आगामी 30 मार्च 2025, भारतीय नववर्ष 2082 है. इस दिन से विक्रम सम्वत प्रारम्भ होनेवाला है. इस भारतीय नववर्ष को मनाने की जोरदार तैयारी हो रही है. हिन्दू आध्यात्मिक एवं सेवा फॉउंडेशन भी इसके लिए जोरदार तैयारी कर रहा है. भारतीय नववर्ष के सम्बन्ध में सर्वप्रथम एक लेख लिखा और फिर धीरे धीरे सम्बंधित लेखों की एक श्रंखला बन गई. यहाँ पर नववर्ष लेखमाला के लेखों की एक सूचि लिंक के साथ दी गई है, जिसके माध्यम से आप सभी लेखों तक पहुँच कर उसे पढ़ सकते हैं. इस लेखमाला के अंतर्गत भविष्य में लिखे जानेवाले लेखों की सूचि भी यहीं दे दी जाएगी.
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1. यह लेख भारतीय नववर्ष की विविध परंपराओं और उनके धार्मिक, खगोलीय, ऐतिहासिक, और सांस्कृतिक महत्व पर प्रकाश डालता है। लेख में विक्रम संवत 2082 के प्रारंभ, विभिन्न क्षेत्रों में मनाए जाने वाले नववर्ष, जैसे उगादि, गुड़ी पड़वा, और चेटीचंड, तथा संवत्सर चक्र के 60 वर्षों के नामों का विस्तृत वर्णन किया गया है। इसके अलावा, चांद्र और सौर वर्ष के आधार पर नववर्ष की गणना और उनके महत्व पर भी चर्चा की गई है।
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2. इस लेख में भारतीय पंचांग की वैज्ञानिक संरचना और खगोलीय आधार पर अयन, चातुर्मास, ऋतु, और मास की व्याख्या की गई है। उत्तरायण और दक्षिणायन, तीन चातुर्मास, छह ऋतुएं, और बारह मासों के साथ उनके संबंधित नक्षत्रों और राशियों का विवरण प्रस्तुत किया गया है। लेख में महीनों के नामकरण और उनके नक्षत्रों के प्रभाव पर भी प्रकाश डाला गया है।
भारतीय संवत्सर में अयन, चातुर्मास, ऋतू, मास एवं उनका नक्षत्रों व राशियों से सम्बन्ध https://jyoti-kothari.blogspot.com/2025/02/blog-post_19.html
3. यह लेख जैन दर्शन में काल की अवधारणा और उसकी सूक्ष्मतम इकाई 'समय' की व्याख्या करता है। लेख में निश्चय काल और व्यवहार काल के भेद, समय की परिभाषा, और आधुनिक विज्ञान में समय मापन की तुलना की गई है। इसके अलावा, काल के विभिन्न प्रकार, जैसे भूतकाल, वर्तमानकाल, भविष्यकाल, संख्यात, असंख्यात, और अनंत, तथा जैन शास्त्रों में काल की गणना और उसकी जटिल संरचना पर विस्तृत चर्चा की गई है।
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4. यह लेख चांद्र वर्ष (लूनर ईयर) और सौर वर्ष (सोलर ईयर) की परिभाषा, उनकी विशेषताएँ और उपयोग पर प्रकाश डालता है। चांद्र वर्ष चंद्रमा की गति पर आधारित होता है, जिसमें लगभग 354.36 दिन होते हैं, जबकि सौर वर्ष सूर्य के चारों ओर पृथ्वी की परिक्रमा पर आधारित होता है, जिसकी अवधि लगभग 365.24 दिन होती है। लेख में बताया गया है कि भारतीय पंचांग में चांद्र और सौर वर्षों का संयोजन कैसे किया जाता है, जिससे धार्मिक पर्वों और कृषि कार्यों का निर्धारण होता है।
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5. इस लेख में भारतीय पंचांग के पांच प्रमुख अंगों—तिथि, वार, नक्षत्र, योग, और करण—का विस्तृत विवरण प्रस्तुत किया गया है। तिथि चंद्रमा और सूर्य के बीच के कोणीय अंतर पर आधारित होती है; वार सप्ताह के सात दिनों को दर्शाते हैं; नक्षत्र चंद्रमा की स्थिति के अनुसार 27 तारामंडलों में से एक होता है; योग सूर्य और चंद्रमा की संयुक्त स्थिति से बनता है; और करण तिथि के आधे भाग को कहते हैं। ये पांचों अंग किसी भी दिन के शुभ-अशुभ मुहूर्त का निर्धारण करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
भारतीय पंचांग के पांच अंग: तिथि, वार, नक्षत्र, योग एवं करणhttps://jyoti-kothari.blogspot.com/2025/02/blog-post_58.html
6. यह लेख भारतीय खगोलविद्या की प्राचीन परंपरा और उसकी समृद्ध विरासत पर केंद्रित है, विशेष रूप से जंतर मंतर और ग्रीनविच वेधशाला की तुलना के माध्यम से। लेख में बताया गया है कि भारत में उज्जैन, वाराणसी, विदिशा, और नालंदा जैसे स्थानों पर प्राचीन वेधशालाएँ थीं, जहाँ खगोलीय अध्ययन और गणनाएँ की जाती थीं। महाराजा जय सिंह द्वितीय द्वारा स्थापित जंतर मंतर वेधशालाएँ खगोलीय अध्ययन के लिए महत्वपूर्ण केंद्र थीं। इसके विपरीत, ग्रीनविच वेधशाला यूरोपीय खगोलविद्या का प्रमुख केंद्र रहा है।
भारतीय खगोलविद्या की समृद्ध विरासत: जंतर मंतर बनाम ग्रीनविच वेधशाला
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7. इस लेख में प्राचीन भारतीय कालगणना की वैदिक और पारंपरिक समय मापन प्रणालियों का विस्तृत विश्लेषण किया गया है। वैदिक काल में समय की सूक्ष्मतम इकाई 'त्रुटि' से लेकर बड़ी इकाइयों जैसे 'युग' और 'मन्वंतर' तक की गणना की जाती थी। लेख में दिन और रात के मापन के लिए घटिका, मुहूर्त, अहोरात्र आदि की चर्चा की गई है, साथ ही मास, ऋतु, अयन, और वर्ष की अवधारणाओं को भी स्पष्ट किया गया है। ब्रह्मांडीय और दीर्घकालिक समय इकाइयों जैसे युग और मन्वंतर का विवरण भी प्रस्तुत किया गया है।
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इन लेखों के माध्यम से, भारतीय खगोलविद्या, कालगणना, और पंचांग की समृद्ध परंपरा और वैज्ञानिक दृष्टिकोण को समझने में सहायता मिलती है।
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