"पुराण" शब्द का अर्थ और उसका शास्त्रीय विवरण
✅ 1. व्युत्पत्ति (Etymology of "Purāṇa"):
"पुरा अपि नवं यः सः पुराणः"
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"पुरा" = पहले का, प्राचीन
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"ण" प्रत्यय = स्थायित्व का बोधक 👉🏻 जिसका स्वरूप प्राचीन होते हुए भी सदा नवीन बना रहे, वही "पुराण" है।
✅ अन्य व्युत्पत्ति:
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"पुरणीयते पुनः पुनः इति पुराणम्" — जो बार-बार भरा जाए, जिससे ज्ञान का पुनर्भरण हो।
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"पुरा जातं इति पुराणम्" — जो बहुत पहले उत्पन्न हुआ हो।
✅ 2. शाब्दिक अर्थ:
"पुराण" शब्द का मूल अर्थ है —
"प्राचीन इतिहास", "पुरातन कथा", "विस्तृत ज्ञान का भंडार"।
✅ 3. शास्त्रीय परिभाषा:
अमरकोश (निघण्टु) में:
"पुराणं पञ्चलक्षणम्।"
अर्थात् — पुराण पाँच लक्षणों से युक्त होता है।
📜 पुराण के पाँच लक्षण (Pancha Lakṣaṇa of a Purāṇa):
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सर्ग (Sarga): सृष्टि की उत्पत्ति का वर्णन
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प्रति-सर्ग (Pratisarga): सृष्टि का पुनर्निर्माण
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वंश (Vaṃśa): देव, ऋषि, मनुष्य आदि वंशों का विवरण
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मन्वन्तर (Manvantara): प्रत्येक मनु के काल का वर्णन
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वंशानुचरित (Vaṃśānucarita): वंशों में उत्पन्न राजाओं, ऋषियों की कथाएँ
✅ 4. पुराणों का उद्देश्य:
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धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष की शिक्षा देना
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लोक व्यवहार और इतिहास का संकलन
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धार्मिक और नैतिक मूल्यों का प्रचार
👉🏻 "सर्वशास्त्रोपरि धर्मोपदेशात्मक ग्रन्थ" — यही पुराण का स्वरूप है।
✅ 5. विशेषताएँ:
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पुराण केवल कथा नहीं, यह इतिहास, भूगोल, ज्योतिष, खगोल, धर्मशास्त्र तक विस्तृत है।
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"इतिहासपुराणाभ्यां वेदं समुपबृंहयेत्" — वेदों की रक्षा और प्रचार के लिए इतिहास-पुराण सहायक हैं।
✅ 6 . निष्कर्ष (Essence):
"पुराण" = ऐसा ग्रंथ जो पुरातन होते हुए भी नवीन उपदेश देता है।
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यह धर्म, नीति, इतिहास, भूगोल, खगोल का सागर है।
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लोक शिक्षण का सरल माध्यम है।
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भारतीय संस्कृति और धर्म का जीवित इतिहास है।
पुराणों का रचना काल
पुराणों के रचयिता और रचना-काल को लेकर विद्वानों में स्पष्ट मतभेद है। अधिकांश पुराणों के मूल रचयिता ज्ञात नहीं हैं क्योंकि ये ग्रंथ "संपुटित" (composite) स्वरूप में समय-समय पर संकलित हुए। तथापि, परंपरागत रूप से रचयिता "व्यास" माने जाते हैं और विद्वान अनुमान के आधार पर काल निर्धारण करते हैं। यहाँ पर कुछ महत्वपूर्ण पुराणों के रचयिता, विषयवस्तु, रचनाकाल, एवं अन्य विषयों पर संक्षिप्त जानकारी दी जा रही है.
