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मंगलवार, 31 मार्च 2026

आचारांग सूत्र में स्व का बोध: आत्मविस्मृति से आत्मज्ञान की यात्रा

  • प्रस्तावना 

  • 1. स्व का बोध: आत्मविकास का मूलाधार

    स्व का बोध एक ऐसी केन्द्रीय अवधारणा है, जिसके बिना किसी भी व्यक्ति, समाज अथवा राष्ट्र की वास्तविक उन्नति संभव नहीं है। यह केवल वैयक्तिक आत्मचेतना नहीं, बल्कि आत्मगौरव, आत्मशक्ति और आत्मदायित्व की सम्यक् अनुभूति है। जब तक यह बोध नहीं होता, तब तक न तो स्वाभिमान विकसित होता है और न ही व्यक्ति अपनी शक्तियों एवं सीमाओं का यथार्थ आकलन कर पाता है।

    जैन आगम आचारांग सूत्र (भगवान् महावीर का प्रथम उपदेश) स्व की अज्ञानता से स्व के ज्ञान की ओर ले जाने का मार्गदर्शन करता है। यह गहन दर्शनशास्त्रीय विषय है और भारतीय ज्ञान परंपरा के मूल चिंतन को रेखांकित करता है। भौतिकता के स्थान पर आत्मविद्या को केंद्र में रखकर विकसित यह चिंतनक्रम भारतीय आध्यात्मिक दृष्टि की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता को अभिव्यक्त करता है। इसी के आधार पर अहिंसा को व्यापक आध्यात्मिक सिद्धांत के रूप में प्रतिष्ठा प्राप्त होती है।

    इसके विपरीत, जब स्व की विस्मृति होती है, तो व्यक्ति न तो अपनी शक्ति को पहचान पाता है और न ही अपनी दुर्बलताओं का बोध कर पाता है। परिणामस्वरूप वह पराश्रित, भ्रमित और अंततः पराधीनता की स्थिति में पहुँच जाता है।


    समवशरण में भगवान महावीर द्वारा आचारांग सूत्र का उपदेश  

    2. भारत में स्वबोध का ह्रास: ऐतिहासिक संदर्भ

    भारतवर्ष, जो कभी आत्मबोध, धर्म और सांस्कृतिक शक्ति का प्रमुख केंद्र था, मध्यकाल में अपनी शत्रुबोध-क्षमता को काफी हद तक खो बैठा। हमने न तो अपनी आंतरिक दुर्बलताओं को पर्याप्त रूप से पहचाना और न ही बाह्य आक्रमणों का यथार्थ मूल्यांकन किया। परिणामस्वरूप भारत को दीर्घकाल तक इस्लामी शासन के अंतर्गत पराधीनता का अनुभव करना पड़ा।

    स्वबोध के इस क्षरण की प्रक्रिया औपनिवेशिक काल में और अधिक गहरी हुई। विशेषतः ब्रिटिश शासन के दौरान शिक्षा, प्रशासन, भाषा और इतिहास-लेखन की नीतियों ने भारतीय परंपरागत आत्मदृष्टि को प्रभावित किया। अनेक विचारकों का मत है कि इस काल में भारतीय समाज में आत्मविश्वास की कमी और सांस्कृतिक विस्मृति की प्रवृत्ति बढ़ी।

    स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात भी औपनिवेशिक प्रभावों से पूर्णतः मुक्त होने की प्रक्रिया धीमी रही। आत्मबोध की पुनर्प्राप्ति के लिए आवश्यक सांस्कृतिक पुनर्समीक्षा व्यापक स्तर पर अपेक्षित थी, जिस पर विभिन्न चिंतकों ने अपने विचार प्रस्तुत किए।

    इस विषय पर स्वामी विवेकानन्दप्रभुदास बेचारदासश्री अरविन्द जैसे विचारकों ने अपने-अपने समय में गंभीर चिंतन किया। इतिहासकार धर्मपाल ने ब्रिटिश अभिलेखों के आधार पर भारतीय समाज की पारंपरिक संरचनाओं का विश्लेषण प्रस्तुत किया है।

