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Sunday, March 16, 2025

ऋग्वेद के दशराज्ञ युद्ध का आध्यात्मिक रूपक: आत्मसंघर्ष और अर्हन्नग्ने का संदेश


🔷 परिचय

ऋग्वेद (मंडल 7, सूक्त 18, मंत्र 22) की यह ऋचा सुदास एवं दस राजाओं के युद्ध से संबंधित है, जिसे "दशराज्ञ युद्ध" के नाम से जाना जाता है। यह वैदिक इतिहास का एक महत्वपूर्ण युद्ध था, जिसमें कहा जाता है कि राजा सुदास और उनके प्रतिद्वंद्वी दस राजाओं के संघ के बीच घोर संग्राम हुआ। इस युद्ध को ब्रम्हर्षि वशिष्ठ एवं महर्षि विश्वमित्र के बीच का युद्ध भी माना जाता है. इस युद्ध में वशिष्ठ की ओर से युद्ध करते हुए राजा सुदास (तृत्सु वंश) विजयी हुए, जबकि विश्वमित्र की और से युद्धरत पुरु वंश के राजा संवरण और उनके 9 साथी- अलीन, अनु, भृगु, भालन, द्रुह्यु, मत्स्य, परसु, पुरू और पणि परास्त हुए.  

इस सूक्त की कई ऋचाएँ इस युद्ध से संबंधित हैं, लेकिन आध्यात्मिक दृष्टि से देखने पर इसमें अर्जुन्य विचार, आत्मोत्थान, एवं मोक्षमार्ग का संकेत मिलता है। यहाँ ध्यान देने योग्य बात ये है की वैदिक साहित्यों में विश्वमित्र को एक वलवान, तपस्वी परन्तु अहंकारी एवं क्रोधी ऋषि के रूपमे बताया गया है जबकि वशिष्ठ को ब्रम्हज्ञानी, शांत, स्थिर, निरभिमानी, क्षमाशील ऋषि के रूप में जाना जाता है. इस युद्ध में विश्वमित्र की और से युद्ध करनेवाले 10 राजाओं की पराजय एवं वशिष्ठ की और से युद्धरत अकेले सुदास की विजय आत्मा की १० इन्द्रियों पर विजय की और स्पष्ट इंगित करता है जिसकी चर्चा आगे करेंगे. 

विशेष रूप से इस मंत्र में "अर्हन्नग्ने" शब्द प्रयुक्त हुआ है, जो अत्यंत महत्वपूर्ण है। "अर्हन्" शब्द प्राचीन शास्त्रों में पूजनीय, श्रेष्ठ एवं मोक्षमार्ग में प्रतिष्ठित व्यक्ति को संदर्भित करता है। यह शब्द उन आत्माओं के लिए प्रयुक्त होता है, जो पुण्य, ज्ञान और निर्वाण प्राप्ति की योग्य होती हैं। अतः यह शब्द विशुद्ध आध्यात्मिक अर्थों में पूर्ण रूप से कर्म-निर्जरा करके मोक्ष की स्थिति तक पहुँचने वाली आत्माओं की ओर संकेत करता है।

इस मंत्र के गहन विश्लेषण से यह स्पष्ट होता है कि इसमें आत्मशुद्धि, ज्ञान की उपलब्धि एवं सद्गुणों के महत्व को उजागर किया गया है।

इस मंत्र का संबंध दशराज्ञ युद्ध से है, जिसका सामान्य अर्थ ऊपर दिया जा चुका है। अब इसके आध्यात्मिक संदर्भ का विश्लेषण करते हैं।

🔷 "दशराज्ञ युद्ध" का व्याकरणिक विश्लेषण

1️⃣ पद विभाजन

👉 "दशराज्ञ युद्ध" = "दश" + "राज्ञ" + "युद्ध"

2️⃣ प्रत्येक शब्द का व्याकरणिक विश्लेषण

(A) "दश" (दशन्) – संख्यावाचक विशेषण
📌 मूल रूप: "दशन्" (संस्कृत संख्यावाचक शब्द)
📌 रूप:

  • यह विशेषण (Adjective) है और संख्या को दर्शाता है।

  • यह नपुंसकलिंग (Neuter Gender) में प्रयुक्त होता है।

  • विभक्ति: प्रथमा विभक्ति एकवचन (Nominative Singular)।

  • संदर्भ: यहाँ दस राजाओं के समूह को इंगित करता है।

(B) "राज्ञ" (राजन्) – संज्ञा रूप
📌 मूल रूप: "राजन्" (राजा)
📌 रूप:

  • "राजन्" शब्द पंचमी विभक्ति बहुवचन (Ablative Plural) में "राज्ञ:" रूप में प्रयुक्त होता है।

  • "दशराज्ञ" = दस राजाओं से संबंधित (संपूर्ण दस राजाओं का समाहार)।

  • यह एक बहुव्रीहि समास (Bahuvrīhi Compound) भी हो सकता है, जिसका अर्थ "जो दस राजाओं से संबंधित हो"।

(C) "युद्ध" – नपुंसकलिंग संज्ञा
📌 मूल रूप: "युद्ध" (युद्ध, संग्राम)
📌 रूप:

  • नपुंसकलिंग (Neuter Gender) संज्ञा।

  • यह शब्द प्रथमा विभक्ति (Nominative Singular) में प्रयुक्त हुआ है।

  • यदि "दशराज्ञ युद्ध" को तत्पुरुष समास माना जाए, तो यह "दस राजाओं का युद्ध" का अर्थ देता है।

  • यदि इसे बहुव्रीहि समास माना जाए, तो "वह युद्ध जिसमें दस राजा सम्मिलित हों" अर्थ बनता है।

3️⃣ समास विश्लेषण

📌 "दशराज्ञ युद्ध" में दो संभावनाएँ हैं:

1️⃣ तत्पुरुष समास
"दशराज्ञ" + "युद्ध" = "दस राजाओं का युद्ध"

  • अर्थ: दस राजाओं द्वारा लड़ा गया संग्राम।

2️⃣ बहुव्रीहि समास
"दशराज्ञ युद्ध" = "वह युद्ध जिसमें दस राजा सम्मिलित हों"

