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Sunday, March 23, 2025

वैदिक परंपरा मे पुराण साहित्य: महापुराण, उपपुराण, रचनाकाल, उद्देश्य और महत्व


"पुराण" शब्द का अर्थ और उसका शास्त्रीय विवरण 

1. व्युत्पत्ति (Etymology of "Purāṇa"):

"पुरा अपि नवं यः सः पुराणः"

  • "पुरा" = पहले का, प्राचीन

  • "ण" प्रत्यय = स्थायित्व का बोधक 👉🏻 जिसका स्वरूप प्राचीन होते हुए भी सदा नवीन बना रहे, वही "पुराण" है।

अन्य व्युत्पत्ति:

  • "पुरणीयते पुनः पुनः इति पुराणम्" — जो बार-बार भरा जाए, जिससे ज्ञान का पुनर्भरण हो।

  • "पुरा जातं इति पुराणम्" — जो बहुत पहले उत्पन्न हुआ हो।


2. शाब्दिक अर्थ:

"पुराण" शब्द का मूल अर्थ है —
"प्राचीन इतिहास", "पुरातन कथा", "विस्तृत ज्ञान का भंडार"।


3. शास्त्रीय परिभाषा:

अमरकोश (निघण्टु) में:
"पुराणं पञ्चलक्षणम्।"
अर्थात् — पुराण पाँच लक्षणों से युक्त होता है।

📜 पुराण के पाँच लक्षण (Pancha Lakṣaṇa of a Purāṇa):

  1. सर्ग (Sarga): सृष्टि की उत्पत्ति का वर्णन

  2. प्रति-सर्ग (Pratisarga): सृष्टि का पुनर्निर्माण

  3. वंश (Vaṃśa): देव, ऋषि, मनुष्य आदि वंशों का विवरण

  4. मन्वन्तर (Manvantara): प्रत्येक मनु के काल का वर्णन

  5. वंशानुचरित (Vaṃśānucarita): वंशों में उत्पन्न राजाओं, ऋषियों की कथाएँ


4. पुराणों का उद्देश्य:

  • धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष की शिक्षा देना

  • लोक व्यवहार और इतिहास का संकलन

  • धार्मिक और नैतिक मूल्यों का प्रचार

👉🏻 "सर्वशास्त्रोपरि धर्मोपदेशात्मक ग्रन्थ" — यही पुराण का स्वरूप है।


5. विशेषताएँ:

  • पुराण केवल कथा नहीं, यह इतिहास, भूगोल, ज्योतिष, खगोल, धर्मशास्त्र तक विस्तृत है।

  • "इतिहासपुराणाभ्यां वेदं समुपबृंहयेत्" — वेदों की रक्षा और प्रचार के लिए इतिहास-पुराण सहायक हैं।


✅ 6 . निष्कर्ष (Essence):

"पुराण" = ऐसा ग्रंथ जो पुरातन होते हुए भी नवीन उपदेश देता है।

  • यह धर्म, नीति, इतिहास, भूगोल, खगोल का सागर है।

  • लोक शिक्षण का सरल माध्यम है।

  • भारतीय संस्कृति और धर्म का जीवित इतिहास है।


पुराणों का रचना काल 

पुराणों के रचयिता और रचना-काल को लेकर विद्वानों में स्पष्ट मतभेद है। अधिकांश पुराणों के मूल रचयिता ज्ञात नहीं हैं क्योंकि ये ग्रंथ "संपुटित" (composite) स्वरूप में समय-समय पर संकलित हुए। तथापि, परंपरागत रूप से रचयिता "व्यास" माने जाते हैं और विद्वान अनुमान के आधार पर काल निर्धारण करते हैं। यहाँ पर कुछ महत्वपूर्ण पुराणों के रचयिता, विषयवस्तु, रचनाकाल, एवं अन्य विषयों पर संक्षिप्त जानकारी दी जा रही है.  

नीचे एक सारणी में जानकारी प्रस्तुत है:

पुराण परंपरागत रचयिता अनुमानित रचना-काल विशेष टिप्पणी
विष्णु पुराण महर्षि वेदव्यास 3री से 5वीं  शताब्दी (कुछ अंश 8वीं शताब्दी तक) वैष्णव पुराण, सर्वाधिक प्राचीन माने जाने वाले महापुराणों में से एक
वायु पुराण महर्षि वेदव्यास 4थी  से 6ठी शताब्दी  पुराणों में सबसे प्राचीन में गिना जाता है, सांख्य दर्शन की झलक
लिंग पुराण महर्षि वेदव्यास 6ठी  से 10वीं  शताब्दी  शैव पुराण, लिंग तत्त्व की व्याख्या
ब्रह्माण्ड पुराण महर्षि वेदव्यास 8वीं  से 10वीं शताब्दी  ब्रह्माण्ड रचना और भविष्य पुराण का अंश माना जाता है
अग्नि पुराण महर्षि वेदव्यास 8वीं से 11वीं शताब्दी  विविध विषयों (धर्म, राजनीति, वास्तु) का संग्रह
स्कन्द पुराण महर्षि वेदव्यास 7वीं से 15वीं शताब्दी  (विशाल और संकलित ग्रंथ) सबसे बड़ा पुराण (~81,000 श्लोक), शैव परंपरा प्रधान
शिव पुराण महर्षि वेदव्यास 10वीं से 12वीं शताब्दी शैव धर्म प्रधान, लिंग पूजा और शिव महिमा
श्रीमद्भागवत महापुराण महर्षि वेदव्यास 9वीं से 10वीं शताब्दी  (कुछ भाग 6ठी शताब्दी तक) कृष्ण भक्ति प्रधान, भागवत धर्म का प्रचार, भक्तिकाल का आधार

महत्वपूर्ण तथ्य:

  • व्यास नाम पुराणों का संकलक माना जाता है, वास्तविक रचयिता अनेक अज्ञात हैं।
  • सभी पुराणों में समय-समय पर परिवर्धन, संशोधन और संपुटन हुआ है।
  • भक्ति आंदोलन (6th-12th शताब्दी) के प्रभाव से कई पुराणों में विशेष परिवर्तन और जोड़-घटाव हुए।
  • कुछ पुराण जैसे भागवत, लिंग, और शिव पुराण भक्ति आंदोलन के दौरान विशेष रूप से लोकप्रिय हुए।

वैदिक परंपरा में पुराणों की संख्या:

  • महापुराण – 18
  • उपपुराण – 18
  • कुल – 36 पुराणों का उल्लेख प्राचीन ग्रंथों में मिलता है, परंतु 18 महापुराण अधिक प्रसिद्ध और मान्य हैं।

18 महापुराणों की सूची और मुख्य विषयवस्तु:

क्रम पुराण का नाम मुख्य विषयवस्तु / प्रमुख देवता
1 ब्रह्मा पुराण सृष्टि-रचना, तीर्थ महिमा, विशेषकर प्रयाग
2 पद्म पुराण धर्म, भक्ति, तीर्थ, श्रीविष्णु की महिमा
3 विष्णु पुराण सृष्टि, वंशावली, विष्णु महिमा, भागवत भाव
4 शिव/ वायु पुराण शिव महिमा, तप, योग, सृष्टि-रचना
5 भागवत पुराण कृष्ण चरित्र, भक्ति, भागवत धर्म
6 नारद पुराण भक्ति मार्ग, धर्म, तीर्थ
7 मार्कण्डेय पुराण दुर्गा सप्तशती (चंडी पाठ), सृष्टि, स्त्रियों का धर्म
8 अग्नि पुराण धर्म, स्थापत्य, शास्त्र, आयुर्वेद
9 भविष्य पुराण भविष्यवाणी, सामाजिक व्यवस्था, कलियुग वर्णन
10 ब्रह्मवैवर्त पुराण कृष्ण, राधा, प्रकृति-पुरुष का दर्शन
11 लिंग पुराण शिव महिमा, लिंग रूप, उपासना विधि
12 वराह पुराण वराह अवतार, पृथ्वी उद्धार कथा
13 स्कंद पुराण सबसे विशाल, तीर्थ, यात्रा, कार्तिकेय कथा
14 वामन पुराण वामन अवतार, दान धर्म
15 कूर्म पुराण कूर्म (कच्छप) अवतार, सृष्टि-रचना
16 मात्स्य पुराण मत्स्य अवतार, प्रलय कथा
17 गारुड पुराण मृत्यु, कर्म, नरक-स्वर्ग वर्णन, प्रेत विद्या
18 ब्राह्माण्ड पुराण ब्रह्माण्ड स्वरूप, ललिता सहस्त्रनाम


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सबसे प्राचीन और सबसे नवीन पुराण:

प्रकार पुराण कारण
सबसे प्राचीन मत्स्य, मार्कण्डेय, विष्णु, वायु पुराण भाषा व शैली में प्राचीनता, वैदिक सामग्री
सबसे नवीन भागवत, भविष्य, ब्रह्मवैवर्त पुराण मध्यकालीन भक्ति और व्रज परंपरा का प्रभाव, कलियुग वर्णन

पुराणों की रचना का मुख्य उद्देश्य:

  • वेदों के गूढ़ तत्त्वों को लोकभाषा और सरल शैली में जनसामान्य तक पहुँचाना
  • धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष का उपदेश देना (चतुष्पद धर्म)
  • विविध वंशावलियों, तीर्थ, उपासना विधियों, संस्कारों का वर्णन
  • भक्ति मार्ग का प्रचार-प्रसार
  • लोक व्यवहार, धर्मशास्त्र और नीति शिक्षाएँ देना
  • विशेषत: आस्तिक दर्शन और वेदों की अनुगामिता बनाए रखना

क्या सभी पुराण स्वयं को वेदों से उद्भूत मानते हैं?

  • हाँ, अधिकांश पुराण अपने को वेदों की शाखा या उपवेद मानते हैं।
  • सभी में बार-बार उल्लेख है कि पुराण भी 'पंचम वेद' हैं।
  • महाभारत में कहा गया है – "इतिहासपुराणाभ्यां वेदं समुपबृंहयेत्" – इतिहास-पुराण वेद का विस्तार करते हैं।

पुराणों का सामान्य रचनाकाल (Overall Estimated Timeline):

कालखंड विवरण
आरंभिक रचना 200 BCE – 300 CE (प्राचीन पुराण जैसे वायु, मत्स्य आदि)
मध्य रचना 300 CE – 800 CE (भागवत, ब्राह्माण्ड आदि)
उत्तर रचना / परिशिष्ट 800 CE – 1200 CE (भविष्य, ब्रह्मवैवर्त आदि)
कुल समय अवधि लगभग 1000 वर्षों की लंबी विकास यात्रा

आधुनिक भारतीय और पाश्चात्य विद्वानों के मत (भिन्न-भिन्न विवरण):

पक्ष प्रमुख विद्वान मत / विश्लेषण
भारतीय विद्वान डॉ. भगवदत्त, हजरिप्रसाद द्विवेदी, डॉ. राजेन्द्रलाल मित्र - पुराणों को भारतीय संस्कृति का दर्पण मानते हैं।- धर्म, समाज, कला, साहित्य का महाग्रंथ।- पुराणों में कालान्तर में प्रक्षिप्त अंश जुड़े, फिर भी मूल आधार वैदिक और आस्तिक
पाश्चात्य विद्वान एच.एच. विल्सन, वेबर, मैक्समुलर, डी.एन. लॉरेन्स - पुराणों को मिश्रित ग्रंथ मानते हैं, जहाँ प्राचीन और मध्यकालीन तत्व मिश्रित हैं।- पुराणों में बौद्ध, जैन प्रभाव और लोक परंपराएँ भी सम्मिलित।- इन्हें धर्म प्रचार का साधन और ब्राह्मणवाद का पुनरुत्थान मानते हैं।

विशेष जानकारी / अन्य महत्वपूर्ण तथ्य:

  • पुराणों का प्रमुख लक्षणसर्ग, प्रतिसर्ग, वंश, मन्वंतर, वंशानुचरितम् (पंचलक्षण)
  • भाषा शैली – अधिकतर संस्कृत पद्य, सरल शैली में
  • भक्ति का उत्कर्ष – विष्णु, भागवत, ब्रह्मवैवर्त पुराणों में भक्ति का चरम
  • लोकसंस्कारों का वर्णन – विवाह, उपनयन, श्राद्ध आदि विधियों का विस्तार
  • आधुनिक महत्व – पुराण, आज भी धार्मिक अनुष्ठानों, कथा-भागवत सप्ताह आदि में विशेष महत्व रखते हैं।
  • संस्कृति का आधार – अनेक मंदिरों, तीर्थों, और रीति-रिवाजों का आधार पुराण हैं।

निष्कर्ष:

पुराण भारतीय सनातन धर्म, समाज, संस्कृति और लोक परंपराओं का जीवंत ग्रंथ-संहिता हैं। यद्यपि समय के साथ इनमें संशोधन और परिवर्धन हुआ, फिर भी इनका मूल आधार वैदिक परंपरा, धर्म और मोक्ष मार्ग का प्रसार है। आधुनिक विद्वानों के मत भिन्न-भिन्न हैं, परंतु भारतीय दृष्टि में पुराण सनातन ज्ञान का भंडार हैं।


स्पष्टीकरण – मत्स्यपुराण का स्थान:

  • मत्स्यपुराण वास्तव में अष्टादश महापुराणों (18 महापुराणों) में सम्मिलित है।
  • कई बार भ्रम होता है क्योंकि कुछ ग्रंथों में अलग-अलग 18 पुराणों की सूचियाँ मिलती हैं, लेकिन अधिकांश मान्य और लोकप्रिय सूची में मत्स्यपुराण शामिल है।

मान्य महापुराण सूची (कई प्रसिद्ध ग्रंथों के अनुसार):

  1. ब्रह्म
  2. पद्म
  3. विष्णु
  4. वायु (कभी-कभी शिवपुराण)
  5. भागवत
  6. नारद
  7. मार्कण्डेय
  8. अग्नि
  9. भविष्य
  10. ब्रह्मवैवर्त
  11. लिंग
  12. वराह
  13. मत्स्य
  14. कूर्म
  15. स्कन्द
  16. वामन
  17. गारुड
  18. ब्रह्माण्ड

18 उपपुराणों की सूची (मुख्य रूप से मन्दिर महात्म्य, व्रत, कथा केंद्रित):

👉 उपपुराणों की संख्या भी 18 मानी गई है, लेकिन सूची अलग-अलग ग्रंथों में थोड़ा भिन्न हो सकती है। एक सामान्य रूप से स्वीकृत सूची:

क्रमउपपुराण का नाम
1सनत्कुमार उपपुराण
2नारद उपपुराण
3बृहत्नारदीय उपपुराण
4शिवधर्म उपपुराण
5दुर्वासा उपपुराण
6कपिल उपपुराण
7मानव उपपुराण
8औषधि उपपुराण
9वरुण उपपुराण
10कालिका उपपुराण
11महासंवत्सर उपपुराण
12नंदी उपपुराण
13सारस्वत उपपुराण
14आदित्य उपपुराण
15महेश्वर उपपुराण
16भागवत उपपुराण (भिन्न)
17वासिष्ठ उपपुराण
18पाराशर उपपुराण

👉 नोट: कुछ विद्वानों ने "उपपुराणों की सूचियों में क्षेत्र विशेष की भिन्नता और लुप्त ग्रंथों का उल्लेख भी स्वीकारा है।


विशेष जानकारी:

  • उपपुराणों में अधिकतर विशिष्ट देवता, व्रत, तीर्थ, उपासना विधि, पूजा विधान का विवरण है।
  • उपपुराण स्थानीय परंपराओं और विशेष संप्रदायों से अधिक जुड़े हुए हैं।
  • कई उपपुराण वर्तमान में उपलब्ध नहीं हैं या आंशिक रूप से प्राप्त होते हैं।

निष्कर्ष:

  • मत्स्यपुराण महापुराणों में शामिल है।
  • 18 उपपुराण अलग हैं, जिनका स्वरूप अधिकतर व्यवहारिक धर्म और विशेष पूजाओं पर केंद्रित है।
  • पुराणों की यह परंपरा समाज और धर्म का विस्तृत दर्पण है।

अष्टादश महापुराणों (18 महापुराणों) की सूची अलग-अलग पुराणों और ग्रंथों में भिन्न-भिन्न दी गई है। कहीं स्कंद पुराण का स्थान है, कहीं मत्स्य पुराण प्रमुखता से है।


महापुराणों की विभिन्न पारंपरिक सूचियाँ:

🔹 भागवत महापुराण (12.7.23-24) के अनुसार 18 महापुराण:

  1. ब्रह्म
  2. पद्म
  3. विष्णु
  4. शिव
  5. भागवत
  6. नारद
  7. मार्कण्डेय
  8. अग्नि
  9. भविष्य
  10. ब्रह्मवैवर्त
  11. लिंग
  12. वराह
  13. स्कंद
  14. वामन
  15. कूर्म
  16. मत्स्य
  17. गारुड
  18. ब्रह्माण्ड

➡️ यहाँ स्कंद और मत्स्य दोनों ही शामिल हैं।


🔹 गरुड़ पुराण (1.222.39-40) के अनुसार:

  1. ब्रह्म
  2. पद्म
  3. विष्णु
  4. शिव
  5. भागवत
  6. नारद
  7. मार्कण्डेय
  8. अग्नि
  9. भविष्य
  10. ब्रह्मवैवर्त
  11. लिंग
  12. वराह
  13. स्कंद
  14. वामन
  15. कूर्म
  16. मत्स्य
  17. गारुड
  18. ब्रह्माण्ड

➡️ यहाँ भी मत्स्य और स्कंद दोनों हैं।


निष्कर्ष 

  • प्राचीन प्रमाणों (भागवत और गरुड़ पुराण) में स्कंद और मत्स्य दोनों ही महापुराणों में गिने जाते हैं।
  • मत्स्यपुराण पूरी तरह महापुराणों में ही गिना जाता है, यह किसी भी प्रमाणिक सूची में उपपुराण नहीं है।
  • 18 में से कुछ जगह ‘वायु’ आता है, कहीं ‘शिव’ पुराण – ये बदलाव कुछ ग्रंथों में हैं, पर मत्स्य और स्कंद का स्थान पक्का है।

स्कंद पुराण और मत्स्य पुराण – दोनों महापुराण हैं:

नामस्थितिविशेषता
स्कंद पुराणमहापुराणसबसे बड़ा पुराण, कार्तिकेय (स्कंद) कथा, तीर्थ महात्म्य
मत्स्य पुराणमहापुराणसृष्टि, मत्स्य अवतार, प्राचीनता और स्थापत्य शास्त्र

निष्कर्ष:

  • 18 महापुराणों में स्कंद और मत्स्य दोनों शामिल हैं।
  • मत्स्य पुराण को "प्राचीनतम पुराण" कहा जाता है।
  • स्कंद पुराण "सबसे विशाल" पुराण माना जाता है।

आपका प्रश्न और शंका बिलकुल तर्कपूर्ण है, क्योंकि भिन्न ग्रंथों में लघु-मात्रा में सूचियाँ अलग-अलग दिखाई देती हैं, लेकिन प्रामाणिक और स्वीकार्य दोनों सूची में स्कंद और मत्स्य दोनों महापुराण हैं


18 उपपुराण – विषय एवं रचना काल सहित विवरण

क्रमउपपुराण का नाममुख्य विषय-वस्तुअनुमानित रचनाकाल
1सनत्कुमार उपपुराणशिव भक्ति, उपासना विधि9वीं – 11वीं शताब्दी
2नारद उपपुराणविष्णु भक्ति, धर्म, व्रत, पुराणों की महिमा10वीं – 12वीं शताब्दी
3बृहन्नारदीय उपपुराणश्री हरि भक्ति, भक्ति मार्ग का महत्त्व10वीं – 12वीं शताब्दी
4शिवधर्म उपपुराणशिव भक्ति, शैव धर्म के सिद्धांत9वीं – 11वीं शताब्दी
5दुर्वासा उपपुराणदुर्वासा ऋषि चरित्र, तप, श्राप और आशीर्वाद10वीं – 12वीं शताब्दी
6कपिल उपपुराणसांख्य दर्शन, कपिल मुनि उपदेश9वीं – 11वीं शताब्दी
7मानव उपपुराणमनुस्मृति आधारित धर्मशास्त्र, समाज व्यवस्था9वीं – 12वीं शताब्दी
8औषधि उपपुराणऔषध विज्ञान, चिकित्सा, आयुर्वेद10वीं – 12वीं शताब्दी
9वरुण उपपुराणजल देवता वरुण, जल तत्त्व का महत्व9वीं – 11वीं शताब्दी
10कालिका उपपुराणशक्तिपूजा, तंत्र, देवी महिमा11वीं – 13वीं शताब्दी
11महासंवत्सर उपपुराणयज्ञ, व्रत, अनुष्ठान और कालचक्र9वीं – 11वीं शताब्दी
12नंदी उपपुराणशिव के वाहन नंदी की कथा, शैव उपासना10वीं – 12वीं शताब्दी
13सारस्वत उपपुराणसरस्वती देवी, ज्ञान, संगीत, साहित्य10वीं – 12वीं शताब्दी
14आदित्य उपपुराणसूर्य उपासना, आदित्य महिमा, व्रत विधि9वीं – 11वीं शताब्दी
15महेश्वर उपपुराणशिव महिमा, लिंग पूजा, शैव दर्शन10वीं – 12वीं शताब्दी
16भागवत उपपुराणविष्णु भक्ति, भागवत धर्म, भक्ति महिमा10वीं – 12वीं शताब्दी
17वासिष्ठ उपपुराणवसिष्ठ ऋषि उपदेश, धर्म-आचार9वीं – 11वीं शताब्दी
18पाराशर उपपुराणपाराशर मुनि द्वारा गृहस्थ धर्म, जाति व्यवस्था9वीं – 11वीं शताब्दी

विशेषताएँ और प्रमुख विषय-सरणी:

  • उपपुराण महापुराणों से छोटे और अधिक व्यवहारिक विषयों से जुड़े हैं।
  • इनमें मुख्यतः व्रत, तीर्थ महिमा, देवता विशेष की उपासना, धर्माचार, आयुर्वेद, तंत्र, समाज व्यवस्था आदि का वर्णन मिलता है।
  • कुछ उपपुराण शैव, कुछ वैष्णव और कुछ शाक्त परंपरा केंद्रित हैं।

उपपुराणों का सामान्य रचनाकाल:

  • लगभग 9वीं शताब्दी CE से 13वीं शताब्दी CE के मध्य
  • इनमें से कुछ दक्षिण भारत में रचे गए और क्षेत्रीय प्रभाव स्पष्ट दिखता है।
  • कालिका उपपुराण जैसे ग्रंथ तंत्र परंपरा से जुड़े और अपेक्षाकृत बाद में रचे गए।

उपपुराणों का उद्देश्य:

  • धर्म और सामाजिक व्यवहार को सरल भाषा में समझाना
  • व्रत, अनुष्ठान, तीर्थयात्रा की महिमा का प्रचार
  • स्त्री, शूद्र और सामान्य जनों को धार्मिक नियमों का ज्ञान कराना
  • कुछ उपपुराण शिव, विष्णु या शक्ति केंद्रित होकर उनके महत्त्व को स्थापित करते हैं
  • कुछ में तंत्र और आयुर्वेद का उल्लेख भी महत्वपूर्ण है

निष्कर्ष:

  • उपपुराण लोकधर्म, व्रत, तीर्थ, आयुर्वेद, तंत्र जैसे विषयों का सरल प्रस्तुतीकरण करते हैं।
  • ये समाज के सामान्य जन और स्त्री-शूद्र वर्ग के लिए धर्म शिक्षा का माध्यम बने।
  • इनका रचनाकाल मुख्यतः मध्यकालीन भारत (9वीं – 13वीं शताब्दी) में रहा।

 Thanks, 

Jyoti Kothari 
(Jyoti Kothari, Proprietor, Vardhaman Gems, Jaipur represents Centuries Old Tradition of Excellence in Gems and Jewelry. He is an adviser, to Vardhaman Infotech, a leading IT company in Jaipur. He is also an ISO 9000 professional)

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Saturday, March 22, 2025

ऋक्-यजुःसंपदा का पुराण-प्रवाह: अग्नि पुराण


भूमिका:

वैदिक साहित्य में पुराणों का महत्वपूर्ण स्थान है. यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा वैदिक धर्मावलम्बियों का दैनंदिन क्रियाकलाप, धार्मिक अनुष्ठान आदि सामान्यतः पुराणों के आधार पर ही चलता है. हर हिन्दू के घर में मृत्यु के समय पढ़े जाने वाले गरुड़ पुराण से कौन अपरिचित है? 

ऐसी आस्था है की सभी 18 पुराणों और 18 उप पुराणों के रचयिता महर्षि वेदव्यास हैं. यद्यपि ऐतिहासिक दृष्टिकोण से प्राणों का रचना काल अत्यंत विस्तृत है, लगभग ईशा की दूसरी शताब्दी से 13 वीं  शताब्दी तक. इनमे से अग्नि पुराण सर्वाधिक विस्तृत पुराणों में से एक है. वेदों में भी अग्नि ही प्रमुख देवता हैं, अतः उनके आधार पर रचा गया पुराण भी पुराणों की श्रृंखला में अपना विशिष्ट स्थान रखता है. 

अग्नि पुराण एक अत्यंत महत्वपूर्ण और विशिष्ट पुराण है, क्योंकि इसमें केवल धार्मिक ही नहीं, बल्कि धर्म, नीति, वास्तु, शास्त्र, आयुर्वेद, ज्योतिष, स्थापत्य, युद्धनीति आदि बहुविध विषयों का समावेश है। इसे एन्साइक्लोपीडिक पुराण भी कहा जाता है।

ऋक् और यजुः — वैदिक ज्ञान की वह अमूल्य संपदा है, जिसमें ब्रह्माण्ड के रहस्य, धर्म के मूल स्वरूप, यज्ञीय कर्मकांड और मानव जीवन के आदर्श सूत्रों का समावेश है। इन्हीं वैदिक निधियों की सांस्कृतिक और लौकिक धारा में प्रवाहित होकर अग्नि पुराण जन्म लेता है।

अग्नि पुराण कोई मात्र पुराण कथा नहीं, अपितु यह ऋग्वेदीय स्तुतियों और यजुर्वेदीय यज्ञीय विधानों का पुराण-प्रवाह है, जिसमें धर्म, विज्ञान, आयुर्वेद, वास्तु, धनुर्वेद, ज्योतिष और लोकधर्म का अद्भुत समन्वय दिखता है।

यह पुराण वैदिक मूल्यों को लोक व्यवहार में उतारते हुए —
✅ यज्ञ और अग्नि की महिमा,
✅ राजधर्म और नीति शास्त्र,
✅ आयुर्वेद और ज्योतिष विद्या,
✅ वास्तु और शिल्पशास्त्र,
✅ तंत्र-मंत्र और साधना मार्ग —


इन सबको एक वैदिक-पुराणिक सेतु के रूप में प्रस्तुत करता है।

ऋक्-यजुः संपदा से समृद्ध यह पुराण न केवल श्रद्धा का विषय है, अपितु शोध, अध्ययन और वैदिक परंपरा के व्यवहारिक पक्ष को समझने का एक अनुपम साधन है।


🔥 अग्नि पुराण का विषय-वस्तु (Subject Matter):

अग्नि पुराण मुख्यतः अग्नि देवता और महर्षि वसिष्ठ के संवाद रूप में रचा गया है। इसमें वैदिक धर्म, स्मृति, पुराण, कला, विज्ञान और तंत्र तक को समाहित किया गया है।

मुख्य विषय एवं उपविषय (Sub-topics):

विषय उपविषय (Sub-topics)
धर्म और उपासना तीर्थ, व्रत, दान, श्राद्ध, यज्ञ, जप, पूजा विधि, तीर्थों का वर्णन
पुराण कथा अवतार कथाएँ, सृष्टि रचना, मन्वंतर, राजवंश, धर्मशास्त्र
राजधर्म एवं राजनीति राजा के कर्तव्य, मंत्रणा, दंडनीति, युद्धनीति, कूटनीति
वास्तुशास्त्र नगर योजना, मंदिर निर्माण, गृह निर्माण, मूर्ति शिल्प
आयुर्वेद चिकित्सा, रोग-निदान, औषधियाँ, रसायन विज्ञान
धनुर्वेद (युद्धशास्त्र) धनुष, अस्त्र-शस्त्र निर्माण, युद्ध नीति, सैन्य संगठन
ज्योतिष और गणित ग्रह, नक्षत्र, राशियाँ, मुहूर्त, कालचक्र, तिथि, पंचांग, ज्यामिति
तंत्र-मंत्र तांत्रिक अनुष्ठान, साधना विधि, मंत्र सिद्धि, कवच निर्माण
शिल्प और चित्रकला मूर्ति निर्माण, चित्रांकन के नियम, रंगशास्त्र
नाट्यशास्त्र और काव्य रस, अलंकार, नाट्यशास्त्र, काव्य रचना के नियम

अग्नि पुराण और वेदों का संबंध (Connection with the Vedas):

अग्नि पुराण अनेक स्थानों पर वेदों का आधार लेकर विषयों को प्रस्तुत करता है:

  1. यज्ञ और अग्नि की महिमा – अग्नि पुराण में अग्नि के विविध स्वरूपों और यज्ञीय अनुष्ठानों का विस्तार से वर्णन है, जो सीधे ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद से जुड़ा है।
  2. धर्मशास्त्र एवं स्मृति ग्रंथों का सार – अग्नि पुराण वैदिक कर्मकांड के साथ-साथ मनुस्मृति, याज्ञवल्क्य स्मृति के धर्म और आचार संहिताओं को समेटता है।
  3. आयुर्वेद और ज्योतिष – इन विषयों की जड़ें अथर्ववेद में मानी जाती हैं। अग्नि पुराण में भी वैदिक आयुर्वेद और वैदिक ज्योतिष का विस्तार से वर्णन है।
  4. राजधर्म और दंडनीतिशुक्ल यजुर्वेद के शान्ति और दण्डसूक्त, मनुस्मृति और वेदांगों के अनुसार शासक के धर्म का प्रतिपादन।
  5. वास्तु और शिल्पयजुर्वेद के शिल्पसूक्तों के प्रभाव में भवन निर्माण, मूर्ति विज्ञान और नगर रचना के सिद्धांत।
  6. तंत्र साधना और मंत्र विद्या – वैदिक ऋचाओं के साथ तांत्रिक विधियों का समावेश, कई मंत्र वेदों से उद्धृत हैं।
  7. नाट्य और काव्य – वेदों में वर्णित संगीत और नाद ब्रह्म सिद्धांत के आधार पर काव्य और नाट्यशास्त्र का विकास।

