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रविवार, 12 अप्रैल 2026

जयपुर के श्वेताम्बर जैन मंदिर एवं दादाबाड़ी भाग 1


जयपुर में प्राचीन काल से ही अनेक श्वेताम्बर जैन मंदिर हैं जिनमे से अधिकांश खरतर गच्छ संघ द्वारा संचालित हैं. इसके अतिरिक्त अनेक दादाबाड़ियाँ उपाश्रय, स्थानक, भवन, धर्मशाला, छात्रावास आदि भी श्वेताम्बर जैन संघों द्वारा संचालित है. सर्वाधिक श्वेताम्बर जैन मंदिर श्री जैन श्वेताम्बर खरतरगच्छ संघ द्वारा संचालित है. 

इसके अतिरिक्त श्रीमाल सभा, तपागच्छ संघ, मुलतान सभा एवं जयपुर की विभिन्न कॉलोनियों जैसे जवाहरनगर, मालवीयनगर, श्यामनगर, मानसरोवर, विद्युतनगर आदि के संघों द्वारा संचालित मंदिर एवं दादाबाड़ियाँ भी हैं. कुछ मंदिर एवं दादाबाड़ी निजी मालिकाना हक़ की है और वो सम्बंधित परिवारों या पारिवारिक ट्रस्ट द्वारा संचालित होती है. 

सर्वप्रथम खरतरगच्छ संघ द्वारा संचालित मंदिर एवं दादाबाड़ियों की चर्चा करते हैं. 

श्री जैन श्वेताम्बर खरतरगच्छ संघ द्वारा संचालित जिनमंदिर 

सांगानेर मंदिर युगल 

1000 वर्ष प्राचीन श्वेताम्बर जैन मंदिर का कलात्मक शिखर 

जयपुर नगर का प्राचीनतम मंदिर श्री ऋषभदेव श्वेताम्बर जैन मंदिर सांगानेर में बस स्टैंड और त्रिपोलिया गेट के पास स्थित है. दिगंबर जैन संघी जी का मंदिर भी इसके पास में ही है. परिसर में दो मंदिर है एक ऋषभदेव भगवान् का मंदिर जो की लगभग १००० वर्ष प्राचीन है. सांगानेर के चोटानी बंधुओं द्वारा प्राचीन नागर शैली में निर्मित इस मंदिर के नयनाभिराम शिखर में अद्भुत कारीगरी है. 

सांगानेर प्राचीन श्वेताम्बर मंदिर का नयनाभिराम रंगमंडप 

रंगमंडप में प्राकृतिक रंगों से सुन्दर चित्रकारी की गई है. ऐसी कथाएं प्रचलित है की रंगमंडप में उत्कीर्ण नर्तकियों की मूर्तियां  मंदिर मंगल होने के बाद रात्रि के समय वहां नृत्य करतीं हैं. मंदिर में चोटानी बंधुओं की भगवान्दो के दर्शन करती हुई दो छोटी मूर्तियां भी स्थापित है. 

इसी परिसर में चन्द्रप्रभ स्वामी की लगभग ५०० वर्ष प्राचीन एक मंदिर भी है. इस मंदिर की प्रतिष्ठा प्रसिद्द खरतर गच्छीय उपाध्याय समयसुन्दर जी के द्वारा कराई गई थी. इस मंदिर में "लदान के छत" बने हुए हैं, जो जयपुर की स्थापत्य कला का उत्कृष्ट उदहारण है.  

सुपार्श्वनाथ मंदिर- खोह 

मूलनायक श्री सुपार्श्वनाथ, खोह

कछावा वंश की प्राचीन राजधानी खोह में सुपार्श्वनाथ स्वामी का एक ७०० वर्ष प्राचीन मंदिर है. यह मंदिर विशाल परिसर में स्थित है. मंदिर के सामने श्री शांतिनाथ स्वामी का दिगंबर जैन मंदिर भी है. इस मंदिर में सम्मेत शिखर तीर्थ का एक विशालकाय प्राचीन पट्ट भी है. 