  • अर्थ: यह युद्ध उन दस राजाओं के समूह से संबंधित है, जिन्होंने राजा सुदास के विरुद्ध युद्ध किया।

4️⃣ निष्कर्ष

📌 "दशराज्ञ युद्ध" शब्द तत्पुरुष समास और बहुव्रीहि समास दोनों प्रकार से व्याख्यायित किया जा सकता है।
📌 "दश" (संख्या) + "राज्ञ" (राजाओं से संबंधित) + "युद्ध" (संग्राम) = दस राजाओं से जुड़ा युद्ध।
📌 इसका ऐतिहासिक संदर्भ राजा सुदास और उनके प्रतिद्वंद्वी दस राजाओं के संघर्ष से है।
📌 व्याकरणिक दृष्टि से यह "प्रथमा विभक्ति" (Nominative Case) में प्रयुक्त हुआ है, जो इसे एक विशिष्ट संज्ञा बना देता है।


🔷 "दशराज्ञ युद्ध" और दस इन्द्रियों के बीच आध्यात्मिक साम्यता

👉 "दशराज्ञ युद्ध" में दस राजा आपस में संघर्षरत थे, जो राजा सुदास के विरुद्ध संगठित होकर लड़े। यह केवल एक लौकिक युद्ध नहीं, बल्कि अंतर्मन में सतत चलने वाले इन्द्रिय-संघर्ष का भी प्रतीक हो सकता है।

इसी प्रकार, हमारे भीतर भी दस इन्द्रियों का संघर्ष निरंतर चलता रहता है –

1️⃣ पाँच ज्ञानेंद्रियाँ (Five Sense Organs)

  • चक्षु (आँखें) – रूप को देखने की शक्ति।

  • श्रवण (कान) – ध्वनि को सुनने की शक्ति।

  • घ्राण (नाक) – गंध को ग्रहण करने की शक्ति।

  • रसना (जीभ) – स्वाद का अनुभव करने की शक्ति।

  • त्वचा (स्पर्श) – संवेदनाओं को ग्रहण करने की शक्ति।

➡️ यदि इनका संयम न हो तो आत्मा इनकी दासता में आ जाती है।

2️⃣ पाँच कर्मेंद्रियाँ (Five Action Organs)

  • वाक् (वाणी) – बोलने की क्रिया।

  • पाणि (हाथ) – ग्रहण करने की क्रिया।

  • पाद (पैर) – गमन करने की क्रिया।

  • उपस्थ (जननेंद्रिय) – सृजन और सुख-संबंधी क्रिया।

  • गुदा (मलत्यागेंद्रिय) – त्याग करने की क्रिया।

➡️ यदि इन्द्रियाँ संयम में रहें, तो आत्मज्ञान की प्राप्ति होती है। ➡️ यदि इन्द्रियाँ अनियंत्रित हो जाएँ, तो वे आत्मा को संसार के जाल में बाँध देती हैं।

👉 इस प्रकार, "दशराज्ञ युद्ध" आत्मा और इन्द्रियों के बीच का एक आध्यात्मिक संघर्ष भी है। 👉 जो इस युद्ध में विजय प्राप्त करता है, वही वास्तविक "अर्ह" (मोक्षपथगामी) होता है। 👉 यह केवल एक लौकिक युद्ध का वर्णन नहीं है, बल्कि आत्मशुद्धि, मोक्ष और पवित्रता के आध्यात्मिक संदेश को भी दर्शाता है।

🔷 ऋग्वेद 7.18.22 – संहितापाठ

द्वे नप्तुर्देववतः शते गोर्द्वा रथा वधूमन्ता सुदासः। अर्हन्नग्ने पैजवनस्य दानं होतेव सद्म पर्येमि रेभन्॥

🔷 पदपाठ

द्वे नप्तुः देववतः शते गौः द्वौ रथौ वधूमन्तौ सुदासः। अर्हन् अग्ने पैजवनस्य दानं होता इव सद्म परीयामि रेभन्॥

🔷 शब्दार्थ

  • द्वे (Dve) – दो।

  • नप्तुः (Naptuḥ) – वंशज, उत्तराधिकारी, या शिष्य।

  • देववतः (Devavataḥ) – दिव्य गुणों से युक्त, देवों से संबंधित।

  • शते (Śate) – सौ (संख्या सूचक)।

  • गौः (Gauḥ) – गौ, जो शुद्धता और समृद्धि का प्रतीक है।

  • द्वौ (Dvau) – दो।

  • रथौ (Rathau) – रथ, जो आध्यात्मिक एवं लौकिक यात्रा का प्रतीक है।

  • वधूमन्तौ (Vadhūmantau) – वधू सहित, स्त्रियों से संपन्न।

  • सुदासः (Sudāsaḥ) – राजा सुदास, जिसका शाब्दिक अर्थ "शुद्ध दाता" है।

  • अर्हन् (Arhan) – पूजनीय, श्रेष्ठ, आत्मशुद्ध व्यक्ति, जो मोक्ष के योग्य हो।

  • अग्ने (Agne) – अग्नि, जो पवित्रता और ज्ञान का प्रतीक है।

  • पैजवनस्य (Paijavanasya) – पैजवना वंश से संबंधित, या उस वंश की संपत्ति।

  • दानं (Dānaṁ) – दान, त्याग, पुण्यकर्म।

  • होता (Hotā) – यज्ञकर्ता, यज्ञ करने वाला पुरोहित।

  • इव (Iva) – समान, जैसा कि।

  • सद्म (Sadma) – घर, आश्रय, स्थान।

  • परीयामि (Pariyāmi) – परिभ्रमण करना, प्रयास करना, यश का विस्तार करना।

  • रेभन् (Rebhan) – गूँजना, उच्च स्वर में प्रतिध्वनित होना।

🔷 अन्वय (वाक्य संरचना)

सुदासः (शुद्ध आत्मा/युद्ध में विजयी राजा) द्वे नप्तुः देववतः शते गौः द्वौ रथौ वधूमन्तौ ददाति। (दिव्य गुणों से युक्त सौ गौ, दो रथ, और वधू सहित अन्य उपहार दान करता है।)

