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मंगलवार, 6 मई 2025

‘The Case for India’: इतिहास, अन्याय और चेतावनी


1. विल ड्यूरेंट की 'द केस फॉर इंडिया': ब्रिटिश उपनिवेशवाद का एक सशक्त दस्तावेज

विल ड्यूरेंट, एक प्रसिद्ध अमेरिकी इतिहासकार और दार्शनिक, ने 1930 में प्रकाशित अपनी पुस्तक The Case for India में ब्रिटिश शासन के दौरान भारत पर हुए अत्याचारों और शोषण का गहन विश्लेषण प्रस्तुत किया है। यह पुस्तक न केवल ब्रिटिश उपनिवेशवाद की नीतियों की कठोर आलोचना करती है, बल्कि ब्रिटिश शासन से पूर्व भारत की सांस्कृतिक और आर्थिक समृद्धि को भी उजागर करती है, जिसे व्यवस्थित रूप से नष्ट किया गया।

हालांकि भारतीय लेखकों जैसे जसवंत सिंह, वीर सावरकर, बिपिन चंद्र और नेहरू ने ब्रिटिश शासन की नीतियों और उनके प्रभावों का विश्लेषण किया है, लेकिन अमेरिकी इतिहासकार विल ड्यूरेंट की पुस्तक The Case for India इस विषय पर एक अद्वितीय दृष्टिकोण प्रस्तुत करती है।

ड्यूरेंट ने ब्रिटिश शासन के दौरान भारत की आर्थिक और सामाजिक स्थिति का गहन विश्लेषण किया।  उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि भारत का राष्ट्रीय ऋण 1792 में $35 मिलियन से बढ़कर 1929 में $3.5 बिलियन हो गया अर्थात 137 वर्षों के ब्रिटिश शासन में यह कर्जा 100 गुणा हो गया।

ड्यूरेंट ने ब्रिटिश शासन को "एक उच्च सभ्यता का व्यापारिक कंपनी द्वारा आक्रमण और विनाश" कहा, जो "कला की परवाह किए बिना और लाभ की लालसा में" भारत को लूटने में लगी थी। यह कोई निम्न सभ्यता का विनाश नहीं था, जिसे किसी हीन जाति ने उत्पन्न किया हो। यह इतिहास की सर्वोच्च सभ्यताओं में से एक थी, और कुछ लोग इसे सभी में सर्वोपरि मानते हैं — जैसे कि कीज़रलींग... जब ब्रिटिश तोपों ने आक्रमण किया... हिंदुओं ने तुरंत आत्मसमर्पण कर दिया, ताकि मानवता की सबसे सुंदर कृतियों में से एक नष्ट न हो जाए। तो फिर, कौन सभ्य लोग थे? (हिंदू या अंग्रेज?) भारत पर ब्रिटिश विजय एक उच्च सभ्यता का विनाश था, जिसे एक व्यापारिक कंपनी ने, बिना किसी नैतिकता या सिद्धांत के, आग, तलवार, रिश्वत और हत्या के माध्यम से एक अस्थायी रूप से अव्यवस्थित और असहाय देश पर कब्जा कर लिया।

यह पुस्तक उपनिवेशवादी शासन और उसके लाभों के पक्ष में दिए गए सभी तर्कों को व्यवस्थित रूप से खंडित करती है। पहला तर्क कि भारत राष्ट्र का निर्माण ब्रिटिशों ने किया: इस कथन को स्पष्ट करना आवश्यक है — भारत का निर्माण ब्रिटिशों की क्रूरता के प्रति प्रतिक्रिया स्वरूप हुआ. वास्तव में, भारतीय और विश्व इतिहास पर एक सरसरी नजर डालने से ही पता चल जाता है कि प्राचीन काल से ही भारत कई बार लंबे समय तक एक शासन के अधीन रहा, और समृद्ध भी रहा.

उन्होंने यह भी बताया कि कैसे ब्रिटिश शासन ने भारत की कपड़ा उद्योग को नष्ट किया, शिक्षा प्रणाली को कमजोर किया, और रेलवे जैसे बुनियादी ढांचे का उपयोग केवल साम्राज्यवादी हितों के लिए किया। ड्यूरेंट की पुस्तक The Case for India भारतीय इतिहास पर एक महत्वपूर्ण दस्तावेज है, जो ब्रिटिश शासन की नीतियों और उनके विनाशकारी प्रभावों को विस्तार से प्रस्तुत करती है।


भारत की समृद्धि और ब्रिटिश लूट

2. भारत की समृद्धि और ब्रिटिश लूट

ड्यूरेंट के अनुसार, ब्रिटिश शासन से पूर्व भारत एक अत्यंत समृद्ध और औद्योगिक राष्ट्र था, जो वस्त्र, धातु कार्य, आभूषण, कीमती पत्थर, पोर्सलीन, जहाज निर्माण और वास्तुकला जैसे अनेक क्षेत्रों में अग्रणी था। उन्होंने लिखा कि भारत यूरोप और एशिया के किसी भी देश की तुलना में अधिक विनिर्माण क्षमताओं वाला राष्ट्र था।

ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने इस समृद्धि को व्यवस्थित रूप से नष्ट किया। भारतीय उत्पादों पर 50% तक कर लगाए गए, जबकि ब्रिटिश वस्त्रों को शुल्क-मुक्त आयात की अनुमति दी गई। भारतीय वस्त्रों पर 70–80% शुल्क लगाकर स्थानीय उद्योगों को अपंग बना दिया गया। भारत को केवल कच्चा माल आपूर्ति करने वाला उपनिवेश बना दिया गया।

ब्रिटिशों द्वारा लगाए गए करों की तुलना आज के समय में अमेरिका की ट्रम्प सरकार द्वारा लगाए गए टैरिफ से की जा सकती है, जहाँ अमेरिका अपनी आर्थिक और सैन्य ताकत के बल पर वैश्विक बाजार को हिला देने की कोशिश कर रहा है। जैसे आज चीन दुनिया का प्रमुख विनिर्माण केंद्र है, वैसा ही स्थान उस समय भारत का हुआ करता था। जिस तरह अमेरिका टैरिफ लगाकर चीन को आर्थिक रूप से झुकाने का प्रयास कर रहा है, उसी तरह ब्रिटिश सरकार ने भारत पर करों का भारी बोझ डालकर उसके पारंपरिक विनिर्माण उद्योग को धीरे-धीरे बर्बाद कर दिया था।

ब्रिटिश शासन की आर्थिक नीतियों के परिणामस्वरूप भारत का राष्ट्रीय ऋण 1792 में $35 मिलियन से बढ़कर 1929 में $3.5 बिलियन हो गया—एक सौ गुना वृद्धि। 1927 तक 7,500 ब्रिटिश सेवानिवृत्त अधिकारी इंग्लैंड में बैठकर भारत से $17.5 मिलियन वार्षिक पेंशन प्राप्त कर रहे थे।

