 1 नलिन |
84,00,000 नलिन | 1 अर्धनिपूरांग |
84,00,000 अर्धनिपूरांग | 1 अर्धनिपूर |
84,00,000 अर्धनिपूर | 1 अयुतांग |
84,00,000 अयुतांग | 1 अयुत |
84,00,000 अयुत | 1 नयुतांग |
84,00,000 नयुतांग | 1 नयुत |
84,00,000 नयुत | 1 प्रयुतांग |
84,00,000 प्रयुतांग | 1 प्रयुत |
84,00,000 प्रयुत | 1 चुलिकांग |
84,00,000 चुलिकांग | 1 चुलिका |
84,00,000 चुलिका | 1 शीर्षप्रहेलिकांग |
84,00,000 शीर्षप्रहेलिकांग | 1 शीर्षप्रहेलिका |
2. शीर्षप्रहेलिका की विशाल गणना
टिप्पणी:
- यह गणना "माथुरी वाचन" (Mathuri version) के अनुसार है, जिसमें 54 अंक होते हैं और 140 शून्य जोड़े जाते हैं।
- जबकि "वलभी वाचन" (Valabhi version) के अनुसार, इसमें चार अतिरिक्त नाम जोड़े जाते हैं, जिससे गणना 70 अलग-अलग अंकों और 180 अतिरिक्त शून्यों तक पहुँच जाती है। परिणामस्वरूप, कुल 250 अंकों की संख्या बनती है।
(क) माथुरी वाचन के अनुसार शीर्षप्रहेलिका की गणना:
(ख) वलभी वाचन के अनुसार शीर्षप्रहेलिका की गणना:
निष्कर्ष:
- शीर्षप्रहेलिका तक के वर्षों के काल को संख्यात (गिनने योग्य) या व्यवहारिक काल माना जाता है।
- इसके आगे की गणना असंख्यात काल में आती है, जिसे केवल उपमा (अनुपातिक तुलना) के माध्यम से ही व्यक्त किया जा सकता है।
- भले ही इसका अवधि मापन निश्चित हो, फिर भी इसे अंकों या गणितीय समीकरण द्वारा दर्शाना संभव नहीं है।
- यहाँ तक की कालगणना व्यवहार में गणना किये जा सकनेवाले काल के सम्बन्ध में है. इससे अधिक काल असंख्य और अनंत की श्रेणी में आता है.
- असंख्यात काल के दो प्रकार होते हैं:
- पल्योपम (Palyaopam)
- सागरोपम (Sagaropam)
संक्षेप
✅ पुद्गल की गति अनादि-अनंत है, इसलिए समय भी अनादि-अनंत है।
✅ सभी भौतिक घटनाएँ आकाश में घटित होती हैं, और काल उन्हीं परिवर्तनों से जुड़ा हुआ है।
✅ व्यावहारिक समय (जिसे हम अनुभव करते हैं) पदार्थों के परिवर्तन से उत्पन्न होता है।
✅ जैन परंपरा में समय को तीन, चार और विभिन्न प्रकारों में विभाजित किया गया है।
✅ काल की गणना में व्यवहारिक समय से लेकर अनंतकाल तक की गणना दी गई है।
✅ काल की गणना 84,00,000 की श्रृंखला में होती है, जो अत्यंत जटिल और विस्तृत है।
✅ माथुरी और वलभी वाचन की गणनाएँ भिन्न हैं, जिसमें अंक और शून्य की संख्या में अंतर है।
✅ शीर्षप्रहेलिका तक का काल "संख्यात" माना जाता है, लेकिन इसके आगे "असंख्यात" हो जाता है।
✅ असंख्यात काल को "पल्योपम" और "सागरोपम" नामक दो श्रेणियों में विभाजित किया गया है, जिसमें प्रत्येक के छह उप-प्रकार हैं।
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