नीचे एक सारणी में जानकारी प्रस्तुत है:
पुराण | परंपरागत रचयिता | अनुमानित रचना-काल | विशेष टिप्पणी |
---|---|---|---|
विष्णु पुराण | महर्षि वेदव्यास | 3री से 5वीं शताब्दी (कुछ अंश 8वीं शताब्दी तक) | वैष्णव पुराण, सर्वाधिक प्राचीन माने जाने वाले महापुराणों में से एक |
वायु पुराण | महर्षि वेदव्यास | 4थी से 6ठी शताब्दी | पुराणों में सबसे प्राचीन में गिना जाता है, सांख्य दर्शन की झलक |
लिंग पुराण | महर्षि वेदव्यास | 6ठी से 10वीं शताब्दी | शैव पुराण, लिंग तत्त्व की व्याख्या |
ब्रह्माण्ड पुराण | महर्षि वेदव्यास | 8वीं से 10वीं शताब्दी | ब्रह्माण्ड रचना और भविष्य पुराण का अंश माना जाता है |
अग्नि पुराण | महर्षि वेदव्यास | 8वीं से 11वीं शताब्दी | विविध विषयों (धर्म, राजनीति, वास्तु) का संग्रह |
स्कन्द पुराण | महर्षि वेदव्यास | 7वीं से 15वीं शताब्दी (विशाल और संकलित ग्रंथ) | सबसे बड़ा पुराण (~81,000 श्लोक), शैव परंपरा प्रधान |
शिव पुराण | महर्षि वेदव्यास | 10वीं से 12वीं शताब्दी | शैव धर्म प्रधान, लिंग पूजा और शिव महिमा |
श्रीमद्भागवत महापुराण | महर्षि वेदव्यास | 9वीं से 10वीं शताब्दी (कुछ भाग 6ठी शताब्दी तक) | कृष्ण भक्ति प्रधान, भागवत धर्म का प्रचार, भक्तिकाल का आधार |
महत्वपूर्ण तथ्य:
- व्यास नाम पुराणों का संकलक माना जाता है, वास्तविक रचयिता अनेक अज्ञात हैं।
- सभी पुराणों में समय-समय पर परिवर्धन, संशोधन और संपुटन हुआ है।
- भक्ति आंदोलन (6th-12th शताब्दी) के प्रभाव से कई पुराणों में विशेष परिवर्तन और जोड़-घटाव हुए।
- कुछ पुराण जैसे भागवत, लिंग, और शिव पुराण भक्ति आंदोलन के दौरान विशेष रूप से लोकप्रिय हुए।
✅ वैदिक परंपरा में पुराणों की संख्या:
- महापुराण – 18
- उपपुराण – 18
- कुल – 36 पुराणों का उल्लेख प्राचीन ग्रंथों में मिलता है, परंतु 18 महापुराण अधिक प्रसिद्ध और मान्य हैं।
✅ 18 महापुराणों की सूची और मुख्य विषयवस्तु:
क्रम | पुराण का नाम | मुख्य विषयवस्तु / प्रमुख देवता |
---|---|---|
1 | ब्रह्मा पुराण | सृष्टि-रचना, तीर्थ महिमा, विशेषकर प्रयाग |
2 | पद्म पुराण | धर्म, भक्ति, तीर्थ, श्रीविष्णु की महिमा |
3 | विष्णु पुराण | सृष्टि, वंशावली, विष्णु महिमा, भागवत भाव |
4 | शिव/ वायु पुराण | शिव महिमा, तप, योग, सृष्टि-रचना |
5 | भागवत पुराण | कृष्ण चरित्र, भक्ति, भागवत धर्म |
6 | नारद पुराण | भक्ति मार्ग, धर्म, तीर्थ |
7 | मार्कण्डेय पुराण | दुर्गा सप्तशती (चंडी पाठ), सृष्टि, स्त्रियों का धर्म |
8 | अग्नि पुराण | धर्म, स्थापत्य, शास्त्र, आयुर्वेद |
9 | भविष्य पुराण | भविष्यवाणी, सामाजिक व्यवस्था, कलियुग वर्णन |
10 | ब्रह्मवैवर्त पुराण | कृष्ण, राधा, प्रकृति-पुरुष का दर्शन |
