भूमिका
यजुर्वेद (18.27) का यह मंत्र वैदिक संस्कृति में पशुपालन, कृषि, और यज्ञ की महत्ता को दर्शाता है। इसमें उत्तम बैल, गाय, और अन्य पशुओं की प्राप्ति की प्रार्थना की गई है, जो प्राचीन भारतीय समाज की आर्थिक एवं आध्यात्मिक समृद्धि का प्रतीक थे। वैदिक परंपरा में पशुओं को केवल कृषि एवं दुग्ध उत्पादन के साधन के रूप में ही नहीं, बल्कि धार्मिक अनुष्ठानों, यज्ञीय कर्मों, एवं सामाजिक उन्नति के लिए भी महत्वपूर्ण माना गया है।
इस मंत्र का व्याकरणीय विश्लेषण करने से इसके प्रत्येक पद का शाब्दिक, धात्विक, एवं भाषिक अर्थ स्पष्ट होता है। साथ ही, "ऋषभ" शब्द का विशेष महत्व है, जो जैन परंपरा में प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव के रूप में भी प्रतिष्ठित है। भगवान ऋषभदेव ने कृषि, पशुपालन, और विभिन्न कलाओं की शिक्षा देकर मानव सभ्यता की नींव रखी, जिससे यह मंत्र जैन दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण बन जाता है।
असि, मसि, कृषि के आद्य प्रणेता ऋषभदेव: मानव सभ्यता और समाज निर्माण के आधारस्तंभ
इस लेख में हम इस मंत्र के संहितापाठ, पदपाठ, व्याकरणीय विश्लेषण, अन्वय, एवं वैदिक संदर्भों का अध्ययन करेंगे। साथ ही, जैन दर्शन के दृष्टिकोण से इसकी व्याख्या करेंगे, जिससे यह स्पष्ट होगा कि यह मंत्र केवल लौकिक अर्थ तक सीमित नहीं है, बल्कि आध्यात्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी गहरी अंतर्दृष्टि प्रदान करता है।
यजुर्वेद मंत्र (18.27) का विस्तृत व्याकरणीय विश्लेषण - भाग 1
(🔹 भाग 1: मंत्र पाठ, पदपाठ एवं व्याकरणीय विश्लेषण)
1. संहितापाठ एवं पदपाठ
संहितापाठ:
"प॒ष्ठ॒वाट् च॑ मे पष्ठौ॒ही च॑ मऽउ॒क्षा च॑ मे व॒शा च॑ मऽऋष॒भश्च॑ मे वे॒हच्च॑ मेऽन॒ड्वाँश्च॑ मे धेनु॒श्च॑ मे य॒ज्ञेन॑ कल्पन्ताम् ॥२७ ॥"
पदपाठ:
"प॒ष्ठ॒वाडिति॑ पष्ठ॒ऽवाट्। च॒। मे॒। प॒ष्ठौ॒ही। च॒। मे॒। उ॒क्षा। च॒। मे॒। व॒शा। च॒। मे॒। ऋ॒ष॒भः। च॒। मे॒। वे॒हत्। च॒। मे॒। अ॒न॒ड्वान्। च॒। मे॒। धे॒नुः। च॒। मे॒। य॒ज्ञेन॑। क॒ल्प॒न्ता॒म् ॥"
2. पदों का व्याकरणीय विश्लेषण
शब्द | वर्ण विचार (उच्चारण) | रूप विचार (शब्द रूप) | व्याकरण (विभक्ति, लिंग, वचन) | सामान्य अर्थ |
---|---|---|---|---|
पष्ठवाट् | प॒ष्ठ॒-वा-ट् | पष्ठवाट् (संयुक्त शब्द) | पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन | अच्छा बैल, उत्तम पशु |
च | च॑ | अव्यय | - | और, तथा |
मे | मे॒ | सर्वनाम | चतुर्थी विभक्ति, एकवचन | मेरे लिए |
पष्ठौही | प॒ष्ठौ॒ही | पष्ठौही | स्त्रीलिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन | अच्छी गाय |
उक्षा | उ॒क्षा | उक्षा (धातु "उक्ष" से बना) | पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन | साँड, बैल |
वशा | व॒शा | वशा | स्त्रीलिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन | दुधारू गाय |
ऋषभः | ऋ॒ष॒भः | ऋषभ (विशेषण) | पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन | श्रेष्ठ, बलशाली बैल |
वेहत् | वे॒हत् | वेहत् | पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन | विशिष्ट बैल |
अनड्वान् | अ॒न॒ड्वान् | अनड्वान् | पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन | हल में जोता न गया बैल |