3. रेलवे और उद्योगों का शोषण

भारत में 30,000 मील रेलवे का निर्माण भारत के लाभ के लिए नहीं, बल्कि ब्रिटिश सेना और व्यापार के लिए किया गया। रेलवे बोर्ड में किसी भी भारतीय को नियुक्त नहीं किया गया; रेलवे का संचालन पूरी तरह से यूरोपीय हाथों में था। भारतीय जहाज निर्माण उद्योग को भी नष्ट कर दिया गया; सभी भारतीय माल ब्रिटिश जहाजों द्वारा ले जाए जाते थे।

4. सामाजिक और शैक्षिक विनाश

ब्रिटिश शासन ने भारत की अर्थव्यवस्था के साथ-साथ उसकी सामाजिक और शैक्षिक संरचनाओं को भी गहरा नुकसान पहुँचाया। ड्यूरेंट के अनुसार, ब्रिटिशों के आने से पहले भारत में बेहतर शैक्षिक व्यवस्था थी. ब्रिटिशों ने उस पारंपरिक भारतीय शिक्षा प्रणाली को व्यवस्थित रूप से समाप्त किया, जिससे साक्षरता दर में भारी गिरावट आई। उन्होंने उल्लेख किया कि ब्रिटिशों के आगमन से पहले भारत में स्कूलों की संख्या अधिक थी, जो बाद में घटती गई और शिक्षा को हतोत्साहित किया गया।

गांवों द्वारा संचालित सामुदायिक विद्यालयों की व्यवस्था को खत्म कर दिया गया। जब 1911 में गोपाल कृष्ण गोखले ने अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा का विधेयक प्रस्तुत किया, तो उसे भी अस्वीकार कर दिया गया। परिणामस्वरूप, ब्रिटिश शासन के अंत तक भारत में निरक्षरता दर 93% तक पहुँच गई। इसके विपरीत, शिक्षा की बजाय शराब और अफीम की बिक्री को बढ़ावा दिया गया। 1922 में शराब बिक्री से ब्रिटिश सरकार को $60 मिलियन की आय हुई, और देशभर में 7,000 अफीम की दुकानें संचालित की गईं।

ऐसा कहा जाता है की ब्रिटिश सरकार भारत में आधुनिक शिक्षा का विकास और प्रसार किया. परन्तु यह एक भ्रामक तथ्य है. भारत एक विशाल शक्ति था जिसका पूरे विश्व से व्यापारिक एवं सांस्कृतिक  संबंध थे.  — अतः सरल तर्क यह है कि जैसे बंदूक और बारूद बनाने, और विभिन्न अन्य तकनीकेंभारत राष्ट्र तक पहुँचीं वैसे ही अंततः आधुनिक यूरोपीय तकनीक और विधियाँ भारत की सीमाओं तक पहुँचतीं!  

5. राजनीतिक अधिकारों का हनन

ब्रिटिश शासन ने भारतीयों को राजनीतिक अधिकारों से वंचित रखा। स्थानीय "निर्वाचित" निकायों को कोई वास्तविक सत्ता नहीं दी गई और वायसराय तथा गवर्नर को उन्हें कभी भी ओवररूल करने का अधिकार था। "फूट डालो और राज करो" नीति के अंतर्गत विभिन्न समुदायों के लिए अलग-अलग मतदान की व्यवस्था की गई, जिससे सामाजिक विभाजन और वैमनस्यता को बढ़ावा मिला। साथ ही, धार्मिक उन्माद और जातिवादी प्रवृत्तियों को भी प्रोत्साहित किया गया।

6. ब्रिटिश शासन की नैतिकता पर प्रश्न

ड्यूरेंट ने ब्रिटिश शासन की नैतिकता पर गंभीर प्रश्न उठाए। उन्होंने ब्रिटिश विजय को "एक उच्च सभ्यता का विनाश" कहा, जिसे एक व्यापारिक कंपनी ने — बिना किसी नैतिकता या सिद्धांत के — आग, तलवार, रिश्वत और हत्या के माध्यम से अंजाम दिया।

7. महात्मा गांधी  

पुस्तक में महात्मा गांधी के जीवन का 1930 तक का विवरण दिया गया है। गांधी जी ने कहा: "ब्रिटिश संबंध ने भारत को राजनीतिक और आर्थिक रूप से अधिक असहाय बना दिया है... आंकड़ों की कोई भी बाजीगरी उन गांवों में कंकालों के प्रमाण को मिटा नहीं सकती... मुझे कोई संदेह नहीं है कि इंग्लैंड और भारत के शहरों को इस मानवता के खिलाफ अपराध के लिए उत्तर देना होगा, यदि ऊपर कोई ईश्वर है, तो।"


The case for India, Will Durant

8. सभ्यता या शोषण और क्रूरता

यह अंश विल ड्यूरेंट की पुस्तक का एक मार्मिक और सजीव चित्रण है, जिसमें ब्रिटिश शासन की नीतियों और उनके भारत पर पड़े अत्याचारपूर्ण प्रभावों को स्पष्ट रूप से उजागर किया गया है। यह पुस्तक तथ्यों और आंकड़ों के माध्यम से उपनिवेशवाद की भयावह सच्चाई को सामने लाती है।

पुस्तक में वर्णित हैं वे दर्दनाक दृश्य, जिन्हें पढ़कर रूह कांप जाती है — “हिंदुओं को सड़कों पर पेट के बल रेंगने को मजबूर किया गया”; स्कूल के बच्चों को सरेआम कोड़े मारे गए; कैदियों को रस्सियों से बांधकर 15-15 घंटे तक धूप में खुले ट्रकों में रखा गया; उनके नग्न शरीरों पर चूना फेंका गया; हिंदू घरों की बिजली काट दी गई; यहां तक कि मजदूरों पर बम गिराने के लिए हवाई जहाजों का प्रयोग किया गया।

इन बर्बर कृत्यों को अंजाम देने वाले अधिकारियों को न तो दंड मिला, न शर्म आई — उल्टा उन्हें पेंशन पर सम्मानपूर्वक सेवानिवृत्त किया गया और निर्दोष घोषित किया गया। उनके समर्थन में तथाकथित सभ्य समाज ने $150,000 की राशि एकत्र कर उन्हें सम्मानित किया।

और फिर भी — “एक भी गोली किसी की पीठ में नहीं लगी — सारी गोलियां छाती में लगीं; एक भी भारतीय भागा नहीं। यह थी अहिंसा की सर्वोच्च अभिव्यक्ति — निष्क्रिय समर्पण का सर्वोच्च उदाहरण।”
ब्रिटिशों की यह क्रूरता, जो यदि उनके ही देश में होती तो शायद फांसी की सजा मिलती, भारत में एक शांतिपूर्ण आंदोलन को दुनिया के सबसे वीरतापूर्ण और सक्रिय आंदोलनों में बदल देती है — ऐसा आंदोलन, जिसकी मिसाल दुनिया में कहीं और नहीं मिलती।

मिस मैडलिन स्लेड (मीरा बेन) लिखती हैं —
“मैंने अपनी त्वचा को सिहरते, बालों को खड़े होते महसूस किया जब मैंने उन वीरों को देखा… उनके अंडकोष कुचल दिए गए थे… शरीर पीटा गया, टूटा पड़ा था… छाती पर प्रहार किए गए थे… जिनसे भी मैंने बात की, सबने एक जैसी भयंकर कहानियाँ सुनाईं — पिटाई, यातना, गुदा में डंडा डालना, घसीट-घसीट कर अपमान करना… यह है अंग्रेजी सम्मान? यही है अंग्रेजी न्याय?”