अर्हन् अग्ने! (हे अग्नि! जो अर्हत् है, पूजनीय है, पवित्रता का प्रतीक है।)

पैजवनस्य दानं होतेव सद्म पर्येमि रेभन्। (हे यज्ञकर्ता! मैं पैजवना के दान की प्रतिष्ठा में विचरण करता हूँ और इसका यश उच्च स्वर में गूँजता है।)

🔷 आध्यात्मिक व्याख्या

📌 इस मंत्र में द्वे नप्तुः देववतः शते गौः का संदर्भ सांसारिक एवं आध्यात्मिक संपन्नता से है।
📌 सुदास का अर्थ केवल राजा नहीं, बल्कि शुद्ध देने वाला, पुण्यात्मा भी होता है।
📌 अर्हन् अग्ने – यहाँ अग्नि को मोक्ष के योग्य, पवित्रता का प्रतीक और अर्हत् स्थिति को प्राप्त आत्मा के रूप में देखा जा सकता है।
📌 दान और यश की गूँज (परीयामि रेभन्) – यह आत्मा के पुण्यकर्म और धर्ममयी वाणी के प्रचार का भी प्रतीक हो सकता है।

🔷 निष्कर्ष

🔹 इस ऋचा में "अर्हन्" शब्द का प्रयोग मोक्षगामी आत्मा, पूर्ण शुद्ध व्यक्ति और पवित्र अग्नि के प्रतीक के रूप में हुआ है।
🔹 यह मंत्र आत्मिक उन्नति, कर्म-निर्जरा, त्याग और आत्मज्ञान की प्रेरणा देता है।
🔹 "अग्नि" और "अर्हन्" का समन्वय आत्मा की शुद्धता, तपस्या और मोक्ष-पथ की ओर संकेत करता है।
🔹 इसमें यज्ञ, दान और संयम के माध्यम से कर्म-निर्जरा एवं आत्मिक उत्थान का भी गूढ़ संकेत है।

🔷 ऋग्वेद 7.18.22: आत्मोत्थान और अर्हन् तत्व का आध्यात्मिक संदेश

🔷 "द्वे नप्तुः" का विश्लेषण

संस्कृत व्याकरण के अनुसार:

  • "द्वे" = दो।

  • "नप्तुः" = "नप्तृ" (Naptru) शब्द से बना है, जिसका अर्थ "वंशज, शिष्य, या उत्तराधिकारी" होता है।

यदि "नप्तुः" को शिष्य/उत्तराधिकारी के रूप में लें, तो:

  • "द्वे नप्तुः" = दो प्रकार के अनुयायी।

  • यह दो मार्गों—ज्ञानमार्गी (स्वाध्याय और साधना करने वाले) और कर्ममार्गी (धर्मकर्म में प्रवृत्त) को इंगित कर सकता है।

  • यह आत्मा के ज्ञान और कर्म की संभावनाओं को दर्शाता है।

यदि "नप्तुः" को वंशज के रूप में लें, तो:

  • यह संभवतः दो वंशों या दो समूहों को इंगित कर सकता है, जो इस युद्ध में शामिल थे।

  • यह सुदास के दो प्रमुख समर्थकों या शत्रुओं को भी दर्शा सकता है।

🔷 "देववतः" का विश्लेषण

  • "देव" = दिव्यता, प्रकाश, शुद्धता।

  • "वत्" प्रत्यय = जिससे संपन्न हो।

  • "देववतः" वह आत्मा हो सकती है, जो दिव्यता को प्राप्त कर चुकी हो या जो देवगुणों से संपन्न हो।

  • यह केवल लौकिक देवताओं तक सीमित नहीं, बल्कि आत्मा की दिव्य अवस्था को भी इंगित कर सकता है।

  • "देववतः" आत्मा के दिव्यता की ओर बढ़ने, शुद्धता प्राप्त करने, और सम्यक् ज्ञान से युक्त होने का संकेत करता है।

🔷 "शते" का विश्लेषण

संस्कृत व्युत्पत्ति के अनुसार:

  • "शत" = मूल रूप से "सौ" का सूचक है।

  • लेकिन "शते" (द्वितीया विभक्ति) का प्रयोग केवल संख्यावाचक अर्थ में ही नहीं, बल्कि "पूर्णता" के लिए भी किया जाता है।

संभावित आध्यात्मिक संकेत:

  • वैदिक साहित्य में "शत" का प्रयोग कभी-कभी "असीमितता" या "पूर्णता" के लिए होता है।

  • यदि यह "गौ" के साथ प्रयोग हुआ है, तो इसका तात्पर्य केवल "100 गाएँ" नहीं, बल्कि पूर्ण ज्ञान या सभी इन्द्रियों के संयमित होने की स्थिति भी हो सकता है।

  • "शते गौः" = पूर्ण इन्द्रिय संयम, शुद्धता, और आत्मा की पूर्ण निर्मलता।

🔷 "गौ" शब्द और गौ-दान का आध्यात्मिक संकेत

संस्कृत में "गौ" के विभिन्न अर्थ:

  • गाय (शुद्धता और जीवन देने वाली शक्ति का प्रतीक)।

  • इन्द्रियाँ (संवेदनाएँ जो बाहरी जगत से ज्ञान ग्रहण करती हैं)।

  • धारा, गति, प्रकाश, वेदवाणी (ज्ञान का प्रवाह)।

  • पृथ्वी (जो सबको धारण करती है)।

100 गौ-दान का आध्यात्मिक अर्थ:

  • यदि "गौ" = इन्द्रियाँ मानी जाएँ, तो "100 गौ-दान" का तात्पर्य:

    • 100 संख्या बड़ा संख्यात्मक प्रतीक हो सकता है, जो इन्द्रिय-विजय की पूर्णता को दर्शाता है।

    • यह समस्त इन्द्रियों के संयम, त्याग और नियंत्रण की ओर संकेत करता है।

    • "गौ-दान" का अर्थ केवल गायों को दान करना नहीं, बल्कि आत्मा के विकारी भावों को त्यागना भी हो सकता है।