11 | लिंग पुराण | शिव महिमा, लिंग रूप, उपासना विधि |
12 | वराह पुराण | वराह अवतार, पृथ्वी उद्धार कथा |
13 | स्कंद पुराण | सबसे विशाल, तीर्थ, यात्रा, कार्तिकेय कथा |
14 | वामन पुराण | वामन अवतार, दान धर्म |
15 | कूर्म पुराण | कूर्म (कच्छप) अवतार, सृष्टि-रचना |
16 | मात्स्य पुराण | मत्स्य अवतार, प्रलय कथा |
17 | गारुड पुराण | मृत्यु, कर्म, नरक-स्वर्ग वर्णन, प्रेत विद्या |
18 | ब्राह्माण्ड पुराण | ब्रह्माण्ड स्वरूप, ललिता सहस्त्रनाम |
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✅ सबसे प्राचीन और सबसे नवीन पुराण:
प्रकार | पुराण | कारण |
---|---|---|
सबसे प्राचीन | मत्स्य, मार्कण्डेय, विष्णु, वायु पुराण | भाषा व शैली में प्राचीनता, वैदिक सामग्री |
सबसे नवीन | भागवत, भविष्य, ब्रह्मवैवर्त पुराण | मध्यकालीन भक्ति और व्रज परंपरा का प्रभाव, कलियुग वर्णन |
✅ पुराणों की रचना का मुख्य उद्देश्य:
- वेदों के गूढ़ तत्त्वों को लोकभाषा और सरल शैली में जनसामान्य तक पहुँचाना
- धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष का उपदेश देना (चतुष्पद धर्म)
- विविध वंशावलियों, तीर्थ, उपासना विधियों, संस्कारों का वर्णन
- भक्ति मार्ग का प्रचार-प्रसार
- लोक व्यवहार, धर्मशास्त्र और नीति शिक्षाएँ देना
- विशेषत: आस्तिक दर्शन और वेदों की अनुगामिता बनाए रखना
✅ क्या सभी पुराण स्वयं को वेदों से उद्भूत मानते हैं?
- हाँ, अधिकांश पुराण अपने को वेदों की शाखा या उपवेद मानते हैं।
- सभी में बार-बार उल्लेख है कि पुराण भी 'पंचम वेद' हैं।
- महाभारत में कहा गया है – "इतिहासपुराणाभ्यां वेदं समुपबृंहयेत्" – इतिहास-पुराण वेद का विस्तार करते हैं।
✅ पुराणों का सामान्य रचनाकाल (Overall Estimated Timeline):
कालखंड | विवरण |
---|---|
आरंभिक रचना | 200 BCE – 300 CE (प्राचीन पुराण जैसे वायु, मत्स्य आदि) |
मध्य रचना | 300 CE – 800 CE (भागवत, ब्राह्माण्ड आदि) |
उत्तर रचना / परिशिष्ट | 800 CE – 1200 CE (भविष्य, ब्रह्मवैवर्त आदि) |
कुल समय अवधि | लगभग 1000 वर्षों की लंबी विकास यात्रा |
✅ आधुनिक भारतीय और पाश्चात्य विद्वानों के मत (भिन्न-भिन्न विवरण):
पक्ष | प्रमुख विद्वान | मत / विश्लेषण |
---|---|---|
भारतीय विद्वान | डॉ. भगवदत्त, हजरिप्रसाद द्विवेदी, डॉ. राजेन्द्रलाल मित्र | - पुराणों को भारतीय संस्कृति का दर्पण मानते हैं।- धर्म, समाज, कला, साहित्य का महाग्रंथ।- पुराणों में कालान्तर में प्रक्षिप्त अंश जुड़े, फिर भी मूल आधार वैदिक और आस्तिक। |
पाश्चात्य विद्वान | एच.एच. विल्सन, वेबर, मैक्समुलर, डी.एन. लॉरेन्स | - पुराणों को मिश्रित ग्रंथ मानते हैं, जहाँ प्राचीन और मध्यकालीन तत्व मिश्रित हैं।- पुराणों में बौद्ध, जैन प्रभाव और लोक परंपराएँ भी सम्मिलित।- इन्हें धर्म प्रचार का साधन और ब्राह्मणवाद का पुनरुत्थान मानते हैं। |