धेनुः | धे॒नुः | धेनु | स्त्रीलिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन | गाय |
यज्ञेन | य॒ज्ञेन॑ | यज्ञ | तृतीया विभक्ति, एकवचन | यज्ञ के द्वारा |
कल्पन्ताम् | क॒ल्प॒न्ता॒म् | कल्प् (धातु) | लोट लकार, प्रार्थनार्थक रूप, बहुवचन | योग्य हो, अनुकूल हों |
3. अन्वय
"पष्ठवाट् च मे, पष्ठौही च मे, उक्षा च मे, वशा च मे, ऋषभः च मे, वेहत् च मे, अनड्वान् च मे, धेनुः च मे, यज्ञेन कल्पन्ताम्।"
🔹 सरल अन्वय:
"अच्छे बैल, अच्छी गाय, बलशाली बैल, विशिष्ट बैल, हल में न जोता गया बैल, दुधारू गाय – ये सब मेरे लिए यज्ञ से अनुकूल हों।"
4. व्याकरणीय विशेषताएँ और विशेष व्याख्या
- पष्ठवाट्, उक्षा, वशा, ऋषभ, वेहत, अनड्वान, धेनु – सभी संज्ञाएँ हैं।
- यज्ञेन – तृतीया विभक्ति में "करण कारक" है, अर्थात यज्ञ के माध्यम से इनका कल्याण हो।
- कल्पन्ताम् – लोट लकार में बहुवचन रूप, जो इच्छा या प्रार्थना का सूचक है।
यजुर्वेद मंत्र (18.27) का विस्तृत विश्लेषण - भाग 2
(🔹 भाग 2: अन्वय पाठ, सामान्य अर्थ एवं वैदिक संदर्भ)
1. अन्वय पाठ (व्याकरणीय क्रम में सार्थक संकलन)
संहितापाठ:
"प॒ष्ठ॒वाट् च॑ मे पष्ठौ॒ही च॑ मऽउ॒क्षा च॑ मे व॒शा च॑ मऽऋष॒भश्च॑ मे वे॒हच्च॑ मेऽन॒ड्वाँश्च॑ मे धेनु॒श्च॑ मे य॒ज्ञेन॑ कल्पन्ताम् ॥२७ ॥"
अन्वय (व्याकरण के अनुसार क्रमबद्धता):
"पष्ठवाट् च मे कल्पन्ताम्, पष्ठौही च मे कल्पन्ताम्, उक्षा च मे कल्पन्ताम्, वशा च मे कल्पन्ताम्, ऋषभः च मे कल्पन्ताम्, वेहत् च मे कल्पन्ताम्, अनड्वान् च मे कल्पन्ताम्, धेनुः च मे कल्पन्ताम्। यज्ञेन कल्पन्ताम्।"
🔹 सरल अन्वय:
"हे यज्ञ! उत्तम बैल, उत्तम गाय, बलशाली बैल, विशेष बैल, हल में न जोता गया बैल, दुधारू गाय – ये सब मेरे लिए तुम्हारे माध्यम से अनुकूल हो जाएँ।"
स्वामी दयानन्द सरस्वती ने इसका निम्न प्रकार से अर्थ किया है.
2. सामान्य अर्थ एवं व्याख्या
(क) सामान्य अर्थ - लौकिक संदर्भ में
विशेष रूप से यज्ञ के माध्यम से इस मंत्र में उत्तम पशुओं की प्राप्ति की कामना की गई है। पशु, विशेष रूप से बैल और गाय, प्राचीन वैदिक समाज में अत्यंत महत्वपूर्ण थे।
🔹 शब्दों के अर्थ एवं संदर्भ:
- पष्ठवाट् – उत्तम बैल, जो खेती एवं भार वहन के लिए उपयुक्त हो।
- पष्ठौही – उत्तम गाय, जो दूध देने में श्रेष्ठ हो।
- उक्षा – बलशाली साँड, प्रजनन एवं कृषि कार्य के लिए उपयोगी।
- वशा – विशेष रूप से उपयोगी गाय, जो अधिक दूध देती हो।
- ऋषभः – सर्वोत्तम बैल, नेतृत्व करने वाला पशु।
- वेहत् – बलवान, विशिष्ट प्रजाति का बैल।
- अनड्वान् – ऐसा बैल जिसे हल में न जोता गया हो, शुद्ध एवं स्वतंत्र।
- धेनुः – गाय, जो पोषण एवं समृद्धि का प्रतीक है।
- यज्ञेन कल्पन्ताम् – इन सभी पशुओं को यज्ञ के द्वारा अनुकूल बनाया जाए, जिससे वे हमारे जीवन में समृद्धि लाएँ।
👉 वैदिक संस्कृति में, यज्ञ के माध्यम से समृद्धि की प्राप्ति की कामना की जाती थी, जिसमें उत्तम पशुधन की प्राप्ति अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती थी।
(ख) वैदिक संदर्भ एवं पुरातन संस्कृति में इस मंत्र का स्थान
- पशुधन का महत्व: वैदिक काल में पशुधन समृद्धि एवं शक्ति का प्रतीक था। उत्तम बैल एवं गायें कृषि एवं दुग्ध उत्पादन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती थीं।