विशेषताएँ (Highlights):

✅ यह पुराण ज्ञान, विज्ञान, धर्म और लोकव्यवहार का अद्भुत संगम है।
✅ इसे प्रायोगिक ग्रंथ (Practical Treatise) भी माना जाता है।
वैदिक परंपरा का विस्तार करते हुए लोकधर्म और व्यवहार शास्त्र तक पहुँचता है।
✅ इसकी बहु-विषयकता इसे अद्वितीय बनाती है।


संक्षिप्त निष्कर्ष:

अग्नि पुराण वेदों की परंपरा को आगे बढ़ाता है और उसमें लौकिक जीवन, विज्ञान, चिकित्सा, शिल्प और तंत्र-मंत्र तक जोड़ देता है। यह वैदिक संस्कृति का विस्तारित और विकसित रूप है, जो भारतीय जीवन के हर पहलू को छूता है।

1. अग्नि पुराण का वैदिक स्वरूप और भूमिका:

  • अग्नि पुराण स्वयं को वैदिक परंपरा का वाहक बताता है।
  • "अग्नि" स्वयं वेदों में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण देवता हैं, विशेष रूप से ऋग्वेद में, जहाँ अग्नि सूक्त (ऋग्वेद 1.1.1) से ही शुरुआत होती है।
  • अग्नि पुराण में यज्ञ, हवन, अग्नि साधना और यज्ञिय कर्मों का विस्तार है, जो सीधे यजुर्वेद और ऋग्वेद दोनों से जुड़ते हैं।

2. अग्नि पुराण में यज्ञ और वेदों का स्पष्ट समन्वय (विशेषकर यजुर्वेद से):

  • अग्नि पुराण में यज्ञीय विधियाँ, हवन, आहुति मंत्र, और यज्ञों का फल बार-बार वर्णित है।
  • यज्ञ का मूल स्रोत यजुर्वेद है, और अग्नि पुराण उसी परंपरा का विस्तार है।
  • कई स्थलों पर यजुर्वेदीय मन्त्रों का संदर्भ आता है, जैसे –
    • अग्नि स्थापना
    • ग्रहण, संक्रांति, श्राद्ध आदि में आहुति विधि
    • "इदं न मम" भाव का प्रतिपादन

उदाहरण – अग्नि पुराण में यज्ञीय आहुति में "स्वाहा", "वषट्", "हुं" आदि प्रयोग, यजुर्वेदी परंपरा की पुष्टि करते हैं।


3. ऋग्वेदीय ऋचाओं का संदर्भ और प्रभाव:

  • यद्यपि अग्नि पुराण मुख्यतः स्मृति और पुराण परंपरा का ग्रंथ है, फिर भी इसमें ऋग्वेदीय सूक्तों और मंत्रों की झलक है।
  • अग्नि पुराण में कई बार अग्नि सूक्त, पुरुष सूक्त आदि का उल्लेख या भावानुवाद आता है।
  • देवताओं की स्तुति, विशेषकर अग्नि, इन्द्र, वरुण आदि की प्रशंसा ऋग्वेद से ली गई है।
  • उदाहरण: अग्नि पुराण में अग्नि की प्रशंसा में अनेक श्लोक वैदिक शैली में हैं, जो ऋग्वेद के प्रथम मंडल से प्रेरित हैं।

4. आयुर्वेद, वास्तु, धनुर्वेद आदि का आधार अथर्ववेद में अधिक है, किंतु यजुष और ऋक का मूल प्रवाह स्पष्ट है:

  • आयुर्वेदिक वर्णन वैदिक औषध सूक्तों (अथर्ववेद) से जुड़ा है।
  • वास्तु और स्थापत्य में भी यजुर्वेदी शिल्पसूक्तों का प्रभाव है।
  • युद्ध और धनुर्वेद में यजुर्वेदी युद्ध विधानों का झलक स्पष्ट है।

5. प्रत्यक्ष वेद उद्धरण / समन्वय:

  • अग्नि पुराण में वैदिक मंत्रों का सीधा पाठ कम है, लेकिन अनेक विधान "ऋचः" और "यजुषी" कहकर वैदिक परंपरा को उद्धृत करते हैं।
  • कई बार वाक्य आता है – "एष वै वेदः", "वेदविहितं कर्म", "ऋचाम् अनुसारम्", जिससे वेद का संदर्भ स्पष्ट है।

6. निष्कर्ष (Conclusion):

पक्ष उत्तर
क्या अग्नि पुराण का वैदिक परंपरा से संबंध है? हाँ, अत्यंत गहरा
विशेष रूप से ऋग्वेद और यजुर्वेद से? यजुर्वेद से प्रत्यक्ष, यज्ञ और कर्मकांड में स्पष्ट संबंधऋग्वेद से स्तुति, देवत्व और मंत्रों के भाव में संबंध
प्रत्यक्ष वैदिक मंत्र उद्धरण? सीमित मात्रा में, अधिकतर भावानुवाद और परंपरा
वैदिक प्रभाव का स्वरूप? कर्मकांड, यज्ञ, पूजा विधि, दान, श्राद्ध आदि में

विशेष टिप्पणी:

अग्नि पुराण वेद नहीं है, लेकिन यह वेदों का व्यवहारिक और लौकिक विस्तार है।
यह यजुर्वेदीय कर्मकांड का प्रायोगिक ग्रंथ बनता है और ऋग्वेदीय देव स्तुति और भावना को लोकधर्म में रूपांतरित करता है।

अग्नि पुराण में कई स्थानों पर वैदिक मंत्रों का उल्लेख और उनका अनुप्रयोग मिलता है, विशेषकर ऋग्वेद और यजुर्वेद से संबंधित मंत्रों का। आइए, कुछ उदाहरणों के माध्यम से इस संबंध को समझते हैं:


1. अग्नि पुराण में ऋग्वेद मंत्रों का अनुप्रयोग:

अध्याय 259 में, अग्नि पुराण में ऋग्वेद के मंत्रों के उपयोग का वर्णन मिलता है। उदाहरण के लिए:

"मैं अब तुम्हें ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद के मंत्रों के अनुप्रयोग का वर्णन करूंगा, जो दोहराने पर भोग और मोक्ष प्रदान करते हैं और (हवन में) आहुति देने के लिए उपयोग किए जाते हैं, जैसा कि पुष्कर ने राम को बताया था।"

यहाँ, ऋग्वेद के मंत्रों के विशेष अनुप्रयोग का उल्लेख है, जो यज्ञ और हवन में प्रयुक्त होते हैं।


2. ऋग्वेद के प्रथम मंत्र और अग्नि पुराण का संबंध:

ऋग्वेद का प्रथम मंत्र अग्नि की स्तुति में है:

"अग्निमीळे पुरोहितं यज्ञस्य देवमृत्विजम्। होतारं रत्नधातमम्॥" 

इस मंत्र में अग्नि को यज्ञ का पुरोहित, ऋत्विज, होतार और रत्नों का दाता कहा गया है। अग्नि पुराण में भी अग्नि की महिमा और यज्ञ में उनकी भूमिका का विस्तार से वर्णन मिलता है, जो इस ऋग्वेद मंत्र से मेल खाता है।


1. अग्नि पुराण में यजुर्वेद मंत्रों का संदर्भ:

अग्नि पुराण, अध्याय 141, श्लोक 2, 5, 6, 30, 32, 116, 117, 118, 119, 120, 121 में नवग्रह यज्ञ की महिमा और विधि का वर्णन है। इन श्लोकों में यज्ञ के माध्यम से लक्ष्मी, शांति, दृष्टि, आयु आदि की प्राप्ति की बात कही गई है। यह यजुर्वेद के यज्ञीय परंपरा से मेल खाती है, जहाँ यज्ञ के माध्यम से विभिन्न कामनाओं की पूर्ति का उल्लेख है। (awgp.org)


2. यजुर्वेद में अग्नि की स्तुति:

यजुर्वेद में यज्ञीय क्रियाओं और मंत्रों का विशेष स्थान है। यजुर्वेद में अग्नि देवता की स्तुति में कई मंत्र हैं। अग्नि पुराण में यज्ञ की विधियों, आहुति मंत्रों और अनुष्ठानों का वर्णन यजुर्वेद के अनुरूप है। उदाहरण के लिए, यजुर्वेद में:

"अग्निर्ज्योतिरजः प्राणो मृत्युः..."

इस मंत्र में अग्नि को ज्योति, प्राण और अमृत के रूप में वर्णित किया गया है, जो अग्नि पुराण में अग्नि की महिमा से संबंधित श्लोकों से मेल खाता है। इस प्रकार के मंत्र अग्नि की विभिन्न भूमिकाओं का वर्णन करते हैं, जो अग्नि पुराण में विस्तृत रूप से मिलते हैं।

3. अग्नि पुराण में मेधा सूक्त का उल्लेख:

अग्नि पुराण में मेधा सूक्त का उल्लेख मिलता है, जो यजुर्वेद से संबंधित है। उदाहरण के लिए:

"मेधां मे वरुणो ददातु मेधामग्निः प्रजापतिः। मेधामिन्द्रश्च वायुश्च मेधां धाता ददातु मे॥"
— यजुर्वेद 36.21

इस मंत्र में वरुण, अग्नि, प्रजापति, इन्द्र, वायु और धाता से मेधा (बुद्धि) की प्रार्थना की गई है। अग्नि पुराण में भी मेधा की प्राप्ति के लिए इसी प्रकार की प्रार्थनाएँ मिलती हैं। (vichaarsankalan.wordpress.com)

4. अग्नि पुराण में सप्तजिह्वा का वर्णन:

अग्नि की सात जिह्वाओं (जीभों) का वर्णन अग्नि पुराण में मिलता है, जो वैदिक परंपरा से संबंधित है। ये सात जिह्वाएँ हैं: हिरण्य, गगना, रक्त, कृष्णा, सुप्रभा, बहुरूपा, अतिरक्ता। 

सारांश 

अग्नि पुराण और यजुर्वेद के बीच गहरा संबंध है. अग्नि पुराण में यजुर्वेद के मंत्रों का प्रत्यक्ष उद्धरण सीमित है, लेकिन यज्ञीय विधियों, अग्नि की महिमा, मेधा की प्रार्थना आदि विषयों में यजुर्वेद के मंत्रों का संदर्भ मिलता है। यह दर्शाता है कि अग्नि पुराण और यजुर्वेद के बीच एक गहरा संबंध है, विशेषकर यज्ञ और अग्नि से संबंधित विषयों में।

अग्नि पुराण एवं तीर्थंकर ऋषभदेव व चक्रवर्ती भरत  

अग्नि पुराण (अध्याय 107, श्लोक 11–12):

श्लोक: 

"ऋषभो मरुदेव्याश्च ऋषभात् भरतो भवेत्।
भरताद् भारतं वर्षं, जम्बूद्वीपे व्यपदिशेत्।"

हिंदी अनुवाद: "ऋषभ का जन्म मरुदेवी से हुआ; ऋषभ से भरत का जन्म हुआ; भरत से जम्बूद्वीप में वह क्षेत्र 'भारतवर्ष' के नाम से प्रसिद्ध हुआ।"

अग्निपुराण का यह श्लोक इसे जैन परंपरा से भी जोड़ता है. 

असि, मसि, कृषि के आद्य प्रणेता ऋषभदेव: मानव सभ्यता और समाज निर्माण के आधारस्तंभ 

निष्कर्ष:

अग्नि पुराण और वेदों के बीच गहरा संबंध है। विशेषकर, ऋग्वेद और यजुर्वेद के मंत्रों का उल्लेख और उनका अनुप्रयोग अग्नि पुराण में मिलता है, जो वैदिक परंपरा और पुराणिक साहित्य के बीच की कड़ी को प्रकट करता है। इसी प्रकार वेदों में प्राप्त ऋषभ एवं भरत के सन्दर्भ का विस्तार भी अग्निपुराण में किया गया है. इस तरह यह वैदिक एवं जैन संस्कृति के मध्य भी एक सेतु का काम करता है. 

वेद विज्ञान लेखमाला: समन्वित दृष्टिकोण- ऋग्वेद एवं अन्य वेदों से सम्बंधित लेखों की सूचि

क्यों कहलाया यह देश भारत? जानिए ऋषभदेव और भरत से जुड़ा वैदिक और पौराणिक सत्य


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क्यों कहलाया यह देश भारत? जानिए ऋषभदेव और भरत से जुड़ा वैदिक और पौराणिक सत्य


वैदिक संस्कृति में पुराणों का महत्व 

वैदिक संस्कृति में पुराणों का महत्वपूर्ण स्थान है. इनका आकार विशाल है एवं ये अपने आप में महत्वपूर्ण सूचनाओं  के भंडार हैं. 2 री सदी से लेकर 13 वीं सदी तक रचे गए 18 पुराण एवं 18 उपपुराण हैं. यह शताब्दियों तक संचित ज्ञान का भंडार है.इतिहासकारों के अनुसार यद्यपि यह 1000 वर्षों तक लिखे/संकलित किये गए तथापि एक ही महर्षि व्यास को इनका रचनाकार माना जाता है एवं किसी भी पुराण एवं उपपुराण में किसी लेखक या रचयिता का नाम नहीं है. 

इनकी रचना वेदों के आधार पर हुई एवं सभी पुराणों में इन्हे उपवेद के रूप में व्याख्यायित किया गया है. इतना ही नहीं वेदों के मन्त्रों का सन्दर्भ इनमे बारम्बार उच्चरित हुआ है जो वैदिक संस्कृति में इनके अत्यधिक महत्व को पुनः रेखांकित करता है. 

वेदों की प्राचीन भाषा के कारण उसके अर्थ को लेकर अनेक मत हैं। अलग अलग विद्वान इसका अलग अलग प्रकार से अर्थ करते हैं परन्तु पुराणों की भाषा आधुनिक एवं सरल सुगम संस्कृत है इसलिए इनके अर्थों में कोई मतविरोध नहीं. जैसा की पहले ही बताया गया है की पुराण वेदों का ही विस्तार है, उस आधार पर पौराणिक मान्यता को एक अर्थ में वैदिक मान्यता कहा जा सकता है. 

 जैन आगमों एवं साहित्य में ऋषभदेव, भरत व भारतवर्ष 

हम जिस देश भारतवर्ष में रहते हैं उसका नामकरण तीर्थंकर ऋषभदेव के पुत्र चक्रवर्ती भरत के नाम पर हुआ. इस ऐतिहासिक तथ्य को रेखांकित करन इस लेख का प्रयोजन है. जैन आगम एवं साहित्य में निर्विवाद रूप से यह बात आती है कि नाभिराजा एवं माता मरुदेवी के पुत्र ऋषभदेव, जिनका लांछन अर्थात चिन्ह वृषभ था; इस भरत क्षेत्र में इस अवसर्पिणी काल के प्रथम तीर्थंकर हैं. उनके ज्येष्ठ पुत्र भरत इस भूमि के प्रथम चक्रवर्ती सम्राट हुये। पिता प्रथम तीर्थंकर एवं सुयोग्य पुत्र प्रथम चक्रवर्ती. इन्ही भरत के नाम से इस भूमि का नाम भारत या भारतवर्ष पड़ा. जैन आगम ग्रन्थ कल्पसूत्र से लेकर कलिकाल सर्वज्ञ हेमचंद्राचार्य रचित त्रिषष्टि शलाका पुरुष चरित्र  तक ऋषभदेव व भरत चक्रवर्ती के आख्यानों से भरा पड़ा है. 

