Search

Loading

शुक्रवार, 28 फ़रवरी 2025

ऋषभाष्टकम् स्तोत्र अर्थ सहित


यह सर्वविदित तथ्य है की जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर श्री ऋषभदेव इस युग के आदिपुरुष थे जिन्होंने अपनी प्रज्ञा के वल पर जगत को असि, मसि, कृषि का ज्ञान दिया. उन्होंने संसार के जीवों को सर्वोत्तम पुरुषों की ७२ कलायें एवं   स्त्रियों की ६४ कलाओं का ज्ञान दिया. वे इस आर्यावर्त के प्रथम राजा, प्रथम श्रमण, प्रथम सर्वज्ञ  एवं प्रथम तीर्थंकर थे. जैन आगम कल्पसूत्र एवं जिनसेन, वर्धमान सूरी, हेमचंद्राचार्य, मानतुंग सूरी आदि महान आचार्यों ने उनकी महिमा का गान किया है. जैनेतर साहित्य एवं धर्मग्रंथों जैसे ऋग्वेद, यजुर्वेद, विभिन्न पुराणों, श्रीमद्भागवत, त्रिपिटक आदि में भी उनका उल्लेख मिलता है. 

प्रथम तीर्थंकर श्री ऋषभदेव,  शत्रुंजय तीर्थ  

ऋग्वेद एवं यजुर्वेद में स्थान स्थान पर उनका एवं उनकी उत्कृष्ट साधना का वर्णन मिलता है. इसी प्रकार की एक अद्भुत संस्कृत रचना है ऋषभाष्टकम्। जिस में ऋग्वेद के आधार पर श्री ऋषभदेव स्वामी की स्तुति की गई है. किन्ही महा प्रभाविक अज्ञात महर्षि की यह रचना आश्चर्य चकित करनेवाली है और प्राचीन भारतीय मनीषा की समन्वयात्मक भावना को प्रस्फुटित करती है. वेदों के विशेषकर ऋग्वेद के मन्त्रों को अंतर्गुम्फित कर जैन तीर्थंकर ऋषभदेव की स्तुति करना कोई साधारण काम नहीं है. यह कार्य कोई महा मनीषी ही कर सकते हैं. साथ ही यह भी गौर करने लायक है की उन्होंने इस स्तोत्र में अपना नाम भी नहीं दिया, कैसी निष्पृहता रही होगी?  

इस बात का आश्चर्य है की ऐसी अद्भुत सुन्दर कृति अभी तक अप्रकाशित एवं अप्रसिद्ध क्यों है? यह महाप्रभाविक स्तोत्र श्रद्धालुओं द्वारा नित्य पठन के योग्य है. 

रचनाशैली 

इस ऋषभाष्टक की रचना में मुख्य रूप से भारवि कवि की गम्भीर एवं गौरवमयी शैली का अनुसरण किया गया है। भारवि अपनी रचनाओं में गूढ़ अर्थ, शक्तिशाली पदविन्यास तथा कठोरता और सरलता का संतुलित समावेश करके यथार्थ को स्पष्ट रूप से प्रस्तुत करते हैं। विशेष रूप से ऋग्वेद, यजुर्वेद आदि के उद्धरणों में तथा पुरुषोत्तम, वातरशन, आर्हत जैसे विशेषणों में भारवि की गंभीरता दृष्टिगोचर होती है।

किन्तु, कुछ स्थलों परमाघ कवि की शब्द-चमत्कृति, कालिदास की मधुरता तथा दण्डिन की अलंकार प्रधान सौंदर्यपूर्ण शैली को भी समाहित किया गया है। 

यहाँ पर प्रस्तुत है ऋषभदेव की स्तुति रूप ऋषभाष्टकम् एवं उसका अर्थ. 


II अथ ऋषभाष्टकम् II  

१ ऋग्वेदवाचः सुकृतिप्रणामाः
यस्योत्तमं वेदविदः स्तुवन्ति।
अजोपनिष्ठं परमार्थगम्यं
तं ऋषभं पूण्डरीकं भजेऽहम्॥

(जिनकी महिमा ऋग्वेद में गाई गई है, ऐसे प्रथम तीर्थंकर पुरुषोत्तम श्री ऋषभदेव की मैं स्तुति करता हूँ।)

अर्थ: ऋग्वेद में जिनकी वंदना की गई है, वे पुण्यशील व्यक्तियों द्वारा पूजनीय हैं। उनके ज्ञान की गहराई इतनी है कि वे परम तत्व तक पहुँचने योग्य हैं। "अजोपनिष्ठं" अर्थात् जो समस्त प्राणियों के मार्गदर्शक हैं। वे पूर्ण विकसित कमल के समान निर्मल और दिव्य हैं।


२ आचर्षिणो यं जगतः समस्तं
कुशस्थलीमास्थितवांश्च योऽभूत्।
श्रुतिर्विनीतैः ऋषिभिः प्रसन्नैः
तं वातरसं प्रणमामि नित्यं॥

(जिन्होंने संपूर्ण जगत् को ज्ञान दिया और जिनकी महिमा वेदों में वर्णित है, ऐसे वातरसन श्री ऋषभदेव की मैं स्तुति करता हूँ।)

अर्थ: जिन्होंने समस्त संसार को आचरण का पथ दिखाया और स्वयं भी तपस्या में स्थित रहे। कुशस्थली (द्वारका) में उनका प्रभाव स्पष्ट रूप से प्रकट हुआ। जिनका वर्णन विनीत और सत्यशील ऋषियों ने किया है, ऐसे वातरसन  (अमृत स्वरूप) ऋषभदेव को मैं नमन करता हूँ।


३ सप्तार्चिषं यो रविवत् प्रकाशं
श्रुतिषु गीते रुचिरं विभाति।
ज्ञानप्रदीपं भवभीतिकर्त्रं
तं जिननाथं प्रणमाम्यहं सदा॥

(जो सूर्य के समान सात किरणों से प्रकाशित हैं, जो श्रुतियों में गाए गए हैं, और जो ज्ञान के दीप हैं, ऐसे जिननाथ श्री ऋषभदेव की मैं स्तुति करता हूँ।)

अर्थ: जिनकी आभा सूर्य के समान तेजस्वी है, वेदों में जिनकी स्तुति हुई है और जो अज्ञान रूपी अंधकार को नष्ट करने वाले दीपक के समान हैं। वे ही संसार की पीड़ा और भय को समाप्त करने वाले जिननाथ हैं।


४ यः सप्त सिन्धून् प्रवहन्न् दिशन्तं
ज्ञानामृतं लोकहिताय दत्तम्।
वेदादिभिः संस्तूयमानं
संस्तूयते तं पुरुषोत्तमं भजे॥

(जो ज्ञान की गंगा बहाकर लोक का कल्याण करते हैं और जो वेदादि ग्रंथों में स्तुत हैं, ऐसे पुरुषोत्तम श्री ऋषभदेव की मैं स्तुति करता हूँ।)

अर्थ: जिन्होंने सात पवित्र नदियों के समान ज्ञान का प्रवाह किया, लोककल्याण हेतु ज्ञानामृत प्रदान किया और जिनका वेदों तथा अन्य धार्मिक ग्रंथों में गुणगान किया गया है, ऐसे परम पुरुषोत्तम ऋषभदेव की मैं स्तुति करता हूँ।


५ अनादिपूर्वः परमः पवित्रः
शुद्धो जितारिः सततं विनीतः।
श्रुतिवचोभिः परिणीयमानं
तं पुरुषपुण्डरीकं नमामि॥

(जो अनादि, पवित्र, शुद्ध और जितेन्द्रिय हैं तथा जिनका गुणगान श्रुतिवचनों में किया गया है, ऐसे पुरुष पुण्डरीक श्री ऋषभदेव की मैं स्तुति करता हूँ।)

अर्थ: जिनका अस्तित्व अनादि है, जो सर्वदा पवित्र और शुद्ध हैं, जिन्होंने अपने समस्त विकारों पर विजय प्राप्त की है और जिनका उल्लेख श्रुति ग्रंथों में हुआ है, वे ही पुरुषों में श्रेष्ठ पुण्डरीक श्री ऋषभदेव हैं।