सम्मेत शिखर तीर्थ का प्राचीन पट्ट , खोह मंदिर 

चंद्रप्रभु स्वामी मंदिर, आमेर 

आमेर भी कछावा वंश की प्राचीन राजधानी रही है. यहाँ आमेर के किले के तरफ जानेवाले रस्ते में जगत शिरोमणि जी मंदिर के सामने चन्द्रप्रभु स्वामी का लगभग ४०० वर्ष प्राचीन मंदिर है. मंदिर में उपलब्ध एक शिलालेख के अनुसार लगभग २०० वर्ष पूर्व इसका जीर्णोद्धार हुआ था. इस मंदिर में भी प्राकृतिक रंगों से सुन्दर चित्रकारी की गई है. यहाँ लकड़ी से बना हुआ एवं सोने की चित्रकारी वाला एक तिगड़ा भी है जिसमे विशेष उत्सव के समय भगवान् को विराजमान कर पूजा की जाती है. इस मंदिर में लकड़ी के ही बने हुए नंदीश्वर द्वीप के ५२ जिनालयों की पूजा प्रतिवर्ष आश्विन शुक्ल तृतीया के दिन की जाती है, जिसमे सम्पूर्ण श्वेताम्बर समाज प्रतिवर्ष भाग लेता है. यह आमेर के मेले के रूप में ख्यात है. 

सुपार्श्वनाथ स्वामी का बड़ा मंदिर, जौहरी बाज़ार

जौहरी बाज़ार के घीवालों के रास्ते में (दड़ा) अवस्थित यह मंदिर भी अत्यंत प्राचीन है. लगभग २५० वर्ष प्राचीन इस मंदिर के दीवारों में सोने का कलात्मक काम किया हुआ है. यहाँ पर अनेक हस्तनिर्मित चित्र भी हैं जिनमे जैन धर्म के कथानक अंकित हैं. इस मंदिर की दीवारों एवं जमीन में पच्चीकारी का सुन्दर और कलात्मक काम किया हुआ है. 

श्री महावीर स्वामी मंदिर, घीवालों का रास्ता 

लीलाधर जी के उपाश्रय में स्थित यह मंदिर (घर देरासर) लगभग १३० वर्ष पुराना है. वर्त्तमान में यहाँ श्वेताम्बर जैन विद्यालय के नाम से एक विद्यालय संचालित है और उसी परिसर में यह मंदिर स्थित है.  

श्री सांवलिया पार्श्वनाथ मंदिर,  मोहनबाड़ी, गलता गेट 

इस मंदिर की स्थापना जयपुर की स्थापना के साथ ही हुआ. मूलरूप में यह मंदिर ऋषभदेव भगवान (आदिनाथ) का था जिनके चरण भव्य कलात्मक छतरी के नीचे स्थित है. लगभग १०० वर्ष पूर्व यहाँ पर श्री सांवलिया पार्श्वनाथ भगवान् की प्रतिमा भी स्थापित की गई तबसे यह श्री सांवलिया पार्श्वनाथ मंदिर के नाम से जाना जाता है. मंदिर के गुम्बद एवं दीवारों में हस्तनिर्मित चित्रकारी इस मंदिर की विशेषता है. 

श्री ऋषभदेव जिन प्रासाद,  मोहनबाड़ी, गलता गेट

मोहनबाड़ी परिसर में ही एक नए और भव्य श्री ऋषभदेव जिन प्रासाद का निर्माण कराया गया है. इस अति भव्य मंदिर को जयपुर का सबसे बड़ा, भव्य और कलात्मक मंदिर माना जाता है. जयपुर-दिल्ली उच्च मार्ग पर स्थित इस मंदिर का १०८ फुट ऊँचा भव्य शिखर उच्च मार्ग से आने जाने वाले लोगों का ध्यान अपनी और खींच ही लेता है. ५४ फ़ीट व्यास का बिना खम्बे का रंगमंडप स्थापत्य कला का अद्भुत उदहारण है. विस्तृत परिसर में बना यह विशाल मंदिर पूरी तरह से मकराना के सफ़ेद मार्बल से बना हुआ है. यहाँ तक की मंदिर के विशाल खम्बे और छत में लगनेवाला बीम भी मकराना के सफ़ेद मार्बल से ही बना हुआ है. 