परन्तु केवल जैन ग्रंथों में इनके आख्यान होने से समग्र इतिहास में उनकी मान्यता नहीं होती. परन्तु ऋग्वेद, यजुर्वेद, अथर्ववेद, वृहदारण्यक, उपनिषद् आदि में भी इनका उल्लेख भिन्न भिन्न रूप में पाया जाता है. ऋग्वेद और यजुर्वेद में सैंकड़ों ऋषभ, वृषभ एवं भरत वाची मन्त्र हैं. परन्तु उनको लेकर अलग अलग विद्वानों की अलग अलग मान्यताएं हैं. कुछ लोग ऋषभ को तीर्थंकर के रूप में मान्यता देते हैं परन्तु कुछ विद्वान इन शब्दों का अलग अर्थ करते हैं और ऋषभ को तीर्थंकर के रूप में मान्यता नहीं देते. इसी प्रकार वेद के भाष्यकार भरत को एक राजा नहीं अपितु एक गण (कबीला) के रूप में मानते हैं. 

पुराणों में ऋषभदेव, भरत व भारतवर्ष 

विशाल पुराण साहित्य ऋषभदेव, उनके पुत्र भरत के आख्यानों से भरा पड़ा है. वस्तुतः, कोई एक पुराण नहीं परन्तु अनेक पुराणों में उनके सन्दर्भ प्राप्त होते हैं. पुराणों में स्पष्ट उल्लेख मिलता है की भरत के नाम से ही इस भूमि का नाम भारत पड़ा और ये भरत ऋषभदेव के ही पुत्र थे, दुष्यंत-शकुन्तला पुत्र भरत नहीं!! 

इन बातों का परीक्षण करने के लिए मैंने पुराणों को आधार बनाया है क्योंकि पुराण वैदिक ग्रन्थ ही है एवं वेदों की ही शाखा या विस्तार हैं. सभी भाष्यों का काल पुराणों के बहुत बाद का है अतः ऐतिहासिक दृष्टि से पुराणों को भाष्यों पर प्राथमिकता मिलनी चाहिए. 


अब हम देखते हैं की पुराणों में कहाँ कहाँ किस प्रकार इनके उल्लेख मिलते हैं. इस लेख में भाषा कि दृष्टि से विष्णुपुराण के दो  श्लोकों का व्याकरणीय विश्लेषण प्रस्तुत करने के पश्चात्  शेष श्लोकों का केवल सामान्य अर्थ दिया गया है. 

1.  विष्णु पुराण (2.1.31) — शुद्ध पाठ:


ऋषभो मरुदेव्याश्च ऋषभात् भरतो भवेत्।
भरताद् भारतं वर्षं, भरतात् सुमतिस्त्वभूत्॥

पद-विच्छेद और व्याकरण:

  • ऋषभः — प्रथमा एकवचन, पुल्लिंग (भगवान ऋषभदेव)
  • मरुदेव्याः — पंचमी एकवचन, स्त्रीलिंग (मरुदेवी से)
  • — संयोजक अव्यय
  • ऋषभात् — पञ्चमी एकवचन (ऋषभ से)
  • भरतः — प्रथमा एकवचन (भरत नामक पुत्र)
  • भवेत् — लोट् लकार, विधिलिङ् (हुआ/होता है)
  • भरतात् — पञ्चमी एकवचन (भरत से)
  • भारतं वर्षं — द्वितीया एकवचन, नपुंसक (भारत नामक वर्ष)
  • भरतात् — पञ्चमी (भरत से)
  • सुमतिः — प्रथमा एकवचन (सुमति नामक पुत्र)
  • अभूत् — लङ् लकार, परस्मैपदी (हुआ)

भावार्थ:

मरुदेवी से ऋषभदेव उत्पन्न हुए। ऋषभ से भरत उत्पन्न हुए।
भरत से भारत नामक वर्ष (देश) प्रसिद्ध हुआ और भरत से सुमति उत्पन्न हुए।


2.  विष्णु पुराण (2.1.32) — शुद्ध पाठ:

ततश्च भारतं वर्षमेतल्लोकेषु गीयते।
भरताय यतः पित्रा दत्तं प्रतिष्ठिता वनम्॥

पद-विच्छेद और व्याकरण:

  • ततः — अव्यय (इसलिए / तब)
  • — अव्यय
  • भारतं वर्षम् — द्वितीया एकवचन, नपुंसक (भारत नामक वर्ष)
  • एतत् — प्रथमा एकवचन (यह)
  • लोकेषु — सप्तमी बहुवचन (सभी लोकों में)
  • गीयते — लट् लकार, आत्मनेपदी (गाया जाता है, प्रसिद्ध है)
  • भरताय — चतुर्थी एकवचन (भरत को)
  • यतः — अव्यय (क्योंकि)
  • पित्रा — तृतीया एकवचन (पिता द्वारा)
  • दत्तं — कृत (दिया गया)
  • प्रतिष्ठिता — लट् लकार (स्थापित हुई)
  • वनम् — द्वितीया एकवचन (वन)

भावार्थ:

अतः यह 'भारतवर्ष' नाम से लोकों में प्रसिद्ध है क्योंकि भरत को उनके पिता ने यह राज्य सौंप दिया और स्वयं वन में तपस्या हेतु चले गए।

विष्णु पुराण (2.1.27)

श्लोक:

"हिमाह्वयं तु वै वर्षं नाभेरासीन्महात्मनः।
तस्य ऋषभोऽभवत्पुत्रो मरुदेव्यां महाद्युतिः॥"

हिंदी अर्थ:

"महात्मा नाभि का हिमवर्ष नामक क्षेत्र था। उनकी पत्नी मरुदेवी से महाद्युतिमान पुत्र ऋषभ उत्पन्न हुए।"

विभिन्न पुराणों में 'भारतवर्ष' के नामकरण और राजा भरत के संबंध का उल्लेख है। नीचे प्रत्येक पुराण से संबंधित श्लोक और उनका हिंदी अनुवाद प्रस्तुत है:


1. वायु पुराण (अध्याय 33, श्लोक 52):

श्लोक: 

"भरताय यतो दत्तं पित्रा भारतमण्डलम्।
तत: स भारतं वर्षं जम्बूद्वीपे अभूत् पुन:।"

हिंदी अनुवाद: "भरत को उनके पिता द्वारा भारतमण्डल (यह भूमि) प्रदान की गई; इसलिए जम्बूद्वीप में यह क्षेत्र 'भारतवर्ष' के नाम से प्रसिद्ध हुआ।"


2. लिंग पुराण (पूर्व भाग, अध्याय 47, श्लोक 23):

श्लोक: 

"ऋषभात् सुतमासाद्य भरतं क्षत्रियर्षभम्।
तत: स भारतं वर्षं जम्बूद्वीपे व्यपदिशेत्।"

हिंदी अनुवाद: "ऋषभदेव ने अपने पुत्र के रूप में क्षत्रियों में श्रेष्ठ भरत को प्राप्त किया; तत्पश्चात् जम्बूद्वीप में वह क्षेत्र 'भारतवर्ष' के नाम से जाना गया।"


3. ब्रह्माण्ड पुराण (अध्याय 14, श्लोक 62):

श्लोक: 

"पितरं सम्प्रयातं तु भरतो नृपसत्तम:।
अजायत महायोगी सुमति: सत्यविक्रम:।"

हिंदी अनुवाद: "पिता के वन में गमन के पश्चात, श्रेष्ठ राजा भरत से महायोगी और सत्यवीर्य सुमति का जन्म हुआ।"

4. ब्रह्माण्ड पुराण से:

श्लोक:

"इह हि इक्ष्वाकुकुलवंशोद्भवेन नाभिसुतेन मरुदेवी
नन्दनमहादेवेन ऋषभेण दशप्रकारो धर्मः
स्वयमेव आचीर्य केवलज्ञानलाभाच्च प्रवर्तितः॥"

हिंदी अर्थ:

"यहाँ, इक्ष्वाकु वंश में उत्पन्न नाभि के पुत्र मरुदेवी नन्दन महादेव ऋषभ ने स्वयं दस प्रकार के धर्म का आचरण किया और केवलज्ञान प्राप्त कर उसे प्रवर्तित किया।"

स्रोत:

यह श्लोक ब्रह्माण्ड पुराण में मिलता है, जहाँ ऋषभदेव के धर्म प्रवर्तन का वर्णन है।

ब्रह्माण्ड पुराण से:

श्लोक:

"नाभिस्तु जनयामास पुत्रं मरुदेव्याः मनोहरम्।
ऋषभं क्षत्रियश्रेष्ठं सर्वक्षत्रियसत्तमम्॥"

हिंदी अर्थ:

"नाभि ने मरुदेवी से मनोहर पुत्र ऋषभ को जन्म दिया, जो क्षत्रियों में श्रेष्ठ और समस्त क्षत्रियों के पूर्वज हैं।"  इस श्लोक में ऋषभदेव को स्पष्ट रूप से सभी क्षत्रियों का पूर्वज कहा गया है. 


4. अग्नि पुराण (अध्याय 107, श्लोक 11–12):

श्लोक: 

"ऋषभो मरुदेव्याश्च ऋषभात् भरतो भवेत्।
भरताद् भारतं वर्षं, जम्बूद्वीपे व्यपदिशेत्।"

हिंदी अनुवाद: "ऋषभ का जन्म मरुदेवी से हुआ; ऋषभ से भरत का जन्म हुआ; भरत से जम्बूद्वीप में वह क्षेत्र 'भारतवर्ष' के नाम से प्रसिद्ध हुआ।"

अग्निपुराण का यह श्लोक स्पष्ट रूप से उद्घोषणा करता है क़ि - ऋषभदेव के पुत्र भरत से ही यह क्षेत्र भारतवर्ष के नाम से प्रसिद्द हुआ. इससे यह भी प्रमाणित होता है भारतवर्ष का नामकरण दुष्यंत पुत्र भरत से नहीं वल्कि ऋषभ पुत्र भरत से हुआ. 


5. स्कंद पुराण (खंड 37, श्लोक 57):

श्लोक: 

"पितरं सम्प्रयातं तु भरतो नृपसत्तम:।
अजायत महायोगी सुमति: सत्यविक्रम:।"

हिंदी अनुवाद: "पिता के वन में गमन के पश्चात, श्रेष्ठ राजा भरत से महायोगी और सत्यवीर्य सुमति का जन्म हुआ।"

1. शिव पुराण से:

श्लोक:

"कैलासे पर्वते रम्ये, वृषभोऽयं जिनेश्वरः।
चकार स्वावतारं यः सर्वज्ञः सर्वगः शिवः॥"

हिंदी अर्थ:

"सुंदर कैलास पर्वत पर, जिनेश्वर वृषभदेव, जो सर्वज्ञ और सर्वव्यापी हैं, ने अवतार लिया।"

स्रोत:

यह श्लोक शिव पुराण में मिलता है, जहाँ भगवान शिव के विभिन्न अवतारों का वर्णन है।

श्रीमद्भागवतम्

यद्यपि 18 पुराणों में श्रीमद्भागवत की गणना नहीं होती परन्तु इस ग्रन्थ की महिमा किसी भी पुराण से कम नहीं. भारतवर्ष में शायद ही कोई ऐसा स्थान हो जहाँ पर भागवत कथा का आयोजन न होता हो. 

श्रीमद्भागवतम् के पंचम स्कंध में भगवान ऋषभदेव और उनके पुत्र महाराज भरत का उल्लेख मिलता है। विशेष रूप से, पंचम स्कंध, अध्याय 4, श्लोक 9 में यह वर्णन है:

श्लोक (5.4.9):

"नाभेर् अथापि धर्मात्मा ऋषभोऽभूद् अजः सुतः।
यं विज्ञाय जनोऽयं हि पितरं परमेश्वरम्॥"

अनुवाद:

"धर्मात्मा नाभि के पुत्र ऋषभ हुए, जो अज (ब्रह्मा) के पुत्र थे। उन्हें परमेश्वर के रूप में जानकर लोग उनकी पूजा पितर के रूप में करते हैं।"

इसके अतिरिक्त, पंचम स्कंध, अध्याय 4, श्लोक 13 में महाराज भरत के बारे में उल्लेख है:

श्लोक (5.4.13):

"भरतो नाम महाभागो भुवो भारत्याः पतिः।
यस्य नाम्ना तु भारतं वर्षं एतद् धियं स्मृतम्॥"

अनुवाद:

"उनके महाभाग्यशाली पुत्र का नाम भरत था, जो इस पृथ्वी के भारतवर्ष के स्वामी बने। उन्हीं के नाम से यह वर्ष (देश) 'भारतवर्ष' के नाम से प्रसिद्ध हुआ।"

इन श्लोकों से स्पष्ट होता है कि भगवान ऋषभदेव के पुत्र महाराज भरत के नाम पर इस भूभाग का नाम 'भारतवर्ष' पड़ा।

1. श्रीमद्भागवतम् 5.4.9:

श्लोक:

"ऋषभदेवस्य हि भगवतः सप्ततितमं तु तत्त्रिंशदुत्तराणामेकशेषः पुत्रः प्रथमो भरतो नाम महाभागवतः स भगवतो धर्मानुशासनं स्वाराज्यं यशः श्रीः भगवदनुभावेनोपलक्षितं नाभ्यवर्तत।"

हिंदी अनुवाद:

"भगवान ऋषभदेव के सौ पुत्रों में से ज्येष्ठ पुत्र भरत महान् भक्त थे। उन्होंने भगवद्-धर्म का पालन करते हुए राज्य का शासन किया, जो भगवान की कृपा से यश और ऐश्वर्य से सम्पन्न था।"

ऋषभाष्टकम् स्तोत्र अर्थ सहित

2. श्रीमद्भागवतम् 5.4.13:

श्लोक:

"तस्य ह वै तत्सुताः पञ्चजन्यः काव्यः हारीयक्षः अन्तरिक्षः प्रबुद्धः पिप्पलायनः आविर्होत्रः द्रुमिलः चमसः करभाजनः इति नव महाभागवताः महाभागवतधर्मान् शिक्षयामासुः।"

हिंदी अनुवाद:

"उनके पुत्रों में पञ्चजन्य, काव्य, हारीयक्ष, अन्तरिक्ष, प्रबुद्ध, पिप्पलायन, आविर्होत्र, द्रुमिल, चमस और करभाजन — ये नौ महाभागवत थे, जिन्होंने महान् भक्तिधर्म का प्रचार किया।"

3. श्रीमद्भागवतम् 5.5.1:

श्लोक:

"ऋषभ उवाच

नायं देहो देहभाजां नृलोके कष्टान् कामानर्हते विड्भुजां ये।

तपो दिव्यं पुत्रका येन सत्त्वं शुद्ध्येद् यस्माद् ब्रह्मसौख्यं त्वनन्तम्॥"

हिंदी अनुवाद:

"ऋषभदेव ने कहा: हे पुत्रों! इस मनुष्य शरीर को, जो हमें मिला है, केवल भोगों के लिए नहीं, जो मलभोजी सुअरों को भी मिलते हैं। इसके बजाय, हमें दिव्य तपस्या करनी चाहिए, जिससे हमारा सत्त्व शुद्ध हो और हमें अनंत ब्रह्मानंद की प्राप्ति हो।"

यजुर्वेद (18.27): ऋषभदेव, कृषि संस्कृति एवं वैदिक संदर्भ 

4. श्रीमद्भागवतम् 5.5.22:

श्लोक:

"पितृपैशुन्यभ्रातृवित्तापहरणस्वस्रीयपतिसंग्रहणाद्यपि गृहेषु जनेषु सङ्गं न कुर्वन्ति।"

हिंदी अनुवाद:

"वे पिताओं की निंदा, भाइयों की संपत्ति हरण, बहनों के पतियों का संग्रह आदि गृहस्थ जीवन की बुराइयों में संलग्न नहीं होते।"

5. श्रीमद्भागवतम् 5.6.1:

श्लोक:

"ऋषभ उवाच

यो वै भारतवर्षे मनुष्यजन्माभिमानिनां मन्यते नात्मानं किञ्चन तद्विपर्ययमिव निरयमिवोपलेभते।"

हिंदी अनुवाद:

"ऋषभदेव ने कहा: जो भारतवर्ष में मनुष्य जन्म पाकर भी आत्मा को नहीं समझता, वह स्वयं को नरक में डालने जैसा कार्य करता है।"

इस श्लोक में स्पष्ट है की ऋषभदेव महान आत्मधर्म के उपदेष्टा थे. 