    • "गौ" का संबंध "ज्ञान और प्रकाश" से भी है, अतः 100 गौ का दान = 100 बार ज्ञान या तप का अभ्यास।

🔷 निष्कर्ष

  • "अर्हन्" शब्द मोक्षगामी आत्मा, पूर्ण शुद्ध व्यक्ति और पवित्र अग्नि के प्रतीक के रूप में प्रयुक्त हुआ है।

  • यह मंत्र आत्मिक उन्नति, कर्म-निर्जरा, त्याग और आत्मज्ञान की प्रेरणा देता है।

  • "अग्नि" और "अर्हन्" का समन्वय आत्मा की शुद्धता, तपस्या और मोक्ष-पथ की ओर संकेत करता है।

  • इसमें यज्ञ, दान और संयम के माध्यम से कर्म-निर्जरा एवं आत्मिक उत्थान का भी गूढ़ संकेत है।

🔷 "रथ", "गौ", और "वधूमन्त" शब्दों का गूढ़ आध्यात्मिक अर्थ

ऋग्वेद की ऋचाओं में प्रयुक्त इन शब्दों के लौकिक अर्थों के साथ-साथ गहरे आध्यात्मिक संकेत भी निहित हैं। ये आत्मसंयम, इन्द्रिय-नियंत्रण और मोक्षमार्ग की व्याख्या प्रस्तुत करते हैं।

🔷 "रथ" और इन्द्रिय संयम का संकेत

  • "रथ" संस्कृत में √रम् धातु से बना है, जिसका अर्थ गति करना या यात्रा करना है। यह आत्मा की सांसारिक और आध्यात्मिक यात्रा का प्रतीक है।

  • संस्कृत में "रथ" शरीर का भी प्रतीक है। इसके घोड़े इन्द्रियों के समान हैं, जिन्हें वल्गा (लगाम) द्वारा नियंत्रित किया जाता है। यदि ये अनियंत्रित हों, तो आत्मा मोह, राग-द्वेष और विकारों में फंस सकती है। यदि लगाम दृढ़ हो, तो आत्मा धर्म के पथ पर आगे बढ़ती है।

  • अतः, "रथ" वह साधन है, जिसके द्वारा आत्मा इन्द्रिय-नियंत्रण के साथ मोक्षमार्ग की ओर अग्रसर हो सकती है।

🔷 "द्वौ रथौ" = ज्ञानेंद्रियाँ और कर्मेंद्रियाँ

  • "द्वौ" का अर्थ दो और "रथौ" द्विवचन रूप में दो रथों को इंगित करता है। यह आत्मा के दो प्रमुख साधनों को दर्शाता है:

    • पहला रथ ज्ञानेंद्रियों का है, जो आत्मा को बाह्य जगत का अनुभव कराते हैं।

    • दूसरा रथ कर्मेंद्रियों का है, जो आत्मा को संसार में प्रवृत्त कराते हैं।

  • यदि इन दोनों रथों को संयम से चलाया जाए, तो आत्मा मोक्षमार्ग की ओर बढ़ती है, अन्यथा यह संसार रूपी भंवर में उलझाने वाला युद्ध बन जाता है।

🔷 "वधूमन्त" और मुक्तिवधू का संकेत

  • संस्कृत में "वधूमन्त" = "वधू (पत्नी) + मन्त (युक्त)"। इसका सामान्य अर्थ "जिसके पास वधू हो" है, परंतु आध्यात्मिक दृष्टि से यह मुक्तिवधू (मोक्ष-लक्ष्मी) की ओर भी संकेत करता है।

  • आध्यात्मिक साहित्य में "वधू" को केवल सांसारिक स्त्री न मानकर, आत्मा की परम दशा (मोक्ष) से जोड़ा गया है।

  • "मोक्ष-लक्ष्मी" या "मुक्तिवधू" वह अवस्था है, जहाँ आत्मा अपने अंतिम लक्ष्य (मोक्ष) को प्राप्त करती है।

  • "वधूमन्त" शब्द केवल सांसारिक विवाह ही नहीं, बल्कि आत्मा और मोक्ष के मिलन का भी प्रतीक हो सकता है। यह संयमी जीवन, इन्द्रिय-विजय, और अंततः आत्मा के अंतिम गंतव्य (मोक्ष) की ओर संकेत करता है।

🔷 "सुदासः" का विश्लेषण

  • "सु" (शुद्ध, अच्छा) + "दास" (सेवक) = जो शुद्ध और धर्म का सेवक हो।

  • "सुदास" केवल राजा का नाम नहीं, बल्कि आत्मा की स्थिति को भी दर्शाता है, जो धर्म, संयम और ज्ञान की सेवा में स्थित हो।

  • यह इन्द्रिय-संयम और आत्मा की तपस्या को दर्शाता है।

  • राजा "सुदास" को "शुद्ध दाता" कहा जाता है, जो इन्द्रियों के संघर्ष में विजयी होने का प्रयास करता है।

🔷 शब्दों के लौकिक एवं आध्यात्मिक संकेत

शब्दलौकिक अर्थआध्यात्मिक संकेत
रथयुद्ध का वाहनआत्मा का शरीर, जो इन्द्रिय-संयम से नियंत्रित रहता है।
गौगायें (पशु)इन्द्रियाँ, ज्ञान, प्रकाश, और तपस्या का प्रतीक।
गौ दानगायों को दान करनाइन्द्रिय-त्याग, ज्ञानार्जन, आत्म-शुद्धि।
वधूमन्तविवाह से युक्त व्यक्तिमुक्तिवधू (मोक्ष-लक्ष्मी), आत्मा की परम दशा।

🔷 निष्कर्ष

  • "रथ" आत्म-संयम का प्रतीक है।

  • "गौ" इन्द्रिय-नियंत्रण, ज्ञान और तपस्या को दर्शाती है।

  • "वधूमन्त" आत्मा और मोक्ष के मिलन का प्रतीक है।

  • "अर्हन्" शुद्ध चेतना और समस्त कर्मों से मुक्त आत्मा को इंगित करता है।

🔷 "अर्हन्" – शुद्ध चेतना, समस्त कर्मों से मुक्त आत्मा

  • "अर्ह" (√अर्ह्) धातु से बना है, जिसका अर्थ है "पूजनीय, योग्य, मोक्ष के अधिकारी"।