६ यः श्रुतिषु वर्णित आर्हतेशः
तपस्विनां पूज्यतमः सुपूज्यः।
सर्वज्ञता यस्य हि शाश्वती च
तं भगवन्तं प्रणमाम्यहं सदा॥

(जो श्रुतियों में वर्णित हैं, जो तपस्वियों के पूज्य हैं और जिनकी सर्वज्ञता शाश्वत है, ऐसे भगवंत श्री ऋषभदेव की मैं स्तुति करता हूँ।)

अर्थ: जो वेदों और श्रुतियों में सर्वज्ञ कहे गए हैं, जो तपस्वियों के लिए परम आदरणीय हैं और जिनकी सर्वज्ञता एवं दिव्यता शाश्वत है, उन ऋषभदेव को मैं सदा नमन करता हूँ।


७ यः सप्तशीर्षः चतुरश्रुगीतः
श्रुतिषु संकीर्तितपूर्वकाले।
वातरसनं जिननाथमाद्यं
तं ऋषभं प्राञ्जलिको भजामि॥

(जो सप्तशीर्ष एवं चतुरश्रु रूप में श्रुतियों में वर्णित हैं, ऐसे वातरसन, जिननाथ, आदि तीर्थंकर श्री ऋषभदेव की मैं स्तुति करता हूँ।)

अर्थ: जो सप्तशीर्ष और चतुरश्रु स्वरूप में वेदों में वर्णित हैं, जो तपस्वियों के लिए आदर्श हैं और जिनकी दिव्यता समस्त दिशाओं में व्याप्त है, ऐसे प्रथम जिननाथ को मैं श्रद्धा सहित भजता हूँ।


८ वेदादिभिः अनघैः स्तुतश्च
यो विश्वनाथः सुरमौक्तिकाभिः।
सत्यं यथार्थं च समं सदा यो
तं वृषभं प्रणमामि नित्यं॥

(जो वेदादि पवित्र ग्रंथों में स्तुत हैं, जो सत्य, यथार्थ एवं समता के प्रतीक हैं, ऐसे वृषभ श्री ऋषभदेव की मैं स्तुति करता हूँ।)

अर्थ: जो वेदों और अन्य पवित्र ग्रंथों में वर्णित हैं, जो सत्य, न्याय और समता के प्रतीक हैं, जो समस्त विश्व के नाथ हैं, उन वृषभदेव को मैं नित्य प्रणाम करता हूँ।

॥इति श्री ऋषभाष्टकं संपूर्णम्॥

ऋत, वृषभ और धर्मध्वनि: ऋग्वेद की ऋचा (70.74.22) का व्याख्यात्मक अध्ययन

ऋषभाष्टक का विस्तृत हिंदी अर्थ


प्रथम तीर्थंकर देवाधिदेव श्री ऋषभदेव स्वामी आदिनाथ की भक्तिपूर्ण स्तुति रूप ऋषभाष्टकम का ऋग्वेद के सन्दर्भ में विशिष्ट अर्थ 

१ ऋग्वेदवाचः सुकृतिप्रणामाः
यस्योत्तमं वेदविदः स्तुवन्ति।
अजोपनिष्ठं परमार्थगम्यं
तं ऋषभं पूण्डरीकं भजेऽहम्॥

अर्थ: ऋग्वेद (१०.१६८.४) में जिनकी स्तुति हुई है, वे पुण्यशीलों द्वारा वंदनीय हैं। "अजोपनिष्ठं" अर्थात् वे सृष्टि के आदि गुरु हैं, जिन्होंने धर्म का पथ प्रशस्त किया। कमलदल के समान उनके गुणों की महिमा निरंतर विकसित होती रहती है।

२ आचर्षिणो यं जगतः समस्तं
कुशस्थलीमास्थितवांश्च योऽभूत्।
श्रुतिर्विनीतैः ऋषिभिः प्रसन्नैः
तं वातरसं प्रणमामि नित्यं॥

अर्थ: ऋग्वेद (१.१६४.४६) में ऋत (सत्य) को जानने वाले को महान कहा गया है। ऋषभदेव ने इसी सत्य को प्रकट किया। कुशस्थली में उन्होंने तपस्या कर लोक को संयम का उपदेश दिया। वे वेदों में उल्लिखित अमृत समान ज्ञान के स्रोत हैं।

३ सप्तार्चिषं यो रविवत् प्रकाशं
श्रुतिषु गीते रुचिरं विभाति।
ज्ञानप्रदीपं भवभीतिकर्त्रं
तं जिननाथं प्रणमाम्यहं सदा॥

अर्थ: ऋग्वेद (३.५५.२२) में कहा गया है कि परम सत्य सूर्य के समान तेजस्वी है। ऋषभदेव का ज्ञान भी सूर्य के समान अज्ञान के अंधकार को नष्ट करता है। वे भव (संसार) भय 
से मुक्त करने वाले ज्ञान-ज्योति स्वरूप जिननाथ हैं।

४ यः सप्त सिन्धून् प्रवहन्न् दिशन्तं
ज्ञानामृतं लोकहिताय दत्तम्।
वेदादिभिः संस्तूयमानं
संस्तूयते तं पुरुषोत्तमं भजे॥

अर्थ: ऋग्वेद (१०.७५) में सप्त-सिन्धु (सात नदियों) की स्तुति की गई है, जो जीवनदायिनी हैं। उसी प्रकार ऋषभदेव ने लोक के हित में सात प्रकार के दिव्य ज्ञान प्रवाहित किए। उनके उपदेशों का गान वेदों में हुआ है।

५ अनादिपूर्वः परमः पवित्रः
शुद्धो जितारिः सततं विनीतः।
श्रुतिवचोभिः परिणीयमानं
तं पुरुषपुण्डरीकं नमामि॥

अर्थ: ऋग्वेद (४.५८.११) में कहा गया है कि सत्य अनादि और शुद्ध है। ऋषभदेव इसी सत्य के प्रतीक हैं। वे जितेन्द्रिय हैं और उनकी पवित्रता कमल के समान है।

६ यः श्रुतिषु वर्णित आर्हतेशः
तपस्विनां पूज्यतमः सुपूज्यः।
सर्वज्ञता यस्य हि शाश्वती च
तं भगवन्तं प्रणमाम्यहं सदा॥

अर्थ: ऋग्वेद (१.१६४.३९) में कहा गया है कि सत्य के मार्ग पर चलने वाले को ही मोक्ष मिलता है। ऋषभदेव इसी सत्य की मूर्ति हैं। वे तपस्वियों के आदर्श हैं, जो सर्वज्ञता से विभूषित हैं।

७ यः सप्तशीर्षः चतुरश्रुगीतः
श्रुतिषु संकीर्तितपूर्वकाले।
वातरसनं जिननाथमाद्यं
तं ऋषभं प्राञ्जलिको भजामि॥

अर्थ: ऋग्वेद (१०.९०) में पुरुषसूक्त के अंतर्गत सप्तशीर्ष पुरुष का वर्णन है, जो संपूर्ण ब्रह्मांड के नियंत्रक हैं। ऋषभदेव इसी सत्य के प्रणेता हैं। वे जिननाथ, वातरस (अमृत स्वरूप ज्ञान) के प्रवर्तक हैं।

८ वेदादिभिः अनघैः स्तुतश्च
यो विश्वनाथः सुरमौक्तिकाभिः।
सत्यं यथार्थं च समं सदा यो
तं वृषभं प्रणमामि नित्यं॥

अर्थ: ऋग्वेद (१०.१९०) में कहा गया है कि सत्य, यथार्थ और समभाव ही परम तत्व हैं। ऋषभदेव इन गुणों के प्रतीक हैं। वे विश्वनाथ हैं, जिनका गुणगान ऋषियों और देवों ने किया है।