शशि थरूर के विचार

शशि थरूर ने भी अपनी पुस्तक Inglorious Empire में ब्रिटिश शासन की आलोचना करते हुए लिखा:

"भारत आने वाले हर मौलिक सोच वाले अंग्रेज के लिए, दस ऐसे थे जो मौलिक सोच में असमर्थ थे, और सौ ऐसे थे जो केवल मौलिक बुराई के लिए सक्षम थे।"

उन्होंने यह भी कहा कि सत्याग्रह को 'निष्क्रिय प्रतिरोध' कहना बकवास है, क्योंकि उसमें कुछ भी निष्क्रिय नहीं था।

9. "सभ्यता" का वास्तविक अर्थ

पुस्तक की शुरुआत में "सभ्यता" (civilization) की परिभाषा प्रस्तुत की गई है: "एक अत्यधिक विकसित समाज और संस्कृति वाला; नैतिक और बौद्धिक उन्नति का प्रमाण दिखाने वाला; मानवीय, नैतिक, और तर्कसंगत; स्वाद और शिष्टाचार में परिष्कृत; सुसंस्कृत; परिष्कृत।"

ड्यूरेंट इस परिभाषा के माध्यम से यह प्रश्न उठाते हैं कि क्या ब्रिटिश शासन वास्तव में "सभ्य" था, या यह एक व्यापारिक कंपनी द्वारा एक समृद्ध सभ्यता का क्रूर विनाश था।

10. भारतीय सभ्यता की अद्वितीय निरंतरता

ड्यूरेंट यह रेखांकित करते हैं कि सभी प्राचीन सभ्यताओं में, भारतीय सभ्यता ही एकमात्र है जो पूरे इतिहास में लगभग अपरिवर्तित रूप से जीवित रही है:

"हम बैबिलोन के समय में थे, हम यूनानियों के समय में थे, हम रोम के उत्कर्ष के समय में थे, हम यूरोप के उदय के समय में थे... और आज भी हम उपस्थित हैं... वही संस्कृति, वही जीवन मूल्य, वही देवताओं की पूजा करते हुए जैसे हम 3500 - 5000 साल पहले करते थे, लगभग वही भोजन करते हुए... लगभग अपरिवर्तित।"

यह निरंतरता भारतीय सभ्यता की शक्ति, लचीलापन और गहराई का प्रमाण है।

11. वर्तमान भारतीयों के लिए संदेश

डॉ. तुलसियान के विचारों के माध्यम से, यह पुस्तक वर्तमान भारतीयों को यह स्मरण कराती है कि स्वतंत्रता केवल एक राजनीतिक उपलब्धि नहीं थी, बल्कि यह हमारे पूर्वजों के बलिदानों और संघर्षों का परिणाम थी। आज, जब कई भारतीय पश्चिमी संस्कृति और प्रचार तंत्र से प्रभावित हैं, यह आवश्यक है कि हम अपने इतिहास, संस्कृति और मूल्यों को समझें और उन पर गर्व करें।

"कभी-कभी मैं चाहता हूँ कि हम ब्रिटिशों को कोहिनूर वापस करने के लिए कहें, उनसे उनके कृत्यों के लिए माफी मांगने को कहें... फिर मुझे अपनी शिक्षाएं याद आती हैं — क्षमा करें और आगे बढ़ें। लेकिन क्षमा करने का अर्थ भूलना नहीं है!"

12. निष्कर्ष: चेतावनी और आत्ममंथन का आह्वान

The Case for India ब्रिटिश उपनिवेशवाद की नीतियों और उनके भारत पर पड़े विनाशकारी प्रभावों का एक सशक्त, तथ्यात्मक और विस्तृत दस्तावेज़ है। यह न केवल ब्रिटिश शासन की क्रूरता, आर्थिक शोषण और सामाजिक विनाश को उजागर करती है, बल्कि भारतीय सभ्यता की महानता और उसकी अद्वितीय निरंतरता को भी रेखांकित करती है। यह पुस्तक केवल ऐतिहासिक विवरण नहीं, बल्कि आत्मचिंतन, आत्मगौरव और आत्मनिर्भरता का आह्वान भी है।

ड्यूरेंट ने ब्रिटिश शासन को "एक उच्च सभ्यता का व्यापारिक कंपनी द्वारा किया गया आक्रमण और विनाश" कहा। उन्होंने दिखाया कि किस तरह ब्रिटिश नीति ने भारत की कपड़ा उद्योग, शिक्षा प्रणाली और सांस्कृतिक आत्मसम्मान को क्रमशः ध्वस्त किया। आज, जब अनेक भारतीय अंग्रेजी भाषा और पश्चिमी संस्कृति से प्रभावित होकर अपने इतिहास से कट रहे हैं, यह पुस्तक एक चेतावनी की तरह हमारे सामने खड़ी है।

यह समय है भारतीय चेतना के पुनर्जागरण का। हमें अपनी सांस्कृतिक विरासत पर गर्व करना चाहिए, अपनी भाषाओं, परंपराओं और मूल्यों को संरक्षित करना चाहिए, और पश्चिमी प्रभावों के प्रति अंधानुकरण से बचना चाहिए।

यह पुस्तक ब्रिटेन में प्रतिबंधित की गई थी — जो इसकी प्रभावशीलता का प्रमाण है। हर भारतीय को यह पुस्तक पढ़नी चाहिए — केवल इतिहास जानने के लिए नहीं, बल्कि एक सशक्त, समृद्ध और आत्मनिर्भर भारत के निर्माण के लिए। 

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Jyoti Kothari 
(Jyoti Kothari, Proprietor, Vardhaman Gems, Jaipur represents the Centuries Old Tradition of Excellence in Gems and Jewelry. He is an adviser at Vardhaman Infotech, a leading IT company in Jaipur. He is also an ISO 9000 professional.