- यज्ञ की भूमिका: यह मंत्र इस विश्वास को प्रकट करता है कि यज्ञ करने से श्रेष्ठ पशु प्राप्त हो सकते हैं, जो समाज की उन्नति के लिए आवश्यक हैं।
- ऋषभ का महत्त्व: "ऋषभ" शब्द का प्रयोग वैदिक साहित्य में श्रेष्ठता, अग्रणी शक्ति एवं आध्यात्मिक नेतृत्व के लिए किया जाता है।
3. वैदिक मंत्रों से तुलनात्मक दृष्टि
✅ ऋग्वेद में भी पशुधन की समृद्धि के लिए मंत्र मिलते हैं, जैसे –
- ऋग्वेद (1.162.2): "गोमन्तं अनड्वानं अश्वावन्तं हविष्मन्तं पुरुषं न इष्टे।"
- इसमें भी गो, अनड्वान, अश्व एवं अन्य पशुओं की प्राप्ति की कामना की गई है।
✅ यजुर्वेद में पशुधन और यज्ञ का संबंध कई मंत्रों में दिखता है, जैसे –
- यजुर्वेद (12.71): "धेनुर्मे रसमायुषं दधातु।"
- यहाँ धेनु (गाय) को आयु एवं रस (जीवनशक्ति) देने वाली बताया गया है।
📌 स्पष्ट है कि वैदिक परंपरा में पशुओं को केवल आर्थिक साधन ही नहीं, बल्कि धार्मिक एवं आध्यात्मिक उन्नति का भी कारक माना गया है।
निष्कर्ष
✅ यज्ञ को इन पशुओं की वृद्धि एवं शुद्धि का माध्यम माना गया है।
✅ ऋषभ (श्रेष्ठ बैल) यहाँ विशेष स्थान रखता है, जो जैन परिप्रेक्ष्य में भी महत्वपूर्ण होगा।
यजुर्वेद मंत्र (18.27) का विस्तृत विश्लेषण - भाग 3
(🔹 भाग 3: जैन दृष्टि से विश्लेषण एवं निष्कर्ष)
1. मंत्र में "ऋषभ" का जैन दृष्टि से विश्लेषण
मूल मंत्र:
"प॒ष्ठ॒वाट् च॑ मे पष्ठौ॒ही च॑ मऽउ॒क्षा च॑ मे व॒शा च॑ मऽऋष॒भश्च॑ मे वे॒हच्च॑ मेऽन॒ड्वाँश्च॑ मे धेनु॒श्च॑ मे य॒ज्ञेन॑ कल्पन्ताम् ॥२७ ॥"
🔹 "ऋषभ" शब्द की व्याख्या:
-
वैदिक दृष्टि से:
- यहाँ "ऋषभ" का सामान्य अर्थ है श्रेष्ठ बैल, जो कृषि एवं पशुधन के लिए उपयोगी होता है।
- वैदिक साहित्य में "ऋषभ" का प्रयोग बलशाली, सर्वोत्तम, एवं नेतृत्वकर्ता के रूप में किया जाता है।
-
जैन दृष्टि से:
- जैन परंपरा में "ऋषभ" केवल एक बलशाली बैल का प्रतीक नहीं, बल्कि प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव का नाम है।
- भगवान ऋषभदेव ही प्रथम युगपुरुष माने जाते हैं, जिन्होंने मनुष्यों को कृषि, पशुपालन, लेखन, शस्त्रविद्या (असि), व्यापार (वाणिज्य) और अन्य आवश्यक कलाओं का ज्ञान दिया।
- जैन आगमों के अनुसार, ऋषभदेव ने मानव समाज को सर्वप्रथम संगठित एवं शिक्षित किया।
- यह मंत्र इस विचार को संकेत कर सकता है कि ऋषभदेव के मार्गदर्शन से मानव जाति ने पशुपालन, कृषि आदि की व्यवस्था सीखी।
🔹 संभावित जैन-वैदिक संबंध:
- यदि "ऋषभ" का अर्थ केवल "श्रेष्ठ बैल" लिया जाए, तब भी यह ऋषभदेव के युग में हुई कृषि क्रांति का प्रतीक हो सकता है।
- यदि "ऋषभ" को प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव के रूप में लिया जाए, तो यह मंत्र उनकी शिक्षा, कृषि संस्कृति, एवं समाज व्यवस्था को प्रतिबिंबित करता है।
2. यज्ञ और जैन परिप्रेक्ष्य
मंत्र में "यज्ञ" का प्रयोग:
"य॒ज्ञेन॑ कल्पन्ताम्" – वैदिक दृष्टि से इस मंत्र में यहाँ "यज्ञ" के माध्यम से पशुधन की समृद्धि की बात कही गई है।
🔹 जैन दृष्टि से यज्ञ का अर्थ:
-
वेदों में यज्ञ:
- ऐसा कहा जाता है की वैदिक यज्ञों में प्राचीनकाल में पशुबलि दी जाती थी।
- यह मंत्र पशुओं की समृद्धि की प्रार्थना कर रहा है, जो संभवतः यज्ञीय पशुबलि के विरोध में कहा गया हो।
- जैन धर्म वैदिक पशुबलि-प्रधान यज्ञों का विरोध करता है.