श्री मुनिसुव्रत स्वामी मंदिर (कटला मंदिर), आगरा रोड 

मूलनायक श्री मुनिसुव्रत स्वामी, कटला मंदिर

सांगानेरी गेट से आगरा रोड की तरफ जाते हुए अग्रवाल कॉलेज के पास यह नया और भव्य मंदिर है. पूर्व में यहाँ एक छोटा सा श्री आदिनाथ भगवान का मंदिर था, जिसे कुछ ही वर्ष पूर्व भव्य रूप देकर इस नए मंदिर का निर्माण कराया गया. 

श्री महावीर स्वामी मंदिर, बरकत नगर, टोंक फाटक 

श्री महावीर स्वामी मंदिर में सुन्दर कांच का काम 


यह मंदिर वर्त्तमान में कांच के मंदिर के नाम से ख्यात है. एक यति जी द्वारा निर्मित एक छोटे से घर देरासर को कुछ वर्षों पूर्व एक भव्य जिन मंदिर में परिवर्तित किया गया. बाद में यहाँ की पूरी दीवारों पर कांच का काम कराया गया, तबसे यह कांच मंदिर के नाम से प्रसिद्द है. 

श्री वासुपूज्य स्वामी जैन मंदिर, मोती मार्ग, मानसरोवर 

जयपुर के विस्तार एवं विभिन्न कॉलोनियों में जैनों की वस्ति होने के बाद लगभग २५ वर्ष पूर्व इस मंदिर का निर्माण कराया गया. आज यह मानसरोवर निवासी जैनों के लिए एक प्रमुख उपासना स्थल है. 

श्री शांतिनाथ स्वामी मंदिर, चाकसू 

जयपुर जिले में स्थित चाकसू में भी एक प्राचीन जैन मंदिर खरतर गच्छ संघ की व्यवस्था में है. प्राचीन होने के कारण इस मंदिर के जीर्णोद्धार की आवश्यकता है. 

श्री वासुपूज्य स्वामी मंदिर, मालपुरा 

टोंक जिले में स्थित प्रसिद्द तीर्थस्थल मालपुरा में प्राचीन जिनमंदिर के स्थान पर आज से २५ वर्ष पूर्व एक भव्य मंदिर का निर्माण कराया गया. यह  शिखरबद्ध मंदिर पत्थर पर सुन्दर नक्काशी कर बनाया गया है.  

श्री जैन श्वेताम्बर खरतरगच्छ संघ द्वारा संचालित दादाबाड़ी 

उपरोक्त श्वेताम्बर जैन मंदिरों के अतिरिक्त श्री जैन श्वेताम्बर खरतर गच्छ संघ द्वारा संचालित अनेक दादाबाड़ियां भी है. इनमे सांगानेर का प्राचीन दादाबाड़ी उल्लेखनीय है. लगभग ४५० वर्ष पूर्व चौथे दादागुरु श्री जिनचन्द्र सूरी की आज्ञा से उनके एक शिष्य ने इस प्राचीन श्री कुशल सूरी दादाबाड़ी की प्रतिष्ठा कराइ थी. 


सांगानेर दादाबाड़ी के मयूर उद्यान में पेड़ पर बैठा मोर 

दादाबाड़ी परिसर में एक मयूर उद्यान भी है जहाँ सैंकड़ों मोर क्रीड़ा करते हुए दर्शनार्थियों का मन मोह लेते हैं. 

मोहनबाड़ी परिसर में भी एक प्राचीन एवं एक नवनिर्मित भव्य एवं विशाल दादाबाड़ी है. आम्बेर के श्री चन्द्रप्रभु मंदिर के सामने (जगत शिरोमणि मंदिर के बगल में) विशाल परिसर में लगभग ६०-७० वर्ष पूर्व एक दादाबाड़ी का निर्माण कराया गया. श्री महावीर स्वामी मंदिर, टोंक फाटक के अंदर भी एक छोटी दादाबाड़ी है. 