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गुरुवार, 24 अप्रैल 2025

राजस्थान की लोकदेवता परंपरा: संस्कृति, श्रद्धा और समावेशी धर्म का जीवंत दर्शन

"गोगा पीर धरती के लाल,
नागदेवता, संकट निवारक विशाल।
जोगण माता का थान बसे,
लोकरक्षा का जाग्रत जस बहसे।"

परिचय: लोक की देवता परंपरा और मुख्यधारा धर्मों का अंतःसंवाद

राजस्थान की भूमि केवल महलों, युद्धों और स्थापत्य की नहीं, बल्कि लोकश्रद्धा की जीवंत भूमि रही है। यहाँ की लोकदेवता परंपरा – जिसमें ग्रामरक्षक, कुलदेवी, सती माता, वीरगति प्राप्त जन, और प्राकृतिक शक्तियों का दैवीकरण सम्मिलित है – न केवल स्थानीय सामाजिक संरचना की आधारशिला है, अपितु इसने समय के साथ वैदिक और जैन परंपराओं को भी गहराई से प्रभावित किया

वैदिक प्रणाली, जो प्रारंभ में देवताओं को मुख्यतः ऋतुओं, प्रकाश, जल, अग्नि आदि प्राकृतिक तत्वों से जोड़ती थी, उसने धीरे-धीरे लोक-आस्था से उद्भूत शक्ति-स्वरूपों को आत्मसात किया। उदाहरण के लिए, शक्ति, भैरव, कुलदेवियाँ आदि का वैदिक/पुराणिक स्वरूप में प्रतिष्ठान लोक श्रद्धा से ही उत्पन्न हुआ।

राजस्थान के राजपूत समाज में कुलदेवियों की परंपरा अत्यंत सुदृढ़ है. वणिक समुदायों में भी यह परंपरा पाई जाती है. ब्राह्मण समाज मुख्यतः गोत्र पूजक देवों की परंपरा से सम्बद्ध है. अनुसूचित जाती, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC, SC, ST) के विभिन्न समुदायों में भी भिन्न भिन्न प्रकार से लोकदेवता/लोकदेवियों की पूजा उपासना प्रचलित है. इस तरह यह समाज में सर्वव्यापी प्रचलन है. राज परिवार एवं स्थानीय लोगों के साथ स्थानीय डकैतों द्वारा कैला देवी की पूजा इस परंपरा को एक विशिष्टता प्रदान करता है. 

इन देवी देवताओं से सम्बंधित चमत्कारों के उल्लेख में "परचा" शब्द बहुलता से उल्लिखित होता है जो की संभवतः प्रत्यक्ष या प्रभाव शब्द का अपभ्रंश राजस्थानी रूप है. 

जैन परंपरा, विशेषतः राजस्थान के ओसवाल, श्रीमाल, खंडेलवाल आदि समुदायों में, ने भी लोकदेवियों को सांस्कृतिक स्तर पर स्थान दिया, यद्यपि धार्मिक रूप में उपासना का विधान संयमित और अरहंत-सिद्ध केन्द्रित ही रहा। फिर भी सच्चियाय माता, शीतला माता, आशापुरा माता आदि को विवाह, गृहप्रवेश, एवं वंश परंपरा में स्थान मिला, यद्यपि ये धर्म नहीं, संस्कृति की अभिव्यक्ति रही।

राजस्थान की लोकदेवता परंपरा की एक विलक्षण विशेषता यह रही है कि इनमें धार्मिक सीमाओं से परे की स्वीकार्यता रही — जैसे बाबा रामदेवजी मुस्लिमों में 'रामसा पीर' के रूप में पूजे जाते हैं, और गोगाजी को हिन्दू-मुस्लिम दोनों समाजों में समान श्रद्धा प्राप्त है।

1. प्रमुख लोकदेवता (जाति- लोक आराध्य)

देवतामुख्य पूजकक्षेत्र
बाबा रामदेवजीदलित, मेघवाल, ओबीसी, मुस्लिमपश्चिम राजस्थान, गुजरात
देवनारायण जीगुर्जर जातिदक्षिण-पूर्व राजस्थान
गोगाजीजाट, गुर्जर, मीणा, मुसलमानसमस्त राजस्थान
तेजाजीजाट, चारण, कृषक वर्गनागौर, टोंक, अजमेर
पाबूजीरेबारी, ऊँटपालकजोधपुर-पाली क्षेत्र
हरबूजी / हड़बूजीओबीसी ग्रामीण समाजमारवाड़, मेवाड़

यह सूची केवल प्रमुख लोकदेवताओं की सूचि है। अन्य कई क्षेत्रीय लोकदेवता भी पूजित हैं।

2. कुलदेवी परंपरा (कुल / गोत्र आधारित देवी पूजन)

देवीमुख्य पूजकक्षेत्र
श्री सच्चियाय माताओसवाल जैनओसियाँ, जोधपुर
अशापुरा माताचौहान, पोरवाल, ओसवालपश्चिम राजस्थान
नागणेचा माताराठौड़, चारणनागाणा
मुण्डवा मातालोढा गोत्रनागौर क्षेत्र
शीतला माताश्रीमाल, माहावरमारवाड़
सुषमणि माताओसवालमोरखाना, बीकानेर
कोडमदेसर भैरवओसवाल, ग्रामीणबीकानेर क्षेत्र

यह सूची कुलदेवियों के कुछ प्रमुख उदाहरणों की है। प्रत्येक गोत्र/वंश में विविधताएँ हो सकती हैं।

3. सती माता परंपरा (बलिदानी स्त्रियों का दैवीकरण)

सती मातामुख्य पूजकक्षेत्र
रानी सतीअग्रवाल, माहेश्वरीझुंझुनूं
खेमी सतीवैश्य समाजझुंझुनूं
नारायणी सतीशेखावाटी ग्राम समाजनवलगढ़
सती थानजाट, मीणा, गुर्जरसंपूर्ण राजस्थान

सती परंपरा स्थानीय इतिहास और सामाजिक-स्मृति का दैवीकरण है, जो वर्तमान में सांस्कृतिक श्रद्धा का अंग है।

4. ग्रामदेवता / नगरदेवता परंपरा

देवतामुख्य पूजकक्षेत्र
थान की माताग्राम समाजराजस्थान के प्रत्येक गाँव में
देव का थानकृषक वर्गपूर्वी राजस्थान
भैरूजी का थानग्रामीण वर्गसीमाएँ, गाँव की रक्षा
नगर देवताशहरी व्यापारी, किलेदारपुराने नगर

यह परंपरा लोकसमाज की रक्षण भावना का प्रतीक है, जहाँ गांव और नगर की रक्षा के लिए देवी/देव की अवधारणा विकसित हुई।

5. रोगनाशक / जोगण परंपरा

देवीमुख्य पूजकक्षेत्र
शीतला माताब्राह्मण, वैश्य, ग्रामीण महिलाएँसमस्त राजस्थान
जोगण माताचारण, ओबीसीमारवाड़
महामाया / आइसर माताग्रामीण महिलाएँपूर्वी व दक्षिणी राजस्थान

जोगणें तांत्रिक शक्तियों का लोक-रूप हैं। 64 योगिनी परंपरा के लोकसंस्करण भी यहाँ पाए जाते हैं।

6. क्षेत्रीय देवियाँ / शक्तियाँ (प्राकृतिक श्रद्धा)

शक्ति रूपमुख्य पूजकक्षेत्र
पानी की माताकिसान महिलाएँजल स्रोत स्थल
पेड़ की मातामहिलाएँ (ST/OBC)पीपल, नीम, वट
चरण थानग्राम समाजभूमि-संरक्षक स्थल

प्रकृति के प्रति आदर भाव और रक्षा भावना लोकदेवियों के इन रूपों में झलकती है।

7. पशु रक्षक देवता

देवतामुख्य पूजकक्षेत्र
दुल्हा भैरवरेबारीऊँटपालक समाज
नाथ जीपशुपालक, योगी वर्गगौ-रक्षा
बाबा वीरकृषक समाजबीकानेर, नागौर क्षेत्र