ऋग्वेद के दशराज्ञ युद्ध का आध्यात्मिक रूपक: आत्मसंघर्ष और अर्हन्नग्ने का संदेश

ऊपर जिन श्लोकों का उल्लेख किया है, वे विभिन्न पुराणों से संबंधित हैं और भगवान ऋषभदेव के जीवन, उनके जन्म, और उनके द्वारा प्रवर्तित धर्म के बारे में बताते हैं। साथ ही इनमे उनके पुत्र भरत का भी महान राजा के रूप में स्पष्ट उल्लेख है. इसी ऋषभ पुत्र भरत से भारतवर्ष का नामकरण हुआ ऐसा उल्लेख भी इन्ही पुराणों में प्राप्त होता है जिसका वर्णन ऊपर दिया गया है. 

उपरोक्त श्लोकों से स्पष्ट होता है कि भगवान ऋषभदेव का जन्म नाभिराज और मरुदेवी के यहाँ हुआ, जो इक्ष्वाकु वंश के थे। उन्होंने दस प्रकार के धर्म का आचरण किया और केवलज्ञान प्राप्त कर उसे प्रवर्तित किया। उनके पुत्र भरत के नाम पर इस भूखंड का नाम 'भारतवर्ष' पड़ा। यह विवरण विभिन्न पुराणों में मिलता है, जो जैन परंपरा के प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव के जीवन और शिक्षाओं से मेल खाता है।

साथ ही इन श्लोकों में भगवान ऋषभदेव के उपदेश और उनके पुत्र महाराज भरत के जीवन का वर्णन मिलता है, जो आध्यात्मिक मार्गदर्शन प्रदान करता है।

ऋत, वृषभ और धर्मध्वनि: ऋग्वेद की ऋचा (70.74.22) का व्याख्यात्मक अध्ययन

गूढ़ विश्लेषण और समग्र दृष्टि:

यह कोई संयोग नहीं कि इतने ग्रंथों में एक स्वर, एक ध्वनि गूंजती है —
"ऋषभ से भरत और भरत से भारतवर्ष।"

ऋषभ कोई सामान्य मानव नहीं, धर्म के प्रथम प्रवर्तक, जिनका लांछन वृषभ था।
भरत कोई केवल विजेता राजा नहीं, बल्कि चक्रवर्ती सम्राट, जिनके नाम पर यह भूमि 'भारतवर्ष' कहलाई।

'पित्रा दत्तं' — यह शब्द भारतीय परंपरा की मूल आत्मा है। पिता स्वयं संन्यास ले, वन में तप करे, और पुत्र को राज्य सौंपे — यही धर्म-परंपरा का प्रवाह है।

यह स्पष्ट होता है कि 'भारतवर्ष' कोई भौगोलिक संज्ञा नहीं, बल्कि यह नाम "धर्म, ज्ञान और तप" का प्रतीक है —
जिसके मूल में हैं ऋषभदेव और भरत चक्रवर्ती

समग्र निष्कर्ष:

"भारत" केवल एक भूखंड नहीं, यह वह भूमि है —
जहाँ तपस्वी राजा ऋषभदेव ने धर्म प्रवर्तित किया,
जहाँ भरत ने चक्रवर्ती बन धर्मचक्र घुमाया,
जहाँ से 'भारतवर्ष' नाम की गूंज तीनों लोकों में फैली।

जिनका उल्लेख वेद, पुराण और भागवत — सब करते हैं।
जिनका स्मरण करने मात्र से धर्म का सागर लहराता है।

"ऋषभ से भरत और भरत से भारतवर्ष" — यही है भारत का असली परिचय।

अंतिम पंक्तियाँ (भावात्मक समापन):

"यह भूमि वही ऋषियों की, भरत की, वृषभ की धरा है,
जिसकी माटी में तप है, जिसके कण-कण में धर्म की गाथा है।
भारत केवल नाम नहीं — यह सनातन संस्कृति की पहचान है,
यह 'ऋषभ' का वंश, 'भरत' का देश — यही 'भारतवर्ष' है।"

असि, मसि, कृषि के आद्य प्रणेता ऋषभदेव: मानव सभ्यता और समाज निर्माण के आधारस्तंभ 


Thanks, 
Jyoti Kothari 
(Jyoti Kothari, Proprietor, Vardhaman Gems, Jaipur represents Centuries Old Tradition of Excellence in Gems and Jewelry. He is an adviser, to Vardhaman Infotech, a leading IT company in Jaipur. He is also an ISO 9000 professional)

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Thursday, March 20, 2025

"भारत" नाम की उत्पत्ति: ऋग्वेद, पुराण और जैन आगमों की दृष्टि से

  • भूमिका
  • 'भरत' शब्द भारतीय सांस्कृतिक, वैदिक और पौराणिक साहित्य में एक अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रखता है। ऋग्वेद में 'भरत' का उल्लेख अनेक स्थानों पर हुआ है, वहीं पुराणों और जैन आगमों में 'भरत' चक्रवर्ती के रूप में एक महापुरुष की प्रतिष्ठा प्राप्त है, जो तीर्थंकर ऋषभदेव के पुत्र माने गए हैं।

    कालांतर में 'भारत' नाम भी इसी 'भरत' के नाम पर प्रतिष्ठित हुआ। परंतु, क्या ऋग्वेद भाष्यों में वर्णित 'भरत' और पुराणों के 'भरत चक्रवर्ती' एक ही हैं? क्या वैदिक मंत्रों का सीधा संबंध तीर्थंकर ऋषभदेव के पुत्र भरत से है? अथवा ऋग्वेद का 'भरत' केवल एक युद्धप्रिय क्षत्रिय गण या वंश का द्योतक है?

    इस लेख में इन्हीं प्रश्नों की गहराई से समीक्षा की गई है। ऋग्वेद के विशिष्ट मंत्रों का सायण, महिधर और उदिताचार्य जैसे प्रमुख भाष्यकारों के मतों सहित विश्लेषण कर, 'भरत' शब्द की वैदिक और पौराणिक अवधारणाओं के तुलनात्मक अध्ययन का प्रयास किया गया है। साथ ही स्वामी दयानंद सरस्वती, महर्षि अरविंद और आधुनिक विद्वानों की व्याख्याओं के आलोक में 'भरत' की सांस्कृतिक और दार्शनिक भूमिका को स्पष्ट किया गया है।


    ऋषभपुत्र भरत चक्रवर्ती जिन के नाम पर भारत नाम पड़ा 

    'भरत' शब्द की व्युत्पत्ति (Etymology):


    "संस्कृत धातु 'भृ' (धारणे) से व्युत्पन्न है"

    • इसका अर्थ है — धारण करने वाला, धर्मरक्षक, पालक और वहन करने वाला।

    भृ (धारणे) + क्त (कृदन्त) = भरत:

    • जो धारण करे
    • जो धर्म का, सत्य का, दायित्व का वहन करे
    • पालक, रक्षक, धारणकर्ता

    अर्थ विस्तार:

    • भरत = धारक, रक्षक, कर्तव्यनिष्ठ योद्धा वंश
    • जो राजधर्म, क्षात्रधर्म और सत्य धर्म को धारण करता है, वही 'भरत' कहलाता है।
    • 'भरत' शब्द में कर्तृत्व, वीरता और धर्मरक्षण का भाव समाहित है।

    दार्शनिक दृष्टि से:

    • ऋग्वेद में 'भरत' धर्म धारण करने वाली जाति/गण है।
    • पौराणिक अर्थ में — भरत चक्रवर्ती वह है, जिसने राज्य, धर्म और लोक का धारण किया।
    • इसलिए 'भरत' शब्द ऋग्वैदिक और पौराणिक दोनों में 'धारणकर्ता' और 'धर्म-संस्थापक' का प्रतीक है।

    ✅ मंत्र 1: ऋग्वेद 3.33.11

    मूल मंत्र:

    अया मंहि॑ष्ठा नृ॒णां वि॒श्वा अ॑द्या॒भ्य॑वर्तिन् | यच्छा॑ सि भर॒तो व॑धैः ||

    पदपाठ:

    अयम् । मंहि॑ष्ठः । नृणाम् । विश्वाः । अद्य । अभ्यवर्तिन् । यच्छा । असि । भरतः । वधैः ॥

    अन्वय:

    अयम् इन्द्रः नृणाम् मंहि॑ष्ठः । अद्य विश्वाः अभ्यवर्तिन् । यच्छा असि भरतः वधैः ।


    ✅ सायण भाष्य 

    मूल:
    "भरतः नाम कश्चिद्गणः। तेन सह युद्धे वधैः युध्यसे।"

    अर्थ:
    भरत नामक एक गण है। उससे युद्ध में तू (इन्द्र) वध करता है अर्थात शत्रुओं का संहार करता है।

    ✅ महिधर भाष्य:

    "भरतः नाम गणः। तस्य वधैः — तेषां शत्रूणां वधेन युध्यसे इति।"

    अर्थ:
    'भरत' नाम का एक गण है, उसके शत्रुओं का वध करने में तू (इन्द्र) युध्य हो।

    भावार्थ:

    यह इन्द्र मनुष्यों में सबसे महान है। आज वह सभी शत्रुओं को परास्त करता है। जैसे तूने भरतों के शत्रुओं का वध किया था, वैसे ही कर।


    ✅ मंत्र 2: ऋग्वेद 7.8.4

    मूल मंत्र:

    प्र ये भ॒रता॑नां नि॒ष्षिधः॑ शूर॒ वज्रि॑णः | अ॒र्यो वि॒दद व॑नुष्यति ||

    पदपाठ:

    प्र । ये । भरतानाम् । निष्षिधः । शूरः । वज्रिणः । अर्यः । विदत् । वनुष्यति ॥

    अन्वय:

    शूरः वज्रिणः इन्द्रः ये भरतानाम् निष्षिधः । अर्यः विदत् वनुष्यति ।

    सायण भाष्य:

    मूल मंत्र:
    प्र ये भ॒रता॑नां नि॒ष्षिधः॑ शूर॒ वज्रि॑णः | अ॒र्यो वि॒दद व॑नुष्यति ||

    सायण भाष्य:
    "प्र — प्रकृष्टम्, ये — यः इन्द्रः, भरतानां — भरत नाम्नः गणस्य, निष्षिधः — निषेधकः, शूरः — वीरः, वज्रिणः — वज्रधारी।
    अर्थ: इन्द्र भरत नामक गण के शत्रुओं का विनाश करता है, वज्रधारी शूर है, आर्य जाति की रक्षा करता है।"

    विशेष:
    यहाँ 'भरतानां' को गण विशेष ही कहा है, कोई चक्रवर्ती अर्थ नहीं।

    ✅ महिधर भाष्य:

    "भरतानाम् — भरत गणस्य, निष्षिधः — निषेधकः, वज्रिणः शूरः इन्द्रः।"

    अर्थ:
    इन्द्र, जो भरत गण के शत्रुओं का नाश करता है।

    भावार्थ:

    वज्रधारी शूरवीर इन्द्र भरतों के शत्रुओं का नाश करने वाला है। वह शत्रुओं को पराजित करता है और आर्य विजयी होते हैं।


    ✅ मंत्र 3: ऋग्वेद 6.16.4

    मूल मंत्र:

    भर॑तानां वृष॒भो व॒ज्री इ॒षे नि॒रक॑ व्रजम् | तुर॑णि॒रभ्य॑मावत ||

    पदपाठ:

    भरतानाम् । वृषभः । वज्री । इषे । निरक् । व्रजम् । तुरणिः । अभि । अमावत् ॥

    अन्वय:

    वज्री वृषभः अग्निः भरतानाम् इषे निरक् व्रजम् तुरणिः अभ्यमावत्।

    सायण भाष्य:

    मूल मंत्र:
    भर॑तानां वृष॒भो व॒ज्री इ॒षे नि॒रक॑ व्रजम् | तुर॑णि॒रभ्य॑मावत ||

    सायण भाष्य:
    "भरतानाम् — भरत नाम्नः गणस्य, वृषभः — श्रेष्ठः, वज्री — वज्रधारी अग्निः, इषे — रक्षा हेतु, निरक् — नाशयति, व्रजम् — शत्रुसंघम्, तुरणिः — शीघ्रगामी।"

    अर्थ: भरत गण का श्रेष्ठ वज्रधारी अग्नि शत्रुओं का नाश करता है।

    ✅  महिधर भाष्य:

    "भरतानाम् — भरत गणस्य, वृषभः — श्रेष्ठः अग्निः वज्री।"

    अर्थ:
    भरत गण का श्रेष्ठ वज्रधारी अग्नि, शत्रुओं का नाश करता है।


    ✅ मंत्र 4: ऋग्वेद 10.102.3

    मूल मंत्र:

    समु॒द्रय॑ज्ञा भर॒तं जेष्य॑न्तो वि॒श्वस्मा॑दिन्द्र॒मवा॑हयन् ||

    पदपाठ:

    समुद्र-यज्ञाः । भरतम् । जेष्यन्तः । विश्वस्मात् । इन्द्रम् । अवाहयन् ॥

    अन्वय:

    समुद्रयज्ञाः विश्वस्मात् जेष्यन्तः भरतम् इन्द्रम् अवाहयन्।

     सायण भाष्य:

    मूल मंत्र:
    समु॒द्रय॑ज्ञा भर॒तं जेष्य॑न्तो वि॒श्वस्मा॑दिन्द्र॒मवा॑हयन् ||

    सायण भाष्य:
    "समुद्रयज्ञाः — समुद्र समवाययुक्त यज्ञवन्तः, भरतम् — भरत नाम गणम्, जेष्यन्तः — जयिष्यन्तः, विश्वस्मात् — सर्वेषां शत्रूणाम्, इन्द्रम् — इन्द्रं, अवाहयन् — आह्वयन्।"

    अर्थ: समुद्र जैसे महान यज्ञ करने वाले, भरत गण की विजय के लिए इन्द्र का आह्वान करते हैं।

    ✅ महिधर भाष्य:

    "भरतम् — भरत गणम्, जेष्यन्तः — विजयिष्यन्तः, इन्द्रम् — आह्वयन्।"

