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रविवार, 29 मार्च 2026

महावीर जन्म कल्याणक: अहिंसा, करुणा और समानता का सन्देश


भगवान महावीर जन्म कल्याणक 

भगवान् महावीर का जन्म कल्याणक चैत्र शुक्ल त्रयोदशी के दिन मनाया जाता है। सामान्य व्यक्तियों का जन्म दिवस ‘जन्म जयंती’ कहलाता है, परन्तु तीर्थंकरों का जन्म दिवस ‘कल्याणक’ कहा जाता है, क्योंकि उनका जन्म समस्त जीवों के कल्याण के लिए होता है। इसलिए महावीर जन्म कल्याणक केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि मानवता के लिए प्रेरणा का पावन पर्व है। इस वर्ष यह पर्व 31 मार्च 2026 को मनाया जा रहा है और उस दिन भारत के केंद्र सरकार ने छुट्टी भी घोषित की है. 

प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव की इक्ष्वाकु वंश परंपरा में २४वें तीर्थंकर भगवान् महावीर (जन्म नाम वर्धमान) का जन्म आज से लगभग २६०० वर्ष पूर्व मगध के क्षत्रियकुंड (मतान्तर से वैशाली) में एक राजपरिवार में हुआ। उनकी माता त्रिशला वैशाली की राजकुमारी थीं, इसलिए उन्हें वैशालीय भी कहा जाता है। उनका पालन-पोषण राजपरिवार की मर्यादाओं और वैभव के बीच हुआ, परन्तु उनका सात्विक मन भोग-विलास और राजसी महत्वाकांक्षाओं से बहुत दूर था। वे बचपन से ही आत्मसाधना और जगत के कल्याण की भावना में रत रहते थे। 

तीर्थंकर महावीर स्वामी, कोलकाता 

संसार त्याग एवं साधना 

मात्र ३० वर्ष की आयु में उन्होंने समस्त राजसी वैभव का त्याग कर मुनि दीक्षा अर्थात संन्यास ग्रहण किया। इसके बाद साढ़े बारह वर्षों तक उन्होंने कठिन तपस्या और आत्मसाधना की। अंततः उन्होंने वीतराग अवस्था और केवलज्ञान प्राप्त किया। उनकी कठोर तपस्या का वर्णन अनेक जैन आगमों में विस्तार से मिलता है। बौद्ध त्रिपिटकों में भी उन्हें ‘निर्ग्रन्थ ज्ञातपुत्र’ के नाम से संबोधित किया गया है। दीक्षा काल में वे सदैव निस्पृह, उच्चतम त्याग के आदर्शों का पालन करने वाले, अत्यंत क्षमाशील और समभाव में विचरण करते थे।  

एक कवि ने उनकी तपस्या के संबंध में कहा है—

देव ने दानव ने वलि मानव, पशु पंखी सहू डंखी रह्या;
हँसते मुखड़े तो ए महावी,र सहु णो मङ्गल जंखी रह्या।

अर्थात महावीर की साधना के समय देव, दानव, पशु और पक्षियों ने उन्हें अनेक प्रकार के कष्ट दिए, परन्तु महावीर ने हँसते हुए न केवल उन कष्टों को सहा बल्कि उन्हें कष्ट देने वालों की भी मंगल कामना करते रहे।


चंडकौशिक का उपसर्ग एवं क्षमाशील महावीर 


भगवान् महावीर और चंडकौशिक सर्प का उपसर्ग

साधनाकाल में एक बार महावीर जंगल के रास्ते से गुजर रहे थे। ग्रामीणों ने उन्हें चेतावनी दी कि उस जंगल में एक अत्यंत भयंकर दृष्टिविष सर्प चंडकौशिक रहता है, जिसकी आँखों की दृष्टि मात्र से जीव की मृत्यु हो जाती है। परन्तु महावीर अपने निश्चय में अडिग थे। उन्हें अपने प्राणों का मोह नहीं था।

जब सर्प ने उन्हें आते देखा तो अत्यंत क्रोधित होकर उनकी ओर देखा। महावीर की करुणा दृष्टि चंडकौशिक की विषदृष्टि से टकराई और अमृत दृष्टि ने विषदृष्टि को निष्फल कर दिया। महावीर आगे बढ़े और सर्प के निकट पहुँच गए। सर्प ने क्रोध में आकर उनके पैर में डस लिया।