॥इति श्री ऋषभाष्टकस्य विशिष्ट हिंदी अर्थः संपूर्णः॥



"ऋषभाष्टकम्" का विस्तृत अन्वय, पदपाठ, शब्दार्थ और भावार्थ

1. श्लोक

ऋग्वेदवाचः सुकृतिप्रणामाः यस्य उत्तमं वेदविदः स्तुवन्ति। अजोपनिष्ठं परमार्थगम्यं तं ऋषभं पूण्डरीकं भजेऽहम्॥

पदपाठ:

ऋग्वेद-वाचः | सुकृति-प्रणामाः | यस्य | उत्तमं | वेद-विदः | स्तुवन्ति | अज-उपनिष्ठं | परमार्थ-गम्यं | तं | ऋषभं | पूण्डरीकं | भजे | अहम्॥

शब्दार्थ:

  • ऋग्वेदवाचः - ऋग्वेद की वाणी (ऋचाएँ)

  • सुकृतिप्रणामाः - पुण्यात्माओं के प्रणाम

  • यस्य - जिसके

  • उत्तमं - सर्वोत्तम

  • वेदविदः - वेदज्ञ पुरुष

  • स्तुवन्ति - स्तुति करते हैं

  • अजोपनिष्ठं - अज (अजन्मा, वृषभ) में उपनिष्ट (स्थापित) जो है

  • परमार्थगम्यं - परमार्थ (मोक्ष) को उपलब्ध कराने वाला

  • ऋषभं - ऋषभदेव को

  • पूण्डरीकं - कमलवत् निर्मल (या कमलरूपी)

  • भजे - मैं भजता हूँ

  • अहम् - मैं

अन्वय:

अहं तं ऋषभं पूण्डरीकं भजे, यस्य ऋग्वेदवाचः सुकृतिप्रणामाः च उत्तमं वेदविदः स्तुवन्ति, यः अजोपनिष्ठं परमार्थगम्यं च अस्ति।

भावार्थ:

मैं उस कमलवत् निर्मल भगवान् ऋषभदेव की भक्ति करता हूँ, जिनकी स्तुति वेदज्ञ श्रेष्ठ पुरुष करते हैं, जिनके चरणों में पुण्यात्माएँ प्रणाम करते हैं, जो अज (वृषभ या अजन्मा) में स्थित हैं और जो परमार्थ (मोक्ष) को देने वाले हैं।


2. श्लोक

आचर्षिणो यं जगतः समस्तं कुशस्थलीमास्थितवांश्च योऽभूत्। श्रुतिर्विनीतैः ऋषिभिः प्रसन्नैः तं वातरसं प्रणमामि नित्यं॥

पदपाठ:

आचर्षिणः | यं | जगतः | समस्तं | कुशस्थलीम् | आस्थितवान् | च | यः | अभूत् | श्रुतिः | विनीतैः | ऋषिभिः | प्रसन्नैः | तं | वातरसं | प्रणमामि | नित्यं॥

शब्दार्थ:

  • आचर्षिणः - जिनका आचरण (पालन) करने वाले (शिष्यगण)

  • जगतः समस्तं - सम्पूर्ण जगत्

  • कुशस्थलीम् - पावन भूमि (कुश से युक्त क्षेत्र, संभवतः अयोध्या)

  • आस्थितवान् - निवास किया

  • श्रुतिः - वेद

  • विनीतैः ऋषिभिः - विनीत (नम्र) ऋषियों द्वारा

  • प्रसन्नैः - प्रसन्नचित्त से

  • वातरसं - वातरसं (भगवान ऋषभ का एक नाम)

  • प्रणमामि - मैं प्रणाम करता हूँ

  • नित्यं - सदा

अन्वय:

अहं तं वातरसं नित्यं प्रणमामि, यं आचर्षिणः जगतः समस्तं च आचरन्ति, यः कुशस्थलीम् आस्थितवान्, यं श्रुतिः विनीतैः ऋषिभिः प्रसन्नैः च वंद्यते।

भावार्थ:

मैं उन भगवान वातरसं (ऋषभदेव) को सदा प्रणाम करता हूँ, जिनका आचरण सम्पूर्ण जगत् करता है, जिन्होंने पुण्यभूमि कुशस्थली में निवास किया और जिनकी स्तुति विनीत व प्रसन्न ऋषियों द्वारा वेद में की गई है।


3. श्लोक

सप्तार्चिषं यो रविवत् प्रकाशं श्रुतिषु गीते रुचिरं विभाति। ज्ञानप्रदीपं भवभीतिकर्त्रं तं जिननाथं प्रणमाम्यहं सदा॥

पदपाठ:

सप्त-अर्चिषं | यः | रविवत् | प्रकाशं | श्रुतिषु | गीते | रुचिरं | विभाति | ज्ञान-प्रदीपं | भव-भीति-कर्त्रं | तं | जिननाथं | प्रणमामि | अहं | सदा॥

शब्दार्थ:

  • सप्तार्चिषं - सात प्रकार की किरणों वाला (सूर्य की तरह)

  • रविवत् - सूर्य के समान

  • प्रकाशं - प्रकाशमान

  • श्रुतिषु - वेदों में

  • गीते - गाया हुआ

  • रुचिरं - सुंदर

  • विभाति - प्रकाशित होता है

  • ज्ञानप्रदीपं - ज्ञान का दीपक

  • भवभीतिकर्त्रं - संसार भय को हरने वाला

  • जिन्नाथं - जिननाथ (विजेता भगवान)

  • प्रणमामि - मैं प्रणाम करता हूँ

  • सदा - सदा

अन्वय:

अहं सदा तं जिननाथं प्रणमामि, यः सप्तार्चिषं रविवत् प्रकाशं रुचिरं श्रुतिषु गीते विभाति, यः ज्ञानप्रदीपं भवभीतिकर्त्रं च अस्ति।

भावार्थ:

मैं उन जिननाथ भगवान को सदा प्रणाम करता हूँ, जो सात प्रकार की किरणों से सूर्य के समान प्रकाशित हैं, जिनका वर्णन वेदों में हुआ है, जो सुंदरता से विभूषित हैं, जो ज्ञान के दीपक हैं और संसार रूपी भय का नाश करते हैं।


4. श्लोक

यः सप्त सिन्धून् प्रवहन्न् दिशन्तं
ज्ञानामृतं लोकहिताय दत्तम्।
वेदादिभिः संस्तूयमानं
संस्तूयते तं पुरुषोत्तमं भजे॥

पदपाठ:

यः | सप्त | सिन्धून् | प्रवहन् | दिशन्तं | ज्ञान-अमृतं | लोक-हिताय | दत्तम् | वेद-आदिभिः | संस्तूयमानं | संस्तूयते | तं | पुरुष-उत्तमं | भजे॥

शब्दार्थ:

  • सप्त सिन्धून् - सात नदियाँ (ज्ञानरूपी सात धाराएँ)

  • प्रवहन् - प्रवाहित करने वाला

  • दिशन्तं - दिशाओं में फैलाने वाला

  • ज्ञानामृतं - अमृत स्वरूप ज्ञान

  • लोकहिताय - लोक कल्याण के लिए

  • दत्तम् - दिया हुआ

  • वेदादिभिः - वेद आदि ग्रंथों द्वारा

  • संस्तूयमानं - जिसकी स्तुति की जाती है

  • पुरुषोत्तमं - श्रेष्ठ पुरुष

  • भजे - मैं भजता हूँ

अन्वय:

अहं तं पुरुषोत्तमं भजे, यः सप्त सिन्धून् प्रवहन् दिशन्तं ज्ञानामृतं लोकहिताय दत्तं, वेदादिभिः संस्तूयमानं संस्तूयते।

भावार्थ:

मैं उस पुरुषोत्तम भगवान ऋषभदेव का भजन करता हूँ, जिन्होंने सात ज्ञान-नदियों के रूप में अमृतमय ज्ञान प्रवाहित कर समस्त दिशाओं में फैलाया, जो लोकहित के लिए दिया गया, और जिनकी वेदादि ग्रंथों में स्तुति की गई है।


5. श्लोक

अनादिपूर्वः परमः पवित्रः
शुद्धो जितारिः सततं विनीतः।
श्रुतिवचोभिः परिणीयमानं
तं पुरुषपुण्डरीकं नमामि॥