    भावार्थ:

    भरतों का वृषभ, वज्रधारी अग्नि, शत्रुओं के समूह को नष्ट कर देता है और तेज गति से सहायता करता है।

    भावार्थ:

    जो समुद्र के समान महान यज्ञ करने वाले हैं, वे भरत को संपूर्ण शत्रुओं पर विजय दिलाने के लिए इन्द्र का आह्वान करते हैं। 

    ✅ वेदार्थदीपिका (उदिताचार्य) — मुख्य बिंदु:

    • वे भी ‘भरत’ = गण / वंश के रूप में ही अर्थ करते हैं।
    • उदाहरण — "भरत नाम गणस्य।"
    • उदिताचार्य किसी भी मंत्र में 'भरत' को चक्रवर्ती भरत नहीं कहते।

    ✅ विश्लेषण:

    • सायणाचार्य स्पष्ट करते हैं कि 'भरत' कोई विशिष्ट व्यक्ति नहीं, बल्कि 'गण' या 'कबीला' है।
    • वह कहीं भी इसे ऋषभदेव पुत्र चक्रवर्ती भरत से नहीं जोड़ते।
    • 'भरत' = युद्धप्रिय क्षत्रिय जाति / वंश — यही अर्थ देते हैं।

    ✅ सारांश:

    सभी मंत्रों में सायणाचार्य 'भरत' को केवल 'गण' या 'वंश' ही मानते हैं।

    • कहीं भी चक्रवर्ती भरत, ऋषभदेव पुत्र या भारतवर्ष की व्याख्या नहीं।
    • 'भरत' = वीर योद्धा गण (tribe/clan)
    • पौराणिक 'भरत' की कल्पना सायण में नहीं है।

    • ऋग्वेद में 'भरत' शब्द का अर्थ — निघण्टु, निरुक्त और भाष्यकारों का विश्लेषण
    • ऋग्वेद के जिन मंत्रों का उल्लेख किया गया है, उन सभी में 'भरत' शब्द के अर्थ को लेकर सायण, महिधर और उदिताचार्य द्वारा 'भरत नामक गण अथवा वंश' के रूप में स्पष्ट किया गया है, किसी चक्रवर्ती राजा भरत या किसी विशेष ऐतिहासिक पात्र के रूप में नहीं। अब आइए निघण्टु और यास्ककृत निरुक्त में 'भरत' शब्द का अर्थ देखें।

  • निघण्टु में 'भरत' शब्द:

    📖 निघण्टु 3.14 (नामा समूह)
    "भरतः सोमम् । विश्वेदेवाः।"

    यहाँ 'भरत' शब्द देवगण के लिए प्रयोग हुआ है, जो सोम का उपभोग करते हैं। इसका सामान्य अर्थ है — 'भरत' वे देवता हैं जो सोम रस का पान करते हैं।

    🌿 निघण्टु के अनुसार 'भरत' का मूल अर्थ:
    'भर' धातु से बना हुआ — जिसका अर्थ होता है धारण करने वाला, पोषण करने वाला, वहन करने वाला।
    'भरत' — जो वहन करे, धारण करे, आगे बढ़ाए।


    निरुक्त में 'भरत' शब्द:

    📖 यास्ककृत निरुक्त (निरुक्त 3.5):
    "भरताः सोमं भरन्ति इति भरताः।"

    अर्थ:
    '
    भरत' वे हैं जो सोम का वहन करते हैं, उसे देवताओं तक पहुँचाते हैं।
    निरुक्त में 'भरत' का अर्थ क्रिया से जुड़ा है — 'भर' धातु से निष्पन्न, अर्थात 'जो वहन करे', 'जो देवकार्य में संलग्न हों'।
    यह अर्थ निघण्टु के साथ पूरी तरह मेल खाता है।

    📖 निरुक्त:
    "भरः पोषणे" — '
    भर' धातु का अर्थ पोषण करना, वहन करना।


    विशेष:

    निरुक्त में 'भरत' शब्द को किसी ऐतिहासिक पात्र, या किसी गण से नहीं जोड़ा गया है।
    यह एक 'कर्तृत्व' (action-based) संज्ञा है — जो 'भर' (धारण/वहन करना) क्रिया से निकला है।
    'भरत' एक देवताओं के समूह का द्योतक है, जिनका कार्य सोम यज्ञ या अन्य कर्म में सम्मिलित होना है।


    निष्कर्ष (निघण्टु और निरुक्त के आधार पर):

    संदर्भ अर्थ विशेष टिप्पणी
    निघण्टु 'भरत' = देवता (जो सोम का पान करते हैं) देववर्ग का संकेत
    निरुक्त 'भरत' = 'जो वहन करे' (विशेषत: सोम या यज्ञ सामग्री का) 'भर' धातु से निष्पन्न, कोई वंश विशेष नहीं

    चारों मंत्रों के सन्दर्भ में निघण्टु-निरुक्त आधारित सम्यक् निष्कर्ष:

    सभी मंत्रों में 'भरत' शब्द का अर्थ कोई 'गण' या 'वंश' विशेष के रूप में है, जो उस समय एक जाति या समुदाय था।
    निघण्टु-निरुक्त के अनुसार भी 'भरत' देवसमूह का बोधक है।
    निघण्टु और निरुक्त में 'चक्रवर्ती राजा भरत' का अर्थ नहीं है तो कहीं भी 'गण' अर्थ भी नहीं है।


    अतिरिक्त विशेष टिप्पणी:

    'भरत' शब्द 'भर' धातु से बना है, जो अत्यंत पुरातन वैदिक शब्द है।
    बाद के महाभारत और पुराणों में 'भरत' शब्द को 'राजा भरत' से जोड़ा गया, किंतु ऋग्वैदिक 'भरत' = देवसमूह ही है।
    ऋग्वेद के परवर्ती अर्वाचीन प्रमुख विद्वानों — सायण, महिधर, और उदिताचार्य — सभी ने भरत को गण माना है, यह उनकी अपनी अवधारणा है, निघण्टु या निरुक्त का मत नहीं।


    अत्यंत महत्वपूर्ण प्रश्न — भाष्यकारों द्वारा 'भरत' को 'गण' अर्थ में लेने का आधार:

    उत्तर — शास्त्रीय विश्लेषण:

    1. निघण्टु-निरुक्त में 'भरत' का अर्थ 'देवगण' कब और कैसे?

    • निघण्टु 3.14: "भरतः सोमम्।" — यहाँ 'भरत' का प्रयोग देवताओं के लिए हुआ है जो सोम पान करते हैं।
    • निरुक्त 3.5: "भरताः सोमं भरन्ति इति भरताः।" — 'भर' धातु से 'भरत' बना, अर्थात 'सोम वहन करने वाले'।

    इस संदर्भ में 'भरत' का अर्थ "सोम वहन करने वाले देवगण" है। यह एक सामान्य धात्वर्थ है — 'जो वहन करे' वह 'भरत'।


    📌 2. ऋग्वेद के मंत्रों का विशेष संदर्भ भिन्न है (Contextual Meaning):

    • ऋग्वेद के 3.33.11, 7.8.4, 6.16.4, 10.102.3 जैसे मंत्रों में 'भरत' शब्द ऐसे संदर्भ में आता है जहाँ युद्ध, शत्रु-वध, विजय आदि की बात हो रही है।
    • वहाँ 'सोम पीने वाले देवता' का संदर्भ संदेहास्पद होता है।
    • 'भरत' का 'वध', 'युद्ध', 'गण', 'शत्रु' जैसे शब्दों से संबंध बैठता है।
    • 'भरत' शब्द का प्रयोग युद्धरत, मानव गण/वंश के अर्थ में स्वाभाविक बनता है। अतः भाष्यकारों ने 'निघण्टु' अर्थ के स्थान पर 'संदर्भ' (Contextual Meaning) को प्राथमिकता दी।

    👉 इससे निष्कर्ष निकलता है की भाष्यकारों ने प्राचीन निघण्टु-निरुक्त के अर्थ के स्थान पर अपने अनुसार सन्दर्भ निकाल कर अर्थ किया है।


    📌 4. ऐतिहासिकता और वैदिक परंपरा: 'भरत' एक प्रसिद्ध ऋग्वैदिक 'गण' भी था।

    • 'भरत' नामक एक मानव गण या वंश वैदिक काल में था, जिससे भरत वंश और आगे चलकर भारत नाम पड़ा — यह भाष्यकारों की मान्यता है, किंतु यह संदेह के घेरे में है।
    • पुराणकार इस व्याख्या से सहमत नहीं हैं। सभी वेद भाष्यकार 'भरत' को प्राचीन मानव वंश/गण मानते हैं। परन्तु निघण्टु, निरुक्त या पुराण में इसका समर्थन नहीं है।
    • भाष्यकारों का ऐसा मानना केवल उनकी अपनी मान्यता ही है। वर्तमान इतिहासज्ञ संभवतः भाष्य को ही प्रमाण मानकर भरत को गण मान बैठे हैं, उन्होंने प्राचीन निघण्टु, निरुक्त को देखने का प्रयास ही नहीं किया।

    अंतिम प्रमाणयुक्त निष्कर्ष:

    • भाष्यकारों ने निघण्टु-निरुक्त में निरुक्त का 'संदर्भ प्रधान अर्थ ग्रहण नियम' अपनाया और 'भरत' शब्द का अर्थ 'मानव गण/वंश' किया। परन्तु ऐसा करने में उन्होंने अपनी मान्यता का ही प्रतिपादन किया। भाष्यकारों की स्वयं की मान्यता अनुसार: 
    • 'भरत' = देवगण अर्थ केवल उन मंत्रों में होगा जहाँ सोमपान, यज्ञ, देवता आदि का संदर्भ हो।
    • 'भरत' = मानव गण/वंश अर्थ तब होगा जब प्रसंग युद्ध, शत्रु-वध, विजय आदि हो।

    1. क्या निघण्टु में 'भरत' को मानव गण या वंश कहा गया है?

    📖 निघण्टु प्रमाण:
    निघण्टु 3.14 — "भरतः सोमम्।"

    यहाँ 'भरत' देवगण है, मानव गण या वंश का कोई स्पष्ट उल्लेख नहीं।

    निष्कर्ष: निघण्टु में 'भरत' शब्द का प्रयोग देवगण अर्थ में है। मानव गण या वंश का कोई प्रमाण नहीं।


    2. क्या यास्क के निरुक्त में 'भरत' मानव गण या वंश है?

    📖 निरुक्त प्रमाण (3.5):
    "भरताः सोमं भरन्ति इति भरताः।"

    • यास्क 'भर' धातु से व्युत्पत्ति करते हैं — "जो वहन करे, वह भरत।"
    • संदर्भ सोम वहन करने का है, देवताओं का है।
    • कहीं भी 'मानव गण' या 'भरत वंश' का संकेत नहीं।

    📖 निरुक्त (निरुक्त 7.14):
    जहाँ यास्क 'भरत' शब्द का कोई अलग मानव गण अर्थ देते हों — ऐसा कोई उल्लेख नहीं मिलता।

    निष्कर्ष: निरुक्त में भी 'भरत' मानव गण या वंश अर्थ नहीं है। यह केवल धात्वर्थ ('भर' धातु) और देवताओं के लिए आता है।


    3. क्या वैदिक मंत्रों में 'भरत' मानव गण या वंश के रूप में प्रमाणित है?

    अब मूल वेद मंत्रों की ओर आते हैं।

    📖 ऋग्वेद 3.33.11:
    "अयम् मंहि॑ष्ठा नृ॒णां वि॒श्वा अ॑द्या॒भ्य॑वर्तिन् । यच्छा॑ सि भर॒तो व॑धैः ॥"

    • सायण और महिधर ने यहाँ 'भरत' को गण नाम माना है, परंतु स्वयं मंत्र में स्पष्टतः मानव वंश या गण का उल्लेख नहीं है, केवल 'भरत' शब्द है।

    📖 ऋग्वेद 7.8.4:
    "प्र ये भ॒रता॑नां नि॒ष्षिधः॑ शूर॒ वज्रि॑णः । अ॒र्यो वि॒दद व॑नुष्यति ॥"

    • 'भरतानाम्' बहुवचन है, जिससे 'किसी समूह' का बोध होता है।
    • यहाँ भी 'गण' अर्थ सायण-भाष्य से आता है, मंत्र स्वतः किसी मानव वंश का नाम लेकर नहीं कहता।

    📖 ऋग्वेद 6.16.4 और 10.102.3 भी ऐसा ही है।


    नोट:

    • ऋग्वेद के इन मंत्रों में 'भरत' नाम आता है, और कभी-कभी वह 'भरतानाम्' बहुवचन में आता है, लेकिन कहीं भी स्पष्ट 'मानव वंश' या 'भारतवर्ष' शब्द नहीं है।

    4. निष्कर्ष — शुद्ध वैदिक प्रमाण क्या कहता है?

    ग्रंथ स्थिति
    निघण्टु 'भरत' = देवता (सोम पान करने वाले)
    निरुक्त 'भरत' = 'भर' धातु से 'वहन करने वाले', सोम वहन करने वाले देवता
    ऋग्वेद मंत्र संदर्भ और भाषा से 'गण' संकेत मान लिया गया है, पर 'मानव वंश' का कोई प्रमाण नहीं

    5. उपसंहार — 'भारत' नाम का भारतवर्ष से संबंध बाद की परंपरा है:

    • वैदिक मूल ग्रंथों में कहीं भी 'भरत' का सीधा अर्थ 'मानव वंश' या 'भारतवर्ष' का जनक — यह प्रमाणित नहीं है।
    • 'भरत' शब्द मंत्र में है, पर मानव गण अर्थ केवल भाष्यकार जोड़ते हैं, मूल मंत्र नहीं।

    अतः शुद्ध वैदिक उत्तर:

    👉 निघण्टु और निरुक्त में 'भरत' = देवगण (सोम वहन करने वाले) हैं।
    👉 ऋग्वेद में संदर्भ 'गण' का हो सकता है, पर 'मानव वंश' का प्रत्यक्ष प्रमाण नही                       ✅ 
    भाष्यकारों की कालानुक्रमिक स्थिति और ऐतिहासिक प्राथमिकता का विश्लेषण:विशाल जैन आगम (ईशा पूर्व ५वीं शताब्दी से ईशा पूर्व दूसरी शताब्दी तक) ) एवं अन्य साहित्य (ईशा की दूसरी से १२ वीं शताब्दी तक) ऋषभदेव को प्रथम तीर्थंकर एवं भरत को प्रथम चक्रवर्ती के रूप में चित्रित करता है. वैदिक साहित्य में पुराणों का भी यही अभिमत है. अनेक बौद्ध ग्रंथों में भी इसी प्रकार के सन्दर्भ पाए जाते हैं. 