8. आपदा निवारक देवियाँ

देवीमुख्य पूजकउद्देश्य
अकाल माताकिसान वर्गसूखा व दुर्भिक्ष निवारण
बाढ़ मातानदी क्षेत्र समाजबाढ़ से रक्षा
पानी माताकृषक महिलाएँजल याचना और संरक्षण

9. विशिष्ट लोकशक्ति परंपराएँ (तांत्रिक-स्थानीय)

देवी / देवतामुख्य पूजकस्वरूप
भूमिया जीग्राम समाजभूमि रक्षक देवता
क्षेत्रपालतांत्रिक लोकसमाजसीमांत रक्षक
भुवन देवी / भूवानी मातासीमित क्षेत्रशक्ति रूप
64 योगिनियाँ (जोगण रूप)लोकतांत्रिक शक्ति पूजनतांत्रिक मूल की लोक-व्याख्या

लोकदेवताओं की उपासना पद्धति: पद गायन, चारण-भाट परंपरा और स्मृति का संप्रेषण

राजस्थान की लोकदेवता परंपरा केवल मंदिरों और मूर्तियों तक सीमित नहीं है, वरन् यह एक जीवंत ध्वनिमय परंपरा है — जहाँ देवताओं का स्मरण गायन, कथा, वाणी और स्मृति के माध्यम से होता है।

पद गायन (Pad Gaayan)

  • लोकदेवताओं की स्तुति में गाए जाने वाले "पद" — विशेष रूप से गोगाजी, तेजाजी, पाबूजी, देवनारायण जी, और रामदेवजी के लिए —
    चारण, ढोली, कमायचा वादक, मंगनियार, लंगा समुदाय के द्वारा गाए जाते हैं।

  • यह गायन सांगीतिक काव्य परंपरा का अंग है — जिसमें तंत्री वाद्य (कमायचा, सारंगी), ढोलक, खंजरी आदि के साथ संवेदना और वीरता का सजीव चित्रण होता है।

“गोगा पीर का पद गाया, नागधारी की बाणियाँ,
उगते सूरज संग जागे, गाँव-गाँव में वाणियाँ।”

चारण और भाट परंपरा

  • चारण और भाट राजस्थान के लोक इतिहास के संरक्षक हैं। इन्होंने लोकदेवताओं की वंशावली, वीरता, चमत्कार, त्याग और धर्मरक्षा को पीढ़ियों तक कंठस्थ वाचिक परंपरा में संजोया।

  • इनके द्वारा कहा गया कवित्त, वेला, रासो — लोकदेवताओं की अधिकार प्राप्त गाथा बन जाते हैं, जो भक्ति और वीर रस का अद्वितीय संगम होते हैं।

  • तेजाजी, पाबूजी, देवनारायण जी की गाथाएँ आज भी "फड़" चित्रों के साथ चारण कथा गायकों द्वारा प्रस्तुत की जाती हैं।

लोकगायक समुदायों की भूमिका

  • मंगनियार, लंगा, ढोली, बील, नट, और बावरी जैसे समुदायों ने लोकदेवताओं की स्तुतियों को संगीत, नृत्य और गाथा से जोड़ा

  • रामदेवजी के मेले में गाया जाने वाला "ठाकर रो जोहारो" आज भी लोक भक्ति का अद्भुत उदाहरण है।

स्मरण की जीवंत परंपरा 

  • किसी भी त्योहार, मेला, यात्रा, विवाह, यज्ञोपवीत आदि में लोकदेवता का पद गाना अनिवार्य माना जाता है।

  • गोगाजी के जुलूस में "गोगा जी की बन्नी", "नागबाण", और रामदेवजी के संदर्भ में "रामसापीर की चालीसा" जैसे लोक-पद आज भी सामूहिक स्मृति और श्रद्धा का स्रोत हैं।

लोकदेवियों की मूर्ति-रचना / स्थापत्य लक्षण 

राजस्थान की लोकदेवियों की मूर्तियाँ अक्सर स्थानीय काले पत्थर, मिट्टी या सिंदूरी प्रतिमाओं के रूप में होती हैं — जो तांत्रिक मुद्रा, चौखट, बंधी आँखों, असवार रूपों के माध्यम से विशिष्ट पहचान देती हैं। इसी प्रकार राजस्थानी चित्रकला विशेष कर फड़ शैली में भी लोकदेवताओं का विशिष्ट स्थान है जैसे देवनारायण जी की फड़, पाबूजी की फड़ आदि. साथ ही पड़ गायन / फड़ गायन का भी एक विशिष्ट स्थान है जहाँ चित्र-श्रृंखला के साथ कथा की जाती है. 

आज के संदर्भ में इन लोकदेवताओं की भूमिका

आज जब परंपरा और आधुनिकता के द्वंद्व में लोकविश्वास डगमगा रहे हैं, राजस्थान की लोकदेवता परंपरा जड़ों से जुड़ने का अवसर प्रदान करती है।

उपसंहार

लोकश्रद्धा की धारा और धर्म की विस्तृत सहिष्णुता

राजस्थान की लोकदेवता परंपरा न केवल धर्म और लोकसंस्कृति के मध्य सेतु है, बल्कि यह दर्शाती है कि जनमानस की आत्मा केवल शास्त्रों से नहीं, बल्कि अनुभव और स्मृति से भी बनती है

वैदिक परंपरा, जहाँ प्रारंभ में ऋषि-मंत्र-यज्ञ का बोलबाला था, वही आगे चलकर लोकदेवताओं को पुराणों में स्थान देने लगीभैरव, दुर्गा, शक्ति, कुलदेवियाँ — ये सब लोक की चेतना से वेद की परिधि में आये।

जैन परंपरा, यद्यपि आत्मा और मोक्ष के मार्ग पर केंद्रीकृत है, फिर भी ओसवाल, श्रीमाल, खंडेलवाल जैसे जातीय समाजों में लोकदेवियों का स्थान वंश-रक्षा और परंपरा के आधार पर स्वीकार्य रहा — सच्चियाय माता, शीतला माता, अशापुरा माता जैसे उदाहरण इसके साक्षी हैं।

अतः राजस्थान की लोकदेवता परंपरा केवल पूजा नहीं — यह सांस्कृतिक निरंतरता, सामाजिक समावेशिता, और ऐतिहासिक स्मृति का जीवंत दर्शन है। लोकदेवता परंपरा इस बात का प्रमाण है कि धर्म जब लोकानुभव और आस्था से जुड़ता है, तो वह केवल मार्ग नहीं, बल्कि स्मृति, पहचान और सामूहिक चेतना का आधार बन जाता है।

सन्दर्भ ग्रंथों की सूची (References)

लोकदेवता एवं क्षेत्रीय श्रद्धा परंपरा

  1. डॉ. भगवतशरण उपाध्यायराजस्थान की लोकदेवियाँ
    प्रकाशक: राजस्थान हिन्दी ग्रंथ अकादमी