पदपाठ:

अनादि-पूर्वः | परमः | पवित्रः | शुद्धः | जित-arih | सततं | विनीतः | श्रुति-वचोभिः | परिणीयमानं | तं | पुरुष-पुण्डरीकं | नमामि॥

शब्दार्थ:

  • अनादिपूर्वः - जिसका कोई आदि नहीं, अनादि

  • परमः - सर्वोच्च

  • पवित्रः - अत्यन्त पवित्र

  • शुद्धः - निर्मल

  • जितारिः - शत्रुओं पर विजय पाने वाला

  • सततं विनीतः - सदा विनम्र

  • श्रुतिवचोभिः परिणीयमानं - वेदवाक्यों द्वारा वर्णित

  • पुरुषपुण्डरीकं - पुरुषों में कमल के समान श्रेष्ठ

  • नमामि - मैं नमन करता हूँ

अन्वय:

अहं तं पुरुषपुण्डरीकं नमामि, यः अनादिपूर्वः परमः पवित्रः शुद्धः जितारिः सततं विनीतः च, यः श्रुतिवचोभिः परिणीयमानं अस्ति।

भावार्थ:

मैं उस पुरुषपुण्डरीक भगवान ऋषभदेव को नमस्कार करता हूँ, जो अनादि, परम पवित्र, शुद्ध, शत्रुजयी, सदा विनम्र हैं और जिनका वेदवाक्यों में विस्तार से वर्णन किया गया है।


6. श्लोक

यः श्रुतिषु वर्णित आर्हतेशः
तपस्विनां पूज्यतमः सुपूज्यः।
सर्वज्ञता यस्य हि शाश्वती च
तं भगवन्तं प्रणमाम्यहं सदा॥

पदपाठ:

यः | श्रुतिषु | वर्णितः | आर्हत-ईशः | तपस्विनां | पूज्यतमः | सुपूज्यः | सर्वज्ञता | यस्य | हि | शाश्वती | च | तं | भगवन्तं | प्रणमामि | अहं | सदा॥

शब्दार्थ:

  • श्रुतिषु वर्णितः - वेदों में वर्णित

  • आर्हतेशः - आर्हतों के ईश्वर, जिनेन्द्र

  • तपस्विनां पूज्यतमः - तपस्वियों में अत्यन्त पूज्य

  • सुपूज्यः - श्रेष्ठ पूज्य

  • सर्वज्ञता - सम्पूर्ण ज्ञान

  • शाश्वती - शाश्वत (सनातन)

  • भगवन्तं - भगवान को

  • प्रणमामि - प्रणाम करता हूँ

  • सदा - सदा

अन्वय:

अहं सदा तं भगवन्तं प्रणमामि, यः श्रुतिषु वर्णित आर्हतेशः, यः तपस्विनां पूज्यतमः सुपूज्यः च, यस्य सर्वज्ञता शाश्वती अस्ति।

भावार्थ:

मैं उस भगवान ऋषभदेव को सदा प्रणाम करता हूँ, जो वेदों में वर्णित आर्हतों के ईश्वर हैं, तपस्वियों में अत्यन्त पूज्य हैं और जिनकी सर्वज्ञता शाश्वत है।


7. श्लोक

यः सप्तशीर्षः चतुरश्रुगीतः
श्रुतिषु संकीर्तितपूर्वकाले।
वातरसनं जिननाथमाद्यं
तं ऋषभं प्राञ्जलिको भजामि॥

पदपाठ:

यः | सप्त-शीर्षः | चतुर-श्रु-गीतः | श्रुतिषु | संकीर्तितः | पूर्व-काले | वात-रसं | जिन-नाथं | आद्यं | तं | ऋषभं | प्राञ्जलिकः | भजामि॥

शब्दार्थ:

  • सप्तशीर्षः - सात शिखर वाला (प्रतीक रूप में महानता का बोधक)

  • चतुरश्रुगीतः - चारों दिशाओं में जिसकी कीर्ति गाई जाती है

  • श्रुतिषु संकीर्तितः - वेदों में जिनका संकीर्तन हुआ है

  • पूर्वकाले - प्राचीन काल में

  • वातरसं - वातरसं (ऋषभदेव का नाम)

  • जिन्नाथमाद्यं - जिननाथों में आदि, प्रथम

  • प्राञ्जलिकः - हाथ जोड़कर

  • भजामि - मैं भजता हूँ

अन्वय:

अहं प्राञ्जलिकः तं ऋषभं भजामि, यः सप्तशीर्षः चतुरश्रुगीतः च, यः श्रुतिषु पूर्वकाले संकीर्तितः, यः वातरसं जिननाथमाद्यं अस्ति।

भावार्थ:

मैं हाथ जोड़कर उस ऋषभदेव भगवान का भजन करता हूँ, जो सात शिखरों वाले हैं, चारों दिशाओं में जिनकी कीर्ति गाई जाती है, जो वेदों में प्राचीन काल से संकीर्तित हैं और जो जिननाथों में प्रथम हैं।


8. श्लोक

वेदादिभिः अनघैः स्तुतश्च
यो विश्वनाथः सुरमौक्तिकाभिः।
सत्यं यथार्थं च समं सदा यो
तं वृषभं प्रणमामि नित्यं॥

पदपाठ:

वेद-आदिभिः | अनघैः | स्तुतः | च | यः | विश्व-नाथः | सुर-मौक्तिकाभिः | सत्यं | यथार्थं | च | समं | सदा | यः | तं | वृषभं | प्रणमामि | नित्यं॥

शब्दार्थ:

  • वेदादिभिः अनघैः - वेदादि निर्दोष ग्रंथों द्वारा

  • स्तुतः - स्तुति किया गया

  • विश्वनाथः - सम्पूर्ण विश्व के स्वामी

  • सुरमौक्तिकाभिः - देवमणियों (देवों द्वारा)

  • सत्यं यथार्थं च समं - सत्य, यथार्थ और समभाव युक्त

  • वृषभं - वृषभ (ऋषभदेव)

  • प्रणमामि नित्यं - मैं सदा प्रणाम करता हूँ

अन्वय:

अहं नित्यं तं वृषभं प्रणमामि, यः वेदादिभिः अनघैः स्तुतः, यः विश्वनाथः सुरमौक्तिकाभिः पूज्यः, यः सत्यं यथार्थं च समं सदा अस्ति।

भावार्थ:

मैं उस वृषभ (ऋषभदेव) को सदा प्रणाम करता हूँ, जिनकी वेदादि निर्दोष ग्रंथों में स्तुति की गई है, जो सम्पूर्ण विश्व के स्वामी हैं, देवों द्वारा मणिरत्नों के समान पूजित हैं और जो सदा सत्य, यथार्थ और समभाव युक्त हैं।


समापन भावार्थ:

"ऋषभाष्टकम्" भगवान ऋषभदेव की महानता, उनकी वेदसम्मत वंदना और उनकी दिव्यता का स्तुतिगान है। यह स्तोत्र ऋषभदेव को आदि तीर्थंकर, ज्ञान और सत्य के स्रोत तथा लोकहितकारी के रूप में प्रस्तुत करता है। उनके गुणों का स्मरण और वंदन आत्मकल्याण और मोक्षमार्ग का सशक्त साधन है।


Thanks, 
Jyoti Kothari 
 (Jyoti Kothari, Proprietor, Vardhaman Gems, Jaipur represents Centuries Old Tradition of Excellence in Gems and Jewelry. He is an adviser, to Vardhaman Infotech, a leading IT company in Jaipur. He is also an ISO 9000 professional)

allvoices

गुरुवार, 27 फ़रवरी 2025

Hindu Spiritual and Service Foundation: Reviving India’s Cultural and Charitable Legacy


The Hindu Spiritual and Service Foundation (HSSF) is a voluntary organization dedicated to showcasing the service activities of Hindu spiritual institutions. Its mission is to correct misconceptions about Hindu spirituality by emphasizing these organizations' extensive charitable and societal contributions. By doing so, HSSF aims to build a proper image of India that reflects its rich spiritual and cultural heritage while fostering national development on the global stage.

