एक महत्वपूर्ण निवेदन – प्राकृत भाषा के लिए एक छोटा सा प्रयास
भारत में जनगणना प्रारम्भ होने वाली है, जो मार्च 2027 तक पूर्ण होने की संभावना है। जनगणना अधिकारी शीघ्र ही आपसे आवश्यक जानकारी एकत्र करने हेतु संपर्क करेंगे।
जब आपसे आपकी मातृभाषा पूछी जाए और उसके बाद यह प्रश्न किया जाए कि आप कौन-कौन सी भाषाएँ जानते हैं, तो कृपया “प्राकृत” को भी द्वितीय या तृतीय भाषा के रूप में अवश्य शामिल करें।
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| प्राकृत भाषा के प्राचीन सूत्र |
2011 की जनगणना में 24 हजार से अधिक लोगों ने संस्कृत को अपनी मातृभाषा बताया था तथा लगभग 31 लाख लोगों ने उसे द्वितीय या तृतीय भाषा के रूप में दर्ज कराया था। जबकि प्राकृत के संबंध में जनगणना आँकड़ों में कोई स्पष्ट जानकारी उपलब्ध नहीं है।
भगवान महावीर ने अपने उपदेश तत्कालीन जनसामान्य की भाषा प्राकृत में दिए थे, जो जैन आगमों के रूप में आज भी सुरक्षित हैं। गत वर्ष भारत सरकार द्वारा पहली बार प्राकृत को शास्त्रीय भाषा का दर्जा देने की घोषणा की गई है। यह हमारे लिए अत्यंत महत्वपूर्ण अवसर है। यदि अधिक से अधिक लोग प्राकृत को द्वितीय या तृतीय भाषा के रूप में दर्ज कराते हैं, तो इस भाषा के संरक्षण, अध्ययन और विकास को बल मिलेगा।
यद्यपि हम सभी प्राकृत बोल नहीं पाते, फिर भी सामायिक, प्रतिक्रमण, चैत्यवंदन, गुरुवंदन आदि पारंपरिक धार्मिक क्रियाओं में प्राकृत सूत्रों का ही प्रयोग करते हैं। कम से कम प्रत्येक जैन नवकार मंत्र का जप करता है, जो प्राकृत भाषा में ही निवद्ध है और अधिकांश लोगों को कंठस्थ भी है। अतः प्रत्येक जैन द्वारा प्राकृत को “ज्ञात भाषा” के रूप में दर्ज करना उचित और आवश्यक है।
प्राकृत भारत की अत्यंत प्राचीन, सरल और मधुर भाषा है। प्राकृत अनेक आधुनिक भारतीय भाषाओं की जननी भी माना जाता है। इसे जीवित रखना हमारी सांस्कृतिक जिम्मेदारी है। अभी भी समय है — कृपया जनगणना के समय “प्राकृत” को अपनी द्वितीय या तृतीय भाषा के रूप में अवश्य लिखवाएँ।
यदि आपको यह संदेश उचित लगे, तो कृपया इसे अपने परिचितों तक अवश्य पहुँचाएँ।


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