  2. डॉ. मोहन सिंह राठौड़राजस्थान की लोकपरंपराएँ
    प्रकाशक: साहित्य मंडल, नाथद्वारा

  3. डॉ. उर्मिला शर्मालोकदेवता: भारतीय जनमानस में देव संस्कृति
    विषय: गोगाजी, रामदेवजी, तेजाजी, पाबूजी आदि

  4. किशोरीलाल व्‍यासग्राम-देवता और राजस्थान की लोकविश्वास प्रणाली

  5. डॉ. महेन्द्र भटनागरराजस्थान की लोकआस्था और धर्मनिष्ठा
    (विशेषकर भैरव, भूमिया, क्षेत्रपाल इत्यादि पर)

कुलदेवी और सती परंपरा

  1. डॉ. रेखा शर्माराजस्थान की कुलदेवियाँ
    (कुल परंपरा, गोत्र संबद्धता, लोकश्रद्धा)

  2. डॉ. नवल शंकर शर्मासती परंपरा और भारतीय समाज
    (राजस्थान में सती थान, स्मृति-संस्कृति की विवेचना)

  3. शेखावाटी क्षेत्रीय अध्ययन केंद्ररानी सती परंपरा: इतिहास व लोकविश्वास
    शोध प्रकाशन, झुंझुनूं

लोकदेवता और वैदिक-जैन संवाद

  1. डॉ. नवल किशोर शर्माभारतीय लोकधर्म और वैदिक समन्वय
    विषय: शक्ति उपासना, ग्रामदेवी, और पुराणों में लोकभाव

  2. डॉ. रमेशचन्द्र शुक्लवैदिक धर्म और जनश्रुति परंपरा
    गूढ़ता से वर्णन कि कैसे लोकश्रद्धाएँ वैदिक-पुराणिक परंपरा में समाहित हुईं

  3. Prof. John E. CortJains in the World: Religious Values and Ideology in India
    Topic: Jain lay communities and local devotional practices

  4. Padmanabh S. JainiCollected Papers on Jain Studies
    Topic: Jain attitudes toward bhakti and village deities

  5. Paul DundasThe Jains
    अध्याय: लोकदेवियों के प्रति जैन सामाजिक दृष्टिकोण

लोक साहित्य, चारण भाट गाथा एवं मेले/थान

  1. डॉ. सीताराम लाळसराजस्थान का चारण साहित्य
    (तेजाजी, गोगाजी, पाबूजी की लोकगाथाएँ)

  2. जगदीशसिंह राठौड़राजस्थान के लोक मेले
    (लोकदेवताओं से जुड़े मेलों का विस्तृत विवरण)

  3. डॉ. अर्जुन देव चरनराजस्थानी लोकविश्वास और परंपरा

  4. राजस्थान पुरातत्व विभागलोकस्थल और थान निर्देशिका
    सरकारी प्रकाशन

  • उपरोक्त ग्रंथों में से अनेक विश्वविद्यालयों के शोधकार्य का भी आधार रहे हैं।

Thanks, 

Jyoti Kothari 
 (Jyoti Kothari, Proprietor, Vardhaman Gems, Jaipur represents Centuries Old Tradition of Excellence in Gems and Jewelry. He is an adviser at Vardhaman Infotech, a leading IT company in Jaipur. He is also an ISO 9000 professional). 

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बुधवार, 23 अप्रैल 2025

बंगाल का मंगलकाव्य: ग्राम्य देवियों की वैदिक प्रतिष्ठा की संघर्षगाथा


"लोक आस्था जब साहित्य बनती है, तब वह केवल कथा नहीं रह जाती — वह संस्कृति की चेतना बन जाती है।"

भूमिका

बंगाल का मध्यकालीन साहित्य एक ऐसी सांस्कृतिक परंपरा है, जिसमें लोक और शास्त्र, भक्ति और सामाजिक चेतना, तथा स्त्री शक्ति और धार्मिक संघर्ष का सुंदर संगम हुआ। इस परंपरा का प्रतिनिधि साहित्य है — मंगलकाव्य

"मंगल" शब्द का अर्थ है शुभता, और यह परंपरा विशेषतः ग्राम्य देवी-देवताओं से जुड़ी हुई है। मंगलकाव्य न केवल पूजा की प्रतिष्ठा दिलाने वाले साहित्य हैं, बल्कि ये सामाजिक विमर्श, स्त्री पक्ष की मुखरता, और लोक से वैदिक शास्त्रों तक की यात्रा का दस्तावेज़ भी हैं।

मंगलकाव्य की ऐतिहासिक समयरेखा

शताब्दी                  प्रमुख काव्य और रचनाकार

प्रारंभिक
13वीं
मनसामंगल – बहराम खान
14वीं–15वींमनसामंगल – कृष्णराम दास, रूपराम
16वींचंडीमंगल – मुकुंदराम चक्रवर्ती, मुक्ताराम चक्रवर्ती
17वींधर्ममंगल – विजय गुप्त, काशीराम दास
17वींषष्ठीमंगलशीतलामंगल – अज्ञात
18वींअन्नदा मंगल – रायगुणाकर भारतचंद्र
18वींचैतन्यमंगलजगन्नाथमंगल – भक्तिकाव्य शैली में मंगल पद्य

प्रमुख मंगलकाव्य और उनकी कथावस्तु

बेहुला की मृत पति के साथ यात्रा: मनसामंगल काव्य 

1. मनसामंगल

  • रचनाकार: बहराम खान, कृष्णराम दास, रूपराम, कानाहरी दत्त

  • देवी: मनसा – सर्पों की देवी, जो बंगाल के सुंदरवन जैसे नाग-प्रभावित क्षेत्रों में पूजनीय हैं।

  • कथा:

    • शिवभक्त चांद सौदागर मनसा की पूजा नहीं करता।

    • मनसा उसके छह पुत्रों को मार डालती हैं, और अंतिम पुत्र लखिंदर को विवाह-रात्रि में नागदंश से मरवा देती हैं।

    • बेहुला, लखिंदर की पत्नी, अपने मृत पति को नाव में रखकर स्वर्ग तक की प्रतीकात्मक यात्रा करती है।

    • वह देवताओं को तप और भक्ति से प्रसन्न करती है और अपने पति को पुनर्जीवित करवा लेती है।

    • अंततः चांद सौदागर को मनसा की पूजा स्वीकारनी पड़ती है

2. चंडीमंगल

  • रचनाकार: मुकुंदराम चक्रवर्ती (धनपति की कथा), मुक्ताराम चक्रवर्ती (कालकेतु–फुल्लरा)

  • देवी: चंडी – शक्ति की लोकस्वरूप देवी

  • कथा:

    • धनपति व्यापारी की कथा में देवी की शहरी प्रतिष्ठा

    • कालकेतु और फुल्लरा की कथा में ग्रामीण जीवन, विपत्ति, और देवी की कृपा से पुनरुत्थान