The Hindu Spiritual and Service Foundation (HSSF) was established to counteract misconceptions about Hindu spirituality, particularly in response to derogatory remarks made by influential figures like Bill Gates. 

Swaminathan Gurumurthy, a prominent chartered accountant and journalist, took notice of such remarks and initiated efforts to highlight the extensive charitable and societal contributions of Hindu spiritual organizations. Through platforms like HSSF, Gurumurthy aimed to correct these misconceptions by showcasing the service activities of these institutions, thereby compelling international media to acknowledge and rectify their narratives about Hindu spirituality and services.

HSSF organizes fairs across various Indian cities, focusing on environmental conservation, family values, women's honor, and patriotism. These events serve as platforms for numerous spiritual and community service organizations to exhibit their contributions to society, fostering a harmonious and progressive community.

Through these initiatives, HSSF strives to demonstrate that Hindu spirituality is deeply connected to addressing contemporary societal challenges, reshaping global perceptions and promoting a more accurate understanding of India's spiritual and cultural heritage.

The Mission and Themes of HSSF

The Hindu Spiritual and Service Fairs are at the core of HSSF’s initiatives, which serve as a platform for various organizations to exhibit their service activities. These fairs are designed around six key themes that focus on social responsibility and ethical living:

  1. Conservation of Forests – Promoting afforestation and sustainable environmental practices.

  2. Preservation of Ecology – Encouraging eco-friendly practices to maintain ecological balance.

  3. Sustaining the Environment – Advocating for environmental protection and sustainability.

  4. Inculcation of Family and Human Values – Strengthening ethical and family structures for a healthier society.

  5. Fostering Women’s Honor – Highlighting the respect, dignity, and empowerment of women.

  6. Instilling Patriotism – Nurturing national pride and responsibility among citizens.

These themes are integrated into various activities and exhibits at the fairs, helping educate the public and create awareness about their significance in building a progressive society.

Recent Hindu Spiritual and Service Fairs

HSSF has been actively organizing fairs across multiple Indian cities, bringing together numerous spiritual and social organizations. These events highlight the intersection of spirituality and service in contemporary society.

1. Jaipur Fair (September 2024)

Held at Dashera Maidan, Adarsh Nagar, this fair focused on ecological preservation, environmental sustainability, family values, women’s honor, and patriotism. The event saw participation from a vast number of spiritual institutions showcasing their contributions to society.

2. Hyderabad Fair (November 2024)

The event at the Hyderabad Exhibition Grounds showcased over 120 spiritual and community service organizations. It was inaugurated by Sri Tridandi Srimannarayana Ramanuja Chinna Jeeyar Swami and included unique programs such as Param Veer Vandanam, honoring military heroes.

3. Indore Fair (December 2024)

The fair, held at Lal Bagh, Indore, featured exhibitions by various spiritual organizations, including a book exhibition by Sanatan Sanstha, which aimed to disseminate spiritual knowledge and cultural values.

4. Pune Fair (December 2024)

The Pune fair, held from December 19 to 22, provided a platform for numerous social organizations to display their service initiatives. Sanatan Sanstha participated in a book exhibition to educate attendees about spirituality and social service.

5. Ahmedabad Fair (January 2025)

Scheduled at Gujarat University Ground, the fair saw the participation of over 250 organizations. Highlights included the ‘11 Kund Samrasata Yagyashala,’ replicas of major temples, and cultural performances.

6. Mumbai Fair (January 2025)

Taking place at Maharani Ahilyadevi Holkar Maidan, Goregaon, this fair featured over 400 Hindu spiritual organizations. It included exhibitions, cultural programs, and discussions on environmental and social issues.

Leadership of HSSF

HSSF was founded by Swaminathan Gurumurthy, a renowned economist, journalist, and commentator on economic and political affairs. Gunwant Singh Kothari, a senior RSS Pracharak and National Convener of HSSF, currently heads the organization. Both leaders have played a vital role in shaping the foundation’s mission and expanding its reach.

Notable Contributions  

Swaminathan Gurumurthy

Born in 1949 in Tamil Nadu, Gurumurthy gained national prominence in the 1980s through his investigative journalism, exposing corporate malpractices and corruption. His role in revealing unethical business practices, including cases related to Reliance Industries and the Bofors arms deal, cemented his reputation as a fearless journalist. Beyond journalism, he is also:

  • A co-convener of the Swadeshi Jagaran Manch, promoting economic self-reliance.

  • The editor of the Tamil political weekly Thuglak.

  • A part-time director on the Reserve Bank of India (RBI) Central Board since 2018.

  • Chairman of the Vivekananda International Foundation, focusing on national policy research.

Gunwant Singh Kothari

As a senior RSS Pracharak, Gunwant Singh Kothari has played a crucial role in fostering cultural and ethical awareness. He leads the Initiative for Moral and Cultural Training Foundation (IMCTF) and HSSF, spearheading initiatives to promote interfaith harmony and social service among Hindu, Buddhist, Jain, and Sikh communities. His contributions include:

  • Organizing the Golden Jubilee celebrations of Vanvasi Kalyan Ashram, an RSS-backed tribal welfare organization, where representatives from 250 tribes across 27 states participated.

  • Leading nationwide service fairs that bring spiritual organizations together to collaborate on social initiatives.

The Impact of HSSF and Its Fairs

HSSF’s fairs have played a crucial role in shaping a positive perception of Hindu spirituality. Through these fairs, spiritual and social organizations have been able to demonstrate their contributions to national development, foster unity, and instill a sense of social responsibility among attendees.

By aligning Hindu spiritual values with pressing societal challenges, HSSF continues to strengthen India’s social fabric, promoting a balance between tradition and modern service-oriented approaches. The fairs act as a beacon of cultural revival, ensuring that Hindu spiritual traditions are recognized for their significant role in shaping a progressive and inclusive society.

Indian New Year Celebration

HSS Foundation enthusiastically observes the Indian New Year, Vikram Samvat, to promote Indian culture among the people. This year, the foundation is all set to observe New Year's Day of Vikram Samvat 2082 on March 30, 2025. 

Conclusion

HSSF stands as a testament to the symbiotic relationship between spirituality and social service. Through its ongoing initiatives and fairs, it reaffirms Hindu spirituality’s deep commitment to national progress and ethical integrity. As the foundation continues to expand its reach, it is poised to play an even greater role in shaping India’s spiritual and social landscape in the years to come.

Thanks, 
Jyoti Kothari 
(Jyoti Kothari, Proprietor, Vardhaman Gems, Jaipur represents Centuries Old Tradition of Excellence in Gems and Jewelry. He is an adviser, to Vardhaman Infotech, a leading IT company in Jaipur. He is also an ISO 9000 professional)

allvoices

बुधवार, 26 फ़रवरी 2025

जैन कालगणना: ब्रह्मांडीय समय की रहस्यमयी संरचना भाग 2


इस लेख के पूर्वभाग में 'समय' से लेकर 'शीर्षप्रहेलिका' तक के काल का वर्णन किया गया है. यह सभी काल गणना संख्यात काल की दृष्टि से किया जाता है. परन्तु जैन दर्शन संख्यात काल से आगे जाकर असंख्यात एवं अनंत काल की भी व्याख्या करता है. असंख्यात एवं अनंत काल की कल्पना करना भी कठिन है परन्तु इसकी समुचित व्याख्या जैन आगमों में उपलब्ध है. लेख के इस भाग में हम  असंख्यात एवं अनंत काल को जैन दर्शन की दृष्टि से समझने का प्रयत्न करेंगे. 