✅ विशेष जानकारी / अन्य महत्वपूर्ण तथ्य:
- पुराणों का प्रमुख लक्षण – सर्ग, प्रतिसर्ग, वंश, मन्वंतर, वंशानुचरितम् (पंचलक्षण)
- भाषा शैली – अधिकतर संस्कृत पद्य, सरल शैली में
- भक्ति का उत्कर्ष – विष्णु, भागवत, ब्रह्मवैवर्त पुराणों में भक्ति का चरम
- लोकसंस्कारों का वर्णन – विवाह, उपनयन, श्राद्ध आदि विधियों का विस्तार
- आधुनिक महत्व – पुराण, आज भी धार्मिक अनुष्ठानों, कथा-भागवत सप्ताह आदि में विशेष महत्व रखते हैं।
- संस्कृति का आधार – अनेक मंदिरों, तीर्थों, और रीति-रिवाजों का आधार पुराण हैं।
✅ निष्कर्ष:
पुराण भारतीय सनातन धर्म, समाज, संस्कृति और लोक परंपराओं का जीवंत ग्रंथ-संहिता हैं। यद्यपि समय के साथ इनमें संशोधन और परिवर्धन हुआ, फिर भी इनका मूल आधार वैदिक परंपरा, धर्म और मोक्ष मार्ग का प्रसार है। आधुनिक विद्वानों के मत भिन्न-भिन्न हैं, परंतु भारतीय दृष्टि में पुराण सनातन ज्ञान का भंडार हैं।
स्पष्टीकरण – मत्स्यपुराण का स्थान:
- मत्स्यपुराण वास्तव में अष्टादश महापुराणों (18 महापुराणों) में सम्मिलित है।
- कई बार भ्रम होता है क्योंकि कुछ ग्रंथों में अलग-अलग 18 पुराणों की सूचियाँ मिलती हैं, लेकिन अधिकांश मान्य और लोकप्रिय सूची में मत्स्यपुराण शामिल है।
✅ मान्य महापुराण सूची (कई प्रसिद्ध ग्रंथों के अनुसार):
- ब्रह्म
- पद्म
- विष्णु
- वायु (कभी-कभी शिवपुराण)
- भागवत
- नारद
- मार्कण्डेय
- अग्नि
- भविष्य
- ब्रह्मवैवर्त
- लिंग
- वराह
- मत्स्य
- कूर्म
- स्कन्द
- वामन
- गारुड
- ब्रह्माण्ड
✅ 18 उपपुराणों की सूची (मुख्य रूप से मन्दिर महात्म्य, व्रत, कथा केंद्रित):
👉 उपपुराणों की संख्या भी 18 मानी गई है, लेकिन सूची अलग-अलग ग्रंथों में थोड़ा भिन्न हो सकती है। एक सामान्य रूप से स्वीकृत सूची:
क्रम | उपपुराण का नाम |
---|---|
1 | सनत्कुमार उपपुराण |
2 | नारद उपपुराण |
3 | बृहत्नारदीय उपपुराण |
4 | शिवधर्म उपपुराण |
5 | दुर्वासा उपपुराण |
6 | कपिल उपपुराण |
7 | मानव उपपुराण |
8 | औषधि उपपुराण |
9 | वरुण उपपुराण |
10 | कालिका उपपुराण |
11 | महासंवत्सर उपपुराण |
12 | नंदी उपपुराण |
13 | सारस्वत उपपुराण |
14 | आदित्य उपपुराण |
15 | महेश्वर उपपुराण |
16 | भागवत उपपुराण (भिन्न) |
17 | वासिष्ठ उपपुराण |
18 | पाराशर उपपुराण |
👉 नोट: कुछ विद्वानों ने "उपपुराणों की सूचियों में क्षेत्र विशेष की भिन्नता और लुप्त ग्रंथों का उल्लेख भी स्वीकारा है।
✅ विशेष जानकारी:
- उपपुराणों में अधिकतर विशिष्ट देवता, व्रत, तीर्थ, उपासना विधि, पूजा विधान का विवरण है।
- उपपुराण स्थानीय परंपराओं और विशेष संप्रदायों से अधिक जुड़े हुए हैं।