मुख्य पात्र

  • कालकेतु: एक निर्धन, निर्धारित भाग्य वाला युवक, जिसे समाज ने त्यागा है।

  • फुल्लरा: एक सौम्य, भक्तिपरायण स्त्री जो कालकेतु की पत्नी बनती है।

  • देवी चंडी: शक्ति और कल्याण की अधिष्ठात्री, जो अपनी कृपा से अछूतों और दलितों को भी समाज में प्रतिष्ठा दिलाती हैं।

कथा सारांश

प्रारंभ: अपमान और त्याग

  • कालकेतु एक अत्यंत निर्धन और दलित जाति का युवक है, जिसे समाज हेय दृष्टि से देखता है।

  • वह देवी चंडी का भक्त है, परंतु मंदिरों में भी उसे प्रवेश नहीं मिलता।

  • फुल्लरा, एक ग्रामीण ब्राह्मणकुल की स्त्री, कालकेतु से विवाह करती है – यह विवाह जाति, वर्ग, और सामाजिक मर्यादाओं के विरोध में है।

संघर्ष और भक्ति

  • विवाह के पश्चात कालकेतु और फुल्लरा को समाज बहिष्कृत कर देता है।

  • वे वनवासियों के साथ रहते हैं, जीवन में अनेक कष्ट सहते हैं।

  • फुल्लरा निरंतर देवी चंडी की पूजा करती है और कालकेतु को धैर्य, धर्म और भक्ति का मार्ग दिखाती है।

कालकेतु- फुल्लरा को देवी चंडी के दर्शन: चंडीमंगल काव्य 

चमत्कार और पुनः प्रतिष्ठा

  • एक दिन देवी चंडी प्रकट होकर उन्हें वरदान देती हैं — वे कालकेतु को राजा बना देती हैं।

  • समाज चौंकता है, कालकेतु को राजा कालकेतु के रूप में स्वीकार करना पड़ता है।

  • फुल्लरा स्त्रीभक्ति, त्याग और श्रद्धा की प्रतीक बनती है।

कथा का सांस्कृतिक महत्व

पक्षविवेचन
सामाजिक स्तर         जातिवाद, अस्पृश्यता, और भेदभाव का विरोध
धार्मिक स्तर         स्त्रीभक्ति और चंडी देवी की कृपाशक्ति
नारी पक्ष         फुल्लरा का चरित्र नवमीराबिहुलासावित्री के समकक्ष
साहित्यिक शैली         ग्रामीण लोकसंवेदना, चमत्कारात्मक किंवदंती, भक्ति रस

निष्कर्ष

कालकेतु और फुल्लरा की कथा बंगाल की मंगलकाव्य परंपरा में वंचित वर्गों की आवाज़ है। यह कथा केवल चमत्कार नहीं, बल्कि यह बताती है कि सच्ची भक्ति, नारी-संवेदना, और देवी की कृपा के सामने जाति, वर्ग और संकीर्ण सामाजिक रेखाएँ तिरोहित हो जाती हैं

3. धर्ममंगल

  • रचनाकार: विजय गुप्त, काशीराम दास, रूपचंद्र

  • देवता: धर्म ठाकुर – ग्राम्य न्यायकर्ता देवता

  • कथा:

    • भवानंद, लहर, सुंदर जैसे पात्रों की कहानियों के माध्यम से धर्म ठाकुर न्याय और धर्म की रक्षा करते हैं।

4. षष्ठीमंगल

  • रचनाकार: अज्ञात

  • देवी: षष्ठी – गर्भ, प्रसव और शिशु रक्षा की देवी

  • कथा:

    • एक स्त्री षष्ठी की पूजा नहीं करती, जिससे उसका बच्चा संकट में आ जाता है।

    • पश्चाताप और भक्ति से देवी प्रसन्न होती हैं और संतान रक्षा करती हैं।

षष्ठीमंगल काव्य: पाणिनीय व्याकरण की लोकव्याख्या

पाणिनि सूत्र:

षष्ठी स्थानेयोगा (अष्टाध्यायी 2.3.50)

व्याख्या (कात्यायन, पतंजलि, भाष्यकार आदि द्वारा):
जहाँ अधिकरणअवस्थान, या सम्बन्ध का बोध हो, वहाँ षष्ठी विभक्ति का प्रयोग होता है।

विशेष रूप से सम्बन्ध के अर्थ में, जब कोई वस्तु किसी दूसरी वस्तु की होती है (जैसे: रामस्य पुस्तकं) — यहाँ राम और पुस्तक के बीच सम्बन्ध है — वहाँ षष्ठी लगती है।

"सम्बन्धे षष्ठी"

यह पाणिनि के सूत्र का एक व्याख्यात्मक संक्षेप है, जिसे कई संस्कृत शिक्षकों, भाष्यकारों और टीकाकारों ने स्मृति-वाक्य के रूप में प्रयोग किया है।

षष्ठीमंगल काव्य और सम्बन्ध का प्रतीकत्व

यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि संतान का जन्म स्त्री–पुरुष के सम्बन्ध से ही होता है, अर्थात् संतान का अस्तित्व सम्बन्ध पर आधारित है
षष्ठीमंगल काव्य में इसी सम्बन्ध को माता षष्ठी अथवा देवी षष्ठी के रूप में व्यंजनात्मक (symbolic) रूप में प्रस्तुत किया गया है।

इस प्रकार, इस नामकरण के पीछे एक गहन आध्यात्मिक और व्याकरणिक प्रतीकात्मकता छिपी हुई है, जो षष्ठी विभक्ति के मूलार्थ — सम्बन्धबोध — को साहित्य और लोकविश्वास में मूर्त रूप प्रदान करती है।

समन्वय की प्रक्रिया: जब शास्त्र लोक से झुकता है

  • पहले देवी पूजा न होने पर संकट लाती हैं

  • फिर भक्त पश्चाताप करता है, और सच्चे हृदय से पूजा करता है।

  • देवी प्रसन्न होती हैं और वरदान देती हैं

  • इस प्रक्रिया में लोकदेवियाँ वैदिक प्रणाली में सम्मिलित हो जाती हैं।

यह एक सांस्कृतिक-साहित्यिक प्रणाली है, जिसमें लोक की शक्ति को शास्त्र धीरे-धीरे आत्मसात करता है।

5. शीतलामंगल

  • रचनाकार: शंकर (कुछ संस्करणों में); अधिकांश में अज्ञात

  • देवी: शीतला – रोग निवारक देवी, विशेषकर चेचक की

  • कथा:

    • जो लोग पूजा नहीं करते, वे रोगों से ग्रस्त होते हैं।

    • पूजा से रोगनिवारण होता है।

6. अन्नदा मंगल

  • रचनाकार: रायगुणाकर भारतचंद्र

  • देवी: अन्नदा – दुर्गा का एक लोकस्वरूप

  • कथा:

    • एक राजा देवी की पूजा नहीं करता, जिससे राज्य पर संकट आता है।

    • अंततः पूजा और भक्ति से राज्य सुख-शांति प्राप्त करता है।

साहित्यिक प्रकृति और शैलीगत टिप्पणी

  • इन काव्यों में से कई मूल मौलिक रचनाएँ नहीं हैं।

  • ये मुख्यतः लोककथाओं, पूजा-विधियों, जनश्रुतियों और सामाजिक प्रथाओं का काव्यात्मक संकलन हैं।