    3. आत्मविस्मृति से स्वबोध की ओर: वर्तमान और भविष्य

    सौभाग्यवश, इक्कीसवीं सदी के भारत में आत्मविस्मृति की जड़ें धीरे-धीरे कमजोर पड़ती दिखाई दे रही हैं। आज भारत स्व के बोध की दिशा में अधिक सजग और आत्मविश्वासी रूप से अग्रसर है। वैश्विक मंच पर आर्थिक, सामरिक और सांस्कृतिक क्षेत्रों में बढ़ती सक्रियता के साथ-साथ भारत अपने मूल आत्मतत्त्व को पुनः पहचानने की प्रक्रिया में भी संलग्न है।

    भारत की मनीषा प्राचीन काल से ही "स्व" की अप्रतिम क्षमता को स्वीकार करती रही है, आत्मविद्या की खोज करती रही है, और आत्मविस्मृति की संभावित हानियों से भी सावधान करती रही है। यही कारण है कि तीर्थंकरों, ऋषि-मुनियों और भारत के महापुरुषों ने स्वबोध को आध्यात्मिक उन्नति का आधार माना है।

    इस लेख में हम विशेष रूप से भगवान महावीर द्वारा उपदिष्ट आचारांग सूत्र के माध्यम से उस मनीषा का अध्ययन करेंगे, जिसमें "स्व के बोध" को केंद्रीय महत्व दिया गया है। भगवद्गीताधम्मपद आदि ग्रंथों तथा अनेक आधुनिक विचारकों के स्वर भी आचारांग सूत्र की इस विचारधारा का समर्थन करते हैं, तथापि इस लेख का विषय आचारांग सूत्र तक ही सीमित रखा गया है।

    इस वैचारिक पुनर्जागरण की प्रक्रिया में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की भूमिका भी उल्लेखनीय रही है। "स्व का बोध" संघ की विचारधारा के प्रमुख तत्वों में से एक है। इसे केवल बौद्धिक अवधारणा के रूप में नहीं, बल्कि भारतीय जीवनदृष्टि के मूलाधार के रूप में देखा जाता है। इस दृष्टिकोण के अनुसार भारत के पुनरुत्थान के लिए अपने ‘स्व’ की पहचान और आत्मविस्मृति से मुक्ति अनिवार्य मानी गई है।

    आचारांग सूत्र: आत्मविस्मृति से स्वबोध और परिज्ञान की यात्रा

    भारतीय दर्शनों में ‘स्व का बोध’ ही वह मूल है, जिससे जीवन की दिशा, मूल्य और मुक्ति का निर्धारण होता है।
    जैन आगम, विशेषतः आचारांग सूत्र, इस बोध को अत्यंत सूक्ष्म और व्यावहारिक ढंग से प्रस्तुत करता है, जहाँ आत्मा की दिशाहीनता से लेकर परिज्ञान तक की यात्रा सूत्रबद्ध रूप में निरूपित की गई है।

    आचारांग सूत्र (1.1.1 – 1.1.6): आत्मविस्मृति से स्वबोध तक

    🔹 सूत्र 1 (1.1.1)

    प्राकृत मूल पाठ:


    "सुयं मे आउस्सं। तेणं भगवया एवमक्खायं — इह मेगेंसि नो सण्णा भवइ।
    तं जहा —
    पुरत्थिमाओ वा दिसाओ आगओ अहमंसि, दाहिणाओ वा… अण्णयरियो दिसाओ वा अणुदिसाओ वा आगओ अहमंसि।
    एवमेगेंसि नो णायं भवइ —
    अत्थि मे आया उववाइए? णत्थि मे आया उववाइए?
    के अहं आसी? के वा इओ चुओ इह पेच्चा भविस्सामि।"

    हिंदी भावार्थ:
    ऐसे जीव को यह भी ज्ञात नहीं होता कि वह किस दिशा से आया है —
    पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, ऊपर, नीचे या अन्य किसी दिशा अथवा अनुदिशा से।
    क्या मैं पुनर्जन्म लेकर आया हूँ या नहीं?
    मैं पूर्वजन्म में कौन था? और इस जन्म के बाद क्या बनूँगा?