-
जैन दृष्टि से यज्ञ:
- "यज्ञ" का वास्तविक अर्थ है – आत्मशुद्धि एवं सत्य की साधना।
- जैन धर्म में यज्ञ = अहिंसा, दान, त्याग, स्वाध्याय एवं तप।
- यह मंत्र ऋषभदेव द्वारा स्थापित अहिंसा पर आधारित कृषि एवं समाज संरचना को भी प्रतिबिंबित करता है।
3. अन्य पदों का जैन संदर्भ में विश्लेषण
वैदिक शब्द | लौकिक संदर्भ | जैन संदर्भ |
---|---|---|
पष्ठवाट् (श्रेष्ठ बैल) | उत्तम कृषि बैल | ऋषभदेव द्वारा स्थापित कृषि संस्कृति |
पष्ठौही (श्रेष्ठ गाय) | उत्तम दुग्ध गाय | गौ-पालन एवं अहिंसक समाज निर्माण |
उक्षा (साँड) | बलशाली पशु | ऋषभदेव द्वारा सिखाई गई कृषि में प्रयुक्त |
वशा (दुग्धगाय) | दूध देने वाली गाय | गौ-पालन से प्राप्त आहार व्यवस्था |
अनड्वान (हल में न जोता गया बैल) | स्वतंत्र बैल | आत्म-संयम एवं मोक्ष-मार्ग का प्रतीक |
धेनु (गाय) | दूध देने वाली माता | अहिंसा, करुणा एवं परोपकार का प्रतीक |
ऋषभ | श्रेष्ठ बैल | ऋषभदेव – प्रथम तीर्थंकर, जिन्होंने सभ्यता को दिशा दी |
यज्ञेन कल्पन्ताम् (यज्ञ द्वारा योग्य हों) | यज्ञ के माध्यम से पशुधन का विकास | अहिंसा, त्याग, तपस्या द्वारा समाज उन्नति |
4. निष्कर्ष – जैन दृष्टि से मंत्र का व्यापक अर्थ
📌 1. "ऋषभ" शब्द का प्रयोग बैल के लिए नहीं, बल्कि शिक्षा प्रवर्तक प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव के लिए भी किया गया है.
📌 2. यह मंत्र कृषि एवं पशुपालन के विकास की बात करता है, जो ऋषभदेव द्वारा स्थापित सभ्यता के अनुरूप है।
📌 3. "यज्ञ" का अर्थ यहाँ आत्म-संयम, शुद्धि एवं धर्म का पालन भी लिया जा सकता है, जो जैन दृष्टि से स्वीकार्य है।
📌 4. पशुबलि-प्रधान यज्ञों का विरोध करते हुए, इस मंत्र में पशुओं की समृद्धि की बात की गई है, जो अहिंसक समाज व्यवस्था की ओर संकेत करता है।
अतः यह मंत्र वैदिक कृषि, ऋषभदेव की शिक्षाओं, एवं अहिंसा आधारित सामाजिक व्यवस्था के बीच एक महत्वपूर्ण संबंध स्थापित कर सकता है।
📌 इस मंत्र का व्यापक अर्थ यह दर्शाता है कि भगवान ऋषभदेव द्वारा स्थापित सामाजिक व्यवस्था और वैदिक युग की कृषि आधारित संरचना में कई समानताएँ थीं।
📌 यज्ञ, कृषि, एवं पशुपालन को ऋषभदेव की शिक्षाओं से जोड़कर देखा जा सकता है, जो अहिंसा एवं समाज-व्यवस्था की आधारशिला बने।
✅ भाग 2: अन्वय पाठ, सामान्य अर्थ एवं वैदिक संदर्भ।
✅ भाग 3: जैन दृष्टि से गहन विश्लेषण एवं निष्कर्ष।
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