  • "अर्हन्" = "जो पूर्ण शुद्ध होकर समस्त कर्मों को भस्म कर चुका हो।"

  • यह मोक्ष की अंतिम स्थिति को दर्शाता है, जहाँ आत्मा सम्पूर्ण ज्ञान और शुद्धता को प्राप्त करती है।

"अर्हन्नग्ने" की गहराई एवं ऋषिमण्डल स्तोत्र से संबंध

"आद्यंताक्षर संलक्ष्यमक्षरं व्याप्य यत्स्थितं।"

📌 वर्णमाला का प्रथम और अंतिम अक्षर

📌 वर्णमाला के "अ" और "ह" के बीच सम्पूर्णता का संकेत

संस्कृत वर्णमाला का प्रथम अक्षर अ एवं अंतिम अक्षर ह है. यदि वर्णमाला की दृष्टि से देखें तो अ एवं ह के बीच सम्पूर्ण वर्णमाला समाहित है. प्रकारांतर से यह भी कहा जा सकता है "अह" में सम्पूर्ण जगत संसार समाहित है.  

  • "अह" का अर्थ = संपूर्ण जगत।

  • जब "अह" में अग्नि तत्त्व ("र्") जुड़ता है, तो यह "अर्ह" बनता है।

  • इसी प्रकार, "अहं" शब्द में अग्निबीज स्वरूप रेफ लगता है, तो वह "अर्हं" बनता है, अर्थात अहंकार को ध्यानरूपी अग्नि से जलाने वाला अर्हं होता है।

  • "अग्नि" केवल लौकिक अग्नि नहीं, बल्कि ज्ञान-ज्योति है, जो आत्मा को मोह से मुक्त करती है।

    • "अर्हन्नग्ने" का प्रयोग अग्नि को एक ऐसे तत्व के रूप में प्रस्तुत करता है, जो आत्मशुद्धि, त्याग, और मोक्ष का माध्यम है।

    • "अर्हन्" शब्द केवल पूजनीय व्यक्ति को इंगित नहीं करता, बल्कि वह आत्मा को भी इंगित करता है, जो समस्त कर्मों को जलाकर पूर्ण निर्मलता (निर्वाण) को प्राप्त कर लेती है।

🔷 "अर्हन्" की परिभाषा

  • "अर्हन्" वह है, जिसने केवल इन्द्रियों को ही नहीं, बल्कि समस्त कर्मों को भी जला दिया हो।

  • "जिन" इन्द्रियों को जीतकर आत्म-विजय प्राप्त करता है, लेकिन "अर्हन्" वह है, जो इस अग्नि द्वारा अपने समस्त कर्मों को जलाकर पूर्ण निर्मल हो चुका हो।

  • "अर्हन्" आत्मा की परम शुद्ध अवस्था को दर्शाता है, जहाँ कोई कर्म शेष नहीं रह जाता।

  • "अर्ह" शब्द में "अ" और "ह" (वर्णमाला के प्रथम और अंतिम अक्षर) का समावेश है, जो समस्त जगत को दर्शाता है।

  • "अर्हन्" वह है, जिसने इस समस्त जगत को जान लिया और उसे पार कर लिया।

📌 "अर्हन्" वह है, जो केवल इन्द्रियों पर विजय प्राप्त करने तक सीमित नहीं, बल्कि समस्त कर्मों को नष्ट करके शुद्ध आत्मा की स्थिति में पहुँच चुका है। 📌 "अर्ह" शब्द अग्नि तत्व से संबंधित है, जो आत्मा के समस्त विकारों को भस्म कर शुद्ध चेतना को प्रकट करता है।

🔷 "जिन" – इन्द्रिय-विजेता (The Conqueror of the Senses)

📌 संस्कृत व्युत्पत्ति:

  • "जि" (√जि) धातु से बना है, जिसका अर्थ है "विजय प्राप्त करना"।

  • "जिन" = "जो समस्त इन्द्रियों और विकारों पर विजय प्राप्त कर चुका हो।"

🔷 "जिन" और "अर्हन्" में अंतर और साम्यता

विशेषताजिनअर्हन्
अर्थइन्द्रिय-विजेतासमस्त कर्मों को नष्ट करने वाला
मुख्य विशेषताआत्मा ने समस्त इन्द्रियों और राग-द्वेष पर विजय प्राप्त कर लीआत्मा पूर्णतः शुद्ध हो चुकी है, कोई कर्म शेष नहीं
संस्कृत व्युत्पत्ति√जि (विजय)√अर्ह (योग्यता, मोक्ष अधिकारी)
प्रयोगतीर्थंकरों के लिए, क्योंकि वे इन्द्रिय-विजेता हैंमोक्ष प्राप्त आत्माओं के लिए, क्योंकि वे समस्त कर्मों से मुक्त हैं
आध्यात्मिक लक्ष्यआत्म-विजय (इन्द्रिय संयम)आत्म-मुक्ति (कर्मों का पूर्ण क्षय)
दशराज्ञ युद्ध से संबंधसुदास आत्मा है, जो दस इन्द्रियों पर विजय प्राप्त कर रहा हैइन्द्रिय विजय के बाद आत्मा पूर्ण निर्मल हो चुकी है

🔷 निष्कर्ष: तीर्थंकर दोनों ही हैं – "जिन" भी और "अर्हन्" भी

📌 "जिन" वह है, जो दस इन्द्रियों को जीत चुका है और आत्मा को इन्द्रियों के अधीन नहीं रहने देता। 📌 "अर्हन्" वह है, जो इस आत्म-विजय के बाद समस्त कर्मों को भी भस्म कर पूर्ण निर्मल हो चुका है। 📌 "जिन" और "अर्हन्" दोनों ही मोक्ष की ओर जाने के दो चरण हैं – पहले इन्द्रिय संयम, फिर कर्मों का क्षय। 📌 तीर्थंकर इसीलिए "जिन" और "अर्हन्" दोनों कहे जाते हैं, क्योंकि वे न केवल स्वयं मुक्त होते हैं, बल्कि अन्य को भी इस मार्ग पर चलने की प्रेरणा देते हैं।

🚩 इस ऋचा की व्याख्या में दशराज्ञ युद्ध एवं रथ का सम्बन्ध जितेन्द्रियत्व अर्थात "जिन" से है और "अर्हन्" शब्द तो ऋचा में ही है।

यहाँ तीर्थंकर शब्द के साथ जिन और अर्हन को सम्मिलित करने का सन्दर्भ है. जिसका विस्तार बाद में "रेभन्" और "पर्येमि" के सन्दर्भ में किया जायेगा. 