     ऋग्वेद, यजुर्वेद आदि मूल वेदों में भी ऋषभ, वृषभ, भरत, अर्हत आदि शब्द बारम्बार उपयोग किये गए हैं. परन्तु भाष्यकारों ने उनके अर्थ अलग सन्दर्भ में किया है जिसका वर्णन लेख के पूर्वभाग में किया जा चूका है. अब इन सभी उल्लेखों के प्राचीनता/ अर्वाचीनता पर विचार करते हैं: 

     मुख्य वेद भाष्यकारों (सायण, महिधर, उदिताचार्य/वेदार्थदीपिका) की कालावधि (Period) का विवरण —     ✅ 1. सायणाचार्य (Sayana Acharya) काल: 14वीं शताब्दी (लगभग 1315 – 1387 ई.) स्थान: विजयनगर साम्राज्य, दक्षिण भारत विशेषता: सम्पूर्ण वेदों पर सायणाचार्य का सर्वाधिक प्रसिद्ध भाष्य; उनके समय के हरिहर और बुक्का राजाओं का संरक्षण प्राप्त। महत्व: सर्वाधिक प्रमाणिक वेद भाष्यकारों में गिने जाते हैं। 

    ✅ 2. महिधर (Mahidhara) काल: 16वीं शताब्दी (लगभग 1580 – 1600 ई.) स्थान: उत्तरी भारत (संभवतः मध्य भारत के आसपास) विशेषता: यजुर्वेद पर 'मन्त्रब्राह्मण भाष्य' तथा अन्य वेद मंत्रों पर स्वतंत्र भाष्य लिखा। महत्व: सायण के बाद का प्रमुख भाष्यकार, सरल भाषा में वेद मंत्रों का अर्थ। 

    ✅ 3. उदिताचार्य (Uditacharya) — वेदार्थदीपिका लेखक काल: अनुमानित 17वीं शताब्दी स्थान: उत्तर भारत विशेषता: वेदों पर 'वेदार्थदीपिका' नामक महत्त्वपूर्ण ग्रंथ की रचना। महत्व: सायण और महिधर के बाद का विद्वान, जिसने वैदिक मंत्रों की व्याख्या सरल शैली में की। 

    निष्कर्ष: 

    ✅ ऐतिहासिक और दार्शनिक पृष्ठभूमि में वैदिक-शैव-जैन संबंध और भाष्यकारों का दृष्टिकोण: भाष्यकार काल (Century) एवं  विशेष योगदान:                                                                                                                              
  • सायण, महिधर, उदिताचार्य जैसे वेद भाष्यकार 14वीं से 17वीं शताब्दी के बीच हुए हैं।
  • जबकि आगम, पुराण यहाँ तक की हेमचंद्राचार्य का त्रिषष्टिशलाका पुरुष चरित्र इससे कई शताब्दियाँ पूर्व रचे जा चुके हैं।
  • इस आधार पर पुराणों और जैन ग्रंथों की ऐतिहासिक प्राथमिकता और उनकी परंपरा में प्राचीनता अधिक है।
  • वेद भाष्यकारों का कार्य मूल मंत्रों पर था, लेकिन कई अर्थ सीमित और बाद के दृष्टिकोण से हैं, जबकि पुराणों में वंश परंपरा और धर्म-प्रतिष्ठा का स्पष्ट चित्रण है।

  • ✅ ऐतिहासिक और दार्शनिक पृष्ठभूमि में वैदिक-शैव-जैन संबंध और भाष्यकारों का दृष्टिकोण:
  • सायणाचार्य, महिधर और उदिताचार्य जैसे वेद भाष्यकार 14वीं से 17वीं शताब्दी के बीच सक्रिय थे। यह काल भारत के इतिहास में भारी धार्मिक और दार्शनिक संघर्ष का काल था।

    📌 1. दक्षिण भारत में सायणाचार्य का काल (14वीं शताब्दी):

    • सायणाचार्य विजयनगर साम्राज्य के संरक्षण में थे, जिसे हरिहर-बुक्का जैसे राजाओं ने स्थापित किया था।
    • विजयनगर साम्राज्य का एक मुख्य उद्देश्य ही दक्षिण भारत में पुनः वैदिक-हिंदू संस्कृति की स्थापना और विस्तार था, क्योंकि उस समय तक जैन, बौद्ध और इस्लामिक प्रभाव दक्षिण में मजबूत हो चुके थे।
    • उस काल में जैन धर्म का प्रभाव दक्षिण भारत में बहुत था, विशेषकर कर्नाटक, आंध्र, तमिलनाडु में।
    • विजयनगर शासकों ने शैव, वैष्णव और वैदिक पुनरुत्थान को बढ़ावा दिया, और धीरे-धीरे जैन और बौद्ध प्रभाव कमजोर हुआ।

    📌 2. क्या सायणाचार्य और अन्य भाष्यकार कट्टर थे?

    • सायणाचार्य स्वयं 'शैव' थे और उन्होंने वेदों का भाष्य राजकीय संरक्षण में लिखा।
    • उनके भाष्यों में 'जैन' या 'बौद्ध' सिद्धांतों का प्रत्यक्ष खंडन तो नहीं मिलता परन्तु सायण ने किसी भी वैदिक मंत्र का कभी भी जैन या बौद्ध से जोड़कर अर्थ नहीं किया, यहाँ तक की उस काल के वैदिक जगत में सुप्रतिष्ठित पुराणों एवं बहुप्रचलित श्रीमद्भागवत (वैष्णव) के उद्धरणों को भी स्पर्श नहीं किया   — यह उनकी वैदिक-शैव  पक्षधरता और सीमितता दर्शाता है।
    • महिधर और उदिताचार्य ने भी इसी वैदिक परंपरा को आगे बढ़ाया।

    📌 3. वैदिक बनाम जैन संघर्ष का संकेत:

    • ऐतिहासिक रूप से 12वीं-13वीं शताब्दी तक दक्षिण भारत में जैन परंपरा बहुत प्रभावशाली थी।
    • 14वीं शताब्दी से शैव और वैष्णव  पुनर्जागरण ने जैन प्रभाव को चुनौती दी।
    • विशेषकर विजयनगर काल में जैन मंदिरों का ह्रास और शैव-वैष्णव मंदिरों का निर्माण इसका प्रमाण है।
    • उस काल के साहित्य और स्थापत्य कला में भी यह बदलाव दिखता है।
    • यह संघर्ष सीधा शस्त्र युद्ध नहीं था, बल्कि दार्शनिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक था।

    📌 4. क्या यह संघर्ष भाष्यकारों की दृष्टि में झलकता है?

    • सायण और अन्य भाष्यकारों ने जानबूझकर 'भरत' जैसे शब्दों को केवल वैदिक/शैव संदर्भ में ही सीमित किया।
    • केवल जैन परंपरा ही नहीं अपितु पुराणों एवं श्रीमद्भागवद आदि ग्रंथों में 'भरत' और 'ऋषभदेव' के महत्व को जानने के बावजूद, उन्होंने कोई संबद्धता नहीं जोड़ी।
    • यह सम्भवतः उनकी अपनी वैदिक शैव परंपरा की रक्षा और पुनर्स्थापना का उद्देश्य था।"
    • वे अपनी रचना में 'जैन दार्शनिक प्रभाव' को स्वीकार नहीं करना चाहते थे, क्योंकि यह उनके संरक्षण और काल की मांग भी थी।

    निष्कर्ष :

    यहाँ यह भी विचारणीय है कि सायण, महिधर और उदिताचार्य जैसे भाष्यकार जिस कालखंड में सक्रिय थे, वह भारत में वैदिक-शैव पुनर्जागरण का काल था। विशेषकर सायणाचार्य विजयनगर के शैव शासकों के संरक्षण में थे, जहाँ जैन प्रभाव कम करने के प्रयास स्पष्ट दिखते हैं। संभवतः इसी कारण उनके भाष्य वैदिक दृष्टिकोण में सीमित रहे और उन्होंने 'भरत' जैसे शब्दों की व्याख्या को कभी जैन चक्रवर्ती भरत या ऋषभदेव से जोड़ने का प्रयास नहीं किया।

    यह ऐतिहासिक-सांस्कृतिक संघर्ष उस काल में परोक्ष रूप से विद्यमान था, जो भाष्य परंपरा में भी झलकता है।

  • क्या किसी वैदिक भाष्यकार ने ऋग्वेद के भरत को तीर्थंकर ऋषभदेव के पुत्र भरत (चक्रवर्ती) के रूप में स्वीकारा है? 

    नहीं, ऋग्वेद के प्रमुख भाष्यकार — सायणाचार्य, महिधर, उदिताचार्य, वेदर्थदीपिका, या अन्य प्राचीन वैदिक टीकाकार — किसी ने भी 'भरत' शब्द का सीधा संबंध तीर्थंकर ऋषभदेव के पुत्र भरत चक्रवर्ती से नहीं जोड़ा है।
    ✔ वेद में 'भरत' को सामान्यतः 'एक वीर क्षत्रिय जाति', 'युद्धप्रिय गण', या 'भरत वंश' के रूप में लिया गया है, जिसका संबंध सुदास, त्रित्सु आदि से है।

    सायण भाष्य में भी 'भरत' शब्द का अर्थ —
    "भरतः नाम कश्चिद्गणः" — एक वीर गण या वंश — के रूप में ही किया गया है।

    ✅ ऋग्वेद भाष्यों के 'भरत' एवं पुराणीय 'भरत' 

    पक्षऋग्वेदपुराण / भागवत
    व्याख्याएक वीर योद्धा वंश / गणऋषभदेव का पुत्र, चक्रवर्ती सम्राट
    स्रोतसायण, महिधर, प्राचीन वैदिक टीकाकारभागवत पुराण, विष्णु पुराण, अन्य पुराण
    भारतवर्ष नामअप्रसक्तभरत चक्रवर्ती के नाम पर
    सीधा संबंधनहींहाँ, विशिष्ट कथा से

    ✅ निष्कर्ष:

    • ऋग्वेद में 'भरत' शब्द वीर योद्धा वंश या कबीले के लिए आता है, जो इन्द्र-अग्नि के प्रिय हैं।
    • कोई वैदिक भाष्यकार 'भरत' को ऋषभदेव का पुत्र नहीं मानता।
    • पुराणों में 'भरत' का निर्माण 'भारतवर्ष' के नामकरण और चक्रवर्ती परंपरा को प्रतिष्ठित करने हेतु हुआ।
    • यह दो अलग संदर्भ हैं:
      • ऋग्वेदिक भाष्य के 'भरत' = योद्धा वंश।
      • पुराणीय 'भरत' = ऋषभदेव का पुत्र, भारतवर्ष के नाम का आधार।

    ऋग्वेद में 'भरत' शब्द की सायण भाष्य में व्याख्या मुख्यतः 'गण' या 'वंश' रूप में हुई है, न कि पुराणीय चक्रवर्ती भरत के रूप में।

    महिधरउदिताचार्य और वेदार्थदीपिका में उपलब्ध ‘भरत’ मंत्रों के भाष्य संदर्भ में भी तीनों ने 'भरत' को 'गण' / 'वंश' के रूप में ही लिया है, कहीं भी पुराणीय चक्रवर्ती भरत का संदर्भ नहीं है।


    ✅ सारांश 

    भाष्यकारभरत का अर्थचक्रवर्ती भरत उल्लेख
    सायणाचार्यभरत नाम गण या वंश❌ नहीं
    महिधरभरत = गण❌ नहीं
    उदिताचार्य (वेदार्थदीपिका)भरत = गण / वीर जाति❌ नहीं

    ✅ निष्कर्ष:
    तीनों वेद भाष्यकार 'भरत' को केवल 'गण' या 'वंश' के अर्थ में ही लेते हैं।
    कोई भी उसे ऋषभदेव पुत्र चक्रवर्ती भरत से जोड़ने का प्रयास नहीं करता।


    ✅ पुराण एवं भागवत में 'भरत' वंश की स्थापना और वंशगत महिमा:

    श्रीमद्भागवत एवं अन्य पुराणों में उल्लेख है:

    "नाभिस्तु जनयामास पुत्रं मरुदेव्याः मनोहरम्। ऋषभं क्षत्रियश्रेष्ठं सर्वक्षत्रियसत्तमम्॥"

    अर्थ: मनु के पुत्र नाभि ने मरुदेवी से अत्यंत मनोहर पुत्र ऋषभ को उत्पन्न किया, जो क्षत्रियों में श्रेष्ठ, समस्त क्षत्रिय वंश का आदिपुरुष और सर्वश्रेष्ठ था।

    यह श्लोक स्पष्ट करता है कि ऋषभदेव समस्त क्षत्रिय वंश के मूल हैं और उनके पुत्र भरत चक्रवर्ती से ही 'भारतवर्ष' का नाम पड़ा।

    यह दृष्टि ऋग्वेद के 'भरत वंश' और पुराण के 'भरत चक्रवर्ती' को जोड़ने में दार्शनिक और सांस्कृतिक आधार देती है, जहाँ 'भरत' केवल एक जाति नहीं, बल्कि धर्म, पराक्रम और वंश की प्रतिष्ठा का प्रतीक बनता है।

    ✅ पुराणों और श्रीमद्भागवत में 'भरत' को ऋषभदेव का पुत्र क्यों कहा गया?

    कारण और आधार:

    1. भागवत पुराण (5.3 - 5.7) में स्पष्ट वर्णन है कि:

      • भगवान ऋषभदेव ने 'भरत' नामक पुत्र को राज्य सौंपा।
      • उसी भरत के नाम पर 'भारतवर्ष' नाम पड़ा।
    2. विशेष आधार:

      • पुराणों एवं श्रीमद्भगवद में भरत एवं ऋषभदेव का जो सम्बन्ध दर्शया गया है वह ऐतिहासिक है. उस समय तक समूर्ण भारतवर्ष में वैदिक एवं जैन दोनों ही संस्कृति में यही सत्य धारा प्रवाहित थी. 
      • पुराणों का उद्देश्य वेदों की विस्तृत व्याख्या कर वंशपरंपरा को जोड़ना है, इसलिए उन्होंने 'भरत' को एक चक्रवर्ती सम्राट के रूप में महिमामंडित किया।

      • 'भारत' नाम के भूभाग की प्रतिष्ठा हेतु यह कथा तत्कालीन आर्यावर्त में निर्विवाद रूप से प्रचलित थी  एवं यह कथा 'भारतवर्ष' के नामकरण का आधार थी।
      • यह 'भरत' पौराणिक एवं जैन 'ऋषभदेव के पुत्र' हैं, न कि ऋग्वैदिक भाष्यकारों के भरत गण
      • भरत गण संभवतः परवर्ती काल के भाष्यकारों की स्वयं की कल्पना है, जिसका समर्थन किसी भी प्राचीन ग्रंथों में नहीं मिलता.  
      

    क्या ऋग्वैदिक भाष्य के 'भरत-ऋषभदेव' पौराणिक एवं जैन भरत-ऋषभदेव से जोड़े जा सकते हैं?