दादाबाड़ी, कटला मंदिर, जयपुर 

कटला मंदिर के बेसमेंट में एक विशाल दादाबाड़ी बनवाई गई है. चाकसू में भी श्री शांतिनाथ मंदिर के अतिरिक्त एक दादाबाड़ी भी है. 

श्री जिन कुशल सूरी दादाबाड़ी, मालपुरा 

मालपुरा एक प्रमुख तीर्थस्थल है. तृतीय दादागुरु श्री जिन कुशल सूरी जी ने स्वर्गवास उपरांत अपने एक भक्त को मालपुरा के एक शिलाखंड पर दर्शन दिया था, तबसे यह तीर्थस्थल के रूप में विख्यात हुआ और वह शिलाखंड पूजनीय बन गया. ७०० वर्ष प्राचीन इस शिलाखंड के दर्शनार्थ एक अति भव्य, विशाल एवं कलात्मक दादाबाड़ी का २५ वर्ष पूर्व निर्माण कराया गया. यहाँ प्रतिवर्ष लाखों की संख्या में दर्शनार्थी भक्त आते हैं. फाल्गुन कृष्ण अमावस्या एवं पूर्णिमा (होली) पर यहाँ भव्य मेला लगता है. 

इस विशाल दादाबाड़ी के दाहिनी ओर श्री वासुपूज्य स्वामी का एवं बांयी ओर अम्बिका देवी का मंदिर है. 

........(क्रमशः)


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Jyoti Kothari, Proprietor at Vardhaman Gems, Jaipur, represents the centuries-old tradition of Excellence in Gems and Jewelry. He is an adviser at Vardhaman Infotech, a leading IT company in Jaipur. He is also an ISO 9000 professional.




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शुक्रवार, 3 अप्रैल 2026

एक महत्वपूर्ण निवेदन – प्राकृत भाषा के लिए एक छोटा सा प्रयास

एक महत्वपूर्ण निवेदन – प्राकृत भाषा के लिए एक छोटा सा प्रयास 

भारत में जनगणना प्रारम्भ होने वाली है, जो मार्च 2027 तक पूर्ण होने की संभावना है। जनगणना अधिकारी शीघ्र ही आपसे आवश्यक जानकारी एकत्र करने हेतु संपर्क करेंगे।

जब आपसे आपकी मातृभाषा पूछी जाए और उसके बाद यह प्रश्न किया जाए कि आप कौन-कौन सी भाषाएँ जानते हैं, तो कृपया “प्राकृत” को भी द्वितीय या तृतीय भाषा के रूप में अवश्य शामिल करें।

प्राकृत भाषा के प्राचीन सूत्र 

2011 की जनगणना में 24 हजार से अधिक लोगों ने संस्कृत को अपनी मातृभाषा बताया था तथा लगभग 31 लाख लोगों ने उसे द्वितीय या तृतीय भाषा के रूप में दर्ज कराया था। जबकि प्राकृत के संबंध में जनगणना आँकड़ों में कोई स्पष्ट जानकारी उपलब्ध नहीं है।

भगवान महावीर ने अपने उपदेश तत्कालीन जनसामान्य की भाषा प्राकृत में दिए थे, जो जैन आगमों के रूप में आज भी सुरक्षित हैं। गत वर्ष भारत सरकार द्वारा पहली बार प्राकृत को शास्त्रीय भाषा का दर्जा देने की घोषणा की गई है। यह हमारे लिए अत्यंत महत्वपूर्ण अवसर है। यदि अधिक से अधिक लोग प्राकृत को द्वितीय या तृतीय भाषा के रूप में दर्ज कराते हैं, तो इस भाषा के संरक्षण, अध्ययन और विकास को बल मिलेगा।

यद्यपि हम सभी प्राकृत बोल नहीं पाते, फिर भी सामायिक, प्रतिक्रमण, चैत्यवंदन, गुरुवंदन आदि पारंपरिक धार्मिक क्रियाओं में प्राकृत सूत्रों का ही प्रयोग करते हैं। कम से कम प्रत्येक जैन नवकार मंत्र का जप करता है, जो प्राकृत भाषा में ही निवद्ध है और अधिकांश लोगों को कंठस्थ भी है। अतः प्रत्येक जैन द्वारा प्राकृत को “ज्ञात भाषा” के रूप में दर्ज करना उचित और आवश्यक है।