🔷 "पैजवन" का विस्तृत अर्थ

📌 संस्कृत व्युत्पत्ति:

  • "पैजवन" = पैजवना वंश से संबंधित या संरक्षक।

  • "पाज" (Pāja) धातु से संबंधित हो सकता है, जिसका अर्थ पालन, सुरक्षा, पोषण होता है।

  • यह किसी विशेष दानदाता, यज्ञकर्ता, या आध्यात्मिक संरक्षक को भी संदर्भित कर सकता है।

📌 संभावित आध्यात्मिक संकेत:

  • "पैजवन" केवल एक वंश का नाम नहीं, बल्कि इसका अर्थ "संरक्षक" (Sanrakshak) भी हो सकता है।

  • यह कोई ऐसा व्यक्ति या तत्व भी हो सकता है, जो आत्म-कल्याण एवं मोक्ष मार्ग का संरक्षक हो।

🔷 3️⃣ "दानं" का विश्लेषण

📌 व्युत्पत्ति:

  • "दा" (देना) + "न" (प्रक्रिया या भाव) = त्याग, परोपकार, आत्म-निवेदन।

📌 आध्यात्मिक संकेत:

  • यह केवल बाह्य "दान" (गायें, संपत्ति आदि का दान) नहीं, बल्कि आत्मा का राग-द्वेष का त्याग, कर्म-निर्जरा और मोक्ष की दिशा में बढ़ना भी हो सकता है।

  • "दान" का सही अर्थ है आत्मा द्वारा अपनी आसक्तियों का समर्पण।

🚩 संभावित व्याख्या: "दानं" = कर्म-निर्जरा, त्याग, और आत्म-शुद्धि।

🔷 4️⃣ "होतेव" का विश्लेषण

📌 व्याकरणिक विश्लेषण:

  • "होतेव" – इसमें "होता" (यज्ञकर्ता, जो यज्ञ में मंत्रों का उच्चारण करता है) और "इव" (समान) का मेल है।

  • इसका अर्थ हुआ, "जिस प्रकार यज्ञकर्ता यज्ञ को संपन्न करता है, उसी प्रकार यह कार्य किया गया।"

  • यह संपूर्ण कर्म-त्याग और मोक्ष-मार्ग की ओर संकेत करता है।

📌 आध्यात्मिक संकेत:

  • आत्मा यज्ञकर्ता की तरह अपने कर्मों को भस्म कर ज्ञान की अग्नि में तपती है।

  • यह तप, स्वाध्याय, और संयम की प्रक्रिया का प्रतीक हो सकता है।

🚩 संभावित व्याख्या: "होतेव" = जो आत्म-तपस्या में रत हो और कर्मों का क्षय कर रहा हो।

🔷 5️⃣ "सद्म" का विश्लेषण

📌 व्युत्पत्ति:

  • "सद्म" = घर, निवास।

📌 आध्यात्मिक संकेत:

  • यह मोक्ष, परमगति, और आत्मा के अंतिम विश्राम-स्थान को इंगित कर सकता है।

  • आत्मा का संस्कारों और भटकाव से मुक्त होकर शाश्वत शांति में स्थित होना।

🚩 संभावित व्याख्या: "सद्म" = मोक्ष, परमगति।

🔷 6️⃣ "पर्येमि" का विश्लेषण

📌 व्युत्पत्ति:

  • "परि" = चारों ओर।

  • "यामि" = गमन करना, घूमना।

📌 आध्यात्मिक संकेत:

  • यह आत्मा के संसार में भटकने या मोक्षमार्ग की ओर चलने का प्रतीक हो सकता है।

  • यह ज्ञान के प्रसार और धर्म का प्रचार भी हो सकता है।

🚩 संभावित व्याख्या: "पर्येमि" = आत्मा की गति—या तो संसार में, या ज्ञानमार्ग में।

🔷 7️⃣ "रेभन्" का विश्लेषण

📌 व्युत्पत्ति:

  • "रेभ" = ध्वनि, प्रतिध्वनि।

📌 आध्यात्मिक संकेत:

  • यह धर्म और सत्य की प्रतिध्वनि को दर्शा सकता है, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ती है।

  • यह ज्ञान और तप की शक्ति को भी दर्शा सकता है, जो आत्मा में गूँजती रहती है।

🚩 संभावित व्याख्या: "रेभन्" = धर्म की गूंज, आत्मज्ञान का प्रसार।

🔷 अंतिम निष्कर्ष

शब्दलौकिक अर्थआध्यात्मिक संकेत
पैजवनपैजवना वंश का व्यक्तिसंरक्षक, आत्म-संरक्षक, धर्मपालक
द्वौ रथौदो रथज्ञानेंद्रियाँ और कर्मेंद्रियाँ (इन्द्रियों का युग्म)
शतेसौपूर्णता, संपूर्ण इन्द्रिय संयम, आत्म-शुद्धि
द्वे नप्तुःदो वंशज या शिष्यदो प्रकार के जीव—ज्ञानमार्गी और कर्ममार्गी, या संसारी और मोक्षगामी आत्मा