असंख्यात काल की गणना - पल्योपम और सागरोपम

  • असंख्यात काल के दो प्रकार होते हैं:

    1. पल्योपम (Palyaopam)
    2. सागरोपम (Sagaropam)
  • जैन शास्त्रों में दोनों के छह-छह प्रकार बताए गए हैं:

पल्योपम को दर्शाता काल्पनिक चित्र 

(क) पल्योपम के प्रकार
  1. बादर उद्धार पल्योपम
  2. सूक्ष्म उद्धार पल्योपम
  3. बादर अद्वा पल्योपम
  4. सूक्ष्म अद्वा पल्योपम
  5. बादर क्षेत्र पल्योपम
  6. सूक्ष्म क्षेत्र पल्योपम

(ख) सागरोपम के प्रकार

  1. बादर उद्धार सागरोपम
  2. सूक्ष्म उद्धार सागरोपम
  3. बादर अद्वा सागरोपम
  4. सूक्ष्म अद्वा सागरोपम
  5. बादर क्षेत्र सागरोपम
  6. सूक्ष्म क्षेत्र सागरोपम

1. पल्योपम – असंख्यात समय की गणना

  • पल्योपम (Palyaopam) समय मापन की एक विशाल इकाई है। काल की कुछ गणनाओं को अंकों में नहीं बताया जा सकता. वह इतना विशाल होता है की पूर्व में वर्णित शीर्ष प्रहेलिका जैसी विशाल संख्या भी उसके आगे बहुत छोटी हो जाती है. इसलिए जैन आगमों में इसे उपमा के माध्यम से समझाया गया है. पालय का अर्थ गड्ढा होता है और गड्ढे की उपमा से समझाने के कारण इसे पल्योपम कहा जाता है. 
    • यदि हम 1 योजन लंबा, 1 योजन चौड़ा और 1 योजन गहरा एक गोलाकार गड्ढा बनायें. 
    • इस गड्ढे को देवकुरु या उत्तरकुरु के मानवों के मस्तक के मुंडन के बाद गिरे हुए बालों से भर दें
    • इन बालों को 7 बार, हर बार 8-8 टुकड़ों में काट दिया जाए और फिर इस गड्ढे को पूरी तरह भर दिया जाए।
    • यदि क्षण के अंतराल से 1-1 बाल का टुकड़ा बाहर निकाला जाए, तो जिस समय में पूरा कटोरा खाली होगा, उसे "बादर उद्धार पल्योपम" कहा जाता है
    • यह संख्यात समय की श्रेणी में आता है और इसका कोई विशेष उपयोग नहीं होता
    • इसका प्रयोग सूक्ष्म उद्धार पल्योपम को समझाने के लिए किया जाता है।

2. सूक्ष्म उद्धार पल्योपम

  • पहले वर्णित बड़े बालों के टुकड़ों को और भी सूक्ष्म टुकड़ों में विभाजित कर दिया जाए।
  • यदि प्रत्येक समय एक-एक सूक्ष्म टुकड़ा बाहर निकाला जाए, और जब तक कटोरा पूरी तरह खाली न हो जाए, उस समय को "सूक्ष्म उद्धार पल्योपम" कहा जाता है।
  • यह सूक्ष्म उद्धार पल्योपम असंख्यात समय की श्रेणी में आता है
  • 25 कोडाकोडी पल्योपम (2.5 सागरोपम के बराबर) समय में त्रिलोक में जितने द्वीप-समुद्र होते हैं, उनकी संख्याएँ इसमें समाहित होती हैं
  • संक्षेप में, सूक्ष्म उद्धार पल्योपम का उपयोग द्वीप-समुद्रों की गणना के लिए किया जाता है

3. बादर अद्वा पल्योपम

  • बादर उद्धार पल्योपम में जो बालों के टुकड़े थे, उन्हें हर 100 वर्षों में एक-एक बाहर निकाला जाए
  • जिस समय में कटोरा पूरी तरह खाली हो जाएगा, उसे "बादर अद्वा पल्योपम" कहा जाता है
  • इसमें भी संख्यात वर्षों की गणना होती है
  • इसका भी कोई विशेष उपयोग नहीं होता
  • इसे सूक्ष्म अद्वा पल्योपम को समझाने के लिए बताया गया है।

4. सूक्ष्म अद्वा पल्योपम

  • यदि पहले बताए गए सूक्ष्म उद्धार पल्योपम के बालों के अत्यंत सूक्ष्मतम कणों को भी 100 वर्षों में 1-1 बाहर निकाला जाए,

  • और जब तक पूरा कटोरा खाली न हो जाए, उस समय को "सूक्ष्म अद्वा पल्योपम" कहा जाता है।

  • इसका उपयोग निम्नलिखित गणनाओं के लिए किया जाता है:

    1. उत्सर्पिणी और अवसर्पिणी काल
    2. जीवों की आयु गणना
    3. कर्मों की स्थिति का निर्धारण
  • सूक्ष्म अद्वा पल्योपम की गणना और उसका महत्व

    इस प्रकार, सूक्ष्म अद्वा पल्योपम का प्रयोग व्यावहारिक रूप से किया जाता है

  •  छह प्रकार के पल्योपम में से चौथे प्रकार "सूक्ष्म अद्वा पल्योपम" असंख्यात  काल की इकाई के रूप में उपयोग किया जाता है

5. बादर क्षेत्र पल्योपम

  • पल्योपम की पहली परिभाषा में वर्णित बालों के कणों को अंदर और बाहर के आकाश क्षेत्र से स्पर्श करने वाले कणों के रूप में विभाजित किया जाए
  • यदि हर समय 1-1 कण बाहर निकाला जाए,
  • और जिस समय तक कटोरा पूरी तरह खाली हो जाए, उसे "बादर क्षेत्र पल्योपम" कहा जाता है
  • इसमें असंख्यात समय चक्र गुजर जाते हैं
  • इसका भी कोई व्यावहारिक उपयोग नहीं होता

6. सूक्ष्म क्षेत्र पल्योपम

  • पल्योपम की दूसरी परिभाषा में वर्णित अत्यंत सूक्ष्मतम बालों के कणों को

  • यदि हर समय 1-1 बाहर निकाला जाए,

  • और जब तक पूरा कटोरा खाली न हो जाए,

  • उस समय को "सूक्ष्म क्षेत्र पल्योपम" कहा जाता है

  • सूक्ष्म क्षेत्र पल्योपम का समय, बादर क्षेत्र पल्योपम की तुलना में "असंख्यात" गुणा अधिक होता है

  • इसका भी कोई व्यावहारिक उपयोग नहीं होता

1. सागरोपम 

पल्य (गड्ढा) के स्थान पर सागर की उपमासे सागरोपम को समझाया गया है.  10 कोडाकोड़ी अर्थात करोड़ को करोड़ से गुना करने पर प्राप्त संख्या) (कोटि-कोटि) पल्योपम के बराबर 1 सागरोपम होता है। 10 कोड़ाकोड़ी आधुनिक गणना के अनुसार 1000 ट्रिलियन होता है. 

कालचक्र का काल्पनिक कलात्मक चित्रण 

2. कालचक्र 

जैन आगमों के अनुसार एक कालचक्र के दो अंग होते हैं. 1. उत्सर्पिणी 2. अवसर्पिणी। उत्सर्पिणी काल में सुख-समृद्धि बढ़ती हुई एवं अवसर्पिणी काल में घटती हुई होती है. काल चक्र के इन दोनों अंगों को पुनः 6 - 6 भागों में बांटा गया है, जिन्हे आरा कहा जाता है. 

उत्सर्पिणी और अवसर्पिणी  

6 आरे एवं उनका काल प्रमाण 

पहला सुखमा सुखमा आरा 4 कोड़ाकोड़ी सागरोपम, दूसरा सुखमा 3 कोड़ाकोड़ी सागरोपम, तीसरा सुखमा दुखमा 2 कोड़ाकोड़ी सागरोपम, चौथा दुखमा सुखमा 42 हज़ार वर्ष कम 1 कोड़ाकोड़ी सागरोपम, पांचवां दुखमा 21 हज़ार वर्ष, छठा दुखमा दुखमा 21 हज़ार वर्ष का होता है. यह अवसर्पिणी काल की अपेक्षा से है, उत्सर्पिणी काल में यह क्रम उल्टा होता है अर्थात दुखमा दुखमा से प्रारम्भ हो कर सुखमा सुखमा में अंत होता है. यह कालचक्र अविराम गति से अनादि से अनंत तक चलता रहता है.  
  • कुल 10 कोडाकोड़ी सागरोपम का 1 उत्सर्पिणी या 1 अवसर्पिणी काल होता है। इस प्रकार एक कालचक्र 20 कोडाकोड़ी सागरोपम का होता है. 