प्राकृत भारत की अत्यंत प्राचीन, सरल और मधुर भाषा है।  प्राकृत अनेक आधुनिक भारतीय भाषाओं की जननी भी माना जाता है। इसे जीवित रखना हमारी सांस्कृतिक जिम्मेदारी है। अभी उचित समय है — कृपया जनगणना के समय “प्राकृत” को अपनी द्वितीय या तृतीय भाषा के रूप में अवश्य लिखवाएँ।

यदि आपको यह संदेश उचित लगे, तो कृपया इसे अपने परिचितों तक अवश्य पहुँचाएँ।

प्राकृत भारती अकादमी 


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श्री महावीरजी रथयात्रा: सांस्कृतिक एकात्मता और सामाजिक समरसता का अद्भुत उदाहरण


चंदनपुर का रोचक इतिहास

आज आपको राजस्थान के करौली जिले के चंदनपुर के लगभग 300 वर्ष पुराने रोचक इतिहास की ओर ले चलते हैं। लोक परंपरा के अनुसार एक ग्वाले की दुधारू गाय प्रतिदिन गोचर भूमि में चरने जाती थी और सायंकाल लौट आती थी, किंतु कुछ दिनों से वह दूध देना बंद कर चुकी थी। ग्वाले को आश्चर्य हुआ। एक दिन उसने छिपकर गाय की निगरानी की। उसने देखा कि गाय एक टीले के पास जाकर खड़ी हो जाती है और अपना सारा दूध उस टीले पर स्वतः ही उंडेल देती है। ऐसी चमत्कारिक घटना देखकर वह आश्चर्यचकित रह गया।

प्रतिमा का प्राकट्य

गाँव के बुजुर्गों की सलाह पर उस टीले की खुदाई करवाई गई। खुदाई के दौरान वहाँ से भगवान महावीर की एक प्राचीन प्रतिमा प्राप्त हुई। तब लोगों को समझ आया कि गाय उस स्थान पर अपना दूध क्यों अर्पित कर रही थी। इस चमत्कारिक घटना की चर्चा शीघ्र ही पूरे क्षेत्र में फैल गई और यह स्थान श्रद्धा का केंद्र बन गया।

मंदिर निर्माण और तीर्थ की स्थापना

कालांतर में जयपुर राज्य के दीवान जोधराज पल्लीवाल ने विक्रम संवत 1826 के लगभग वहाँ तीन शिखरों वाले भव्य मंदिर का निर्माण करवाया। उसी समय से यह स्थान “श्री महावीरजी” के रूप में प्रसिद्ध हो गया और जैन समाज सहित समस्त क्षेत्र के लोगों के लिए एक महत्वपूर्ण तीर्थ बन गया।

श्री महावीर भगवान का रथ, महावीर जी तीर्थ  

रथयात्रा की परंपरा

वैशाख कृष्ण प्रतिपदा के दिन यहाँ भगवान महावीर की भव्य रथयात्रा निकाली जाती है। यह रथयात्रा मंदिर प्रांगण (कटला) से प्रारंभ होकर स्थानीय गंभीर नदी तक जाती है, जहाँ प्रतिमा का अभिषेक किया जाता है। इसके पश्चात प्रतिमा को पुनः रथ पर विराजमान कर मंदिर तक लाया जाता है। बाह्य दृष्टि से यह एक सामान्य धार्मिक अनुष्ठान प्रतीत होता है, किंतु इसके साथ भारत की सांस्कृतिक एकात्मता और सामाजिक सद्भाव एवं समरसता का अत्यंत प्रेरणादायक प्रसंग जुड़ा हुआ है।

कल वैशाख कृष्ण १ को (३ अरैल, २०२६) भी विशाल रथयात्रा निकली गई जिसके कुछ चित्र नीचे प्रस्तुत हैं. 