🔷 शब्दों का व्याकरणिक विश्लेषण एवं अंतिम रूपांतरण

शब्दव्याकरणिक रूपअर्थआध्यात्मिक संकेत
द्वे (Dve)संख्यावाचक विशेषण, द्विवचनदोसंसार में दो प्रमुख मार्ग: ज्ञानमार्ग और कर्ममार्ग।
नप्तुः (Naptuḥ)नप्तृ (वंशज, उत्तराधिकारी), षष्ठी विभक्ति बहुवचनदो वंशजआत्मा के दो मार्ग—एक जो इन्द्रियों में फंसी है, और दूसरी जो मोक्षमार्गी है।
देववतः (Devavataḥ)विशेषण, षष्ठी विभक्तिदेवगुणों से संपन्न, दिव्य गुणों से युक्तजो आध्यात्मिक उन्नति में स्थित हो और मोक्षमार्ग में अग्रसर हो।
शते (Śate)संख्यावाचक विशेषण, द्वितीया विभक्तिसौपूर्णता, संपूर्ण इन्द्रिय संयम, आत्मशुद्धि।
दानं (Dānaṁ)द्वितीया विभक्तिदानआत्मिक त्याग, कर्म-निर्जरा, और इन्द्रियों का समर्पण।
होतेव (Hotā Iva)"होता + इव"यज्ञकर्ता के समानजो यज्ञ के माध्यम से आत्मशुद्धि प्राप्त करता है।
सद्म (Sadma)द्वितीया विभक्तिघर, आश्रयमोक्ष, आत्मा का अंतिम गंतव्य।
पर्येमि (Pariyāmi)कर्ता क्रिया रूपघूमना, भटकनाआत्मा का कर्मबद्ध संसार में चक्रण।
रेभन् (Rebhan)कर्ता क्रिया रूपगूंजना, प्रतिध्वनि करनाधर्म की गूंज, आत्मज्ञान का प्रचार।

🔷 निष्कर्ष: संपूर्ण ऋचा का गूढ़ आध्यात्मिक सार

संभावित महत्वपूर्ण शब्दव्याकरणिक रूपअर्थआध्यात्मिक संकेत
द्वे नप्तुःसंख्यावाचक विशेषण, द्विवचनदो प्रकार के जीवज्ञानमार्गी एवं कर्ममार्गी, या संसारी एवं मोक्षगामी।
देववतःविशेषण, षष्ठी विभक्तिदेवगुणों से संपन्न, दिव्य गुणों से युक्तजो आध्यात्मिक उन्नति में स्थित हो और मोक्षमार्ग में अग्रसर हो।
शते गौःसंख्यावाचक विशेषण, स्त्रीलिंग संज्ञासौ गौ (इन्द्रियाँ)संपूर्ण इन्द्रिय संयम और आत्मज्ञान।
द्वौ रथौसंख्यावाचक विशेषण, द्विवचनदो रथआत्मा के दो मुख्य साधन: ज्ञानेंद्रियाँ और कर्मेंद्रियाँ।
वधूमन्तविशेषण, पुल्लिंग एकवचनवधू सहितमुक्तिवधू, मोक्ष की प्राप्ति।
सुदासः"सु" (शुद्ध) + "दास" (सेवक)जो धर्म का शुद्ध सेवक होआत्मा जो संयम और तपस्या द्वारा शुद्ध हो।
अर्हन्नग्ने"अर्हन् + अग्ने" संबोधन रूपअर्ह अग्निवह अग्नि जो केवल लौकिक नहीं, बल्कि आत्मा को शुद्ध करने वाली ज्ञान-ज्योति है।
पैजवनस्यषष्ठी विभक्तिपैजवना वंशधर्म संरक्षक, आत्म-संरक्षक।
दानंद्वितीया विभक्तिदानआत्मिक त्याग, कर्म-निर्जरा, और इन्द्रियों का समर्पण।
होतेव"होता + इव"यज्ञकर्ता के समानजो यज्ञ के माध्यम से आत्मशुद्धि प्राप्त करता है।
सद्मद्वितीया विभक्तिघर, आश्रयमोक्ष, आत्मा का अंतिम गंतव्य।
पर्येमिकर्ता क्रिया रूपघूमना, भटकनाआत्मा का कर्मबद्ध संसार में चक्रण।
रेभन्कर्ता क्रिया रूपगूंजना, प्रतिध्वनि करनाधर्म की गूंज, आत्मज्ञान का प्रचार।


🔷 व्याकरणिक परीक्षण: क्या "रेभन्" और "पर्येमि" दिव्यध्वनि के लिए प्रयोग हो सकते हैं?


📌 संस्कृत व्युत्पत्ति और व्याकरणिक विश्लेषण

1️⃣ "रेभन्" = दिव्यध्वनि का गूढ़ संकेत?

  • "रेभ" धातु का मूल अर्थ है गूंजना, प्रतिध्वनित होना, ध्वनि करना।

  • "रेभन्" वर्तमान कालिक कर्तरि प्रयोग में क्रियापद है, जिसका अर्थ होता है "जो गूंज रहा है" या "जो प्रतिध्वनित हो रहा है"।

  • संस्कृत में "रेभ्" धातु का प्रयोग किसी विशेष ध्वनि, वाणी, या घोषणा के लिए भी होता है।

📌 क्या यह दिव्यध्वनि का संकेत हो सकता है?

  • हाँ, "रेभन्" केवल साधारण प्रतिध्वनि तक सीमित नहीं है।

  • यह ऐसी ध्वनि भी हो सकती है, जो अपने आप उत्पन्न हो और स्वतः गूंजती रहे—जैसे तीर्थंकर की दिव्यध्वनि।

  • तीर्थंकर की वाणी स्वयं उत्पन्न होती है, किसी भाषा में बंधी नहीं होती, और सभी प्राणियों को उनकी भाषा में समझ में आती है—यह विशेषता "रेभन्" के अर्थ से सामंजस्य रखती है।

✅ संभावित व्याख्या: "रेभन्" = तीर्थंकर की दिव्यध्वनि/धर्मध्वनि , जो आत्मज्ञान के बाद स्वतः गूंजती है और समस्त संसार में धर्म का प्रसार करती है।

2️⃣ "पर्येमि" = विश्वव्यापी दिव्यध्वनि?