3. असंख्यात काल और अनंत काल की अवधारणा

  • अब तक बताए गए सभी काल "असंख्यात काल" की श्रेणी में आते हैं
  • लेकिन अब "अनंत काल" की अवधारणा प्रस्तुत की जा रही है, जो कभी समाप्त नहीं होता
  • कालचक्र में अनंत उत्सर्पिणी और अनंत अवसर्पिणी = 1 पुद्गलपरावर्त
  • इस प्रकार, अनंत पुद्गलपरावर्त अतीत में भी बीत चुके हैं और भविष्य में भी अनंत मात्रा में आने वाले हैं
  • जैन आगमों में पुद्गल परावर्त के विस्तृत स्वरुप का वर्णन है. विस्तार के भय से पुद्गल परावर्त की गणना यहाँ नहीं दी जा रही है. 

4. आधुनिक विज्ञान और जैन कालगणना की तुलना

  • सामान्यतः आधुनिक विज्ञान को प्रामाणिक माना जाता है परन्तु वास्तविकता ये है की यह भी अनेक अनुमानों एवं परष्पर विरोधी अवधारणाओं पर आधारित है. जबकि जैन दर्शन सर्वज्ञों (केवलज्ञानियों) की दृष्टि पर आधारित होने से निश्चित गणना होती है. 
  • आधुनिक विज्ञान के अनुसार, ब्रह्मांड की उत्पत्ति केवल 13.8 अरब वर्ष (billion years) पहले हुई है। इस सम्बन्ध में भी निश्चित रूप से कहा नहीं जा सकता. भिन्न भिन्न वैज्ञानिक मॉडल में भिन्न भिन्न समय बताया जाता है. 
  • विज्ञान के पास इस बात की कोई निश्चित जानकारी नहीं है कि ब्रह्मांड का अंत कब होगा और उसके बाद क्या होगा
  • विज्ञान के सभी निष्कर्ष अनुमानों पर आधारित हैं और वे निश्चित नहीं हैं।
  • इसके विपरीत, जैन दर्शन की कालगणना अनंत काल तक फैली हुई है, जिसमें न केवल भविष्य के अनंत काल की गणना की गई है, बल्कि अतीत के भी अनंत काल का विवरण उपलब्ध है


5. देव और नारकीय लोक में समय की गणना
  • जैन गणना का यह काल केवल दृश्यमान क्षेत्र तक सीमित नहीं है जहाँ मनुष्य एवं पशु पक्षी रहते हैं. 
  • इसके विपरीत, इसकी गणना देव लोक (स्वर्ग) और नारकीय लोक (नरक) में भी की जाती है। जहाँ न सूर्य होता है, न चंद्रमा, और न ही दिन-रात का चक्र। वहाँ भी समय की गणना इस जैन कालगणना के आधार पर ही की जाती है।
  • देव एवं नारकी जीवों की न्यूनतम आयु 10 हज़ार वर्ष एवं अधिकतम आयु 33 सागरोपम होती है. देवताओं और नारकीय जीवों के भी आयुष्य (जीवन अवधि), जन्म और मृत्यु का निर्धारण भी इसी कालगणना के आधार पर किया जाता है

संक्षेप 

✅ असंख्यात काल को "पल्योपम" और "सागरोपम" नामक दो श्रेणियों में विभाजित किया गया है, जिसमें प्रत्येक के छह उप-प्रकार हैं।
✅ पल्योपम एक अत्यंत सूक्ष्म समय इकाई है, जिसकी गणना "बालों के कणों" से की जाती है।

✅ बादर उद्धार पल्योपम और सूक्ष्म उद्धार पल्योपम संख्यात और असंख्यात समय की गणना में भिन्न होते हैं।
✅ सूक्ष्म अद्वा पल्योपम का उपयोग उत्सर्पिणी-अवसर्पिणी काल, जीवों की आयु और कर्मों की स्थिति की गणना में किया जाता है।
✅ बादर क्षेत्र पल्योपम और सूक्ष्म क्षेत्र पल्योपम "असंख्यात" समय की अवधारणाएँ हैं, जिनका व्यावहारिक उपयोग नहीं होता।

✅ सूक्ष्म अद्वा पल्योपम को वास्तविक समय मापन के रूप में स्वीकार किया जाता है।

✅ 10 कोडाकोड़ी पल्योपम = 1 सागरोपम और 10 कोडाकोड़ी सागरोपम = 1 उत्सर्पिणी/अवसर्पिणी।
✅ 1 उत्सर्पिणी और 1 अवसर्पिणी = 1 कालचक्र, और यह अनंत कालचक्रों तक चलता रहता है।
✅ जैन कालगणना विज्ञान की तुलना में अधिक विस्तृत है, क्योंकि यह अनंत काल की अवधारणा को स्पष्ट रूप से प्रस्तुत करती है।
✅ इस कालगणना का उपयोग केवल मानव जीवन के लिए नहीं, बल्कि देव और नारकीय लोकों में भी किया जाता है।

निष्कर्ष:

यह लेख बताता है कि जैन कालगणना केवल गणितीय अवधारणा नहीं है, बल्कि यह ब्रह्मांड के अनंत चक्रों की एक वैज्ञानिक और आध्यात्मिक व्याख्या है। यह न केवल मानव जीवन, बल्कि देव और नारकीय लोकों में भी समय की गणना का आधार है।

भारतीय नववर्ष लेखमाला के लेखों की सन्दर्भ एवं लिंक सहित सूचि


Thanks, 
Jyoti Kothari (Jyoti Kothari, Proprietor, Vardhaman Gems, Jaipur represents Centuries Old Tradition of Excellence in Gems and Jewelry. He is an adviser, to Vardhaman Infotech, a leading IT company in Jaipur. He is also an ISO 9000 professional)

allvoices

भारतीय नववर्ष लेखमाला के लेखों की सन्दर्भ एवं लिंक सहित सूचि

 

गत वर्ष भारतीय नववर्ष (2082) 30 मार्च 2025 के दिन थाआगामी 19 मार्च 2026, भारतीय नववर्ष है. इस दिन से विक्रम सम्वत 2083 प्रारम्भ होनेवाला है. इस भारतीय नववर्ष को मनाने की जोरदार तैयारी हो रही है. हिन्दू आध्यात्मिक एवं सेवा फॉउंडेशन भी इसके लिए जोरदार तैयारी कर रहा है. भारतीय नववर्ष के सम्बन्ध में सर्वप्रथम एक लेख लिखा और फिर धीरे धीरे सम्बंधित लेखों की एक श्रंखला बन गई. यहाँ पर नववर्ष लेखमाला के लेखों की एक सूचि लिंक के साथ दी गई है, जिसके माध्यम से आप सभी लेखों तक पहुँच कर उसे पढ़ सकते हैं. इस लेखमाला के अंतर्गत भविष्य में लिखे जानेवाले लेखों की सूचि भी यहीं दे दी जाएगी. 

आपसे निवेदन है की लेखों को पढ़ने के बाद अपने सुझाव कमेंट बॉक्स में अवश्य देवें। आपके सुझाव हमारे लिए मूल्यवान हैं. इन लेखों को कृपया अग्रेषित एवं साझा करने की भी कृपा करें.  जिससे भारतीय ज्ञान परंपरा को संरक्षित एवं प्रसारित करने के हमारे प्रयत्न को वल मिले. 