    ➡ यह स्व-विस्मृति की पूर्ण अवस्था है — जिसमें आत्मा अपने मूल, मार्ग और गंतव्य से पूर्णतः अनभिज्ञ हो जाती है।

    🔹 सूत्र 2 (1.1.2)

    प्राकृत मूल पाठ:


    "से जं पुण जाणेज्जा सहसम्मइयाए परवागरणेणं अण्णेसिं वा अंतिए सोच्चा...
    एवमेगेंसि जं णायं भवइ —
    अत्थि मे आया उववाइए, जो इमाओ दिसाओ वा अणुदिसाओ वा अणुसंचरइ, सव्वाओ दिसाओ सव्वाओ अणुदिसाओ जो आगओ अणुसंचरइ — सोऽहं।
    से आयावाई, लोयावाई, कम्मावाई, किरियावाई।"

    हिंदी भावार्थ:
    जब किसी को स्वयं (पूर्वजन्म की स्मृति आदि से) अपने आप का ज्ञान होता है, अथवा किसी ज्ञानी पुरुष के उपदेश से वह आत्मबोध को प्राप्त करता है —
    तब उसे यह बोध होता है कि मैं ही वह जीव हूँ, जो समस्त दिशाओं और अनुदिशाओं में संचरण करता आया है।

    ➡ यही आध्यात्मिक अर्थों में आत्मविस्मृति से निकलकर स्वबोध की अवस्था है।

    ऐसे जानने वाला व्यक्ति कहलाता है —

    • आयावाई (आत्मवादी) — आत्मा की सत्ता को जानने और मानने वाला,

    • लोयावाई (लोकवादी) — लोक में भ्रमणशील आत्मा को मानने वाला,

    • कम्मावाई (कर्मवादी) — कर्मबन्ध को जानने वाला,

    • किरियावाई (क्रियावादी) — क्रिया को कर्मबन्ध का कारण मानने वाला।

    🔹 सूत्र 3 (1.1.3)

    प्राकृत मूल पाठ:


    "अकरिस्सं च हं, कारवेसुं च हं, करओ यावि समणुण्णे भविस्सामि।
    एयावंति सव्वावंति लोगंसि कम्मसमारंभा परिजाणियव्वा भवंति।"

    हिंदी भावार्थ:
    मैंने स्वयं भी कर्म किए हैं, दूसरों से करवाए हैं, और उन्हें करने योग्य समझा है।
    इस प्रकार लोक में होने वाले समस्त कर्म-समारम्भों को भली-भाँति जानना चाहिए।

    ➡ यह आत्मा की कर्म-संवेदनशीलता का चरण है — जहाँ वह अपने दोषों की स्वीकृति करती है।

    🔹 सूत्र 4 (1.1.4)

    प्राकृत मूल पाठ:


    "अपरिण्णाय कम्मे खलु अयं पुरिसे, जो इमाओ दिसाओ वा अणुदिसाओ वा अणुसंचरइ,
    सव्वाओ दिसाओ सव्वाओ अणुदिसाओ साहेइ,
    अणेगरूवा जोणीओ संधेइ, विरुवरुवे फासे पड़िसंवेदेइ।"

    हिंदी भावार्थ:
    जो आत्मा कर्म का यथार्थ ज्ञान नहीं रखती,
    वह समस्त दिशाओं और अनुदिशाओं में भटकती रहती है,
    अनेक प्रकार की योनियों में जन्म लेती है, और विविध प्रकार के दुःखों का अनुभव करती है।