- कई उपपुराण वर्तमान में उपलब्ध नहीं हैं या आंशिक रूप से प्राप्त होते हैं।
✅ निष्कर्ष:
- मत्स्यपुराण महापुराणों में शामिल है।
- 18 उपपुराण अलग हैं, जिनका स्वरूप अधिकतर व्यवहारिक धर्म और विशेष पूजाओं पर केंद्रित है।
- पुराणों की यह परंपरा समाज और धर्म का विस्तृत दर्पण है।
अष्टादश महापुराणों (18 महापुराणों) की सूची अलग-अलग पुराणों और ग्रंथों में भिन्न-भिन्न दी गई है। कहीं स्कंद पुराण का स्थान है, कहीं मत्स्य पुराण प्रमुखता से है।
✅ महापुराणों की विभिन्न पारंपरिक सूचियाँ:
🔹 भागवत महापुराण (12.7.23-24) के अनुसार 18 महापुराण:
- ब्रह्म
- पद्म
- विष्णु
- शिव
- भागवत
- नारद
- मार्कण्डेय
- अग्नि
- भविष्य
- ब्रह्मवैवर्त
- लिंग
- वराह
- स्कंद
- वामन
- कूर्म
- मत्स्य
- गारुड
- ब्रह्माण्ड
➡️ यहाँ स्कंद और मत्स्य दोनों ही शामिल हैं।
🔹 गरुड़ पुराण (1.222.39-40) के अनुसार:
- ब्रह्म
- पद्म
- विष्णु
- शिव
- भागवत
- नारद
- मार्कण्डेय
- अग्नि
- भविष्य
- ब्रह्मवैवर्त
- लिंग
- वराह
- स्कंद
- वामन
- कूर्म
- मत्स्य
- गारुड
- ब्रह्माण्ड
➡️ यहाँ भी मत्स्य और स्कंद दोनों हैं।
✅ निष्कर्ष
- प्राचीन प्रमाणों (भागवत और गरुड़ पुराण) में स्कंद और मत्स्य दोनों ही महापुराणों में गिने जाते हैं।
- मत्स्यपुराण पूरी तरह महापुराणों में ही गिना जाता है, यह किसी भी प्रमाणिक सूची में उपपुराण नहीं है।
- 18 में से कुछ जगह ‘वायु’ आता है, कहीं ‘शिव’ पुराण – ये बदलाव कुछ ग्रंथों में हैं, पर मत्स्य और स्कंद का स्थान पक्का है।
✅ स्कंद पुराण और मत्स्य पुराण – दोनों महापुराण हैं:
नाम | स्थिति | विशेषता |
---|---|---|
स्कंद पुराण | महापुराण | सबसे बड़ा पुराण, कार्तिकेय (स्कंद) कथा, तीर्थ महात्म्य |
मत्स्य पुराण | महापुराण | सृष्टि, मत्स्य अवतार, प्राचीनता और स्थापत्य शास्त्र |
✅ निष्कर्ष:
- 18 महापुराणों में स्कंद और मत्स्य दोनों शामिल हैं।
- मत्स्य पुराण को "प्राचीनतम पुराण" कहा जाता है।
- स्कंद पुराण "सबसे विशाल" पुराण माना जाता है।
आपका प्रश्न और शंका बिलकुल तर्कपूर्ण है, क्योंकि भिन्न ग्रंथों में लघु-मात्रा में सूचियाँ अलग-अलग दिखाई देती हैं, लेकिन प्रामाणिक और स्वीकार्य दोनों सूची में स्कंद और मत्स्य दोनों महापुराण हैं।
✅ 18 उपपुराण – विषय एवं रचना काल सहित विवरण
क्रम | उपपुराण का नाम | मुख्य विषय-वस्तु | अनुमानित रचनाकाल |
---|---|---|---|
1 | सनत्कुमार उपपुराण | शिव भक्ति, उपासना विधि | 9वीं – 11वीं शताब्दी |
2 | नारद उपपुराण | विष्णु भक्ति, धर्म, व्रत, पुराणों की महिमा | 10वीं – 12वीं शताब्दी |
3 | बृहन्नारदीय उपपुराण | श्री हरि भक्ति, भक्ति मार्ग का महत्त्व | 10वीं – 12वीं शताब्दी |