  • लेखकों ने इन्हें साहित्यबद्ध कर ब्राह्मण परंपरा के समीप लाने का प्रयत्न किया ताकि ग्राम्य देवी-देवताओं को धार्मिक वैधता मिल सके।

ये काव्य लोक और शास्त्र के बीच सेतु हैं।

लोकदेवियाँ बनाम वैदिक देवता: संघर्ष और समन्वय

मुख्य संघर्ष: मनसा बनाम शिव

  • मनसा – ग्राम्य नागदेवी, जिन्हें वैदिक धर्म ने आरंभ में स्वीकार नहीं किया।

  • शिव – वैदिक और पुराणिक मुख्यधारा के देवता, जिनके भक्त मनसा की पूजा नहीं मानते।

  • कथा में यह संघर्ष बेहुला की भक्ति, साहस और तपस्या से समन्वय में परिवर्तित होता है।

 यह संघर्ष अन्य मंगलकाव्यों में भी है:

काव्य                   लोकदेवी          संघर्ष / स्वीकृति का रूप
मनसामंगल                   मनसा                     शिवभक्तों से टकराव; अंततः पूजा स्वीकार्य होती है।
चंडीमंगल                   चंडी                     लोक शक्ति को शास्त्र में स्थान
धर्ममंगल                  धर्म ठाकुर                     न्याय के प्रतीक लोकदेवता को धार्मिक स्वीकार्यता
षष्ठीमंगल                  षष्ठी                     मातृत्व शक्ति का लोक से धर्म में प्रवेश

भारत एक एकीकृत समन्वयवादी देश है और एक सांस्कृतिक इकाई है जहाँ विभिन्न परम्पराओं का समन्वय रहा है. आर्यावर्त की इस महान भूमि पर विभिन्न दर्शनों का उदय हुआ परन्तु धर्म का शास्वत तत्व सदा बना रहा. यहाँ विचारों, मान्यताओं का संघर्ष सशस्त्र या हिंसक नहीं अपितु शास्त्रार्थ, लोकविमर्श एवं वैचारिक आदान प्रदान रहा है. इसी पृष्ठभूमि में इन साहित्यों के लोकदेवताओं का संघर्ष और अंततः शास्त्रसम्मत सर्वजनग्रह्य मान्यता की प्राप्ति को देखना चाहिए. 

चैतन्यमंगल और जगन्नाथमंगल: शैली का विस्तार

  • चैतन्यमंगल – लोचनदास द्वारा रचित, श्री चैतन्य महाप्रभु की भक्ति कथा; मंगल पद्यशैली में।

  • जगन्नाथमंगल – विशंभर दास द्वारा; भगवान जगन्नाथ की महिमा।

🔸 ये दर्शाते हैं कि मंगलकाव्य शैली केवल ग्राम्य देवी कथाओं तक सीमित नहीं रही — इसका उपयोग भक्तिकाव्य में भी हुआ

तुलना: बेहुला–लखिंदर और सावित्री–सत्यवान

तत्व                                बेहुला–लखिंदर                           सावित्री–सत्यवान
क्षेत्र                                 सुंदरवन, बंगाल                            वन प्रदेश (महाभारत)
देवता से संघर्ष                 देवी मनसा                                   यमराज
स्त्री की भूमिका               मृत पति की रक्षा हेतु यात्रा             यम से तर्क द्वारा जीवनदान
समापन                          पति पुनर्जीवित, पूजा स्वीकृति       पति पुनर्जीवित, धर्म-विजय

उपसंहार: 

लोकदेवियों की साहित्य में प्रतिष्ठा की यात्रा

बंगाल का मंगलकाव्य साहित्य न केवल भक्ति का साहित्य है, बल्कि यह लोक चेतना की विजय गाथा है।
यह वह साहित्य है, जिसने लोक में उपजी आस्था को शास्त्र के विधान में प्रतिष्ठित किया।
बेहुला, मनसा, चंडी, षष्ठी, शीतला, अन्नदा — ये सब मात्र पात्र नहीं, सांस्कृतिक संकल्पनाएँ हैं, जिन्होंने धर्म, स्त्री, समाज और परंपरा के बीच सेतु का कार्य किया।

इन काव्यों ने लोक को वैदिक मंच पर प्रतिष्ठा दी — यही इनकी सबसे बड़ी साहित्यिक और सांस्कृतिक विजय है।

ग्रंथ-सूची (संदर्भ सूची)

व्याकरण और शास्त्रीय ग्रंथ

  1. पाणिनिअष्टाध्यायी, सम्पादक: श्रीराम शास्त्री, चौखम्बा संस्कृत सीरीज

  2. कात्यायनवर्तिक-सम्पुट, षष्ठी स्थानेयोगा पर टिप्पणी

  3. पतंजलिमहाभाष्य, भाग 2.3.50 पर टीका

मंगलकाव्य की मूल और लोकप्रिय कृतियाँ

  1. बहराम खान – मनसामंगल, सम्पादन: बंगीय साहित्य परिषद्, कोलकाता

  2. कृष्णराम दास – मनसामंगल (कृष्णराम संस्करण), प्रकाशक: विश्वभारती प्रकाशन

  3. मुकुंदराम चक्रवर्ती – चंडीमंगल (कविकंकण), सम्पादन: डॉ. अशोक मजूमदार

  4. मुक्ताराम चक्रवर्ती – चंडीमंगल (ग्रामीण संस्करण), शिल्पा पब्लिकेशन

  5. रायगुणाकर भारतचंद्र – अन्नदा मंगल, बंगीय ग्रंथ परिषद् संस्करण

शोध और आलोचना

  1. डॉ. सुकुमार सेन – बंगला साहित्य का इतिहास, भाग 1, नबान्न प्रकाशन

  2. डॉ. श्यामाचरण गांगुली – मंगलकाव्य: उत्पत्ति, शैली और समाज, कोलकाता विश्वविद्यालय

  3. डॉ. गीता भट्टाचार्य – देवी परंपरा और स्त्री विमर्श: मनसामंगल के सन्दर्भ में, शोधपत्र, कलकत्ता यूनिवर्सिटी

  4. Hitesranjan Sanyal – Social Mobility in Bengal, K.P. Bagchi & Co.

लोककथा, संस्कृति और समाजशास्त्रीय सन्दर्भ

  1. Dinesh Chandra Sen – The Folk Literature of Bengal, Indian Studies Series

  2. Sukumar Dutt – Religion and Society in Eastern India, Calcutta University Press

  3. John Boulton – Folk Deities of Bengal and Their Cults, Cambridge South Asian Series

Thanks, 

Jyoti Kothari 
(Jyoti Kothari, Proprietor, Vardhaman Gems, Jaipur, represents the Centuries Old Tradition of Excellence in Gems and Jewelry. He is an adviser at Vardhaman Infotech, a leading IT company in Jaipur. He is also an ISO 9000 professional.

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