कथानक है कि सर्प के डसने पर उनके चरणों से रक्त के स्थान पर दूध की धारा बह निकली। यह देखकर सर्प आश्चर्यचकित रह गया। जैसे संतान के प्रति वात्सल्य से माता के स्तनों से दूध प्रवाहित होता है, वैसे ही समस्त जगत के प्रति वात्सल्य के कारण उनके शरीर का रक्त भी दूध के समान करुणामय बन गया था।

आश्चर्यचकित चंडकौशिक को महावीर ने क्रोध त्याग कर क्षमा का उपदेश दिया। सर्प का हृदय परिवर्तन हुआ और उसने आत्मसाधना का मार्ग अपनाया। कहा जाता है कि उसने आगे चलकर देवत्व प्राप्त किया।

चंदनबाला द्वारा आहारदान

एक बार भगवान् महावीर ने साधना के दौरान एक कठोर प्रतिज्ञा ली। इसमें एक साथ तेरह शर्तें थीं— जैसे कोई राजकुमारी हो, परन्तु बेड़ियों में जकड़ी हुई हो, मुंडित मस्तक हो, तीन दिन से भूखी हो, हाथ में उबले हुए उड़द लेकर भिक्षा दे रही हो, और वह एक साथ हँस भी रही हो तथा रो भी रही हो। ऐसा संयोग मिलने पर ही वे आहार ग्रहण करेंगे।

पाँच महीने और पच्चीस दिन तक ऐसा कोई संयोग नहीं मिला और वे इतने दिनों तक निराहार रहे।

चंदनबाला एक राजकुमारी थी। युद्ध में पिता की पराजय के बाद उसे दासी के रूप में बेच दिया गया और उसकी वही अवस्था हो गई। जब महावीर वहाँ पहुँचे तो वह अत्यंत प्रसन्न हुई और अपने लिए रखे उबले हुए उड़द उन्हें देने को तैयार हुई। सभी शर्तें पूर्ण हो रही थीं, परन्तु उसकी आँखों में आँसू नहीं थे।

महावीर लौटने लगे। तब चंदनबाला ने सोचा— “मैं अभागिनी हूँ, इतना दुःख सहा, अब यह तपस्वी भी मेरे द्वार से लौट रहे हैं।” यह सोचकर उसकी आँखों से आँसू बह निकले। महावीर ने उसी क्षण उसके हाथों से आहार ग्रहण किया।

कहा जाता है कि उस समय देवताओं ने पाँच दिव्य प्रकट किए और चंदनबाला दासत्व से मुक्त हुई। आगे चलकर वही चंदनबाला महावीर के संघ में ३६००० साध्वियों की प्रमुखा बनीं।

इस प्रकार उनका साधनाकाल अनेक घटनाओं से भरा हुआ है। साढ़े बारह वर्षों की उत्कट साधना के बाद उनका सम्पूर्ण मोह, राग-द्वेष आदि नष्ट हो गया और वे वीतरागी एवं सर्वज्ञ बने। उन्हें केवलज्ञान-केवलदर्शन प्राप्त हुआ। सर्वज्ञ अवस्था प्राप्त करने के बाद जब उन्हें तीनों लोकों के समस्त पदार्थों और ८४ लाख योनियों के जीवों का ज्ञान हुआ, तब उन्होंने जगत के कल्याण के लिए उपदेश देना प्रारम्भ किया। अहिंसा और सत्य उनके उपदेश का मूल आधार था।

लोकभाषा का उपयोग

भगवान् महावीर स्वयं राजपुत्र थे, परन्तु सर्वज्ञ बनने के बाद उन्होंने अपने उपदेश राजभाषा या तत्कालीन विद्वानों की भाषा संस्कृत में नहीं दिए। उन्होंने सामान्य जनता की लोकभाषा प्राकृत को चुना। उनके उपदेश अर्धमागधी प्राकृत में ही गुम्फित हैं। इस प्रकार उन्होंने धर्म क्षेत्र में व्याप्त आभिजात्य वर्ग के एकाधिकार को समाप्त कर धर्म के सार्वभौमिक और सार्वजनिक स्वरूप को प्रकाशित किया।

भगवान महावीर का समवशरण

चतुर्विध संघ, तीर्थ एवं तीर्थंकर

केवलज्ञान प्राप्ति के बाद सभी तीर्थंकर समवशरण में विराजमान होकर धर्म का उपदेश देकर तीर्थ की स्थापना करते हैं। तीर्थ का अर्थ है— तारने वाला। भगवान् स्वयं संसार-सागर से पार पहुँचे और उनके अनुयायी बनकर अन्य जीव भी संसार की मोह-माया से मुक्त होकर मोक्ष प्राप्त करते हैं।