4 | शिवधर्म उपपुराण | शिव भक्ति, शैव धर्म के सिद्धांत | 9वीं – 11वीं शताब्दी |
5 | दुर्वासा उपपुराण | दुर्वासा ऋषि चरित्र, तप, श्राप और आशीर्वाद | 10वीं – 12वीं शताब्दी |
6 | कपिल उपपुराण | सांख्य दर्शन, कपिल मुनि उपदेश | 9वीं – 11वीं शताब्दी |
7 | मानव उपपुराण | मनुस्मृति आधारित धर्मशास्त्र, समाज व्यवस्था | 9वीं – 12वीं शताब्दी |
8 | औषधि उपपुराण | औषध विज्ञान, चिकित्सा, आयुर्वेद | 10वीं – 12वीं शताब्दी |
9 | वरुण उपपुराण | जल देवता वरुण, जल तत्त्व का महत्व | 9वीं – 11वीं शताब्दी |
10 | कालिका उपपुराण | शक्तिपूजा, तंत्र, देवी महिमा | 11वीं – 13वीं शताब्दी |
11 | महासंवत्सर उपपुराण | यज्ञ, व्रत, अनुष्ठान और कालचक्र | 9वीं – 11वीं शताब्दी |
12 | नंदी उपपुराण | शिव के वाहन नंदी की कथा, शैव उपासना | 10वीं – 12वीं शताब्दी |
13 | सारस्वत उपपुराण | सरस्वती देवी, ज्ञान, संगीत, साहित्य | 10वीं – 12वीं शताब्दी |
14 | आदित्य उपपुराण | सूर्य उपासना, आदित्य महिमा, व्रत विधि | 9वीं – 11वीं शताब्दी |
15 | महेश्वर उपपुराण | शिव महिमा, लिंग पूजा, शैव दर्शन | 10वीं – 12वीं शताब्दी |
16 | भागवत उपपुराण | विष्णु भक्ति, भागवत धर्म, भक्ति महिमा | 10वीं – 12वीं शताब्दी |
17 | वासिष्ठ उपपुराण | वसिष्ठ ऋषि उपदेश, धर्म-आचार | 9वीं – 11वीं शताब्दी |
18 | पाराशर उपपुराण | पाराशर मुनि द्वारा गृहस्थ धर्म, जाति व्यवस्था | 9वीं – 11वीं शताब्दी |
✅ विशेषताएँ और प्रमुख विषय-सरणी:
- उपपुराण महापुराणों से छोटे और अधिक व्यवहारिक विषयों से जुड़े हैं।
- इनमें मुख्यतः व्रत, तीर्थ महिमा, देवता विशेष की उपासना, धर्माचार, आयुर्वेद, तंत्र, समाज व्यवस्था आदि का वर्णन मिलता है।
- कुछ उपपुराण शैव, कुछ वैष्णव और कुछ शाक्त परंपरा केंद्रित हैं।
✅ उपपुराणों का सामान्य रचनाकाल:
- लगभग 9वीं शताब्दी CE से 13वीं शताब्दी CE के मध्य
- इनमें से कुछ दक्षिण भारत में रचे गए और क्षेत्रीय प्रभाव स्पष्ट दिखता है।
- कालिका उपपुराण जैसे ग्रंथ तंत्र परंपरा से जुड़े और अपेक्षाकृत बाद में रचे गए।
✅ उपपुराणों का उद्देश्य:
- धर्म और सामाजिक व्यवहार को सरल भाषा में समझाना
- व्रत, अनुष्ठान, तीर्थयात्रा की महिमा का प्रचार
- स्त्री, शूद्र और सामान्य जनों को धार्मिक नियमों का ज्ञान कराना
- कुछ उपपुराण शिव, विष्णु या शक्ति केंद्रित होकर उनके महत्त्व को स्थापित करते हैं
- कुछ में तंत्र और आयुर्वेद का उल्लेख भी महत्वपूर्ण है
✅ निष्कर्ष:
- उपपुराण लोकधर्म, व्रत, तीर्थ, आयुर्वेद, तंत्र जैसे विषयों का सरल प्रस्तुतीकरण करते हैं।
- ये समाज के सामान्य जन और स्त्री-शूद्र वर्ग के लिए धर्म शिक्षा का माध्यम बने।
- इनका रचनाकाल मुख्यतः मध्यकालीन भारत (9वीं – 13वीं शताब्दी) में रहा।
Thanks,