1. यह लेख भारतीय नववर्ष की विविध परंपराओं और उनके धार्मिक, खगोलीय, ऐतिहासिक, और सांस्कृतिक महत्व पर प्रकाश डालता है। लेख में विक्रम संवत 2082 के प्रारंभ, विभिन्न क्षेत्रों में मनाए जाने वाले नववर्ष, जैसे उगादि, गुड़ी पड़वा, और चेटीचंड, तथा संवत्सर चक्र के 60 वर्षों के नामों का विस्तृत वर्णन किया गया है। इसके अलावा, चांद्र और सौर वर्ष के आधार पर नववर्ष की गणना और उनके महत्व पर भी चर्चा की गई है।


https://jyoti-kothari.blogspot.com/2025/01/blog-post.html

2. इस लेख में भारतीय पंचांग की वैज्ञानिक संरचना और खगोलीय आधार पर अयन, चातुर्मास, ऋतु, और मास की व्याख्या की गई है। उत्तरायण और दक्षिणायन, तीन चातुर्मास, छह ऋतुएं, और बारह मासों के साथ उनके संबंधित नक्षत्रों और राशियों का विवरण प्रस्तुत किया गया है। लेख में महीनों के नामकरण और उनके नक्षत्रों के प्रभाव पर भी प्रकाश डाला गया है।


 https://jyoti-kothari.blogspot.com/2025/02/blog-post_19.html

3. यह लेख जैन दर्शन में काल की अवधारणा और उसकी सूक्ष्मतम इकाई 'समय' की व्याख्या करता है। लेख में निश्चय काल और व्यवहार काल के भेद, समय की परिभाषा, और आधुनिक विज्ञान में समय मापन की तुलना की गई है। इसके अलावा, काल के विभिन्न प्रकार, जैसे भूतकाल, वर्तमानकाल, भविष्यकाल, संख्यात, असंख्यात, और अनंत, तथा जैन शास्त्रों में काल की गणना और उसकी जटिल संरचना पर विस्तृत चर्चा की गई है।


https://jyoti-kothari.blogspot.com/2025/02/1.html 
  • 4. यह लेख चांद्र वर्ष (लूनर ईयर) और सौर वर्ष (सोलर ईयर) की परिभाषा, उनकी विशेषताएँ और उपयोग पर प्रकाश डालता है। चांद्र वर्ष चंद्रमा की गति पर आधारित होता है, जिसमें लगभग 354.36 दिन होते हैं, जबकि सौर वर्ष सूर्य के चारों ओर पृथ्वी की परिक्रमा पर आधारित होता है, जिसकी अवधि लगभग 365.24 दिन होती है। लेख में बताया गया है कि भारतीय पंचांग में चांद्र और सौर वर्षों का संयोजन कैसे किया जाता है, जिससे धार्मिक पर्वों और कृषि कार्यों का निर्धारण होता है।
  • https://jyoti-kothari.blogspot.com/2025/02/blog-post.html
  • 5. इस लेख में भारतीय पंचांग के पांच प्रमुख अंगों—तिथि, वार, नक्षत्र, योग, और करण—का विस्तृत विवरण प्रस्तुत किया गया है। तिथि चंद्रमा और सूर्य के बीच के कोणीय अंतर पर आधारित होती है; वार सप्ताह के सात दिनों को दर्शाते हैं; नक्षत्र चंद्रमा की स्थिति के अनुसार 27 तारामंडलों में से एक होता है; योग सूर्य और चंद्रमा की संयुक्त स्थिति से बनता है; और करण तिथि के आधे भाग को कहते हैं। ये पांचों अंग किसी भी दिन के शुभ-अशुभ मुहूर्त का निर्धारण करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
  • https://jyoti-kothari.blogspot.com/2025/02/blog-post_58.html
  • 6. यह लेख भारतीय खगोलविद्या की प्राचीन परंपरा और उसकी समृद्ध विरासत पर केंद्रित है, विशेष रूप से जंतर मंतर और ग्रीनविच वेधशाला की तुलना के माध्यम से। लेख में बताया गया है कि भारत में उज्जैन, वाराणसी, विदिशा, और नालंदा जैसे स्थानों पर प्राचीन वेधशालाएँ थीं, जहाँ खगोलीय अध्ययन और गणनाएँ की जाती थीं। महाराजा जय सिंह द्वितीय द्वारा स्थापित जंतर मंतर वेधशालाएँ खगोलीय अध्ययन के लिए महत्वपूर्ण केंद्र थीं। इसके विपरीत, ग्रीनविच वेधशाला यूरोपीय खगोलविद्या का प्रमुख केंद्र रहा है।
  •  https://jyoti-kothari.blogspot.com/2025/02/blog-post_21.html
  • 7. इस लेख में प्राचीन भारतीय कालगणना की वैदिक और पारंपरिक समय मापन प्रणालियों का विस्तृत विश्लेषण किया गया है। वैदिक काल में समय की सूक्ष्मतम इकाई 'त्रुटि' से लेकर बड़ी इकाइयों जैसे 'युग' और 'मन्वंतर' तक की गणना की जाती थी। लेख में दिन और रात के मापन के लिए घटिका, मुहूर्त, अहोरात्र आदि की चर्चा की गई है, साथ ही मास, ऋतु, अयन, और वर्ष की अवधारणाओं को भी स्पष्ट किया गया है। ब्रह्मांडीय और दीर्घकालिक समय इकाइयों जैसे युग और मन्वंतर का विवरण भी प्रस्तुत किया गया है।
  • https://jyoti-kothari.blogspot.com/2025/02/blog-post_25.html
  • 8. यह लेख जैन दर्शन में काल (समय) की मूल अवधारणा को स्पष्ट करता है। इसमें काल को षट्द्रव्य में एक महत्वपूर्ण द्रव्य बताते हुए उसके दो रूप—निश्चय काल और व्यवहार काल—का विवेचन किया गया है। “समय” को काल की सूक्ष्मतम, अविभाज्य इकाई माना गया है, जिसे केवल केवलज्ञानी ही पूर्णतः जान सकते हैं। लेख में समय की सूक्ष्म से विशाल इकाइयों (जैसे आवलिका आदि) का उल्लेख कर जैन कालगणना की अद्भुत व्यापकता को रेखांकित किया गया है। यह प्रस्तुति दर्शाती है कि जैन परंपरा में समय केवल गणना नहीं, बल्कि दार्शनिक और ब्रह्मांडीय सत्य है।
  • जैन कालगणना: ब्रह्मांडीय समय की रहस्यमयी संरचना भाग 1

  • https://jyoti-kothari.blogspot.com/2025/02/1.html
  • 9. इस लेख में जैन कालगणना के असंख्यात और अनंत समय की अवधारणाओं को विस्तार से समझाया गया है। पल्योपम और सागरोपम जैसी इकाइयों द्वारा असंख्यात समय की गणना की जाती है। कालचक्र उत्सर्पिणी (वृद्धि) और अवसर्पिणी (ह्रास) के दो भागों में अनंत काल तक चलता रहता है। अनंत पुद्गल परावर्त ब्रह्मांडीय समय के अनंत विस्तार को दर्शाता है। आधुनिक विज्ञान की तुलना में, जैन दर्शन अधिक विस्तृत और सुनिश्चित गणना प्रदान करता है। यह गणना न केवल पृथ्वी, बल्कि देवलोक और नारक लोक में भी लागू होती है।
  • https://jyoti-kothari.blogspot.com/2025/02/2.html
  • 10. यह लेख बंगाली नववर्ष (पोइला बैसाख) के सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और सामाजिक महत्व पर केंद्रित है। इसमें बताया गया है कि यह केवल एक कैलेंडर परिवर्तन नहीं, बल्कि व्यापार, समाज और लोकजीवन से गहराई से जुड़ा उत्सव है। लेख में मुगल काल से जुड़ी इसकी पृष्ठभूमि, विशेषकर कर-वसूली और कृषि चक्र से संबंध, का उल्लेख किया गया है। साथ ही, “हालखाता” परंपरा, नए आरंभ की भावना और सामुदायिक उल्लास को रेखांकित किया गया है। यह ब्लॉग दर्शाता है कि बंगाली नववर्ष भारतीय सांस्कृतिक विविधता में एक जीवंत और परंपरागत उत्सव के रूप में आज भी प्रासंगिक है।
  • https://jyoti-kothari.blogspot.com/2025/03/blog-post_10.html
  • इन लेखों के माध्यम से, न केवल भारतीय नवर्ष परंपरा अपितु भारतीय खगोलविद्या, कालगणना, और पंचांग की समृद्ध परंपरा और वैज्ञानिक दृष्टिकोण को समझने में सहायता मिलती है।


  • allvoices