महावीर जी रथयात्रा में उमड़ा जनसमूह 


मंदिर के प्रवेशद्वार में महावीर स्वामी का भव्य रथ 

 मंदिर के प्रवेशद्वार में महावीर स्वामी का भव्य रथ एवं जनमेदिनी 

उत्सव का प्रारंभ

महावीर जन्म कल्याणक (चैत्र शुक्ल त्रयोदशी) के दिन स्थानीय स्तर पर प्रभात फेरी के साथ उत्सव का प्रारंभ होता है। इसके तीन दिन बाद वैशाख कृष्ण प्रतिपदा को दोपहर में मंदिर प्रांगण से रथयात्रा प्रारंभ होती है और यहीं से सामाजिक सद्भाव एवं समरसता का अद्भुत दृश्य सामने आता है।

विभिन्न समुदायों की सहभागिता

स्थानीय परंपरा के अनुसार सर्वप्रथम सेवादास जाटव परिवार के प्रतिनिधि का मंदिर ट्रस्ट द्वारा माल्यारोपण एवं साफा पहनाकर सम्मान किया जाता है। इसके बाद वही व्यक्ति रथ को प्रथम धक्का देकर चलाता है। रथ का प्रारंभ इसी परिवार के सदस्य द्वारा किया जाना आवश्यक माना जाता है। इसके पश्चात स्थानीय मीणा समुदाय के लोग रथ को खींचते हैं। रथ में जुड़ने वाले बैलों की व्यवस्था भी मीणा समाज द्वारा ही की जाती है।

गंभीर नदी पर प्रतिमा का अभिषेक जैन समुदाय द्वारा किया जाता है, जबकि वापसी में रथ को गुर्जर समाज के लोग खींचकर मंदिर तक लाते हैं। इस प्रकार इस रथयात्रा में जाटव (अनुसूचित जाति), मीणा (अनुसूचित जनजाति) और गुर्जर (अन्य पिछड़ा वर्ग) समुदाय पारंपरिक रूप से जैन समाज के साथ सहभागिता करते हैं। यह परंपरा सदियों से सामाजिक सद्भाव और समरसता का जीवंत उदाहरण प्रस्तुत करती है।

एक रोचक प्रसंग

स्थानीय लोगों के अनुसार कुछ वर्ष पूर्व एक रोचक घटना भी घटी। मंदिर प्रशासन द्वारा एक नया मशीनीकृत रथ तैयार कराया गया। परंपरा के अनुसार सेवादास जाटव परिवार के सदस्य का हाथ लगवाए बिना ही उस रथ को चलाने का प्रयास किया गया, किंतु वह रथ प्रारंभ होते ही क्षतिग्रस्त हो गया और मशीनीकृत व्यवस्था विफल रही। तत्पश्चात पारंपरिक रथ को पुनः निकाला गया, जाटव परिवार का सम्मान किया गया और उनके हाथ से रथ का प्रारंभ कराया गया। इसके बाद मीणा समाज द्वारा बैलों की जोड़ी से रथ खींचकर सभी अनुष्ठान सफलतापूर्वक संपन्न किए गए।



सांस्कृतिक एकात्मता का जीवंत उदाहरण

यह रथयात्रा केवल धार्मिक आयोजन नहीं है, बल्कि भारत की सांस्कृतिक एकात्मता, सामाजिक सद्भाव एवं समरसता का सशक्त प्रतीक है। विभिन्न समुदायों की सहभागिता इस तथ्य को प्रमाणित करती है कि आस्था और परंपरा समाज को जोड़ने का माध्यम बन सकती है। श्री महावीरजी की यह परंपरा आज भी उसी भाव के साथ जीवित है और सामाजिक समरसता का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत करती है।

लेखक: ज्योति कुमार कोठारी, जयपुर 

पूज्य जैन मुनि गणिवर्य श्री मणिरत्नसागर जी, जिनका जन्म महावीर जी तीर्थ के समीप ही हुआ और जो सभी स्थानीय परम्पराओं से भली भांति परिचित हैं द्वारा दिए गए तथ्यों के आधार पर यह लेख लिखा गया है. सभी चित्र एवं वीडियो उनके शिष्य संयम जैन ने भेजे हैं. लेखक उनके प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करते हैं. 


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