    🔎 संभावना का आधार (Philosophical and Conceptual Bridge):

    1. भरत नाम में साम्य:

      • ऋग्वेद और पुराण — दोनों में ‘भरत’ एक वीर योद्धा, धर्मनिष्ठ वंश का प्रतीक है।
      • पुराणों एवं जैन ग्रंथों में भरत चक्रवर्ती ऋषभदेव पुत्र, धर्म-स्थापक चक्रवर्ती हैं।
      • दोनों ही धर्म और शक्ति के आदर्श रूप में प्रतिष्ठित हैं।
    2. ऋग्वेद भाष्यों में भरतों की पहचान:

      • 'भरत' एक ऐसा वंश है, जो इन्द्र और अग्नि की कृपा से विजयी होता है।
      • 'इन्द्र' शक्ति का, 'अग्नि' आत्मशुद्धि और ज्ञान का प्रतीक।
      • यह चित्रण जैन और पौराणिक भरत चक्रवर्ती के ही "ज्ञान-धर्म और शक्ति-संपन्न सम्राट" स्वरूप से मेल खाता है।
    3. ऋषभदेव और भरत — धर्म एवं चक्र का आदर्श:

      • पुराणों में ऋषभदेव का पुत्र भरत चक्रवर्ती "आत्म-धर्म में स्थित, सम्राट और भारतवर्ष का नामदाता" है।
      • ऋग्वेद में भी 'भरत' का चित्रण धर्मवीर योद्धा वंश के रूप में आता है।
    4. अर्थ का विस्तृत आयाम:

      • यदि हम  'भरत' को केवल भाष्यकारों के जाति/गण न मानकर "धर्मरक्षक वंश, आदर्श मानव-वंश" के रूप में लें तो यह ऋषभदेव के पुत्र भरत और भारतवर्ष के संकल्पना से आध्यात्मिक और सांस्कृतिक रूप से जोड़ सकता है।

    संभावित निष्कर्ष / Viable Alignment:

    1. शाब्दिक रूप से ऋग्वेद भाष्य और पुराणीय भरत में भिन्नता है, क्योंकि वैदिक भाष्यकार 'भरत' को 'गण' मानते हैं।
    2. लेकिन दार्शनिक और सांस्कृतिक दृष्टि से यह एक ही मूल प्रतीक — धर्म-पराक्रम, सत्य और शक्ति का प्रतिनिधि बनता है।
    3. यद्यपि सभी वैदिक भाष्य जैन ग्रंथों एवं पुराणों के बहुत बाद में रचे गए तथापि यहाँ एक भावनात्मक, दार्शनिक और सांस्कृतिक सेतुबंध  (Philosophical Bridge) स्थापित होता है:
      • ऋग्वेद के भाष्यकारों का 'भरत' वंश का आदर्श विकास, पुराणों में भरत चक्रवर्ती के रूप में हुआ।
      • 'भरत' ऋषभदेव पुत्र के रूप में आत्मिक चक्रवर्ती है, जो ऋग्वेदिक 'धर्मरत वंश' की चरम परिणति है।

    उपसंहार:

    शास्त्रीय दृष्टि से भले ही सीधा सन्दर्भ न हो,
    परंतु दार्शनिक, सांस्कृतिक और आत्मिक दृष्टि से — ऋग्वैदिक भाष्यों के 'भरत' और पौराणिक 'भरत चक्रवर्ती' को जोड़ा जा सकता है।

    "यह जोड़ ऋषभदेव की धर्म-परंपरा और भारतवर्ष के आदर्श स्वरूप का वैदिक संस्कृति से समन्वय करता है।"

    ✅ विशेष दार्शनिक और सांस्कृतिक दृष्टिकोण:

    कलिकाल सर्वज्ञ आचार्य हेमचंद्राचार्य के त्रिषष्टिशलाका पुरुष चरित्र जैसे जैन ग्रंथों में भरत चक्रवर्ती की विजय यात्रा में इन्द्र को उनकी सहायता करते हुए दिखाया गया है।

    ठीक उसी प्रकार, ऋग्वेद के उपरोक्त मंत्रों में भरत वंश को इन्द्र की कृपा और शक्ति प्राप्त होती है।

    • ऋग्वेद भाष्य में: भरत वंश इन्द्र-अग्नि के सहारे शत्रुओं पर विजय प्राप्त करता है।

    • जैन परंपरा में: इन्द्र स्वयं तीर्थंकरों की पूजा व वंदना करता है।

    यहाँ महत्वपूर्ण अंतर यह है कि:

    • वैदिक संदर्भ में मनुष्य इन्द्र की सहायता चाहता है और उसकी स्तुति करता है।

    • जैन दर्शन में इन्द्र स्वयं तीर्थंकरों की अर्चना करता है।

    यह दार्शनिक अंतर स्पष्ट करता है कि:

    • वैदिक साहित्य में इन्द्र शक्ति और विजय का अधिष्ठाता देवता है।

    • जैन साहित्य में इन्द्र संस्कार और सम्मान का प्रतीक है, जो आत्मज्ञान और धर्म के आगे नतमस्तक होता है।

    अतः दोनों परंपराओं में 'भरत' और 'इन्द्र' का संबंध भले ही अलग संदर्भ में हो, किन्तु दोनों ही स्थानों पर धर्म, विजय और उच्च आदर्शों की स्थापना का प्रतीक बनता है।

    ऋग्वेद मंडल 10, सूक्त 136 के 7 मंत्रों का जैन दृष्टिकोण से विश्लेषण

    ✅ स्वामी दयानंद सरस्वती, महर्षि अरविंद और अन्य विद्वानों की व्याख्या:

    1. स्वामी दयानंद सरस्वती (Maharshi Dayanand Saraswati):

    • ऋग्वेद भाष्य: स्वामी दयानंद ने 'ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका' और 'ऋग्वेद भाष्य' की रचना की, जिसमें उन्होंने वैदिक मंत्रों की व्याख्या की है।

    • 'भरत' का संदर्भ: स्वामी दयानंद ने 'भरत' को एक विशेष वंश या जनजाति के रूप में संदर्भित किया है। उनके अनुसार, 'भरत' एक प्रमुख और धार्मिक वंश था, जो वैदिक काल में विशेष रूप से प्रतिष्ठित था।

    • मंत्र 3.33.11 पर टिप्पणी: इस मंत्र में 'भरत' वंश के शत्रुओं के विनाश के लिए इंद्र की स्तुति की गई है। स्वामी दयानंद ने इसे धार्मिक और नैतिक मूल्यों की रक्षा के संदर्भ में व्याख्यायित किया है।

    • मंत्र 7.8.4 पर टिप्पणी: यहाँ इंद्र को 'भरत' वंश के शत्रुओं का नाश करने वाला बताया गया है। स्वामी दयानंद ने इसे धर्म की स्थापना और अधर्म के नाश के रूप में देखा है।

    • मंत्र 6.16.4 पर टिप्पणी: इस मंत्र में अग्नि को 'भरत' वंश का रक्षक बताया गया है। स्वामी दयानंद ने अग्नि को ज्ञान और प्रकाश का प्रतीक मानते हुए, इसे आत्मिक उन्नति से जोड़ा है।

    • मंत्र 10.102.3 पर टिप्पणी: यहाँ 'भरत' वंश की विजय के लिए इंद्र का आह्वान किया गया है। स्वामी दयानंद ने इसे सत्य और धर्म की विजय के प्रतीक के रूप में व्याख्यायित किया है।

    1. महर्षि अरविंद (Maharshi Aurobindo):

    • वेदों पर दृष्टिकोण: महर्षि अरविंद ने वेदों की आध्यात्मिक और प्रतीकात्मक व्याख्या की है। उन्होंने वेदों को मानव चेतना की आंतरिक यात्रा के रूप में देखा है।

    • 'भरत' का संदर्भ: अरविंद ने 'भरत' को आत्मा के आध्यात्मिक साधक के रूप में देखा है, जो आंतरिक शत्रुओं (जैसे अज्ञान, अहंकार) से संघर्ष करता है।

    • मंत्रों की व्याख्या: अरविंद के अनुसार, इन मंत्रों में 'भरत' आत्मा का प्रतीक है, जो इंद्र (दिव्य शक्ति) और अग्नि (आत्मिक प्रकाश) की सहायता से आंतरिक विकारों पर विजय प्राप्त करता है।

      1. अन्य विद्वानों की व्याख्या:

      • सामान्य दृष्टिकोण: अनेक आधुनिक विद्वानों ने 'भरत' को एक प्रमुख वैदिक जनजाति या वंश के रूप में स्वीकार किया है, जो धर्म और सत्य के मार्ग पर अग्रसर था। यह भाष्य का ही दृष्टिकोण है. 

      • आधुनिक व्याख्या: कुछ सत्यान्वेषी आधुनिक विद्वानों ने 'भरत' को भारतवर्ष के प्रतीक के रूप में देखा है, जो सांस्कृतिक और आध्यात्मिक धरोहर का प्रतिनिधित्व करता है।

      ✅ तुलनात्मक विश्लेषण 

    स्वामी दयानंद सरस्वती का दृष्टिकोण सायण, महिधर और वेदार्थदीपिका जैसे पारंपरिक वेद भाष्यकारों से अधिक निकट है, जहाँ 'भरत' एक ऐतिहासिक और वीर वंश या गण के रूप में व्याख्यायित है और इन्द्र-अग्नि उनकी बाह्य विजय में सहायक देवता हैं।

    इसके विपरीत, महर्षि अरविंद का दृष्टिकोण हमारी दार्शनिक और आध्यात्मिक व्याख्या के अत्यंत समीप है। उन्होंने 'भरत' को आत्मा का साधक माना है, जो आंतरिक शत्रुओं (अज्ञान, अहंकार) से संघर्ष करता है और इन्द्र-अग्नि (दिव्यता और प्रकाश) की सहायता से आत्म-विजय प्राप्त करता है। यह पूर्णतः हमारे जैन और आध्यात्मिक परिप्रेक्ष्य से मेल खाता है।

    ✅ निष्कर्ष:

    ऋग्वेद में 'भरत' का उल्लेख वीरता, धर्म, और इन्द्र-अग्नि जैसे देवताओं की कृपा प्राप्त वंश के रूप में होता है। 'भरत' केवल एक जाति या वंश नहीं, बल्कि एक ऐसा प्रतीक है जो सत्य, धर्म और विजय के मार्ग पर अग्रसर है।

    ऋग्वेदीय भाष्य में  'भरत' बनाम पौराणिक 'भरत चक्रवर्ती' — तुलनात्मक सार-तालिका

    पक्ष / तत्वऋग्वेद भाष्य के 'भरत' (Vedic Bharat)पौराणिक 'भरत चक्रवर्ती' (Puranic Bharat Chakravarti)
    उल्लेख स्रोतऋग्वेद, सायण, महिधर, उदिताचार्य, वेदार्थदीपिकाभागवत पुराण, विष्णु पुराण, जैन आगम, त्रिषष्टिशलाका पुरुष चरित्र
    अर्थ / स्वरूपयुद्धप्रिय क्षत्रिय वंश / गण (Tribe/Clan)तीर्थंकर ऋषभदेव का पुत्र, चक्रवर्ती सम्राट
    मुख्य भूमिकाइन्द्र-अग्नि द्वारा संरक्षण प्राप्त योद्धा गणधर्म, सत्य और शक्ति का प्रतिष्ठापक, भारतवर्ष का नामदाता
    दार्शनिक दृष्टि सेबाह्य विजय और युद्ध में श्रेष्ठ क्षत्रिय वंशआत्म-धर्म में स्थित, सम्पूर्ण क्षत्रिय वंश का आदिपुरुष, आंतरिक विजय का आदर्श
    इन्द्र का संबंधइन्द्र भरत गण का रक्षक, शत्रु विनाशकजैन परंपरा में इन्द्र स्वयं भरत-ऋषभदेव की पूजा करता है
    भारतवर्ष नामकरण संबंधअप्रासंगिक (कोई सीधा उल्लेख नहीं)भरत चक्रवर्ती के नाम पर 'भारतवर्ष' की प्रतिष्ठा
    सांस्कृतिक स्थानएक वीर योद्धा वंश, ऋग्वैदिक आर्यों का प्रमुख गणआदर्श धर्म-सम्राट, चक्रवर्ती, सम्पूर्ण भारत का सांस्कृतिक प्रतीक
    भाष्यकारों की मान्यतासायण, महिधर, उदिताचार्य — केवल 'गण' अर्थपुराण, भागवत, जैन आगम — चक्रवर्ती अर्थ
    सीधा संबंध ऋषभदेव से❌ नहीं ✅ हाँ — ऋषभदेव पुत्र भरत

    अंतिम निष्कर्ष 

    • ऋग्वेद भाष्यों में 'भरत' = वीर क्षत्रिय वंश या गण, कोई चक्रवर्ती व्यक्तित्व नहीं।
    • पुराण-जैन परंपरा में 'भरत' = ऋषभदेव पुत्र, चक्रवर्ती सम्राट, भारतवर्ष का प्रतिष्ठापक
    • दार्शनिक और सांस्कृतिक दृष्टि से दोनों का मेल संभव है, किंतु शाब्दिक रूप से दोनों की अलग पहचान है।
    • यहाँ यह स्पष्ट करना अत्यंत आवश्यक है की सभी वैदिक भाष्य कि रचना वेदों की रचना से लगभग 3000 वर्षों के बाद हुई. यह काल खंड पौराणिक एवं जैन आगमों यहाँ तक की मूल जैन कथा साहित्य की रचना के समय से भी बहुत बाद का है. वेदों के भाष्यों को ही वेद मान लेना किसी भी प्रकार से युक्तिसंगत एवं बुद्धिमत्तापूर्ण नहीं है.
    • पुराण शब्द का अर्थ ही प्राचीन है अर्थात श्रुति के माध्यम से उपलब्ध ज्ञान के भंडार को पुराणों में संचित किया गया. 
    • सभी पुराण एक मत से ऋषभदेव एवं भरत की महत्ता को रेखांकित करते हैं एवं भारतवर्ष का नामकरण ऋषभदेव के पुत्र भरत पर होना मानते हैं. जैन और पौराणिक मतों में अत्यंत साम्यता है. पुराणों की प्राचीनता एवं प्राचीन जैन आगमों से समानता ही इसकी सत्यता का सबसे बड़ा प्रमाण है. 
    • इसलिए प्राचीन पौराणिक उद्धरणों के मुकाबले अर्वाचीन वैदिक भाष्यों की व्याख्या को अंतिम सत्य नहीं माना जा सकता है. 

    परिशिष्ट 

    ✅ आधुनिक विद्वानों की दृष्टि और सांस्कृतिक प्रतीक:

    Several scholars have interpreted the term 'Bharat' in the Rigveda as representing the broader cultural and spiritual identity of India, aligning it with the concept of 'Bharatvarsha.' Notable among them are:

    1. B. D. Chattopadhyaya: In his anthology, The Concept of Bharatavarsha and Other Essays, Chattopadhyaya examines the socio-political and cultural developments in ancient India, discussing how the idea of 'Bharatavarsha' symbolizes the enduring cultural unity and identity of the Indian subcontinent. (hasp.ub.uni-heidelberg.de)

    2. David Frawley: In The Rig Veda and the History of India, Frawley posits that the Rigvedic references to the Bharatas reflect the foundational culture that spread throughout India, giving the land its traditional name, Bharatavarsha. He suggests that the Rigveda serves not only as a spiritual document but also as a record of the early socio-political landscape of ancient India. (exoticindiaart.com)

    3. Shrikant G. Talageri: In his work, The Rigveda: A Historical Analysis, Talageri explores the historical and cultural significance of the Rigvedic hymns, asserting that the Bharatas mentioned therein were instrumental in shaping the cultural identity that evolved into the concept of Bharatavarsha. (ia801707.us.archive.org)

    These interpretations highlight a perspective that views the Rigvedic 'Bharat' not merely as a tribe but as a representation of the emerging cultural and spiritual ethos that eventually defined the Indian subcontinent as Bharatavarsha.


    Thanks, 
    Jyoti Kothari 
    (Jyoti Kothari, Proprietor, Vardhaman Gems, Jaipur represents Centuries Old Tradition of Excellence in Gems and Jewelry. He is an adviser, at Vardhaman Infotech, a leading IT company in Jaipur. He is also an ISO 9000 professional)

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