    ➡ यह दुःखमूलक संसार-चक्र आत्मविस्मृति की ही परिणति है।

    🔹 सूत्र 5 (1.1.5)

    प्राकृत मूल पाठ:


    "तत्थ खलु भगवया परिण्णा पवेइया —
    इमस्स चेव जीवियस्स परिवंदण, माणण, पूयणाए;
    जाई मरण मोयणाए; दुक्ख पड़िघाय हेउं।"

    हिंदी भावार्थ:
    अब भगवान महावीर ज्ञान का मार्ग बताते हैं —
    यह जीव वंदना, मान और पूजा प्राप्त करने के लिए,
    जन्म–मरण और मोक्ष की आकांक्षा से प्रेरित होकर,
    दुःखों को दूर करने हेतु विभिन्न प्रकार की क्रियाओं में उलझा रहता है।

    ➡ यह संसार में आसक्ति और भ्रम की चेतावनी है।

    🔹 सूत्र 6 (1.1.6)

    प्राकृत मूल पाठ:


    "एयावंति सव्वावंति लोगंसि कम्मसमारंभा परिजाणियव्वा भवंति।
    जस्सेते लोगंसि कम्मसमारंभा परिण्णाया भवंति, से हु मुणी परिण्णायकम्मे — त्ति बेमि।"

    हिंदी भावार्थ:
    इस प्रकार लोक में अज्ञानवश किए जाने वाले समस्त कर्म-समारम्भों को जानना चाहिए।
    जो व्यक्ति लोक के इन समस्त कर्म-समारम्भों का यथार्थ ज्ञान प्राप्त कर चुका है,
    वही सच्चा मुनि है, वही परिज्ञातकर्मी है।

    ➡ यही आत्मज्ञान का चरम लक्ष्य है — मुनित्व अथवा परिज्ञान में स्थित अवस्था

    निष्कर्ष

    इन सूत्रों में भगवान महावीर ने जीव की आत्मविस्मृति की दशा से लेकर स्वबोध और परिज्ञान तक की यात्रा को अत्यंत सूक्ष्मता और स्पष्टता से प्रतिपादित किया है। साथ ही वे जीवों को चार प्रमुख दृष्टियों — आत्मवाद, लोकवाद, कर्मवाद और क्रियावाद — से अवगत कराते हुए स्वदर्शन की आधारशिला स्थापित करते हैं।

    यहाँ यह भी संकेत किया गया है कि जीव अकेला नहीं है, अपितु लोक में परिभ्रमण करते हुए अपने जैसे अनगिनत जीवों की भाँति आत्मविस्मृति और अज्ञानवश भ्रमणशील है। वह अपने अज्ञान और स्वार्थवश विविध प्रकार की क्रियाएँ करता है, जिससे कर्म का बन्ध होता है और परिणामस्वरूप वह संसार में परिभ्रमण करते हुए विविध प्रकार के दुःखों का अनुभव करता है।

    विशेष द्रष्टव्य:

    स्व के बोध को यदि आधुनिक प्रबंधन-भाषा में समझें, तो इसे आंशिक रूप से SWOT (Strengths, Weaknesses, Opportunities, Threats) विश्लेषण से जोड़ा जा सकता है। जैसे SWOT में व्यक्ति या संस्था अपनी शक्तियों, सीमाओं और परिस्थितियों का आकलन करती है, उसी प्रकार “स्व का बोध” व्यक्ति और समाज को अपने वास्तविक स्वरूप, सामर्थ्य और दिशा का आत्ममूल्यांकन करने हेतु प्रेरित करता है।


    Thanks, 
    Jyoti Kothari, Proprietor at Vardhaman Gems, Jaipur, represents the centuries-old tradition of Excellence in Gems and Jewelry. He is an adviser at Vardhaman Infotech, a leading IT company in Jaipur. He is also an ISO 9000 professional.

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