  • "परि" उपसर्ग = चारों ओर, सर्वव्यापक रूप से।

  • "यम्" धातु = गति करना, घूमना, विस्तार होना।

  • "पर्येमि" = मैं चारों ओर घूमता हूँ, मैं सर्वत्र व्याप्त हूँ।

📌 क्या यह दिव्यध्वनि के विस्तार का संकेत हो सकता है?

  • हाँ, "पर्येमि" केवल लौकिक गमन तक सीमित नहीं, बल्कि व्यापक प्रसार और फैलाव को भी दर्शाता है।

  • तीर्थंकर की दिव्यध्वनि केवल सीमित स्थान तक नहीं रहती, बल्कि समस्त लोक में प्रवाहित होती है।

  • यह विस्तारित दिव्यध्वनि, जो सम्पूर्ण संसार में ज्ञान की गूंज पैदा करती है, "पर्येमि" से अभिव्यक्त की जा सकती है।

✅ संभावित व्याख्या: "पर्येमि" = तीर्थंकर की विश्वव्यापी दिव्यध्वनि, जो सम्पूर्ण लोक में धर्म और आत्मज्ञान का प्रसार करती है।

3️⃣ क्या यह अर्थ ऋग्वेद 7.18.22 के व्याकरण में सही बैठता है?

📌 मूल वाक्यांश: "होतेव सद्म पर्येमि रेभन्"

👉 "होतेव" (यज्ञकर्ता के समान), 👉 "सद्म" (आश्रय, मोक्ष), 👉 "पर्येमि" (चारों ओर व्याप्त होना), 👉 "रेभन्" (गूंजना, ध्वनि करना)।

✅ संभावित अर्थ: "मैं यज्ञकर्ता के समान मोक्ष की ओर बढ़ रहा हूँ और मेरी वाणी (दिव्यध्वनि) सम्पूर्ण जगत में गूंज रही है।"

🔷 निष्कर्ष:

  • "रेभन्" और "पर्येमि" तीर्थंकर की दिव्यध्वनि के लिए उपयुक्त हैं।

  • इस ऋचा में लौकिक युद्ध के साथ-साथ आत्मा के मोक्षमार्ग की गहरी आध्यात्मिक व्याख्या छिपी हुई है।

👉 अर्थ:

➡️ दो प्रकार के जीव (द्वे नप्तुः) – एक जो संसार में बंधे हैं और दूसरे जो मोक्षमार्ग पर हैं, देवत्व प्राप्त कर पूर्णता (शते) की ओर बढ़ते हैं। ➡️ गौ (इन्द्रियाँ) और दो रथ (ज्ञानेंद्रियाँ व कर्मेंद्रियाँ) आत्मा के लिए मार्गदर्शक हैं— यदि संयमित हों, तो मोक्ष की ओर ले जाते हैं। ➡️ वधूमन्त (मुक्तिवधू) का अर्थ आत्मा की मोक्ष प्राप्ति है, जो संयम और तपस्या के माध्यम से संभव होती है। ➡️ सुदास वह आत्मा है, जिसने संयम, धर्म और ज्ञान के बल पर दशराज्ञ युद्ध (इन्द्रियों के संघर्ष) में विजय प्राप्त कर ली है। ➡️ अर्हन्नग्ने – वह दिव्य अग्नि, जो आत्मा को शुद्ध कर उसे "अर्ह" (मोक्षगामी) बनाती है। ➡️ पैजवनस्य दानं – मोक्ष मार्ग पर अग्रसर आत्मा का सबसे बड़ा दान, अर्थात राग-द्वेष का त्याग। ➡️ होतेव – यह आत्मा तपस्वी यज्ञकर्ता के समान है, जो संसार रूपी अग्नि में अपने बंधनों का त्याग कर रहा है। ➡️ सद्म – यह आत्मा का परमगति (मोक्ष) है, जो परम विश्रांति का स्थान है। ➡️ पर्येमि रेभन् – यह तीर्थंकर की दिव्यध्वनि है, जो सम्पूर्ण लोक में गूँजती है और मोक्षमार्ग का संकेत देती है।

🔷 ऋचा का अंतिम समग्र अर्थ

➡️ यह मंत्र आत्मा के मोक्षमार्ग की मंगलकामना करता है। ➡️ यह आत्मबल, सम्यक् दृष्टि, सम्यग्ज्ञान, कर्म-निर्जरा और तीर्थंकर वाणी के माध्यम से आत्मोत्थान की दिशा में प्रेरित करता है। ➡️ यह युद्ध केवल लौकिक युद्ध नहीं, बल्कि आत्मा और इन्द्रियों के संघर्ष का प्रतीक भी है।

🔷 निष्कर्ष: 🚩 यह ऋचा केवल दशराज्ञ युद्ध का संदर्भ नहीं, बल्कि आत्मा के मोक्षमार्ग की यात्रा को भी दर्शाती है। 🚩 "शते" केवल "सौ" नहीं, बल्कि पूर्णता का संकेत करता है। 🚩 "अर्हन्नग्ने" आत्मा की पूर्ण शुद्धता को इंगित करता है। 🚩 "गौ," "द्वौ रथौ" इन्द्रिय संयम और ज्ञानार्जन को दर्शाते हैं। 🚩 "वधूमन्त" मोक्षलक्ष्मी की प्राप्ति को इंगित करता है। 🚩 "सुदास" संयम और धर्म का प्रतीक है। 🚩 "दशराज्ञ युद्ध" आत्मा और इन्द्रियों के संघर्ष का प्रतीक है। 🚩 "पर्येमि रेभन्" तीर्थंकर की दिव्यध्वनि है, जो संपूर्ण जगत में गूँजती है और मोक्षमार्ग की ओर प्रेरित करती है।

वेद विज्ञान लेखमाला: समन्वित दृष्टिकोण- ऋग्वेद एवं अन्य वेदों से सम्बंधित लेखों की सूचि

 
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Jyoti Kothari 
(Jyoti Kothari, Proprietor, Vardhaman Gems, Jaipur represents Centuries Old Tradition of Excellence in Gems and Jewelry. He is an adviser at Vardhaman Infotech, a leading IT company in Jaipur. He is also ISO 9000 professional)

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