अनुयायियों का यह समूह तीर्थ कहलाता है, जिसे चतुर्विध संघ कहा जाता है— साधु, साध्वी (गृहत्यागी) तथा श्रावक और श्राविका (गृहस्थ)। ये चार अंग मिलकर चतुर्विध संघ बनाते हैं।

भगवान महावीर का चित्र- कल्पसूत्र  प्राचीन प्रति 


सामाजिक सद्भाव एवं समरसता

भगवान् महावीर तत्कालीन समाज में व्याप्त अस्पृश्यता और जातिवाद की विकृतियों को स्वीकार नहीं करते थे। उनकी दृष्टि में प्राणिमात्र के प्रति समान भाव था। उन्होंने कहा कि व्यक्ति जन्म से नहीं, बल्कि कर्म से ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र होता है।

उनके संघ में इंद्रभूति गौतम जैसे ब्राह्मण, श्रेणिक जैसे क्षत्रिय, आनंद जैसे वैश्य तथा हरिकेशवल जैसे चाण्डाल भी सम्मिलित थे। उत्तराध्ययन सूत्र में हरिकेशवल मुनि की प्रशंसा करते हुए उन्हें श्रेष्ठ गुणों से सम्पन्न बताया गया है।

नारी जाति का सम्मान

भगवान् महावीर प्राणी मात्र को समान मानते थे, इसलिए उनका उपदेश जाति के साथ-साथ लिंगभेद से भी परे था। उनके चतुर्विध संघ में पुरुष साधुओं के साथ स्त्री साध्वियाँ और पुरुष श्रावकों के साथ स्त्री श्राविकाएँ भी सम्मिलित थीं।

चंदनबाला, मृगावती जैसी साध्वियाँ तथा सुलसा, रेवती जैसी श्राविकाएँ उनके संघ में शोभायमान थीं। विशेष उल्लेखनीय तथ्य यह है कि सुलसा, रेवती और चेल्लना ने अपने जीवन में सर्वोच्च सत्कर्म अर्जित किए, जिसके कारण भविष्य में वे तीर्थंकर पद प्राप्त करेंगी। चंदनबाला का प्रसंग नारी गरिमा के पुनरुद्धार का उत्कृष्ट उदाहरण है।

भगवान् महावीर के प्रथम शिष्य गणधर गौतम 


महावीर का जीवन संदेश

भगवान् महावीर ने धर्म को उत्कृष्ट मंगल बताते हुए उसे अहिंसा, संयम और तप के रूप में परिभाषित किया। उन्होंने कहा कि जिनका मन सदैव धर्म में लगा रहता है, उन्हें देवता भी नमस्कार करते हैं। इस प्रकार धार्मिक मनुष्य का स्थान देवताओं से भी ऊपर प्रतिष्ठित किया गया।

उन्होंने सत्य को प्रतिष्ठित करते हुए कहा कि सत्य ही भगवान् है। अहिंसा सभी जीवों के लिए कल्याणकारी है। समभाव सभी धर्मों में श्रेष्ठ है। विनय सभी धर्मों का मूल है।

क्रोध, मान (अहंकार), माया (कपट) और लोभ इन चार दुर्गुणों से बचने के लिए उन्होंने क्रमशः क्षमा, मृदुता, सरलता और संतोष अपनाने का उपदेश दिया।

जीवन में आचरण के लिए उन्होंने पाँच व्रत बताए— अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह। ये व्रत गृहस्थों के लिए अणुव्रत और त्यागी ascetics के लिए महाव्रत माने गए हैं।

भगवान् महावीर का जीवन केवल धार्मिक कथा नहीं, बल्कि मानव समाज के लिए आचरण का मार्ग है। आज भी जब समाज हिंसा, भेदभाव और स्वार्थ से जूझ रहा है, तब महावीर का संदेश— अहिंसा, समानता और संयम — पहले से अधिक प्रासंगिक हो गया है। उनके जन्म कल्याणक पर हमें संकल्प लेना चाहिए कि हम अपने जीवन में उनके आदर्शों को अपनाएँ और समाज में शांति, सद्भाव और करुणा का वातावरण बनाएँ। 

Thanks, 
Jyoti Kothari, Proprietor at Vardhaman Gems, Jaipur, represents the centuries-old tradition of Excellence in Gems and Jewelry. He is an adviser at Vardhaman Infotech, a leading IT company in Jaipur. He is also an ISO 9000 professional.



 

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